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Saadhana Paada / Means / 17
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Saadhana Paada / Means / 17

द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः॥१७॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 17

In Hindi:

पदपाठ : द्रष्टृदृश्ययोः संयोगः हेयहेतुः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तस्माद्यदेव हेयमित्युच्यते तस्यैव कारणं प्रतिनिर्दिश्यते—

हिंदी में अर्थ : (तस्मात्) इसलिए (यदेव) जो ही (हेयम् इति उच्यते) त्याग करने योग्य कहा है (तस्य एव) उस अनागत दुःख का (कारणम्) कारण (प्रतिनिर्दिश्यते) बताया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (द्रष्टृदृश्ययोः) द्रष्टा = पुरुष = जीवात्मा तथा दृश्य = प्रधान = प्रकृति (सत्त्व, रज और तम गुणों का समुदाय) तथा उससे उत्पन्न बुद्धि आदि विकारों का जो (संयोगः) संयोग = सम्बन्ध होना है, वह (हेयहेतुः) त्यागने योग्य दुःखों का कारण है।

व्यास भाष्य : द्रष्टा बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः। दृश्या बुद्धिसत्त्वोपारूढाः सर्वे धर्माः। तदेतद्दृश्यमयस्कान्तमणिकल्पं सन्निधिमात्रोपकारि दृश्यत्वेन स्वं भवति पुरुषस्य दृशिरूपस्य स्वामिनः अनुभवकर्मविषयतामापन्नं यतः। अन्यस्वरूपेण प्रतिलब्धात्मकम्। स्वतन्त्रमपि परार्थत्वात्परतन्त्रम्। तयोर्दृग्दर्शनशक्त्योरनादिरर्थकृतः संयोगो हेयहेतुर्दुःखस्य कारणमित्यर्थः।

तथा चोक्तम्—तत्संयोगहेतुविवर्जनात्स्यादयमात्यन्तिको दुःखप्रतीकारः। कस्मात्? दुःखहेतोः परिहार्यस्य प्रतिकारदर्शनात्। तद्यथा—पादतलस्य भेद्यता, कण्टकस्य भेत्तृत्वं, परिहारः कण्टकस्य पादानधिष्ठानं पादत्राणव्यवहितेन वाऽधिष्ठानम्। एतत्त्रयं यो वेद लोके स तत्र प्रतीकारमारभमाणो भेदजं दुःखं नाप्नोति। कस्मात्? त्रित्वोपलब्धिसामर्थ्यादिति। अत्रापि तापकस्य रजसः सत्त्वमेव तप्यम्। कस्मात्? तपिक्रियायाः कर्मस्थत्वात्। सत्त्वे कर्मणि तपिक्रिया नापरिणामिनि निष्क्रिये क्षेत्रज्ञे। दर्शितविषयत्वात्सत्त्वे तु तप्यमाने तदाकारानुरोधी पुरुषोऽनुतप्यत इति॥

हिंदी में अर्थ : (द्रष्टाः) द्रष्टा का अर्थ — (बुद्धेः) बुद्धि का = बुद्धिगत समस्त प्रकृति जन्य भोगों का (प्रतिसंवेदी) अनुभव करने वाला (पुरुषः) पुरुष है। (दृश्याः) दृश्य का अर्थ — (बुद्धिसत्त्वोपारूढाः) बुद्धि सत्त्व = चित्त पर आरूढ़ हुए = प्राप्त हुए (सर्वे धर्माः) प्रकृति के समस्त धर्म हैं। (तत्) वह (एतत्) यह (दृश्यम्) दृश्य = बुद्धि सत्त्व (अयस्कान्तमणिकल्पम्) अयस्कान्तमणि के समान (सन्निधिमात्रोपकारि) समीप होने मात्र से (पुरुष का) उपकार करने वाला, (दृश्यत्वेन) दृश्य होने के कारण, (दृशिरूपस्य) द्रष्टा = भोक्ता (स्वामिनः) स्वामी रूप (पुरुषस्य) पुरुष का (स्वम्) स्व = सम्पत्ति (भवति) बनता है; (यतः) क्योंकि यह दृश्य (अनुभवकर्मविषयताम्) पुरुष के अनुभव = भोग रूपी कर्म विषयता को (आपन्नम्) प्राप्त हो जाता है। (अन्यस्वरूपेण) अपने से भिन्न अन्य अर्थात् पुरुष के स्वरूप से चेतनवत् रूप को (प्रतिलब्धात्मकम्) प्राप्त होकर (स्वतन्त्रम् अपि) जगत् की उपादानता में स्वतन्त्र कारण होता हुआ भी अथवा जड़ प्रकृति का पुरुष के समान नित्य स्वतन्त्र सत्ता वाला पदार्थ होने पर भी (परार्थत्वात्) अपने से भिन्न पुरुष के भोगापवर्ग हेतु होने के कारण से (परतन्त्रम्) परतन्त्र = पुरुष के अधीन है। (तयोः) उन दोनों द्रष्टा और दृश्य अर्थात् (दृग्दर्शनशक्त्योः) दृक् और दर्शन शक्ति का जो (अनादिः) अनादि कालीन = प्रवाह से अनादि (अर्थकृतः) पुरुषार्थ = पुरुष के अर्थ के लिए होने वाला (संयोगः) संयोग = सम्बन्ध (हेयहेतुः) हेय का हेतु अर्थात् (दुःखस्य) दुःख का (कारणम्) कारण है; (इति अर्थः) यह अर्थ है।

(च) और (तथा उक्तम्) वैसा कहा है — (तत् संयोगहेतुविवर्जनात्) उस प्रकृति-पुरुष के संयोग के कारण को दूर करने से (अयम्) यह (दुःखप्रतीकारः) दुःख का प्रतिकार = नाश (आत्यन्तिकः) अत्यन्त रूप से (स्यात्) हो जाता है। (कस्मात्) कैसे ? क्योंकि (परिहार्यस्य) परिहार = दूर करने योग्य (दुःखहेतोः) दुःख के कारण का (प्रतिकारदर्शनात्) प्रतिकार = निवृत्ति देखे जाने से। अर्थात् कारण को दूर करने से कार्य का अभाव होता है। (तद् यथा) वह जैसे कि — “(पादतलस्य) पैर के तलुए का (भेद्यता) बिध जाना” यह दुःख है; “(कण्टकस्य) काँटे का (भेत्तृत्वम्) पैर को बीधना” यह दुःख का कारण है; “(कण्टकस्य परिहारः) काँटे का परिहार” यह बेधन-दुःख को दूर करने का उपाय है, अतः “(पादानधिष्ठानम्) काँटे पर पैर न रखना, (वा) अथवा (पादत्राणव्यवहितेन) जूते के व्यवधान से = जूते को पहनकर (अधिष्ठानम्) काँटे पर पैर को रखना” इससे काँटे से बिधने का दुःख दूर हो जाता है। (एतत् त्रयम्) इन तीन बातों को (यः) जो (वेदः) जानता है; (लोके) इस लोक में (सः) वह (तत्र) वहाँ (उस काँटे से मिलने वाले दुःख के प्रसङ्ग में) (प्रतीकारम्) दुःख के कारण का प्रतिकार (आरभमाणः) करता हुआ (भेदजम्) भेदज काँटे से होने वाले (दुःखम्) दुःख को (न आप्नोति) प्राप्त नहीं करता। (कस्मात्) क्यों ? क्योकि (त्रित्वोपलब्धिसामर्थ्यात् इति) तीनों बातों = भेद्यत्व, भेदकत्व और प्रतिकार के यथायोग्य ज्ञान का सामर्थ्य होने से।

वैसे ही (अत्र अपि) यहाँ भी (दुःखभोग के प्रसङ्ग में भी) (तापकस्य रजसः) दुःख देने वाले रजोगुण का (सत्त्वम् एव) बुद्धिस्थ = चित्तस्थ सत्त्वगुण ही (तप्यम्) तपाने वाला है। (कस्मात्) कैसे ? क्योंकि (तपिक्रियायाः) ताप रूप क्रिया के (कर्मस्थत्वात्) कर्म में स्थित होने के कारण से। (तपिक्रिया) दुःख प्राप्ति रूप क्रिया (सत्त्वे कर्मणि) सत्त्व गुण रूप कर्म में होती है; (अपरिणामिनि) अपरिणामी = गुणों के परिणाम से रहित; और (निष्क्रिये) क्रिया रहित = प्राकृतिक पदार्थों की क्रियाओं से रहित (क्षेत्रज्ञे) पुरुष में (न) नहीं होती। ऐसे में पुरुष को उस दुःख की प्राप्ति क्यों होती है ? (तु) किन्तु (दर्शितविषयत्वात्) बुद्धि में विद्यमान = उपस्थित विषयों को देखने वाला होने से (सत्त्वे तप्यमाने) सत्त्व = बुद्धि तत्त्व के तप्त होने पर (तदाकारानुरोधी) उसके स्वरूप को ग्रहण करने वाला (पुरुषः) पुरुष = जीवात्मा उस दुःखानुभव से उपरक्त होकर (अनुतप्यते इति) अनुतप्त होता है = दुःखी होता है॥

वैदिक योग मीमांसा : महर्षि पतञ्जलि इस सूत्र में पुरुष को प्राप्त होने वाले दुःखों के कारण को स्पष्ट कर रहे हैं। महर्षि कहते हैं कि द्रष्टा जो आत्मा है, उसका प्रकृति रूपी दृश्य के साथ संयोग ही, उसे प्राप्त होने वाले दुःखों का मूल कारण है; और द्रष्टा और दृश्य का यह संयोग अविद्या के कारण होता है। क्यों ? देखो, प्रकृति और पुरुष स्वरूपतः सर्वथा भिन्न-भिन्न पदार्थ हैं। इन दोनों के अन्तर को निम्न प्रकार से समझें —

पुरुष = जीवात्मा प्रकृति

१. चेतन सत्ता है। जड़ सत्ता है।

२. भोगों को प्राप्त करने वाला है। स्वयं भोग रूप है।

३. सत्त्वादि गुणों तथा उनके धर्मों से रहित है। सत्त्वादि गुणों का समुदाय है।

४. अविकारी = विकार को प्राप्त नहीं होता। विकारी = समस्त दृश्य, अदृश्य जगत् प्रकति

का विकार है।

५. अपरिणामी = गुणों के परिणाम को प्राप्त गुणों के परिणाम से सृष्टि की रचना होती

नहीं होता। है।

६. स्वतन्त्र और स्व-अर्थ को साधने वाला है। परतन्त्र और परार्थ — पुरुष के भोग और

अपवर्ग को सिद्ध करने वाली है।

ऐसे स्वभाव और स्वरूप वाला पुरुष = जीवात्मा अविद्यावशात् जब अपने शुद्धस्वरूप को भूलकर भोगों की प्राप्ति हेतु, चित्त के माध्यम से, प्रकृति के आलम्बन को प्राप्त होता है, तो इसे दुःखों की प्राप्ति होती है। ऐसी स्थिति में प्रकृति और उसके सभी विकार बुद्धिगत हुए द्रष्टा रूपी पुरुष को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे अयस्कान्त मणि = चुम्बक अपने समीप लोहे को आकृष्ट करता है, उसी प्रकार प्रकृति विभिन्न रूपों में उपस्थित होकर, अपने सुखात्मक और मोहात्मक रूप से पुरुष को आकृष्ट करती और उसे भोगों को प्राप्त कराती है। बुद्धि में उपस्थित हुए प्रकृति के सभी धर्म = विकार पुरुष के भोग बन जाते हैं। बुद्धि का बोध करने वाला होने से पुरुष, इनका अनुभव करता है। वस्तुतः प्रकृति स्वयं एक स्वतन्त्र पदार्थ एवं पुरुष के समान नित्य है, और यह ब्रह्माण्ड का स्वतन्त्र रूप से, लेकिन अपने से भिन्न चेतन परमात्मा द्वारा नियन्त्रित, जड़ उपादान कारण है; परन्तु परार्थ होने से पुरुष के भोग और अपवर्ग रूप दोनों ही प्रयोजनों को सिद्ध करती है।

अविद्यावशात् पुरुष जब प्रकृति के त्रिगुणात्मक स्वरूप को सुख हेतु स्वीकार करता है, तो इसे सुख के साथ-साथ बहुसंख्य दुःखश्रंखला भी स्वतः ही प्राप्त हो जाती है। प्रकृति-पुरुष का उपरोक्त प्रकार का संयोग अनादि कालीन कहा है। वस्तुतः यह प्रवाह से अनादि है। पुरुष जब विवेकख्याति से संयोग का नाश करता है, तो मुक्ति = मोक्ष को प्राप्त होता है। परमात्मा की व्यवस्था में वह मोक्षकाल में सभी प्रकार के दुःखों से पृथक् रहता है; और उस मोक्षकाल के उपरान्त, पुरुष पुनः अविद्यावशात् = अविवेक के कारण प्रकृति के संयोग को प्राप्त होकर दुःखों को प्राप्त करता है। सांख्यदर्शनकार महर्षि कपिल ने इस प्रकार अविद्या को भी प्रवाह से अनादि कहा है, और इसको अनादि मानने के कारणों को भी कहा है —

अनादिरविवेकोऽन्यथा दोषद्वयप्रसक्तेः॥ सांख्य० ६.१२॥

अर्थात् अविवेक अनादि होता है, अभाव रूप से अन्धकार के समान। अन्यथा उस अविवेक के अनादि स्वीकार न करने पर उसका आदि = आरम्भ मानना होगा। उस अविवेक को आरम्भ वाला मानने से दो दोष आते हैं (१) यदि अविवेक को अनादि न माना जाये अर्थात् सादि = आरम्भ वाला माना जाये तो संसारचक्र को भी सादि मानना पड़ेगा, जबकि वेद में संसारचक्र को अनादि कहा है; (अथवा अविवेक का आरम्भ मानने से मुक्त जीवों को भी स्वाभाविक रूप से अविवेक की प्राप्त होकर बन्धन की प्राप्ति हो जाये) तथा (२) उसका कारण क्या है? क्या कर्म या अन्य कोई कारण? यदि कर्म है तो कर्म का कारण क्या है? इसी प्रकार अन्य किसी कारण का भी कारण क्या है? इस प्रकार अनवस्था दोष आएगा। दोनों ही स्थितियों को मानने से विभिन्न प्रकार के दोष आते हैं।

अतः जिस प्रकार से अविवेक = अविद्या अनादि है, उसी प्रकार से इस अविवेक के कारण पुरुष का प्रकृति से संयोग भी अनादि है। इस संयोग के कारण उत्पन्न होने वाले दुःखों को दूर करने का उपाय योगसूत्र २.१५ में महर्षि व्यास ने सम्यग्दर्शन कहा है। इसी सम्यग्दर्शन से ही दुःखों की अत्यन्त निवृत्ति दीर्घकाल = मोक्षकाल पर्यन्त सम्भव होती है। यथा कारण के अभाव से कार्य का अभाव होता है, उसी प्रकार इस संयोग की निवृत्ति से ही, प्रकृति-पुरुष के संयोग के कारण प्राप्त होने वाले सभी प्रकार के दुःखों की निवृत्ति होती है।

उदाहरण देते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि जिस प्रकार काँटे से पैर का बिध जाना दुःख का कारण है, अतः काँटे पर पैर को न रखने अथवा जूता पहन कर रखने से, काँटे से पैर का बेधन न होने से, दुःख की प्राप्ति नहीं होती। इसी प्रकार इस संसार में दुःख का कारण रजोगुण है। सत्त्वगुण को सुख, रजोगुण को दुःख तथा तमोगुण को मोह रूप कहा गया है। इसी रजोगुण के कारण ही सत्त्वगुण बहुल बुद्धि में ताप क्रिया होती है; क्योंकि ताप-दुःख रूपी क्रिया कर्मस्थ = कर्म में ही स्थित होती है। अतः रजोगुण दुःख देने वाला और सत्त्वगुण तपने वाला है। यह तपन रूपी परिणाम, परिणामी और क्रियावान् बुद्धि में ही होता है; न कि अपरिणामी = गुणों के परिणाम से रहित तथा निष्क्रिय = प्राकृतिक पदार्थों की सभी प्रकार की क्रियाओं से रहित पुरुष में। परन्तु पुरुष का बुद्धि में उपस्थित सभी विषयों को देखने = अनुभव करने वाला होने से, वह पुरुष उस बुद्धि में उपस्थित दुःख का भी अनुभव करता है। वस्तुतः प्रकृति-पुरुष = दृश्य और द्रष्टा के इसी संयोग के कारण ही प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों के धर्मों सुख, दुःख और मोह को पुरुष अपना धर्म जानता है और तदनुसार ही सुखी, दुःखी और मोहित होता है।

आगे शास्त्रकार क्रमशः दृश्य = प्रकृति का स्वरूप, पुरुष का स्वरूप, इन दोनों के संयोग का प्रकार, उस संयोग का कारण = अविद्या, संयोग के नाश का उपाय, और दुःखनाश की स्थिति को बताते हैं।