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Saadhana Paada / Means / 23
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Saadhana Paada / Means / 23

स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः॥२३॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 23

In Hindi:

पदपाठ : स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपः उपलब्धिहेतुः संयोगः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : संयोगस्वरूपाभिधित्सयेदं सूत्रं प्रवृर्त्तते —

हिंदी में अर्थ : (संयोगस्वरूपाभिधित्सया) द्रष्टा और दृश्य के संयोग का स्वरूप कहने की इच्छा से (इदम् सूत्रम्) यह सूत्र (प्रवृर्त्तते) प्रवृत्त होता है —

हिंदी में अर्थ : (स्वस्वामिशक्त्योः) स्वशक्ति = दृश्य = प्रकृति और स्वामिशक्ति = द्रष्टा = चेतन जीवात्मा के (स्वरूपोपलब्धिहेतुः) स्वरूप की उपलब्धि (= ज्ञान) का हेतु (संयोगः) संयोग है॥

व्यास भाष्य : पुरुषः स्वामी दृश्येन स्वेन दर्शनार्थं संयुक्तः। तस्मात्संयोगाद्दृश्यस्योपलब्धिर्या स भोगः। या तु द्रष्टुः स्वरूपोपलब्धिः सोऽपवर्गः। दर्शनकार्यावसानः संयोग इति दर्शनं वियोगस्य कारणमुक्तम्। दर्शनमदर्शनस्य प्रतिद्वन्द्वीत्यदर्शनं संयोगनिमित्तमुक्तम्। नात्र दर्शनं मोक्षकारणमदर्शनाभावादेव बन्धाभावः स मोक्ष इति। दर्शनस्य भावे बन्धकारणस्यादर्शनस्य नाश इत्यतो दर्शनं ज्ञानं कैवल्यकारणमुक्तम्।

किं चेदमदर्शनं नाम? किं गुणानामधिकारः। आहोस्विद्दृशिरूपस्य स्वामिनो दर्शितविषयस्य प्रधानचित्तस्यानुत्पादः। स्वस्मिन्दृश्ये विद्यमाने यो दर्शनाभावः। किमर्थवत्ता गुणानाम्। अथाविद्या स्वचित्तेन सह निरुद्धा स्वचित्तस्योत्पत्तिबीजम्। किं स्थितिसंस्कारक्षये गतिसंस्काराभिव्यक्तिः। यत्रेदमुक्तं प्रधानं स्थित्यैव वर्त्तमानं विकाराकरणादप्रधानं स्यात्। तथा गत्यैव वर्त्तमानं विकारनित्यत्वादप्रधानं स्यात्। उभयथा चास्य वृत्तिः प्रधानव्यवहारं लभते नान्यथा। कारणान्तरेष्वपि कल्पितेष्वेष समानश्चर्चः। दर्शनशक्तिरेवादर्शनमित्येके। प्रधानस्यात्मख्यापनार्था प्रवृत्तिरिति श्रुतेः। सर्वबोध्यबोधसमर्थः प्राक्प्रवृत्तेः पुरुषो न पश्यति सर्वकार्यकरणसमर्थं दृश्यं तदा न दृश्यत इति। उभयस्याप्यदर्शनं धर्म इत्येके। तत्रेदं दृश्यस्य स्वात्मभूतमपि पुरुषप्रत्ययापेक्षं दर्शनं दृश्यधर्मत्वेन भवति। तथा पुरुषस्यानात्मभूतमपि दृश्यप्रत्ययापेक्षं पुरुषधर्मत्वेनेवादर्शनमवभासते। दर्शनं ज्ञानमेवादर्शनमिति केचिदभिदधति। इत्येते शास्त्रगता विकल्पाः। तत्र विकल्पबहुत्वमेतत्सर्वपुरुषाणां गुणानां संयोगे साधारणविषयम्॥

हिंदी में अर्थ : (पुरुषः स्वामी) पुरुष रूपी स्वामी (दृश्येन स्वेन) स्व = दृश्य = प्रकृति और उसके विकारों बुद्धि आदि के साथ (दर्शनार्थम्) दर्शन के लिए (संयुक्तः) संयुक्त होता है। (तस्मात् संयोगात्) उस संयोग से (याः) जो (दृश्यस्य) दृश्य के स्वरूप का (उपलब्धिः) ज्ञान होता है (सः) वह पुरुष का (भोगः) भोग है। (या तु) जो तो (द्रष्टुः) द्रष्टा पुरुष के (स्वरूपः) स्वरूप का (उपलब्धिः) ज्ञान होना है, (सः) वह पुरुष का (अपवर्गः) अपवर्ग = मोक्ष है। (संयोगः) प्रकृति और पुरुष का संयोग (दर्शनकार्यावसानः) दर्शनकार्य = यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति के सम्पन्न होने तक रहता है; (इति) इसलिए (दर्शनम्) दर्शन = विवेकख्याति रूप यथार्थ ज्ञान (वियोगस्य) द्रष्टा और दृश्य के वियोग का (कारणम्) कारण (उक्तम्) कहा गया है। (दर्शनम्) विवेकख्याति (अदर्शनस्य) अदर्शन = अविद्या = अविवेक का (प्रतिद्वन्द्वी) विरोधी है (इति) इसलिए (अदर्शनम्) अविवेक = अविद्या (संयोगनिमित्तम्) द्रष्टा और दृश्य के संयोग का निमित्त = कारण (उक्तम्) कहा गया है। (अत्र) यहाँ (दर्शनम्) विवेक ज्ञान (मोक्षकारणम्) मोक्ष का कारण (न) नहीं है; वरन् (अदर्शनाभावात्) अदर्शन = अविद्या का अभाव हो जाने से (एव) ही जो (बन्धाभावः) बन्धन का अभाव हो जाता है, (सः) वही (मोक्षः इति) पुरुष का मोक्ष है। (दर्शनस्य भावे) विवेकज्ञान के होने पर (बन्धकारणस्य) बन्धन के कारण (अदर्शनस्य) अदर्शन = अविद्या का (नाशः) नाश हो जाता है; (इत्यतः) इसलिए (दर्शनम् ज्ञानम्) विवेक ज्ञान को (कैवल्यकारणम्) कैवल्य = मोक्ष का कारण (उक्तम्) कहा गया है। (इदम्) यह (अदर्शनम् नाम) अदर्शन = अविवेक (किम् च) क्या है ? —

१. (किम्) क्या (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों का (अधिकारः) अधिकार = कार्य उत्पादन का सामर्थ्य ही अदर्शन = अविद्या है ?

२. (आहोस्वित्) अथवा (दृशिरूपस्य स्वामिनः) द्रष्टा रूप स्वामी के लिए (दर्शितविषयस्य प्रधानचित्तस्य) शब्दादि विषयों को दिखलाने वाले प्रधान चित्त का (अनुत्पादः) प्रकट = उत्पन्न न होना अर्थात् (स्वस्मिन् दृश्ये) स्व = दृश्य के स्वरूप के (विद्यमाने) विद्यमान रहने पर (यः) जो (दर्शनाभावः) दर्शन = यथार्थ ज्ञान का न होना है; क्या वह अदर्शन = अविद्या है ?

३. (किम्) क्या (गुणानाम्) सत्त्वादि गुणों की (अर्थवत्ता) पुरुषार्थ युक्तता = भोग अपवर्ग रूपी पुरुष के प्रयोजनों के सम्पादन में प्रवृत्त रहना; यह अदर्शन = अविद्या है ?

४. (अथ) अथवा प्रलय काल में (स्वचित्तेन सह) अपने चित्त के साथ (निरुद्धाः) अपने कारण में लीन हो जाने वाली; और (सर्ग के आरम्भ में) (स्वचित्तस्य) अपने चित्त के साथ (उत्पत्तिबीजम्) उत्पत्ति के बीज = कारण रूप में रहने वाली (अविद्या) अविद्या है ?

५. (किम्) क्या (स्थितिसंस्कारक्षये) प्रधान = मूल प्रकृति में स्थिति = साम्यावस्था के संस्कारों के क्षीण हो जाने पर (गतिसंस्काराभिव्यक्तिः) सत्त्वादि गुणों की विषमता से महत्तत्वादि विकारों को आरम्भ करने वाले संस्कारों की अभिव्यक्ति का होना ही अदर्शन = अविद्या है ? (यत्र) जिसके विषय में (इदम्) यह (उक्तम्) कहा है कि — (प्रधानम्) प्रधान = प्रकृति (स्थित्या एव) स्थिति = साम्यावस्था में ही (वर्त्तमानम्) विद्यमान रहे तो (विकाराकरणात्) महत्तत्त्वादि विकारों का कारण न होने से (= विकारों को आरम्भ न करने से) (अप्रधानम्) उक्त प्रकृति प्रधान नहीं (स्यात्) कहला सकती; और (तथा) वैसे ही (गत्यैव वर्त्तमानम्) निरन्तर गति = विषम अवस्था में विद्यमान रहने से (विकारनित्यत्वात्) महत्तत्त्वादि विकारों के नित्य होने से, विकारों की अपेक्षा से प्रकृति (अप्रधानम् स्यात्) प्रधान नहीं कहलायेगी। (च) और (उभयथा) स्थिति = साम्यावस्था और गति = विषमावस्था दोनों प्रकार की (अस्य) इस प्रकृति की (वृत्तिः) प्रवृत्ति होने से (प्रधानव्यवहारम्) प्रधान पद के व्यवहार को (लभते) प्राप्त होती है; (अन्यथा न) अन्यथा नहीं। (कारणान्तरेषु) अन्य प्रकार के कारणों की (कल्पितेषु) कल्पना किए जाने से (अपि) भी (एषः) यह (समानः) समान प्रकार की (चर्चः) चर्चा = बात होगी।

६. (दर्शनशक्तिः) दर्शन शक्ति = बुद्धि (एव) ही (अदर्शनम्) अदर्शन = अविद्या है, (इति एके) ऐसा कुछ लोग मानते हैं। और प्रमाण देते हैं — “(प्रधानस्य) प्रधान = प्रकृति की (प्रवृत्तिः) प्रवृत्ति (आत्मख्यापनार्था) अपने स्वरूप को प्रकट करने के लिए होती है।” (इति श्रुतेः) यह श्रुति है। (सर्वबोध्यबोधसमर्थः) सभी ज्ञेयों को जानने में समर्थ (पुरुषः) पुरुष (प्राक् प्रवृत्तेः) प्रधान की प्रवृत्ति से पूर्व (न पश्यति) नहीं देखता = नहीं जानता। और (सर्वकार्यकरणसमर्थम्) सभी कार्यों को करने में समर्थ (दृश्यम्) दृश्य = कार्य जगत् भी (तदा) प्रधान की प्रवृत्ति से पूर्व (न दृश्यत इति) नहीं दिखाई देता।।

७. (एके) कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि (अदर्शनम्) अदर्शन = अविद्या (उभयस्य अपि) प्रधान और पुरुष = दृश्य और द्रष्टा, दोनों का ही (धर्मः इति) धर्म है। (तत्र) उन दोनों में से (इदम्) (प्रधान का) अदर्शन (दृश्यस्य) दृश्य का (स्वात्मभूतम् अपि) निजी रूप = धर्म होने पर भी (पुरुषप्रत्ययापेक्षम्) पुरुष ज्ञान की अपेक्षा से = चेतन पुरुष के अधीन होने से (दर्शनम्) दर्शन = दृश्य का ज्ञान (दृश्यधर्मत्वेन) दृश्य धर्म के रूप से (भवति) होता है। (तथा) वैसे ही (पुरुषस्य) पुरुष का (अदर्शनम्) अदर्शन जो कि (अनात्मभूतमपि) अपनी निजी धर्म न होने पर भी, वह (दृश्यप्रत्ययापेक्षम्) दृश्य = बुद्धि वृत्ति के ज्ञान की अपेक्षा रखने से (पुरुषधर्मत्वेन इव) पुरुष के धर्म के रूप में ही (अवभासते) भासित = प्रतीत होता है।

८. (दर्शनम् ज्ञानम्) रागादि विषयों = शब्दादि विषयों का ज्ञान (एव) ही (अदर्शनम्) अदर्शन है, (इति) ऐसा (केचित्) कुछ लोग (अभिदधति) कहते हैं।

(इति) इस प्रकार (एते) ये (शास्त्रगताः) शास्त्रों में कहे हुए (विकल्पाः) विकल्प है। (तत्र) उस अदर्शन के विषय में (विकल्पबहुत्वम्) उन अनेक विकल्पों में (एतत्) यह, (सर्वपुरुषाणाम्) सब पुरुषों का, (गुणानाम्) जीव = पुरुष का सत्त्वादि गुणों के साथ (संयोगे) संयोग में (साधारणविषयम्) सामान्य = समान मत है॥

वैदिक योग मीमांसा : प्रकृति और पुरुष का (प्रवाह से) अनादि काल से चला आ रहा संयोग ही पुरुष के दुःखों का कारण है। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि प्रकृति जो स्वशक्ति है, और पुरुष जो स्वामिशक्ति है, इन दोनों के स्वरूप का ज्ञान, इन दोनों के संयोग होने पर होता है। दृश्य = प्रकृति को ज्ञेय और द्रष्टा = पुरुष को ज्ञाता कहा गया है। महर्षि व्यास कहते हैं कि पुरुष रूपी स्वामी, प्रकृति और उसके विकारों के साथ दर्शन = ज्ञान के लिए संयुक्त होता है; और उस संयोग से जब दृश्य = प्रकृति और उसके विकारों के स्वरूप का ज्ञान होता है, तो यह पुरुष का भोग कहलाता है। और इसी संयोग काल में जब पुरुष अपने स्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर स्वरूपस्थिति को पा लेता है, तो यह पुरुष का अपवर्ग होता है। प्रकृति, इस प्रकार ही, पुरुष के लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को साधती है। जब तक पुरुष, प्रकृति और उसके विकारों के स्वरूप ज्ञान की प्राप्ति से सन्तुष्ट रहता, और अपने स्वरूप की उपलब्धि को प्राप्त नहीं करता, तब तक पुरुष को भोगों की प्राप्ति अनवरत रूप से होती रहती है। सभी पुरुषों के साथ यही क्रम अनन्त काल से प्रत्येक सर्ग में चल रहा है। इस तरह से संयुक्त हुआ पुरुष, प्रकृति से संयोग के फलस्वरूप जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में अनन्त काल से लगा हुआ, विभिन्न प्रकार के परिणाम, ताप और संस्कार दुःखों के साथ-साथ सत्त्वादि गुणों की विरुद्ध वृत्तियों के कारण दुःखों को ही प्राप्त कर रहा है।

दूसरी ओर पुरुष जब प्रकृति के साथ-साथ अपने स्वरूप का भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो इस संयोग की समाप्ति हो जाती है। क्योंकि अपने स्वरूप की उपलब्धि हो जाने पर पुरुष जीवन्मुक्त होता हुआ, परवैराग्य के सम्पादन द्वारा सत्त्वादि गुणों से विरक्त हुआ, असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में अपने संस्कारों को भी दग्धबीजवत् करता हुआ, परमात्मा का साक्षात्कार करता हुआ, शरीरपात् के उपरान्त ईश्वरीय व्यवस्था में मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः विवेकख्याति = प्रकृति-पुरुष के साक्षात्कार द्वारा हुए भेद ज्ञान को, पुरुष और प्रकृति के वियोग का कारण कहा गया है। विवेकख्याति अविद्या की विरोधी है, और यही विवेकख्याति पुरुष और प्रकृति के वियोग का कारण बनती है; जबकि अविद्या उन दोनों = प्रकृति-पुरुष के संयोग का कारण होती है। विवेकज्ञान = विवेकख्याति से अविद्या का नाश होता; अविद्या के नाश होने से प्रकृति-पुरुष के बन्धन = संयोग का नाश भी होता; और उपरोक्त संयोग नाश से ही पुरुष स्वरूपस्थिति को प्राप्त हुआ अपवर्ग को प्राप्त करता है। अर्थात् प्रकृति के संयोग से छूटना ही शुद्ध द्रष्टा = पुरुष के लिए स्वरूपस्थिति = अपवर्ग की प्राप्ति है। यहाँ यह ध्यान रखना चाहिए कि उपरोक्त विवेकख्याति, जब तक शाब्दिक है तब तक किसी प्रकार की, कोई भी उपलब्धि नहीं होने वाली है। इस शाब्दिक ज्ञान का मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार करने से ही पुरुष को प्रकृति, स्वयं और परमात्मा का यथार्थ ज्ञान = यथार्थ दर्शन = साक्षात्कार होने से ही स्वरूपस्थिति = अपवर्ग की प्राप्ति होती है।

पुरुष के लिए प्रकृति और उसके विकारों से संयोग का कारण अविद्या को कहा है। परन्तु एक या अनेक पुरुषों को अपवर्ग प्राप्ति के उपरान्त भी प्रकृति अन्य बद्ध = साधारण पुरुषों के हेतु कार्याभिमुख रहती हुई उनके लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को साधती रहती है। अतः जो प्रवाह से अनादिकालीन अविवेक = अविद्या है जिसके परिणामस्वरूप संसारचक्र अनन्त काल से चल रहा है उसको विभिन्न आचार्यों ने शास्त्रों में विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया है। उसी अविद्या = अविवेक के व्याख्यात विभिन्न विकल्पों को महर्षि व्यास ने ८ आठ रूपों से निम्न प्रकार कहा है—

१. सत्त्वादि गुणों का अधिकार = विभिन्न महत्तत्त्व आदि कार्यों का उत्पन्न करने रूपी सामर्थ्य का रहना — यह अदर्शन = अविद्या है।

२. द्रष्टा = आत्मा के लिए शब्दादि विषयों का ज्ञान कराने वाले प्रधान चित्त का प्रकट न होने से पुरुष को विवेकख्याति की अप्राप्ति रहना — यह अदर्शन = अविद्या है।

३. सत्त्वादि गुणों का पुरुष के भोग और अपवर्ग रूप प्रयोजनों का सम्पादन करना — यह अदर्शन = अविद्या है।

४. प्रलय काल में चित्त के साथ अपने कारण में लीन हुई तथा सर्गकाल में अपने चित्त की पुनः उत्पत्ति का कारण हुई अविद्या ही अदर्शन है।

५. प्रलय काल के समाप्त होने पर सृष्टि की स्थिति का पुनः आरम्भ हो जाना ही अदर्शन = अविद्या है। अर्थात् सत्त्वादि गुणों का साम्यावस्था से विषमावस्था में आना और विषमावस्था से पुनः साम्यावस्था में आना इस प्रकार का चक्र ही प्रकति की सिद्धि हेतु आवश्यक है।

६. कुछ आचार्यों का मत है कि दर्शन शक्ति = बुद्धि ही अविद्या है क्योंकि प्रधान की प्रवृत्ति अपने स्वरूप को जनाने हेतु होती है। उस प्रवृत्ति के बिना पुरुष इस दृश्य को नहीं जानता और न ही कार्यजगत् जाना जाता है।

७. कुछ आचार्यों के मतानुसार अविद्या, द्रश्य और द्रष्टा दोनों का ही धर्म है।

८. अन्य आचार्यों के मत में शब्दादि विषयों का ज्ञान होना ही अदर्शन = अविद्या है।

बहुधा भाष्यकारों ने चतुर्थ विकल्प को ही अविद्या = अदर्शन को स्पष्ट व्याख्यान करने वाला कहा है। परन्तु महर्षि व्यास कहते है कि इन सभी विकल्पों में पुरुष का सत्त्वादि गुणों के साथ संयोग समान रूप से होता है। महर्षि व्यास ने अपवर्ग प्राप्ति हेतु पुरुष के लिए नष्ट करने योग्य अविद्या आदि क्लेशों का योगसूत्र २.५-९ में स्पष्ट रूप से व्याख्यान किया है। अतः प्रत्येक पुरुष के लिए इस अविद्या के स्वरूप को जानकर इसके नाश का सम्यक् उपाय करना, अपवर्ग प्राप्ति हेतु परमावश्यक है। अविद्या का नाश उसके प्रतिद्वन्द्वी = विरोधी साधन से ही सम्भव है जिसे शास्त्रकारों ने विवेकख्याति के नाम से कहा है।

पौराणिक भाष्यकारों ने इस सूत्र पर व्यासभाष्य के इस वाक्य “नात्र दर्शनं मोक्षकारणम्” के आधार पर मोक्ष को नित्य सिद्ध करने हेतु दर्शन = विवेकख्याति को अपवर्ग का प्रत्यक्ष = साक्षात् कारण नहीं माना। उनका यह कहना है कि विवेकज्ञान से अविद्या का नाश होता है, और अविद्या की निवृत्ति होने से प्रकृति-पुरुष का संयोग न रहने से मोक्ष = अपवर्ग स्वतः सिद्ध हो जाता है। उनके अनुसार मोक्ष को कारण सहित मानने से मोक्ष की नित्यता समाप्त हो जायेगी, अतः मोक्ष को नित्य सिद्ध करने हेतु अदर्शन = अविद्या के अभाव से बन्धन के अभाव को मोक्ष कहा है। वस्तुतः यह पक्ष भ्रान्तिमात्र है। इस भ्रान्ति का मुख्य कारण है कि इन भाष्यकारों ने मोक्ष को पहले से ही नित्य मान रखा है। परन्तु वेदादि शास्त्रों में मोक्ष को नित्य नहीं माना। इस विषय में हमने योगसूत्र १.२४ की व्याख्या में प्रमाणों को दिया है। महर्षि व्यास ने प्रकृति और पुरुष के संयोग = बन्धन का कारण अविद्या कहा को है। जब दोनों का संयोग कारण सहित है तो दोनों का वियोग बिना कारण के कैसे हो सकता है ? इस तथ्य को महर्षि व्यास आगे कहते हैं “दर्शनस्य भावे बन्धकारणस्यादर्शनस्य नाश इत्यतो दर्शनं ज्ञानं कैवल्यकारणमुक्तम्” अर्थात् विवेकज्ञान के होने पर बन्धन के कारण अदर्शन = अविद्या का नाश हो जाता है; इसलिए विवेक ज्ञान को कैवल्य = मोक्ष का कारण कहा गया है।

इसी प्रकार योगसूत्र २.१५ के भाष्य में महर्षि व्यास कहते हैं — “संयोगस्याऽऽत्यन्तिकी निवृत्तिर्हानम्। हानोपायः सम्यग्दर्शनम्।” अर्थात् इस प्रकृति-पुरुष संयोग की अत्यन्त = पूर्णरूपेण निवृत्ति हान = मोक्ष है, और सम्यक्दर्शन = पदार्थों के साक्षात्कार से हुआ यथार्थ ज्ञान = विवेकख्याति हान = मोक्ष का उपाय है। इसी प्रकार महर्षि पतञ्जलि भी हान का उपाय विवेकख्याति को कहते हैं।

इसी प्रकार महर्षि कपिल भी सांख्यदर्शन में स्पष्ट रूप से कहते हैं “ज्ञानन्मुक्तिः” (सांख्य ३.२३) अर्थात् ज्ञान = विवेक साक्षात्कार से पुरुष की मुक्ति होती है। अतः उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि मोक्ष विवेकज्ञान = प्रकृति, पुरुष (जीवात्मा और परमात्मा) के यथार्थ दर्शन = साक्षात् के कारण होता है, अतः सकारण है। मोक्ष की अवधि = परान्तकाल के उपरान्त पुरुष = जीवात्मा पुनः ईश्वर की व्यवस्था में अपने कर्माशय (मोक्षप्राप्ति से पूर्व दग्धबीजभाव को प्राप्त हुए) के आधार पर मनुष्य का जन्म पुनः प्राप्त करता है।