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Saadhana Paada / Means / 20
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Saadhana Paada / Means / 20

द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥२०॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 20

In Hindi:

पदपाठ : द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धः अपि प्रत्ययानुपश्यः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : व्याख्यातं दृश्यम्। अथ द्रष्टुः स्वरूपावधारणार्थमिदमारभ्यते—

हिंदी में अर्थ : (दृश्यम्) दृश्य = प्रकृति और उसके विकारों की (व्याख्यातम्) व्याख्या की गई। (अथ) अब (द्रष्टुः) द्रष्टा = जीवात्मा के (स्वरूपावधारणार्थम्) स्वरूप का निश्चय करने के लिए (इदम्) इस सूत्र का (आरभ्यते) आरम्भ किया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (द्रष्टा) देखने वाला = ज्ञाता (दृशिमात्रः) ज्ञानस्वरूप चेतन जीवात्मा (शुद्धः) दृश्य = प्रकृति के धर्मों, विकारों, मिश्रण से सर्वथा रहित, निर्विकार होता हुआ (अपि) भी (प्रत्ययानुपश्यः) त्रिगुणात्मक बुद्धि की सन्निधि से बुद्धिगत ज्ञानों = विषयों = वृत्तियों को देखने वाला है॥

व्यास भाष्य : दृशिमात्र इति दृक्शक्तिरेव विशेषणापरामृष्टेत्यर्थः। स पुरुषो बुद्धेः प्रतिसंवेदी। स बुद्धेर्न सरूपो नात्यन्तं विरूप इति। न तावत्सरूपः। कस्मात्? ज्ञाताज्ञातविषयत्वात्परिणामिनी हि बुद्धिः। तस्याश्च विषयो गवादिर्घटादिश्च ज्ञातश्चाज्ञातश्चेति परिणामित्वं दर्शयति।

सदा ज्ञातविषयत्वं तु पुरुषस्यापरिणामित्वं परिदीपयति। कस्मात्? न हि बुद्विश्च नाम पुरुषविषयश्च स्यादगृहीता गृहीता चेति सिद्धं पुरुषस्य सदा ज्ञातविषयत्वं ततश्चापरिणामित्वमिति। किं च परार्था बुद्धिः संहत्यकारित्वात्, स्वार्थः पुरुष इति। तथा सर्वार्थाध्यवसायकत्वात् त्रिगुणा बुद्धिस्त्रिगुणत्वादचेतनेति। गुणानां तूपद्रष्टा पुरुष इति। अतो न सरूपः।

अस्तु तर्हि विरूप इति। नात्यन्तं विरूपः। कस्मात्? शुद्धोऽप्यसौ प्रत्ययानुपश्यः। यतः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति। तमनुपश्यन्नतदात्मापि तदात्मक इव प्रत्यवभासते। तथा चोक्तम्—“अपरिणामिनी हि भोक्तृशक्तिरप्रतिसंक्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुपतति। तस्याश्च प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपाया बुद्धिवृत्तेरनुकारमात्रतया बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि ज्ञानवृत्तिरित्याख्यायते॥”

हिंदी में अर्थ : (दृशिमात्र इति)“दृशिमात्र” कहने से (इति अर्थः) यह अभिप्राय है कि (दृक्शक्तिः एव) देखने वाली = ज्ञानशक्ति ही (विशेषणापरामृष्टः) विशेषणों से अपरामृष्ट = रहित है। (सः) वह ज्ञानशक्ति वाला (पुरुषः) चेतन पुरुष (बुद्धेः) बुद्धि का (प्रतिसंवेदी) प्रतिसंवेदन = अनुभव करने वाला है। (सः) वह पुरुष (बुद्धेः) बुद्धि के (सरूपः) समान रूप वाला (न) नहीं है; और (न) न ही (अत्यन्तम्) अत्यन्त (विरूपः इति) भिन्न रूप वाला है।

समान रूप वाला नहीं है, इस विषय में कहते हैं कि पुरुष (तावत्सरूपः) बुद्धि के समान रूप वाला (न) नहीं है। (कस्मात्) क्यों नहीं है ? (हि) क्योंकि (ज्ञाताज्ञातविषयत्वात्) ज्ञात और अज्ञात विषयों वाली होने से (बुद्धिः) बुद्धि (परिणामिनी) परिणाम = विकार को प्राप्त होने वाली है। (च) और (तस्याः) उस बुद्धि के (विषयः) विषय (गवादिः) गौ आदि (च) और (घटादिः) घट आदि (ज्ञातः च अज्ञातः च) कभी ज्ञात और कभी अज्ञात होते हैं अर्थात् कभी ये विषय ज्ञात होते और कभी ये विषय अज्ञात होते हैं; (इति) इसलिए इस प्रकार की ज्ञात-अज्ञात विषयता बुद्धि की (परिणामित्वम्) परिणामशीलता को (दर्शयति) दर्शाती है = प्रकट करती है। (तु) परन्तु इसके विपरीत (सदा ज्ञातविषयत्वम्) विषयों का सदा ज्ञात रहना (पुरुषस्य) पुरुष के (अपरिणामित्वम्) अपरिणामित्व = अपरिणामशीलता को (परिदीपयति) प्रकाशित = सिद्ध करता है। (कस्मात्) क्यों वह पुरुष सदा ज्ञात विषय वाला है ? (हि) क्योंकि (बुद्विश्च नाम पुरुषविषयश्च) पुरुष के ज्ञान की विषयभूता बुद्धि, पुरुष को (गृहीताऽगृहीता च) कभी ज्ञात हो और कभी अज्ञात हो (इति) ऐसा (न स्यात्) नहीं हो सकता। अतः इससे (पुरुषस्य) पुरुष का (सदा ज्ञातविषयत्वम्) सदा ज्ञात विषय वाला होना (सिद्धम्) सिद्ध हुआ (च) और (ततः) उससे पुरुष का (अपरिणामित्वम् इति) अपरिणामी = अविकारी होना भी सिद्ध होता है।

(किम् च) और भी (बुद्धिः) बुद्धि (संहत्यकारित्वात्) संहत् = सत्त्वादि तीन गुणों का संघात रूप होने से (परार्थाः) परार्थ = पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करती है; जबकि (पुरुषः) पुरुष (स्वार्थः इति) अपने प्रयोजन को सिद्ध करता है, अपने से भिन्न जड़ पदार्थ के नहीं।

(तथा) उसी प्रकार (सर्वार्थाध्यवसायकत्वात्) सत्त्व आदि गुणों के सभी शान्त, घोर और मूढ रूप अर्थों का अध्यवसाय = निश्चयात्मक ज्ञान कराने वाली होने से (त्रिगुणा बुद्धिः) बुद्धि सत्त्व, रज और तम गुणों वाली = त्रिगुणात्मक है; और (त्रिगुणत्वात्) त्रिगुणात्मक होने से बुद्धि (अचेतना इति) अचेतन = जड़ है। (तु) किन्तु (पुरुषः) पुरुष = जीवात्मा (गुणानाम्) तीनों सत्त्वादि गुणों का (उपद्रष्टाः इति) उपद्रष्टा = साक्षात्कार करने वाला है। (अतः) इस प्रकार पुरुष (न सरूपः) बुद्धि के समान रूप वाला नहीं है।

अब अत्यन्त वैरूप्य का निराकरण करते हैं — (अस्तु तर्हि) जब पुरुष बुद्धि के समान रूप वाला नहीं है तो (विरूप इति) उससे विपरीत = भिन्न रूप वाला होगा ? उत्तर देते हैं — (अत्यन्तम्) पुरुष बुद्धि से सर्वथा (विरूपः) भिन्न रूप वाला भी (न) नहीं है। (कस्मात्) क्यों सर्वथा भिन्न रूप वाला नहीं है? क्योंकि (असौ) वह पुरुष (शुद्धः अपि) शुद्ध, निर्विकार, निर्लेप, असङ्ग होता हुआ भी (प्रत्ययानुपश्यः) बुद्धि वृत्ति का अनुद्रष्टा = उपद्रष्टा = साक्षात्कार करने वाला है; (यतः) जिस कारण से पुरुष (बौद्धम् प्रत्ययम्) बुद्धि वृत्ति रूप ज्ञान को (अनुपश्यति) अनुपश्य = ग्रहण अथवा अनुभव करता है। (तम्) उस बुद्धिगत ज्ञान को (अनुपश्यन्) अनुभव करता हुआ पुरुष, (अतदात्मा अपि) बुद्धि जैसा न होता हुआ भी, (तदात्मक इव) उसके समान रूप वाला (प्रत्यवभासते) प्रतिभासित = प्रतीत होता है। (तथा च उक्तम्) और वैसा कहा भी है — (भोक्तृशक्तिः) भोक्तृशक्ति = चेतन शक्ति (पुरुष) (अपरिणामिनि) अपरिणामी = किसी प्रकार के परिणाम से रहित (च) और (अप्रतिसंक्रमा) निर्लेप, विषयों में संचरण = घुलने-मिलने वाली नहीं है; तथापि (परिणामिनि अर्थे) परिणाम को प्राप्त होने वाली = परिणामशील बुद्धि में (प्रतिसंक्रान्ता इव) प्रतिसंक्रमित = घुली-मिली = चलायमान, परिणामवाली की भाँति होकर (तद्वृत्तिम्) उस बुद्धि की वृत्तियों का (अनुपतति) अनुगमन करती हुई, उस बुद्धिगत ज्ञान को ग्रहण करती है। (च) और (तस्याः) उस (प्राप्तचैतन्योपग्रहरूपायाः) चेतन पुरुष के सम्बन्ध से चेतनता को प्राप्त करने वाली (बुद्धि वृत्तेः) उस बुद्धि वृत्ति के (अनुकारमात्रतया) अनुकरण मात्र से (बुद्धिवृत्त्यविशिष्टा हि) बुद्धिवृत्ति के समान ही (ज्ञानवृत्तिः) पुरुष की ज्ञानवृत्ति हो जाती है; (इति आख्यायते) ऐसा कहा जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : दृश्य, पुरुष के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए है। और यह पुरुष रूपी द्रष्टा कैसा है? यह कैसे विषयों को प्राप्त करता है? इन विषयों का वर्णन महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास इस सूत्र में कर रहे हैं।

द्रष्टा = चेतन जीवात्मा सर्वथा शुद्ध है, अर्थात् इसमें किसी प्रकार का विकार = परिणाम नहीं होता — जैसे कि सत्त्वादि गुणों के विभिन्न परिणाम पूर्व सूत्र में कहे गए है; अथवा भूत और इन्द्रियों में धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम होते हैं; वैसा किसी प्रकार का कोई भी परिणाम पुरुष में नहीं होता। यह निर्विकारी, असङ्ग होता हुआ भी बुद्धि की वृत्तियों = ज्ञानों का उपद्रष्टा है, उन्हें देखने, अनुभव करने वाला है।

महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२ के भाष्य में पुरुष को परिभाषित करते हुए कहा है — “चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च” अर्थात् (चितिशक्तिः) चेतना शक्ति = चेतन पुरुष = आत्मा (अपरिणामिनी) उपरोक्त सत्त्वादि गुणों के परिणाम से रहित तथा धर्म, लक्षण और अवस्था (योगसूत्र ३.१३) रूप तीन प्रकार के परिणाम से रहित (अप्रतिसंक्रमा) निर्लेप (बुद्धि आदि के मिश्रण से रहित) एवं अविचल अर्थात् किसी पदार्थ में घुलने मिलने के स्वभाव से रहित (दर्शितविषया) चित्त द्वारा दिखाये जाने वाले विषयों का द्रष्टा और उन विषयों से भी उपरत हो जाने वाला (शुद्धा च) शुद्ध = पवित्र और (अनन्ता) अन्त अर्थात् नाश रहित है। यहाँ भी पुरुष को स्वरूपतः शुद्ध के साथ-साथ “दर्शितविषया” कहा है अर्थात् यह चित्त = बुद्धि द्वारा दिखाए जाने वाले विषयों का द्रष्टा है।

इसी प्रकार योगसूत्र १.४ की भूमिका में इसे “दर्शितविषयत्वात्” कहा है अर्थात् यह पुरुष बुद्धि की वृत्तियों का प्रतिसंवेदन करने वाला होने से उसके स्वरूप वाला होकर भासता है।

महर्षि वात्स्यायन ने भी न्यायसूत्र १.१.९ के भाष्य में आत्मा का इस प्रकार से व्याख्यान किया है “तत्राऽऽत्मा सर्वस्य द्रष्टा सर्वस्य भोक्ता सर्वज्ञः सर्वानुभवी” अर्थात् आत्मा ही सब दृश्यों = प्राकृतिक विषयों यथा भूत, इन्द्रियों आदि का द्रष्टा, सब विषयों को भोगने वाला, सब का जानने वाला तथा सब विषयों का अनुभव करने वाला है।

अतः परार्थ प्रकृति और उसके विकारों का साक्षात् करने वाला चेतन जीवात्मा है, जो बुद्धि में उपस्थित विषयों का अनुभव करता है। जीवात्मा = पुरुष को महर्षि व्यास ने उपद्रष्टा कहा है, और आगे इसे प्रत्ययानुपश्यः अर्थात् बुद्धि वृत्ति का अनुद्रष्टा कहा है। इस रहस्य को समझना आवश्यक है। पुरुष को विषयों की प्राप्ति में बुद्धि, मन और इन्द्रियाँ सहायक होती हैं। विषयों का सम्बन्ध बाह्य इन्द्रियों से होता; इन्द्रियों के माध्यम से विषय मन में और मन से वह विषय बुद्धि में उपस्थित होता है। वह विषय जिस प्रकार से उपस्थित होता, पुरुष बुद्धि में उपस्थित हुए विषय को उसी प्रकार से साक्षात् करता है। इस प्रकार पुरुष का सम्बन्ध सीधा प्रकृति और उसके विकार रूप विषयों से नहीं होता। अतः चेतन पुरुष की सन्निधि से चेतनवत् हुई बुद्धि जिस विषय को जिस प्रकार से उपस्थित करती, पुरुष उस विषय को उसी प्रकार से जानता है। यथा कामी पुरुष स्त्री की सन्निधि में सुख का अनुभव करता और वैराग्य को प्राप्त हुआ पुरुष उसी स्त्री की सन्निधि में दुःख का अनुभव करता। वस्तुतः विषय एक ही होता हुआ भी विभिन्न पुरुषों द्वारा भिन्न रूप में जाना जाता है। इसी कारण से पुरुष को विषयों का साक्षात् द्रष्टा न कह कर उसे उपद्रष्टा कहा गया है।

दूसरी ओर पुरुष अन्य चेतन पुरुषों और ईश्वर का उपद्रष्टा न होकर द्रष्टा होता है। असम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा, परमात्मा को बुद्धि के आश्रय से नहीं वरन् स्वयं के आश्रय से ही साक्षात् करता है; और मुक्ति की अवस्था में वह, अपने स्वाभाविक सामर्थ्य से युक्त हुआ, अन्य मुक्त पुरुषों से बिना किसी अन्य (बुद्धि आदि) के आश्रय से मिलता है, अतः इनका वह द्रष्टा होता है, न कि उपद्रष्टा।

बुद्धि के माध्यम से विषयों का साक्षात् करने वाला पुरुष न तो बुद्धि के समान रूप वाला ही है, और न ही उससे अत्यन्त भिन्न रूप वाला कहा गया है। पुरुष की बुद्धि से समान रूपता का निम्न तीन कारणों से निराकरण किया गया है —

१. बुद्धि को कभी कोई विषय ज्ञात रहता और कभी अज्ञात रहता। अतः विषयों का ज्ञात और अज्ञात रहना उसकी परिणामशीलता को दर्शाता हैं। विषयों के साथ सम्बन्ध की अपेक्षा से पदार्थ = विषय बुद्धि को ज्ञात अथवा अज्ञात रहते हैं। अतः जब घट से सम्बन्ध होता तो घट ज्ञात रहता और गौ अज्ञात रहती और जब गौ से सम्बन्ध होता तो गौ ज्ञात रहती और घट अज्ञात रहता। परन्तु पुरुष जो बुद्धि का स्वामी है उसे बुद्धि की वृत्तियाँ सदा ज्ञात रहती हैं अतः पुरुष को अपरिणामी कहते हैं। अर्थात् यह बुद्धि के समान विकार = परिणाम को प्राप्त नहीं होता। इस विषय पर विशेष व्याख्यान योगसूत्र ४.१८-१९ की व्याख्या में देखें।

२. बुद्धि संहत है अर्थात् यह सत्त्व, रज और तम गुणों के संघात से बनी है। अतः जड़ होने से यह परार्थ है। और वह पर “पुरुष” है, जिसके भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन हेतु ही यह प्रकृति और उसके समस्त विकार हैं। दूसरी ओर पुरुष = जीवात्मा किन्हीं पदार्थों के संघात से नहीं बनता और यह स्वार्थ है। इसका साक्षात्कार भी स्वार्थसंयम से होता है। यह अपने स्वयं के प्रयोजनों को सिद्ध करने वाला है न कि अन्य किसी पदार्थ के।

३. बुद्धि सत्त्वादि तीनों गुणों का ज्ञान कराने वाली, त्रिगुणात्मक है; और त्रिगुणात्मक होने से अपने उपादान कारणों के समान ही जड़ = अचेतन है। परन्तु पुरुष को इन तीनों सत्त्वादि गुणों का उपद्रष्टा कहा है, और वह चेतन है। अतः इन तीनों कारणों से पुरुष, बुद्धि के समान रूप वाला नहीं है।

तो क्या पुरुष बुद्धि से भिन्न = विपरीत रूप वाला है? महर्षि व्यास कहते हैं कि यह बुद्धि से सर्वथा भिन्न रूप वाला भी नहीं है। वस्तुतः संसार दशा में पुरुष को “वृत्तिसारूप्यम्” = वृत्तियों के समान रूप वाला कहा जाता है। यह पुरुष शुद्ध, निर्विकार, निर्लेप होता हुआ भी बुद्धिगत विषयों का उपद्रष्टा है, और बुद्धि में उपस्थित विषयों को ग्रहण = अनुभव करता है। अतः बुद्धि जैसा न होता हुआ भी उसके समान रूप वाला ही प्रतीत होता है। सांसारिक दशा में उस बुद्धि की वृत्तियों का अनुकरण करने से, उन बुद्धि की वृत्तियों के समान, उसका ज्ञान होता है। अतः वह बुद्धि से सर्वथा = अत्यन्त भिन्न रूप वाला भी नहीं है।

द्रष्टा = पुरुष के उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि वह ही द्रष्टा तथा भोक्ता है, न कि बुद्धि। सांसारिक भोग, सुख-दुःख बुद्धि में रहते हुए भी बुद्धि के न होते हुए परार्थ है, अर्थात् उसके स्वामी पुरुष के लिए होते हैं। और फिर बुद्धि जड़ होने से, उनका अनुभव नहीं कर सकती, बल्कि चेतन पुरुष ही इनका अनुभव करता है। इसी तथ्य को अगले सूत्र में प्रतिपादित किया है।

इस सूत्र की व्याख्या से पौराणिकभाष्यकारों को यह भ्रान्ति होती है कि पुरुष मात्र द्रष्टा है, वह कर्मों का कर्त्ता नहीं है। परन्तु यह भ्रान्ति वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय न होने के कारण है। महर्षि व्यास अपने ग्रन्थ वेदान्तदर्शन में यह स्पष्ट रूप से प्रतिपादित करते हैं कि —

कर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात्॥ वेदान्त० २.३.३३॥

अर्थात् शास्त्र की अर्थवत्ता से = शास्त्र की सार्थकता होने से, आत्मा कर्त्ता सिद्ध होता है। अर्थात् यदि आत्मा को कर्त्ता न माना जाये तो शास्त्र अनर्थक हो जायेगा॥ अतः वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणानुसार आत्मा ही कर्मों का कर्त्ता है, तथा वह ही स्वकृत कर्मों के फलों का भोक्ता है।