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Saadhana Paada / Means / 19
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Saadhana Paada / Means / 19

विशेषाऽविशेषलिङ्गमात्राऽलिङ्गानि गुणपर्वाणि॥१९॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 19

In Hindi:

पदपाठ : विशेषाऽविशेषलिङ्गमात्राऽलिङ्गानि गुणपर्वाणि॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : दृश्यानां तु गुणानां स्वरूपभेदावधारणार्थमिदमारभ्यते—

हिंदी में अर्थ : (दृश्यानाम् तु गुणानाम्) दृश्य प्रकृति के सत्त्व, रज और तम गुणों के (स्वरूपभेदावधारणार्थम्) स्वरूप और भेदों का निश्चय कराने के लिए (इदम्) इस सूत्र का (आरभ्यते) आरम्भ किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (विशेषाऽविशेषलिङ्गमात्राऽलिङ्गानि) विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग (गुणपर्वाणि) सत्त्वादि गुणों के पर्व = परिणाम अर्थात् अवस्थाएँ हैं॥

व्यास भाष्य : तत्राकाशवाय्वग्न्युदकभूमयो भूतानि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्राणामविशेषाणां विशेषाः। तथा श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि बुद्धीन्द्रियाणि। वाक्पाणिपादपायूपस्थानि कर्मेन्द्रियाणि। एकादशं मनः सर्वार्थम्। इत्येतान्यस्मितालक्षणस्याविशेषस्य विशेषाः। गुणानामेष षोडशको विशेषपरिणामः।

षडविशेषाः। तद्यथा—शब्दतन्मात्रं स्पर्शतन्मात्रं रूपतन्मात्रं रसतन्मात्रं गन्धतन्मात्रं चेत्येकद्वित्रि- चतुष्पञ्चलक्षणाः शब्दादयः पञ्चाविशेषाः षष्ठश्चाविशेषोऽस्मितामात्र इति। एते सत्तामात्रस्यात्मनो महतः षडविशेषपरिणामाः। यत्तत्परमविशेषभ्यो लिङ्गमात्रं महत्तत्त्वं तस्मिन्नेते सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय विवृद्धिकाष्ठामनुभवन्ति।

प्रतिसंसृज्यमानाश्च तस्मिन्नेव सत्तामात्रे महत्यात्मन्यवस्थाय यत्तन्निःसत्तासत्तं निःसदसन्निरसदव्यक्तमलिङ्गं प्रधानं तत्प्रतियन्ति। एष तेषां लिङ्गमात्रः परिणामः। निःसत्तासत्तं चालिङ्गपरिणाम इति।

अलिङ्गावस्थायां न पुरुषार्थो हेतुः। नालिङ्गावस्थायामादौ पुरुषार्थता कारणं भवतीति न तस्याः पुरुषार्थता कारणं भवति। नासौ पुरुषार्थकृतेति नित्याख्यायते। त्रयाणां त्ववस्थाविशेषाणामादौ पुरुषार्थता कारणं भवति। स चार्थो हेतुर्निमित्तं कारणं भवतीत्यनित्याख्यायते। गुणास्तु सर्वधर्मानुपातिनो न प्रत्यस्तमयन्ते नोपजायन्ते। व्यक्तिभिरेवातीतानागतव्ययागमवतीभिर्गुणान्वयिनीभिरुपजनापायधर्मका इव प्रत्यवभासन्ते। यथा देवदत्तो दरिद्राति। कस्मात्? यतोऽस्य म्रियन्ते गाव इति। गवामेव मरणात्तस्य दरिद्रता न स्वरूपहानादिति समः समाधिः।

लिङ्गमात्रमलिङ्गस्य प्रत्यासन्नं तत्र तत्संसृष्टं विविच्यते। क्रमानतिवृत्तेः। तथा षडविशेषा लिङ्गमात्रे संसृष्टा विविच्यन्ते परिणामक्रमनियमात्। तथा तेष्वविशेषेषु भूतेन्द्रियाणि संसृष्टानि विविच्यन्ते। तथा चोक्तं पुरस्तात्। न विशेषेभ्यः परं तत्त्वान्तरमस्तीति विशेषाणां नास्ति तत्त्वान्तरपरिणामः। तेषां तु धर्मलक्षणावस्था परिणामा व्याख्यायिष्यन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उनमें (आकाशवाय्वग्न्युदकभूमयः) आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी (भूतानि) ये पाँच महाभूत, (शब्दस्पर्शरूपरसगन्धतन्मात्राणाम्) शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध तन्मात्रा नामक (अविशेषाणाम्) इन पाँच अविशेषों के (विशेषाः) विशेष परिणाम = कार्य हैं। (तथा) उसी प्रकार (श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणानि) श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण रूप पाँच (बुद्धीन्द्रियाणि) ज्ञानेन्द्रियाँ; और (वाक्पाणिपादपायूपस्थानि) वाणी, हाथ, पैर, गुदा और उपस्थ रूप पाँच (कर्मेन्द्रियाणि) कर्मेन्द्रियाँ; और (एकादशं मनः) ग्यारहवाँ मन जो (सर्वार्थम्) सर्वार्थ अर्थात् सभी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाला है, (इति एतानि) ये सभी ग्यारह (अस्मितालक्षणस्य) अस्मिता लक्षण वाले अंहकार नामक (अविशेषस्य) अविशेष के (विशेषाः) विशेष परिणाम = कार्य हैं। (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों के (एषः) यह (षोडशकः) १६ सोलह (विशेषपरिणामः) विशेष परिणाम = कार्य हैं।

सत्त्वादि गुणों के (षड् अविशेषाः) छः अविशेष पर्व = परिणाम हैं। (तद्यथा) जैसे कि (शब्दतन्मात्रम्) शब्दतन्मात्रा, (स्पर्शतन्मात्रम्) स्पर्शतन्मात्रा, (रूपतन्मात्रम्) रूपतन्मात्रा, (रसतन्मात्रम्) रसतन्मात्रा, (च) और (गन्धतन्मात्रम्) गन्धतन्मात्रा (इति) ये, क्रमशः (एकद्वित्रिचतुष्पञ्चलक्षणाः) एक, दो, तीन, चार और पाँच लक्षण वाले (शब्दादयः) शब्दादि तन्मात्राएँ (पञ्च अविशेषाः) पाँच अविशेष हैं (च) और (षष्ठः) छठा (अविशेषः) अविशेष (अस्मितामात्रः इति) अस्मितामात्र नामक अंहकार है। (एते) ये (सत्तामात्रस्य आत्मनः) सत्तामात्र = अभिव्यक्त रूप वाले परम सूक्ष्म (महतः) महत्तत्त्व के उपरान्त होने वाले (षड्) छः (अविशेषपरिणामाः) अविशेष परिणाम = कार्य हैं। (यत्) जो (अविशेषभ्यः) छः अविशेषों से (परम्) परे = सूक्ष्म तत्त्व है, (तत्) वह (लिङ्गमात्रम्) लिङ्गमात्र कहा जाने वाला (महत्तत्त्वम्) महत्तत्त्व है (तस्मिन्) उस (सत्तामात्रे) सत्तामात्र (महति आत्मनि) महान् सूक्ष्म महत्तत्त्व में (एते) ये (षट्) छः अविशेष पदार्थ = परिणाम (अवस्थाय) अवस्थित होकर (विवृद्धिकाष्ठाम्) विवृद्धि = विशेष परिणाम की पराकाष्ठा को (अनुभवन्ति) प्राप्त होते हैं।

प्रलय = विनाश क्रम में — (च) और ये छः अविशेष (प्रतिसंसृज्यमानाः) अपने-अपने कारण में विलीन होते हुए = लय को प्राप्त होते हुए (तस्मिन् एव) उसी (सत्तामात्रे) सत्तामात्र (महति आत्मनि) परम सूक्ष्म महत्तत्त्व में (अवस्थाय) अवस्थित = अनुगत होकर उसी के साथ ही (यत् तत्) जो वह (निःसत्तासत्तम्) सत्ता = अभिव्यक्ति एवं असत्ता = अभाव से रहित, और (निःसदसत्) निःसत् = किसी का कार्य नहीं और अभाव से विलक्षण अर्थात् सूक्ष्मतम अतीन्द्रिय है, तथापि (निरसत्) अभावात्मकता से रहित = भिन्न भावात्मक, (अव्यक्तम्) अव्यक्त = जो व्यक्त नहीं है, (अलिङ्गम्) जो लिङ्ग लक्षण वाले महत्तत्त्व से भिन्न = उसका भी उपादान कारण (प्रधानम्) प्रधान = गुणों की साम्यावस्था रूप मूल प्रकृति है, (तत् प्रतियन्ति) उसी में लीन हो जाते हैं। (एषः) यह महत्तत्त्व (तेषाम्) उन गुणों का (लिङ्गमात्रः) लिङ्गमात्र नामक (परिणामः) परिणाम = कार्य है। (च) और महत्तत्त्व का भी कारण (निःसत्तासत्तम्) सत्ता और असत्ता से रहित = अभिव्यक्ति और अभाव से रहित त्रिगुणों की साम्यावस्था नामक प्रधान = प्रकृति (अलिङ्गपरिणामः इति) अलिङ्ग परिणाम है।

अतः इस (अलिङ्गावस्थायाम्) अलिङ्गावस्था में (पुरुषार्थः) पुरुष का अर्थ = भोग और अपवर्ग (हेतुः) हेतु = कारण (न) नहीं होता है। इस का स्पष्ट करते हुए कहा है — (अलिङ्गावस्थायाम्) अलिङ्ग अवस्था के (आदौ) प्रारम्भ में (पुरुषार्थता) पुरुषार्थता = पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन (कारणम्) कारण (न भवति) नहीं होते (इति) इसलिए (पुरुषार्थता) पुरुषार्थता (तस्याः) उस मूल प्रकृति रूप अलिङ्ग अवस्था का (कारणम् न भवति) कारण नहीं है। अतः (असौ) यह अलिङ्ग अवस्था रूप मूल प्रकृति (न पुरुषार्थकृता) पुरुषार्थकृत = पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों के लिए नहीं बनी (इति) इसलिए (नित्या) नित्य (आख्यायते) कही जाती है। (त्रयाणाम् अवस्थाविशेषाणाम्) अन्य तीनों अवस्था विशेषों = लिङ्गमात्र, अविशेष और विशेष अवस्थाओं की (आदौ) उत्पत्ति = प्रारम्भ में (तु) तो (पुरुषार्थता) पुरुष का भोग और अपवर्ग रूपी अर्थ = प्रयोजन (कारणम्) कारण (भवति) होता है। (च) और (सः अर्थः) वह अर्थ = प्रयोजन (हेतुः) हेतु अर्थात् (निमित्तम् कारणम्) निमित्त कारण (भवति) होता है। (इति) इसलिए ये तीनों अवस्थाएँ (अनित्या) अनित्य (आख्यायते) कही जाती हैं। (गुणाः तु) सत्त्वादि गुण तो (सर्वधर्मानुपातिनः) सभी धर्मों = प्रकृति के कार्यों = परिणामों में अनुगत = उपस्थित रहते हैं; वे (न प्रत्यस्तमयन्ते) न तो लय = नष्ट होते हैं और (न उपजायन्ते) न ही उत्पन्न होते हैं। बल्कि (गुणान्वयिनीभिः) गुणों में अनुगत = रहने वाली (अतीतानागतव्ययागमवतीभिः) भूत, भविष्यत और वर्त्तमान कालिक, तथा ह्रास और वृद्धि वाली (व्यक्तिभिः एव) अभिव्यक्तियों (महत्तत्त्व से लेकर स्थूलभूत पर्यन्त) के द्वारा ही (उपजनापायधर्मका इव) उत्पत्ति और विनाशशील धर्म वाले के समान (प्रत्यवभासन्ते) प्रतीत होते हैं। (यथा) जैसे कि (देवदत्तः) देवदत्त (दरिद्राति) दरिद्र हो रहा है। (कस्मात्) कैसे ? (यतः) क्योंकि (अस्य) इसकी (गावः) गौएँ (म्रियन्ते इति) मर रही हैं। यहाँ पर (गवाम्) गौओं के (एव) ही (मरणात्) मरण से (तस्य) उस देवदत्त की (दरिद्रता) दरिद्रता है; (न स्वरूपहानात्) उस देवदत्त के स्वरूप की हीनता के कारण नहीं। (इति) इस प्रकार यह गुणों के प्रसङ्ग में (समः) समान ही (समाधिः) समाधान है। अर्थात् इसी प्रकार महत्तत्त्व आदि की उत्पत्ति में गुणों की उत्पत्ति आदि व्यवहृत होती है।

अलिङ्ग प्रकृति से लिङ्गादि अवस्थाओं का क्रम कहा है — (लिङ्गमात्रम्) लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व (अलिङ्गस्य) अलिङ्ग प्रकृति का (प्रत्यासन्नम्) प्रथम निकटतम कार्य है। (तत्र) उस प्रकृति में (तत्) वह लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व (संसृष्टम्) संसृष्ट = मिला हुआ = अविभक्त रहता हुआ, उससे (विविच्यते) विभक्त = पृथक् होता = कार्यरूप में आता है। कैसे ? (क्रमानतिवृत्तेः) प्रकृति के विकार क्रम का अतिक्रमण न करने के कारण से। (तथा) वैसे ही (षड् अविशेषाः) छः अविशेष नामक गुणों के परिणाम (लिङ्गमात्रे) लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व में (संसृष्टाः) अविभक्त रहते हुए, (परिणामक्रमनियमात्) परिणाम क्रम के नियम से, अपने कारण से (विविच्यन्ते) पृथक = विभक्त होते हैं। (तथा) वैसे ही (तेषु अविशेषेषु) उन छः अविशेषों = पाँच तन्मात्राओं तथा अहंकार में (भूतेन्द्रियाणि) पाँच महाभूत तथा ग्यारह इन्द्रियाँ, गुणों के विशेष परिणाम (संसृष्टानि) संसृष्ट = अविभक्त रहते हुए, उनसे (विविच्यन्ते) पृथक् = विभक्त होते हैं। कैसे? (तथा च) उनका विभाग वैसे ही होता है जैसे (उक्तम् पुरस्तात्) प्रथम कहा है अर्थात् परिणाम क्रम का नियम होने से। (विशेषेभ्यः परम्) इन विशेष नाम गुणों के परिणाम से आगे (तत्त्वान्तरम्) अन्य कोई तत्त्व = परिणाम (न अस्ति इति) नहीं है; अतः (विशेषाणाम्) इन १६ सोलह विशेषों का (तत्त्वान्तरपरिणामः) तत्त्वान्तर परिणाम (न अस्ति) नहीं है। वरन् (तेषाम् तु) उन १६ सोलह परिणामों = भूत और इन्द्रियों के तो (धर्मलक्षणावस्थापरिणामः) धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम होते हैं; (व्याख्यायिष्यन्ते) उनकी व्याख्या आगे (योगसूत्र ३.१३ में) की जायेगी॥

वैदिक योग मीमांसा : दृश्य जो सत्त्व, रज और तम गुणों की साम्यावस्था प्रकृति और उसके विकार हैं, जिनके संयोग को प्राप्त होकर, पुरुष विभिन्न प्रकार के सुख-दुःखों को भोगता है; वह भूत और इन्द्रिय स्वरूप वाला तथा पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करता है। उस दृश्य के सत्त्वादि गुणों के विभिन्न परिणाम = अवस्था क्या-क्या हैं?, यह इस सूत्र में स्पष्ट किया गया है। महर्षि पतञ्जलि ने इन गुणों के चार परिणाम = अवस्थाएँ कही हैं जो कि क्रमशः विशेष, अविशेष, लिङ्गमात्र और अलिङ्ग रूप हैं। महर्षि व्यास दृश्यमान जगत् के स्थूल परिणामों से आरम्भ करते हुए इनको स्पष्ट करते हैं—

१. विशेष परिणाम :— सत्त्वादि गुणों की अन्तिम स्थूलतम अवस्था विशेष परिणाम कहाती है। ये विशेष विकारभेद से १६ सोलह हैं। इन में पाँच महाभूत आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी हैं, जो कि क्रमशः शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, और गन्धतन्मात्रा रूपी अविशेषों के कार्य हैं। इन्द्रियों में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ — श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और घ्राण; पाँच कर्मेन्द्रियाँ — वाणी, हाथ, पैर, उपस्थ और गुदा; तथा ग्यारहवाँ मन है, जो दोनों ज्ञानेन्द्रियों तथा कर्मेन्द्रियों से सम्बन्धित रहता है। ये सभी ग्यारह इन्द्रियाँ, अहंकार नामक अविशेष के कार्य हैं। इस प्रकार ये १६ सोलह पदार्थ विशेष कहाते हैं। इन विशेषों का आगे कोई कार्य = तत्त्वान्तर परिणाम नहीं होता, अर्थात् ये किसी अन्य पदार्थ के कारण नहीं होते। अतः ये १६ सोलह पदार्थ कारण-कार्य परिणाम क्रम में अन्तिम कार्य पदार्थ होने से अपने-अपने स्तर पर स्थूल पदार्थ हैं। दूसरी और इन भूत और इन्द्रियों के धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम होते हैं, जिनकी व्याख्या आगे योगसूत्र ३.१३ में की जायेगी। इन्हीं धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों के कारण ही दृश्यमान जगत् बहु रूपों वाला होकर उपलब्ध होता है। ये सभी विशेष इसलिए भी कहाते हैं कि इनमें सत्त्वादि गुणों के स्थूल धर्म = शान्त, घोर और मूढता आदि विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं।

२. अविशेष परिणाम :— सत्त्वादि गुणों के छः अविशेष परिणाम कहे गये हैं, जो कि पाँच तन्मात्राएँ तथा छठा अहंकार नामक विकार है। पाँच तन्मात्राओं की विशेषता इस प्रकार से स्पष्ट की गई है — शब्द तन्मात्रा केवल शब्द गुण वाली होने से एक लक्षण वाली; स्पर्श तन्मात्रा शब्द और स्पर्श गुण वाली होने से दो लक्षण वाली; रूप तन्मात्रा शब्द, स्पर्श और रूप गुण वाली होने से तीन लक्षण वाली; रस तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप और रस गुण वाली होने से चार लक्षण वाली तथा गन्ध तन्मात्रा शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध गुण वाली होने से पाँच लक्षण वाली कहलाती है।

ये छः विकार, अविशेष इसलिए कहे गए हैं कि इनमें गुणों के शान्त, घोर और मूढ धर्म अभिव्यक्त नहीं रहते। ये छः विकार आगे वाले १६ विकारों के उपादान कारण तथा परिणाम क्रम के नियम से अपने से पूर्व वालों के कार्य कहाते हैं। ये सभी अपने कार्यों की अपेक्षा से सूक्ष्म तथा अपने कारणों की अपेक्षा से स्थूल होते हैं।

३. लिङ्गमात्र परिणाम :— सत्त्वादि गुणों का स्थूलता से सूक्ष्मता की ओर सूक्ष्मतम विकार महत्तत्त्व हैं, जिसे लिङ्गमात्र परिणाम कहा जाता है। यह महत्तत्त्व मूल प्रकृति का प्रथम विकार = कार्य है, और इसे “सत्तामात्र” तथा “महति आत्मनि” कहा गया है। आत्म पद से यहाँ यह अभिप्राय है कि यह अपने कार्यों से सूक्ष्म है। अतः सत्तावान् महत्तत्त्व कार्य पदार्थों में परम सूक्ष्म पदार्थ है।

४. अलिङ्ग परिणाम :— सत्त्वादि गुणों की साम्यावस्था जो कि प्रधान नाम से कही गयी है, वह अलिङ्ग अवस्था है। इस अवस्था को महर्षि व्यास ने “निःसत्तासत्तम्” कहा है। अर्थात् यह अवस्था सत्ता और असत्ता से रहित है। यहाँ “सत्ता” से अभिप्राय है “अभिव्यक्ति”; तथा “असत्ता” से अभिप्राय है “अभाव”। अतः मूल प्रकृति अभिव्यक्ति और अभाव से रहित है। यह न तो अपने कार्यों की तरह अभिव्यक्त और न ही अभाव रूप वाली है अर्थात् सत्तावाली है। इसको आगे “निःसदसत्” भी कहा है। यह शब्द “निःसत्तासत्तम्” के भावों को और अधिक स्पष्ट करता है। इसका अभिप्राय है कि मूल प्रकृति न तो अन्य किसी पदार्थ का कार्य है = इसका उपादान कारण कोई नहीं है, परन्तु यह जगत् का उपादान कारण है; तथा यह अभावात्मकता से रहित = भावात्मक पदार्थ है जो कि सूक्ष्मतम अतीन्द्रिय पदार्थ है। अतः मूल प्रकृति = प्रधान नामक पदार्थ सत्तावान् और जगत् का उपादान कारण है।

इन चारों अवस्थाओं को स्थूलता के क्रम से कहते हुए सूक्ष्मतम अवस्था का वर्णन किया गया है, क्योंकि पुरुष अपने समक्ष उपलब्ध स्थूल पदार्थों का ही प्रथम ज्ञान प्राप्त करता है। ये विशेष नामक १६ सोलह पदार्थ अपने कारण छः अविशेषों का ज्ञान कराते हैं। इसी प्रकार यह छः अविशेष पदार्थ भी क्रमशः अपने कारणों एवं प्रथम कार्य पदार्थ महत्तत्त्व का ज्ञान कराते हैं। इसी प्रकार से लिङ्गमात्र महत्तत्त्व भी अपने कारण मूल प्रकृति का ज्ञान कराता है।

इन चारों अवस्थाओं में अलिङ्ग अवस्था को नित्य कहा है, क्योंकि इसका कोई कारण नहीं है। दृश्य को पुरुष के भोग और अपवर्ग का हेतु कहा है। परन्तु यह अलिङ्ग अवस्था पुरुषार्थकृत अर्थात् पुरुष के भोग और अपवर्ग, मूल प्रकृति के हेतु = कारण नहीं है, अर्थात् इस अवस्था का आरम्भ इस पुरुषार्थ के कारण नहीं हुआ। अतः इस अवस्था का हेतु = कारण न होने से यह नित्य कही गयी है। शेष तीनों अवस्थाओं में पुरुषार्थ = पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन निमित्त कारण होते हैं। अर्थात् प्रकृति से बनने वाले सभी विकार, ईश्वर रूपी निमित्त कारण द्वारा पुरुष = जीवात्माओं के भोग और अपवर्ग हेतु ही सत्ता में आते हैं। अतः अन्य तीनों अवस्थाएँ मूल प्रकृति का कार्य परिणाम होने से अनित्य कही गई हैं। इस मूल प्रकृति से सृष्टि निर्माण और प्रलय में निमित्त कारणता पुरुषार्थ = पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन होते हुए भी मुख्य निमित्त कारण ईश्वर ही है, क्योंकि जड़ पदार्थ में स्वयं कार्य सम्पादन की क्षमता नहीं होती; और न ही अल्पज्ञ जीवात्माओं में सृष्टि निर्माण और प्रलय का सामर्थ्य और ज्ञान है। इन्हीं भावों को महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२४ में भी व्यक्त किया है।

अपने कार्य परिणामों अर्थात् लिङ्गमात्र, अविशेष और विशेष अवस्थाओं में सत्त्वादि गुण उत्पन्न नहीं होते वरन् उन परिणामों में ही अनुगत = उपस्थित रहते हैं। इन अवस्थाओं की उत्पत्ति और विनाश के द्वारा ही इन सत्त्वादि गुणों की उत्पत्ति और विनाश का व्यवहार होता है; वस्तुतः इन गुणों के स्वरूप की उत्पत्ति और विनाश नहीं होता। इसमें उदाहरण देकर कहा है कि जैसे गायों के मरण से देवदत्त नामक पुरुष की दरिद्रता कही जाती है, न कि अपने स्वरूप की हानि के कारण। तथा गायों की समृद्धि से देवदत्त की समृद्धि होती है न कि उसके अपने किसी स्वरूप के लाभ से। इसी प्रकार गुणों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए।

शंका — इस सूत्र के भाष्य से ऐसा प्रतीत होता है कि अहंकार और पाँच तन्मात्राओं रूपी छः अविशेषों का उपादान कारण महत्तत्त्व है। महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.४५ के भाष्य में स्पष्ट रूप से तन्मात्राओं का कारण अहंकार और अहंकार का कारण महत्तत्त्व कहा है। इसी प्रकार सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल ने भी सांख्यसूत्रों में अहंकार को तन्मात्राओं और इन्द्रियों का कारण कहा है। इस प्रकार ये विरोधाभास प्रतीत होता है।

समाधान — वस्तुतः यहाँ सत्त्वादि गुणों की अवस्थाओं का वर्णन है न कि सृष्टि क्रम का। सत्त्वादि गुण जिन विकारों में विशेष रूप से अभिव्यक्त होते हैं वे विकार = परिणाम विशेष और जिन विकारों में विशेष रूप से अभिव्यक्त नहीं होते वे विकार = परिणाम अविशेष कहाते हैं। कार्य-कारण परम्परा हेतु सांख्यदर्शन में प्रतिपादित महर्षि कपिल और योगसूत्र १.४५ में प्रतिपादित महर्षि व्यास वाला क्रम ही मान्य है। यदि यहाँ भी कारण-कार्य परम्परा से विभिन्न विकारों का वर्णन होता तो यह पुनरुक्ति दोष होता। अतः कारण-कार्य के नियम को महर्षि व्यास ने, इस सूत्र के भाष्य में सृष्टि रचना क्रम को स्पष्ट करते हुए, “परिणामक्रमनियमात्” से कहा है। अर्थात् ये सभी विकार अपने परिणाम क्रम के नियम के अनुसार ही अपने-अपने उपादान कारणों से कार्यरूप में अभिव्यक्त होते हैं। यदि ऐसा न माना जाए तो अविशेष और लिङ्गमात्र अवस्था के बीच में एक और अवस्था का वर्णन होना चाहिए, तथा अहंकार के सभी कार्यों को भी एक ही अवस्था में रखा जाना चाहिए था। परन्तु यहाँ ऐसा व्याख्यान अपेक्षित नहीं था।

इस विषय में मनुस्मृति के निम्न श्लोक द्रष्टव्य हैं —

उद्बबर्हाऽऽत्मनश्चैव मनः सदसदात्मकम्। मनसश्चाप्यहंकारमभिमन्तारमीश्वरम्॥

महान्तमेव चाऽऽत्मानं सर्वाणि त्रिगुणानि च। विषयाणां ग्रहीतृणि शनैः पञ्चेन्द्रियाणि च॥

तेषां त्ववयवान्सूक्ष्मान् षण्णामप्यमितौजसाम्। सन्निवेश्याऽऽत्ममात्रासु सर्वभूतानि निर्ममे॥ मनु॰१.१४-१६॥

अर्थात् :— (च) और फिर उस परमात्मा ने (आत्मनः एव) स्वाश्रयस्थित प्रकृति से (सद्-असद् आत्मकम्) जो कारणरूप में विद्यमान रहे और विकारी अंश से कार्यरूप में जो अविद्यमान रहे, ऐसे स्वभाव वाले (मनः) ‘महत्’ नामक तत्त्व को (च) और (मनसः अपि) महत्तत्त्व से (अभिमन्तारम्) ‘मैं हूँ’ ऐसा अभिमान करने वाले (ईश्वरम्) सामर्थ्यशाली (अहंकारम्) ‘अहंकार’ नामक तत्त्व को (च) और फिर उससे (सर्वाणि त्रिगुणानि) सब त्रिगुणात्मक पांच तन्मात्राओं को (च) तथा (आत्मानम् एव महान्तम्) आत्मोपकारक अथवा निरन्तर गमनशील ‘मन’ इन्द्रिय को (च) और (विषयाणां ग्रहीतॄणि) विषयों को ग्रहण करने वाली (पञ्चेन्द्रियाणि) दोनों वर्गों की पांचों ज्ञानेन्द्रियों एवं चकार से पांच कर्मेन्द्रियों को (शनैः) यथाक्रम से (उद्बबर्ह) उत्पन्न कर प्रकट किया॥ (तेषां तु) उन तत्त्वों में से (अमित औजसाम्) अत्याधिक शक्तिवाले (षण्णाम् अपि) छहों तत्त्वों के (सूक्ष्मान् अवयवान्) सूक्ष्म अवयवों = शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये पांच तन्मात्राएँ तथा छठे अंहकार के सूक्ष्म अवयवों को (आत्ममात्रासु) उनके आत्मभूत तत्त्वों के विकारी अंशों अर्थात् कारणों में मिलाकर (सर्व भूतानि) सब पाँचों महाभूतों = आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी की (निर्ममे) सृष्टि की॥

उपरोक्त विवरण से स्पष्ट है कि पाँच महाभूतों की उत्पत्ति में केवल तन्मात्राएँ ही उपादान कारण नहीं रही वरन् शब्दादि तन्मात्रों के साथ अहंकार नामक तत्त्व भी महाभूतों की उत्पत्ति में मुख्य उपादान कारण रहा है। शास्त्रों के इसी रहस्य को स्पष्ट करने हेतु ही महर्षि व्यास ने अंहकार और तन्मात्राओं को अविशेषों में एक साथ गिना है, और लिङ्गमात्र = महत्तत्त्व के उपरान्त उनकी उत्पत्ति कही है।

अतः महर्षि व्यास द्वारा अविशेषों की उत्पत्ति का वर्णन करते हुए “परिणामक्रमनियमात्” का स्पष्ट निर्देश करना ही इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि ये सभी पदार्थ अपने-अपने परिणामक्रम के नियम से उत्पन्न होते हैं, अन्यथा नहीं।

इस प्रकार से दृश्य का ज्ञान, दृष्टा पुरुष को अपने स्वरूप को समझनें में सहायक होता है, जो कि इन गुणों के परिणामों तथा अवस्थाओं से सर्वथा भिन्न चेतन सत्ता है, और जिसके भोग और अपवर्ग हेतु ही यह दृश्य विभिन्न रूपों में परणित होता है। आगे महर्षि पतञ्जलि द्रष्टा = पुरुष के स्वरूप का व्याख्यान कर रहे हैं।