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Saadhana Paada / Means / 18
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Saadhana Paada / Means / 18

प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्॥१८॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 18

In Hindi:

पदपाठ : प्रकाशक्रियास्थितिशीलम् भूतेन्द्रियात्मकम् भोगापवर्गार्थम् दृश्यम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : दृश्यस्वरूपमुच्यते—

हिंदी में अर्थ : (दृश्यस्वरूपम्) दृश्य का स्वरूप (उच्यते) बताया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (दृश्यम्) दृश्य = द्रष्टा से भिन्न प्रकृति और उसके समस्त विकार हैं; वह (प्रकाशक्रियास्थितिशीलम्) प्रकाशशील, क्रियाशील और स्थितिशील अर्थात् सत्त्व, रज और तमोगुण रूप, (भूतेन्द्रियात्मकम्) स्थूल और सूक्ष्म भूत और इन्द्रिय रूप वाला है; तथा (भोगापवर्गार्थम्) द्रष्टा अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग के लिए है॥

व्यास भाष्य : प्रकाशशीलं सत्त्वम्। क्रियाशीलं रजः। स्थितिशीलं तम इति। एते गुणाः परस्परोपरक्तप्रविभागाः परिणामिनः संयोगविभागधर्माण इतरेतरोपाश्रयेणोपार्जितमूर्त्तयः परस्पराङ्गाङ्गित्वेऽप्यसंभिन्नशक्तिप्रविभागाः। तुल्यजातीयातुल्यजातीयशक्तिभेदानुपातिनः। प्रधानवेलायामुपदर्शितसन्निधाना गुणत्वेऽपि च व्यापारमात्रेण प्रधानान्तर्णीतानुमितास्तिताः पुरुषार्थकर्त्तव्यतया प्रयुक्तसामर्थ्याः सन्निधिमात्रोपकारिणोऽयस्कान्तमणिकल्पाः। प्रत्ययमन्तरेणैकतमस्य वृत्तिमनुवर्त्तमानाः प्रधानशब्दवाच्या भवन्ति। एतद् दृश्यमित्युच्यते।

तदेतद्भूतेन्द्रियात्मकं भूतभावेन पृथिव्यादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमते। तथेन्द्रियभावेन श्रोत्रादिना सूक्ष्मस्थूलेन परिणमत इति। तत्तु नाप्रयोजनमपि तु प्रयोजनमुररीकृत्य प्रवर्त्तत इति भोगापवर्गार्थं हि तद्दृश्यं पुरुषस्येति। तत्रेष्टानिष्टगुणस्वरूपावधारणमविभागापन्नं भोगो भोक्तुः स्वरूपावधारणमपवर्ग इति द्वयोरतिरिक्तमन्यद्दर्शनं नास्ति। तथा चोक्तम्—अयं तु खलु त्रिषु गुणेषु कर्त्तृष्वकर्त्तरि च पुरुषे तुल्यातुल्यजातीये चतुर्थे तत्क्रियासाक्षिण्युपनीयमानान्सर्वभावानुपपन्नाननुपश्यन्नदर्शनमन्यच्छङ्कत इति।

तावेतौ भोगापवर्गौ बुद्धिकृतौ बुद्धावेव वर्त्तमानौ कथं पुरुषे व्यपदिश्येते इति? यथा च जयः पराजयो वा योद्धृषु वर्त्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते, स हि तत्फलस्य भोक्तेति। एवं बन्धमोक्षौ बुद्धावेव वर्त्तमानौ पुरुषे व्यपदिश्येते, स हि तत्फलस्य भोक्तेति। बुद्धेरेव पुरुषार्थापरिसमाप्तिर्बन्धस्तदर्थावसानो मोक्ष इति। एतेन ग्रहणधारणोहापोहतत्त्वज्ञानाभिनिवेशा बुद्धौ वर्त्तमानाः पुरुषेऽध्यारोपितसद्भावाः। स हि तत्फलस्य भोक्तेति॥

हिंदी में अर्थ : (सत्त्वम्) सत्त्वगुण (प्रकाशशीलम्) प्रकाश शील = प्रकाश स्वभाव वाला है; (रजः) रजोगुण (क्रियाशीलम्) क्रियाशील = क्रिया स्वभाव वाला है; और (तम) तमोगुण (स्थितिशीलम् इति) स्थितिशील = स्थिति स्वभाव वाला है। (एते) ये (गुणाः) तीनों गुण (परस्परः) परस्पर = एक दूसरे के साथ (उपरक्ताः) मिले हुए, और (प्रविभागाः) विभाग = अंशों वाले (परिणामिनः) परिणामी = विकार को प्राप्त होने वाले; (संयोगविभागधर्माणः) संयोग और विभाग धर्मों से युक्त; (इतरेतरोपाश्रयेण) एक दूसरे के सहयोग = आश्रय से (उपार्जितमूर्त्तयः) मूर्त्त द्रव्यों के रूप में प्रकट होने वाले; (परस्पराङ्गाङ्गित्वेऽपि) परस्पर अङ्ग-अङ्गी भाव = गौण-प्रधान भाव से एकत्र हुए भी (असंभिन्न-शक्तिप्रविभागाः) अपनी-अपनी शक्ति = सामर्थ्य को अलग-अलग बनाए रखने वाले; (तुल्यजातीया- तुल्यजातीयशक्तिभेदानुपातिनः) तुल्यजातीय = सजातीय और अतुल्यजातीय = विजातीय पदार्थों में शक्ति भेद से प्राप्त = विद्यमान रहने वाले; (प्रधानवेलायाम्) अपनी-अपनी प्रधानता के समय (उपदर्शितसन्निधानाः) अपना स्वरूप प्रकट = अभिव्यक्त करने वाले; (च) और (गुणत्वेऽपि) इन गुणों के गौण रूप में रहने पर भी (व्यापारमात्रेण) व्यापार मात्र से = सहकारी कारण के व्यापार मात्र से (प्रधानान्तर्णीतानुमितास्तिताः) प्रधान गुण में अन्तर्निहित होने पर भी अनुमान से अपनी सत्ता को बताने वाले; (पुरुषार्थकर्त्तव्यतया) पुरुष = आत्मा के प्रति कर्तव्यता = भोग-अपवर्ग रूप प्रयोजन के हेतु (प्रयुक्तसामर्थ्याः) प्रयुक्त सामर्थ्य = अपने सामर्थ्य का प्रयोग करने वाले; (अयस्कान्तमणिकल्पाः) अयस्कान्तमणि = चुम्बक के समान (सन्निधिमात्रोपकारिणिः) सन्निधिमात्र से उपकार करने वाले; (प्रत्ययमन्तरेण) अपनी अभिव्यक्ति = प्रतीति के बिना (एकतमस्य) किसी एक प्रधान गुण की (वृत्तिम्) वृत्ति = व्यापार का (अनुवर्त्तमानाः) अनुवर्तन = अनुसरण करने वाले; (प्रधानशब्दवाच्या भवन्ति) ‘प्रधान’ शब्द से कहे जाते हैं। (एतत्) यह गुणत्रय ही (दृश्यम्) दृश्य (इति उच्यते) कहा जाता है।

(तत्) वह (एतत्) यह दृश्य = प्रधान शब्दवाच्य गुणत्रय (भूतेन्द्रियात्मकम्) भूत और इन्द्रिय स्वरूप वाला है। (भूतभावेन) भूत रूप से अर्थात् (सूक्ष्मस्थूलेन) सूक्ष्मभूत और स्थूलभूत रूप से (पृथिव्यादिना) पृथिवी आदि स्थूलों तथा गन्धतन्त्रामादि सूक्ष्म भूतों के रूप में (परिणमते) परिणत होता है। (तथा) और वैसे ही (इन्द्रियभावेन) इन्द्रिय रूप से अर्थात् (सूक्ष्मस्थूलेन) सूक्ष्म इन्द्रिय और स्थूल इन्द्रिय रूप से (श्रोत्रादिना) श्रोत्रादि इन्द्रियों के आकार में (परिणमते इति) परिणत होता है। (तत् तु) वह गुणत्रय का भूत और इन्द्रिय रूप में परिणत होना तो (न अप्रयोजनम्) निष्प्रयोजन = प्रयोजन रहित नहीं है; (अपितु) बल्कि (प्रयोजनम् उररीकृत्य) प्रयोजन को स्वीकार करके (प्रवर्त्तते) इनकी प्रवृत्ति होती है (इति) इस प्रकार (पुरुषस्य) पुरुष के (भोगापवर्गार्थम्) भोग और अपवर्ग = कैवल्य के लिए (हि) निश्चयरूपेण (तद्) वह (दृश्यम् इति) दृश्य है।

भोग और अपवर्ग का स्वरूप क्या है ? प्रथम भोग के बारे में कहते हैं — (तत्र) उन भोग और अपवर्ग में (अविभागापन्नम्) पुरुष और बुद्धि द्वारा अविभक्त रूप से जो (इष्टानिष्टगुणस्वरूपावधारणम्) इष्ट और अनिष्ट गुणों के स्वरूप का अवधारण अर्थात् अनुभव = ज्ञान होना है, (भोगः) वह भोग है। अर्थात् बुद्धि को अपने से भिन्न न जानकर पुरुष द्वारा बुद्धिगत सुख-दुःख रूप धर्मों का अनुभव = ज्ञान करना ही भोग है। और अपवर्ग क्या है ? (भोक्तुः) भोक्ता = पुरुष के (स्वरूपावधारणम्) स्वरूप का अवधारण = निश्चय होना (अपवर्गः इति) अपवर्ग = मोक्ष है। (द्वयोः) इन दोनों भोग और अपवर्ग से (अतिरिक्तम्) अतिरिक्त = भिन्न (अन्यत् दर्शनम्) अन्य कोई दर्शन = अनुभव (न अस्ति) नहीं है।

(तथा च उक्तम्) और वैसा कहा भी है — (अयम् तु) यह अविवेकी जीवात्मा तो (खलु) निश्चय ही (कर्तृषु) क्रियावान् (त्रिषु गुणेषु) तीनों गुणों में (च) और (चतुर्थे) चौथे (अकर्त्तरि पुरुषे) अकर्त्ता पुरुष में, जो (तुल्यातुल्यजातीये) सत्तावान् और सूक्ष्म होने से गुणों का तुल्य जातीय तथा चेतन और अपरिणामी होने से गुणों का अतुल्य जातीय हैं, और जो (तत्क्रियासाक्षिणी) गुणों की सकल क्रियाओं का साक्षी है, उस पुरुष में (उपनीयमानान्) बुद्धि द्वारा तत्तदाकार रूप से प्रतिबिम्बित हुए = समर्पित हुए (सर्वभावान्) सभी सुख-दुःखादि भावों = धर्मों को (उपपन्नान्) वस्तुतः = यथार्थ में उपस्थित (अनुपश्यन्) जानता हुआ = देखता हुआ (अन्यत्) गुणों से भिन्न अथवा वृत्ति द्वारा प्राप्त = समर्पित भोग से भिन्न (दर्शनम्) दर्शन = ज्ञान की (न शङ्कते इति) शंका भी नहीं करता है।

(तौ एतौ) वे ये दोनों (भोगापवर्गौ) भोग और अपवर्ग (बुद्धिकृतौ) बुद्धिगत क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले होने से (बुद्धौ एव) बुद्धि में ही (वर्त्तमानौ) वर्त्तमान रहते हैं। तब उनका (पुरुषे) पुरुष = आत्मा में (व्यपदिश्येते) व्यवहार = कथन (कथम् इति) क्यों होता है ? उत्तर देते हुए कहा है — (यथा च) जैसे (जयः) जीत (पराजयो वा) अथवा हार (योद्धृषु वर्तमानः) युद्ध करने वाले योद्धाओं में रहती हुई भी (स्वामिनि) उन योद्धाओं के स्वामी राजा में (व्यपदिश्यते) कही जाती है, (हि) क्योंकि (सः) वह राजा ही (तत्फलस्य) उस जीत या हार के फल का (भोक्ता इति) भोक्ता है। (एवम्) वैसे ही (बन्धमोक्षौ) बन्धन और मोक्ष रूप भोग और अपवर्ग (बुद्धौ एव) बुद्धि में ही (वर्त्तमानौ) वर्त्तमान होते हुए (पुरुषे) पुरुष में (व्यपदिश्येते) कहे जाते हैं, (हि) क्योंकि (सः) वह पुरुष ही (तत्फलस्य) उस भोग और अपवर्ग रूपी फलों का (भोक्ता इति) भोक्ता है। (बुद्धेः एव) बुद्धि की ही (पुरुषार्थापरिसमाप्तिः) पुरुषार्थ अपरिसमाप्ति अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजन का पूरा न होना (बन्धः) बन्धन है; और (तदर्थावसानः) उस पुरुषार्थ का पूरा हो जाना ही (मोक्षः इति) मोक्ष है।

(एतेन) इस से स्पष्ट होता है कि (ग्रहणधारणोहापोहतत्त्वज्ञानाभिनिवेशाः) ग्रहण = पदार्थ का ज्ञान; धारण = पदार्थ की स्मृति; ऊहा = पदार्थ के विशेष ज्ञान की शक्ति; अपोह = अयथार्थ ज्ञान का ज्ञान से निराकरण करना; तत्त्वज्ञान = विवेकख्याति, सम्यग्दर्शन से प्राप्त यथार्थ ज्ञान; अभिनिवेश = तत्त्वज्ञान के आधार पर ग्रहण-अग्रहण का निश्यच करना; ये सभी (बुद्धौ वर्त्तमानाः) बुद्धि में वर्त्तमान रहते हुए (पुरुषे) पुरुष = जीवात्मा में (अध्यारोपितसद्भावाः) अध्यारोपित सत्ता वाले होते हैं; (हि) क्योंकि (सः) वह पुरुष ही (तत्फलस्य) उनके फल का (भोक्ता इति) भोक्ता है॥

वैदिक योग मीमांसा : दृश्य — जिससे संयोग को प्राप्त कर जीवात्मा सुख-दुःखों को भोगता है; वह दृश्य क्या है ? कैसा है? किस प्रकार कार्य करता है ? किन-किन प्रयोजनों को सिद्ध करता है ? महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि प्रकृति दृश्य है जो कि सत्त्व, रज और तम गुण रूप है, तथा उसके विकार भूत और इन्द्रियों के रूप में उपलब्ध होते हैं और ये सभी (= प्रकृति और उसके कार्य) पुरुष = जीवात्मा के भोग और अपवर्ग को सिद्ध करते हैं।

उपर्युक्त सत्त्व, रज और तम — तीनों गुण ही समुदाय रूप से प्रधान = प्रकृति के नाम से कहे जाते हैं। जिसमें सत्त्व गुण प्रकाशशील = प्रकाश स्वभाव वाला; रजोगुण प्रवृत्तिशील = क्रिया स्वभाव वाला और तमोगुण स्थितिशील = स्थिति स्वभाव वाला है। जब ये तीनों गुण साम्यावस्था में होते हैं तो मूल प्रकृति कहलाते हैं = अर्थात् तब प्रकृति मूल अवस्था में होती है; उसमें कोई विकार नहीं होता। यही गुण जब, ईश्वर के ईक्षण द्वारा, प्रधान और गौण भाव से विषमता को प्राप्त होते हैं, तो सृष्टि का निर्माण कार्य आरम्भ होता और सृष्टि रचना होती। इन गुणों की विभिन्न स्थितियाँ / विशेषताएँ / कार्य इस प्रकार से कहे गए हैं —

१. ये तीनों गुण परस्पर एक दूसरे के साथ मिलकर, विभाग = अंश वाले होकर विभिन्न प्रकार के परिणामों = विकारों को प्राप्त होते हैं;

२. तीनों गुण संयोग और विभाग धर्मों से युक्त हैं। अर्थात् संयोग को प्राप्त होने पर पदार्थों का निर्माण तथा विभाग को प्राप्त होने पर निर्मित पदार्थों का नाश होता है;

३. तीनों गुण एक दूसरे के आश्रय से — विभिन्न अनुपातों में मिलकर मूर्त द्रव्यों के रूप में बनते हैं अर्थात् स्थूलता के विभिन्न स्तरों को प्राप्त होते हैं, जिसमें स्थूलता का अन्तिम स्तर पृथिवी है;

४. ये गुण विभिन्न पदार्थों = विकारों में गौण अथवा प्रधान रूप से एकत्र हो कर रहते हैं; जिसमें एक गुण प्रधान रहता तथा शेष दो गुण गौण रहते हैं। परन्तु इस रूप में रहकर भी अपने स्वभाव एवम् सामर्थ्य को अलग-अलग बनाए रखते हैं, अर्थात् गौण रूप से उपस्थित गुणों का सामर्थ्य समाप्त नहीं होता;

५. ये गुण समानजातीय = सजातीय तथा असमानजातीय = विजातीय पदार्थों में शक्ति रूप से विद्यमान रहते हैं = प्राप्त होते हैं;

६. जिस पदार्थ में जो गुण प्रधान होता है, उस पदार्थ में ये अपना स्वरूप = स्वभाव मुख्य रूप से प्रकट करता है। यथा बुद्धि में सत्त्वगुण प्रधान रहता, अतः यही प्रकाश = ज्ञान कराने का साधन बनती है;

७. जहाँ जो गुण गौण रूप से रहते हैं, वे प्रधान गुण की सत्ता में व्यापार मात्र से = क्रियामात्र से = अपने स्वरूप मात्र से उपस्थित रहते और विभिन्न कार्यों में अनुमान से ही अपनी सत्ता को बताते हैं;

८. पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले होने से ही, अपने स्वरूप का प्रयोग करने वाले है, अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग हेतु ही कार्य जगत् का निर्माण होता है;

९. ये गुण चुम्बक के समान अपनी समीपता से ही पुरुष का उपकार करने वाले होते हैं; तथा

१०. गौण रूप से अपनी सत्ता का पूर्णरूपेण ज्ञान कराये बिना ही प्रधान गुण की वृत्ति = व्यापार के अनुसार कार्य करने वाले होते हैं।

इसप्रकार से विविध सामर्थ्य वाले, विविध रूप से कार्य करने वाले, ये गुण विषमता को प्राप्त होने पर भूत और इन्द्रिय रूप में बनते हैं। वस्तुतः यह कार्य जगत् इन्हीं भूत और इन्द्रियों का समुदाय है। ये भूत स्थूल और सूक्ष्म भेद से दो-दो प्रकार के है। सूक्ष्मभूतों में शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्धतन्मात्रा हैं; और स्थूल भूतों में इनसे बने हुए क्रमशः आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी हैं। इन्द्रिय रूप में भी स्थूल और सूक्ष्म भेद से इन्द्रिय दो प्रकार के हैं। सूक्ष्म इन्द्रियों में बुद्धि और अंहकार का ग्रहण होता है तथा स्थूल इन्द्रियों में ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ कर्मेन्द्रियाँ तथा ११वाँ मन आता हैं। वस्तुतः स्थूल कहीं जाने वाली ये सभी इन्द्रियाँ भी सूक्ष्म ही प्रतीत होती हैं। इसमें स्थूलता और सूक्ष्मता का भेद यह है कि जिस विकार = पदार्थ का उत्पत्ति क्रम में आगे कोई विकार न हो वह स्थूलता के क्रम में अन्तिम विकार = कार्य पदार्थ होता है; और जिन विकारों = पदार्थों के आगे विकार होते हैं वे अपने विकारों की अपेक्षा से सूक्ष्म कहाते हैं। इस प्रकार हम देखतें हैं कि स्थूल भूतों में भी पृथिवी सबसे अधिक स्थूल और उसकी अपेक्षा जल सूक्ष्म; जल से अग्नि सूक्ष्म; अग्नि से वायु सूक्ष्म और आकाश सबसे सूक्ष्म हैं। परन्तु अन्तिम कार्य पदार्थ होने से ये सभी महाभूत स्थूल ही कहलाते हैं। इसी प्रकार इन्द्रियों के विषय में भी जानना चाहिए, अर्थात् से सभी इन्द्रियाँ भी, अहंकार का अन्तिम कार्य परिणाम होने से = इनका आगे कोई तत्वान्तर परिणाम न होने से, सत्त्वादि गुणों के स्थूल परिणाम हैं। इसी आधार पर सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि और भाष्यकार महर्षि व्यास ने अगले सूत्र में स्थूल कहलाने वाले इन सभी पाँच महाभूतों तथा ११ इन्द्रियों को ‘विशेष’ कहा है।

इस प्रकार से भूत और इन्द्रिय रूप यह “दृश्य” रूपी ब्रह्माण्ड जड़ प्रकृति से बना है, जिसका अपना कोई प्रयोजन नहीं है। प्रकृति को परार्थ कहा गया है — यह पर अर्थात् पुरुष के लिए है। अतः यह जगत् पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए बना है।

पुरुष का भोग क्या है ? पुरुष का अपवर्ग क्या है ? ये दोनों ही प्रश्न जटिल हैं। इसका उत्तर देते हुए कहा है कि पुरुष द्वारा, स्वयं को बुद्धि से भिन्न न जानकर, बुद्धि में उपस्थित हुए सभी विषयों तथा सुख-दुःख-मोह का अनुभव करना, भोग है। पुरुष को बुद्धि बोधात्मा कहा गया है। अतः यह बुद्धिगत सभी धर्मों का ज्ञान करता है, और तदाकार होकर वैसा ही सुखी, दुःखी और मोहित होता है; यही पुरुष का भोग है। दूसरी ओर जब पुरुष अपने स्वरूप का निश्चयात्मक ज्ञान करता है, तो यह पुरुष का अपवर्ग कहाता है। इन दोनों — भोग और अपवर्ग से अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का कोई ज्ञान नहीं है। अतः या तो भोग होगा या फिर अपवर्ग होगा।

इस विषय को आचार्य पञ्चशिख ने इस प्रकार कहा है कि — अनन्त काल से जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ, सुख-दुःखादि भोगों को भोगने वाला, अविवेकी और वैराग्य हीन यह पुरुष = आत्मा, संस्कारवशात् तथा अविद्यावशात्, स्वयं को क्रियावान् जानता है। वस्तुतः तीन गुणों में रजोगुण के प्रभाव से होने वाली क्रिया, तीनों गुणों को ही क्रियावान् बनाए रखती है। दूसरी ओर यह जीवात्मा गुणों की क्रियाओं का साक्षी होता हुआ भी गुणों की क्रियाओं के बुद्धिगत होने से, उनका स्वयं अनुभव करता है। इन गुणों के परिणामस्वरूप सुख-दुःख और मोह को, पुरुष वास्तविक रूप से स्वयं में होता हुआ जानता है। वह यह जान भी नहीं पाता कि उपरोक्त सुख-दुःख-मोह रूपी धर्म बुद्धि में हो रहे हैं, जोकि मुझसे भिन्न जड़ एवं परिणामी पदार्थ है। वस्तुतः सभी प्रकार के धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भूत और इन्द्रियों में ही होते हैं। ये परिणाम कदापि अपरिणामी आत्मा में नहीं होते। इसी प्रकार सत्त्वादि गुणों के धर्म भी गुणों तक ही सीमित रहते हैं, आत्मा में घटित नहीं होते। परन्तु अविवेक = अविद्या के कारण प्रकृति के संयोग को प्राप्त हुआ जीवात्मा इन भूत और इन्द्रियों में होने वाले धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों तथा गुणों के सुख, दुःख और मोह रूपी धर्मों को स्वयं में मानकर विभिन्न प्रकार के भोगों को प्राप्त करता है।

बुद्धिगत होने वाली ये सभी क्रियाएँ, बुद्धि में ही उपस्थित रहती हुई भी, पुरुष की इस हेतु कहलाती हैं कि पुरुष ही इन सभी के सुख, दुःख फलों को भोक्ता है। वही भोग को और वही अपवर्ग को प्राप्त करता है। बुद्धि तो जड़ पदार्थ होने से परार्थ = पुरुष के लिए ही है। अतः बुद्धि के पुरुषार्थ की असमाप्ति ही पुरुष का बन्धन है। जब तक पुरुष इसके धर्मों का अनुभव करता रहेगा, तब तक वह बन्धन में रहेगा। जब विवेकख्याति को प्राप्त कर स्वयं के तथा गुणों के स्वरूप को जानकर परवैराग्य से इन गुणों से विरक्त = पृथक् हो जायेगा तो, गुणों का परिणामक्रम समाप्त होने तथा बुद्धि = चित्त के कृतकार्य होने से उसका मोक्ष हो जायेगा।

विवेकख्याति हेतु ग्रहण = पदार्थों के ज्ञान का होना; धारण = उन ज्ञात हुए पदार्थों की स्मृति का होना; ऊहा = पदार्थ के विशेष धर्मों हेतु तर्क आदि का होना; अपोह = यथार्थ ज्ञान से अयथार्थ ज्ञान का निराकरण करना; तत्त्वज्ञान = विवेकख्याति, सम्यग्दर्शन = साक्षात्कार से पदार्थों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त करना; तथा अभिनिवेश = तत्त्वज्ञान के आधार पर ग्रहण और अग्रहण योग्य का निश्चय करना; ये सभी बुद्धिगत ही रहते हैं, परन्तु आत्मा में आरोपित होते हैं। क्योंकि आत्मा की सत्ता से ही ये सभी बुद्धिगत रहते हुए, आत्मा द्वारा उनके फल = यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति से, आत्मा को ही अपवर्ग की प्राप्ति होने से, ये आत्मा के लिए ही कहे जाते हैं। दूसरी ओर बुद्धि जड़ होने से इनका स्वयं कोई प्रयोग नहीं कर सकती।