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Saadhana Paada / Means / 22
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Saadhana Paada / Means / 22

कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥२२॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 22

In Hindi:

पदपाठ : कृतार्थम् प्रति नष्टम् अपि अनष्टम् तत् अन्यसाधारणत्वात्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्स्वरूपं तु पररूपेण प्रतिलब्धात्मकं भोगापवर्गार्थतायां कृतायां पुरुषेण न दृश्यत इति। स्वरूपहानादस्य नाशः प्राप्तः। न तु विनश्यति॥ कस्मात्—

हिंदी में अर्थ : (तत्स्वरूपम्) उस दृश्य का स्वरूप (तु) तो (पररूपेण) अन्य आत्मा = पुरुष रूप द्रष्टा के द्वारा (प्रतिलब्धात्मकम्) अनुभूत = परिज्ञात होने पर और (भोगापवर्गार्थतायाम् कृतायाम्) भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजन के चरितार्थ होने पर वह दृश्य (पुरुषेण) पुरुष के द्वारा (न दृश्यते) नहीं देखा जाता है। (इति) इसलिए (स्वरूपहानात्) स्वरूप का हान = स्थिति न होने से (अस्य) इस दृश्य का (नाशः प्राप्तः) नाश का प्रसंग प्राप्त होता है; (न तु विनश्यति) किन्तु दृश्य का नाश नहीं होता। (कस्मात्) क्यों ? इस प्रश्न का उत्तर देते हैं —

हिंदी में अर्थ : (कृतार्थम् प्रति) कृतार्थ पुरुष = जिस पुरुष का भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन सिद्ध हो गया है, उसके प्रति (नष्टम् अपि) नाश को प्राप्त होता हुआ भी (तत्) वह दृश्य (अन्यसाधारणत्वात्) अन्य अकृतार्थ = अमुक्त पुरुषों के प्रति, सामान्य रूप से भोग और अपवर्ग की सिद्धि कराने वाला होने से, (अनष्टम्) नष्ट नहीं होता = विद्यमान रहता है॥

व्यास भाष्य : कृतार्थमेकं पुरुषं प्रति दृश्यं नष्टमपि नाशं प्राप्तमप्यनष्टं तदन्यपुरुषसाधारणत्वात्। कुशलं पुरुषं प्रति नाशं प्राप्तमप्यकुशलान्पुरुषान्प्रति न कृतार्थमिति तेषां दृशेः कर्मविषयतामापन्नं लभत एव पररूपेणात्मरूपमिति। अतश्च दृग्दर्शनशक्त्योर्नित्यत्वादनादिः संयोगो व्याख्यात इति। तथा चोक्तम् — धर्मिणामनादिसंयोगाद्धर्ममात्राणामप्यनादिः संयोगः इति॥

हिंदी में अर्थ : (कृतार्थम्) कृतार्थ हुए = मोक्ष को प्राप्त हुए (एकम् पुरुषम्) किसी एक पुरुष के (प्रति) प्रति (दृश्यम्) दृश्य = प्रकृति और उसके विकार (नष्टम् अपि) नष्ट हुए भी अर्थात् (नाशम् प्राप्तम् अपि) नाश को प्राप्त हुए भी (तद्) वह दृश्य (अन्यपुरुषसाधारणत्वात्) अन्य अमुक्त = अकृतार्थ पुरुषों के प्रति साधारण = समान रूप से उपलब्ध होने से (अनष्टम्) नष्ट नहीं होता। (कुशलम् पुरुषम् प्रति) कुशल = अविप्लवा विवेकख्याति को प्राप्त पुरुष के प्रति (नाशम् प्राप्तम् अपि) वह दृश्य नाश को प्राप्त हुआ भी (अकुशलान् पुरुषान् प्रति) अकुशल = अविवेकी पुरुषों के प्रति (न कृतार्थम्) समाप्त प्रयोजन वाला नहीं होता, उनके भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों के शेष रहने से। (इति) इस लिए (तेषाम्) उन बद्ध पुरुषों की (दृशेः) दर्शन क्रिया को (कर्मविषयताम्) कर्मविषयता को (आपन्नम्) प्राप्त होता है। और इस प्रकार कर्म विषयता को प्राप्त होता हुआ वह दृश्य (पररूपेण) बद्ध पुरुषों की स्थिति के द्वारा (आत्मरूपम्) अपने स्वरूप को (लभते एव इति) प्राप्त करता ही है। (अतः च) और इसलिए (दृग्दर्शनशक्त्योः) दृक् शक्ति = पुरुष, और दर्शन शक्ति = बुद्धि के (प्रवाह से) (नित्यत्वात्) नित्य होने से, दोनों का (संयोगः) संयोग (अनादिः) अनादि है (इति व्याख्यातः) ऐसा कहा गया है।

(तथा च उक्तम्) और ऐसा कहा गया है — “(धर्मिणाम्) धर्मी रूप सत्त्वादि गुणों का (पुरुष के साथ) (अनादिसंयोगात्) अनादि संयोग होने से (धर्ममात्राणाम् अपि) बुद्धि आदि गुणों के धर्मों = विकारों का भी (अनादिः संयोगः इति) संयोग (प्रवाह से) अनादि है॥

वैदिक योग मीमांसा : सम्पूर्ण दृश्य = प्रकृति और उसके विकार, पुरुष रूपी द्रष्टाओं के भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए हैं। सभी पुरुषों को प्रकृति के माध्यम से सुख-दुःखादि भोगों की प्राप्ति, कर्मानुसार अनन्त काल से हो रही है। परन्तु जो पुरुष इस मनुष्य शरीर में आकर योगाभ्यास करता हुआ अपने और प्रकृति के स्वरूप को यथार्थ रूप से साक्षात् कर, असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में पहुँच कर ईश्वर साक्षात्कार कर जीवन्मुक्त होता और शरीरपात् के पश्चात् ईश्वरीय व्यवस्था में अपवर्ग = मुक्ति को प्राप्त कर लेता है उस कृतार्थ = कृतकृत्य हुए पुरुष के प्रति प्रकृति का प्रयोजन पूरा हो जाता है। पुरुष को अपवर्ग की प्राप्ति के उपरान्त, प्रकृति उसके हेतु भोगों को उपलब्ध नहीं कराती अर्थात् उसके प्रति उस दृश्य का व्यापार समाप्त हो जाता है। ऐसे पुरुष का, प्रकृति से कोई प्रयोजन शेष न रहने से, दृश्य उस पुरुष के प्रति नष्ट हो जाता है।

ऐसी स्थिति के आने पर भी प्रकृति का सकल व्यापार समाप्त नहीं होता। क्योंकि पुरुषों की संख्या अगणित होने से सभी पुरुष, अपने विचित्र कर्माशय और असंख्य संस्कारों से युक्त होने के कारण, एक साथ एक ही काल में मुक्ति को प्राप्त कर ले, ऐसा सम्भव नहीं है। जबकि दृश्य का कार्यरूप में प्रकट होना किसी पुरुष विशेष के लिए न होकर सभी पुरुषों के लिए समान है। अतः अकृतार्थ = अविद्याग्रस्त अन्य सभी पुरुषों के लिए दृश्य उसी प्रकार से उपस्थित रहता है; उन सभी अकृतार्थ पुरुषों के लिए विभिन्न प्रकार के भोग, दृश्य के रूप में प्राप्त रहते हैं। और यह क्रम अनादि काल से चल रहा है। हर सर्ग के आदि में ईश्वरीय व्यवस्था में प्रकृति के विकारों = बुद्धि, अंहकार, मन आदि इन्द्रियों का बद्ध पुरुषों के साथ संयोग हो जाता है। और दृश्य से इस प्रकार संयोग के होने से, पुरुष विभिन्न प्रकार के भोगों को प्राप्त करता है, और विवेकख्याति की प्राप्ति पर्यन्त इस प्रकार भोगों की प्राप्ति का क्रम चलता रहता है। विवेकख्याति के उपरान्त ही जीवन्मुक्त पुरुष का, शरीरपात होने पर, प्रकृति और उसके विकारों से संयोग समाप्त हो जाता है।

अतः प्रवाह से अनादि रूप से पुरुष और दृश्य का संयोग ही इस संसार चक्र को चालू रखता है। प्रलय काल में दृष्टा और दृश्य के संयोग का नाश होने पर बद्ध पुरुषों को भोग भी उपलब्ध नहीं होते। इसी प्रकार मुक्त पुरुष भी प्रकृति के संयोग के अभाव में सांसारिक भोगों को प्राप्त नहीं करता। परन्तु मुक्ति की अवधि की समाप्ति के उपरान्त, फिर से दृश्य के संयोग को प्राप्त होने पर, उस पुरुष के प्रति भी दृश्य का भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन पुनः आरम्भ हो जाता है।