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Saadhana Paada / Means / 24
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Saadhana Paada / Means / 24

तस्य हेतुरविद्या॥२४॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 24

In Hindi:

पदपाठ : तस्य हेतुः अविद्या॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : यस्तु प्रत्यक्चेतनस्य स्वबुद्धिसंयोग: —

हिंदी में अर्थ : (यः तु) जो तो (प्रत्यक्चेतनस्य) जीवात्मा = पुरुष का (स्वबुद्धिसंयोगः) प्रकृति जन्य बुद्धि के साथ संयोग होता है —

हिंदी में अर्थ : (तस्य) प्रकृति और पुरुष के संयोग का (हेतुः) कारण (अविद्या) अविद्या = मिथ्याज्ञान है॥

व्यास भाष्य : विपर्ययज्ञानवासनेत्यर्थः। विपर्ययज्ञानवासनावासिता च न कार्यनिष्ठां पुरुषख्यातिं बुद्धिः प्राप्नोति साधिकारा पुनरावर्त्तते। सा तु पुरुषख्यातिपर्यवसाना कार्यनिष्ठां प्राप्नोति। चरिताधिकारा निवृत्तादर्शना बन्धकारणाभावान्न पुनरावर्त्तते।

अत्र कश्चित्षण्डकोपाख्यानेनोद्घाटयति — मुग्धया भार्ययाभिधीयते—षण्डकार्यपुत्र, अपत्यवती मे भगिनी किमर्थं नाहमिति। स तामाह — मृतस्तेऽहमपत्यमुत्पादयिष्यामीति। तथेदं विद्यमानं ज्ञानं चित्तनिवृत्तिं न करोति विनष्टं करिष्यतीति का प्रत्याशा? तत्राचार्यदेशीयो वक्ति— “ननु बुद्धिनिवृत्तिरेव मोक्षः”। अदर्शनकारणाभावाद् बुद्धिनिवृत्तिः। तच्चादर्शनं बन्धकारणं दर्शनान्निवर्त्तते। तत्र चित्तनिवृत्तिरेव मोक्षः। किमर्थमस्थान एवास्य मतिविभ्रमः॥

हिंदी में अर्थ : (विपर्ययज्ञानवासना) विपर्यय = मिथ्याज्ञान की वासना (इति अर्थः) यह अविद्या का अर्थ है। (च) और (विपर्ययज्ञानवासनावासिता) मिथ्याज्ञान की वासना से युक्त (बुद्धिः) बुद्धि (पुरुषख्यातिम्) पुरुषख्याति = पुरुष (जीवात्मा और परमात्मा) साक्षात्कार रूप (कार्यनिष्ठाम्) अपने कार्य की निष्ठा = परिसमाप्ति को (न) नहीं (प्राप्नोति) प्राप्त करती; अतः (साधिकाराः) मिथ्याज्ञान की वासनाओं = संस्कारों के बने रहने के कारण बुद्धि अपने कार्य सम्पादन के अधिकार वाली होती हुई (पुनः) बार-बार (आवर्त्तते) पुरुष के भोग-अपवर्ग रूपी प्रयोजन के हेतु संसारचक्र में प्रवृत्त रहती है। अर्थात् पुरुष के संयुक्त रहती हुई उसे जन्म-मरण के संसारचक्र में लगाए रखती है। और (सा तु) जब वह बुद्धि (पुरुषख्यातिपर्यवसाना) पुरुषख्याति = पुरुष साक्षात्कार पर्यन्त (कार्यनिष्ठाम्) अन्तिम कार्य निष्ठा को (प्राप्नोति) प्राप्त हो जाती है, तब (चरिताधिकारा) अपने कार्य (पुरुष हेतु भोग-अपवर्ग सम्पादन) रूपी अधिकार समाप्त होने से तथा (निवृत्तादर्शना) विवेकख्याति द्वारा अदर्शन = अविद्या की निवृत्ति होने पर (बन्धकारणाभावात्) बन्धन के कारण के न रहने से (पुनः) पुरुष के साथ फिर से (न आवर्त्तते) संसारचक्र में प्रवृत्त नहीं होती अर्थात् पुरुष के साथ संयोग को प्राप्त न होने के कारण पुरुष से पृथक् हो अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाती है।

(अत्र) इस विषय में (कश्चित्) कोई पूर्वपक्षी अथवा नास्तिक (षण्डकोपाख्यानेन) षण्डक = नपुंसक के उपख्यान से (उद्घाटयति) आक्षेप करता है — (मुग्धया भार्यया) कोई भोली = नासमझ पत्नी अपने (षण्डकः) नपुंसक पति से (अभिधीयते) कहती है — “(आर्यपुत्र) हे स्वामिन्! (मे) मेरी (भगिनी) बहन (अपत्यवती) सन्तान वाली हो गई है; (किमर्थम्) किस कारण (न अहम् इति) मैं सन्तान वाली नहीं हुई ? (सः) वह नपुंसक (ताम्) उस भोली = नासमझ पत्नी से (आह) कहता है (मृतः अहम्) मरकर मैं (ते) तुम्हारे लिए (अपत्यम्) सन्तान को (उत्पादयिष्यामि इति) उत्पन्न करूँगा।” (तथा) उसी प्रकार (इदम्) यह (विद्यमानम् ज्ञानम्) वर्त्तमान हुआ विवेकज्ञान (चित्तनिवृत्तिम्) चित्त = बुद्धि को निवृत्त (न करोति) नहीं करता, तो (विनष्टम्) परवैराग्य के द्वारा विवेकख्याति = विवेकज्ञान निरुद्ध होकर (करिष्यति इति) चित्त को निवृत्त करेगा (का प्रत्याशा) इसका क्या विश्वास किया जा सकता है ?

(तत्र) उस पूर्वपक्ष के विषय में (आचार्यदेशीयः) आचार्य पद को प्राप्त कोई सिद्धान्ती (वक्ति) कहता है — (ननु) अरे भद्र पुरुष! (बुद्धिनिवृत्तिः एव) बुद्धि की निवृत्ति ही (मोक्षः) मोक्ष है। (अदर्शनकारणाभावात्) अदर्शन = अविद्या रूपी कारण के निवृत्त होने पर (बुद्धिनिवृत्तिः) बुद्धि की निवृत्ति होती है। (च) और (तत्) वह (अदर्शनम्) अदर्शन = अविद्या जो (बन्धकारणम्) बन्धन का कारण है, (दर्शनात्) दर्शन = विवेकज्ञान से (निवर्त्तते) निवृत्त होता है। (तत्र) उस विषय में (चित्तनिवृत्तिः एव) चित्त = बुद्धि की निवृत्ति ही (मोक्षः) मोक्ष है। अतः (अस्य) इस पूर्व पक्षी को (अस्थाने एव) अस्थान में ही (किमर्थम्) किस कारण से (मतिविभ्रमः) भ्रान्ति हो रही है ? अर्थात् इस सन्दर्भ में भ्रान्ति का कोई अवसर ही नहीं है॥

वैदिक योग मीमांसा : दृश्य = प्रकृति और द्रष्टा = पुरुष = जीवात्मा का जो अनादि काल से, प्रवाह से, संयोग चला आ रहा है, उसका कारण अविद्या = मिथ्याज्ञान और उसके संस्कार हैं। अविद्या की व्याख्या महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.५ में की है। प्रकृति और पुरुष का संयोग रूपी कार्य, अविद्या रूपी कारण के रहते हुए होता है। कार्य हमेशा अनित्य एवं आदि वाला होता है। इन दोनों के संयोग का आरम्भ, मुक्तिकाल की समाप्ति के उपरान्त अथवा प्रत्येक सर्ग के आरम्भ ही होता है। अतः पुरुष न तो स्वभावतः बद्ध और न ही स्वभावतः मुक्त है। प्रकृति और पुरुष का संयोग और वियोग, प्रवाह से अनादि होने के कारण, पुरुष के लिए बन्ध और मोक्ष का क्रम अनादिकाल से चल रहा है। प्रत्येक सर्ग के अन्त में, जो पुरुष, प्रकृति के साथ संयुक्त होते हैं अर्थात् जिनकी बुद्धि साधिकार होती है, उन सभी पुरुषों का अगले सर्ग के आरम्भ में प्रकृति से संयोग ईश्वरीय व्यवस्था में स्वतः ही हो जाता है। इसी प्रकार मोक्ष को प्राप्त हुए पुरुष को भी, मोक्ष की अवधि के उपरान्त, जो प्रकृति के संयोग की प्राप्ति होती है, उसका कारण भी, उस पुरुष के अनादि काल से चले आ रहे अविद्या के संस्कार ही होते हैं, जो समय पाकर पुनः उदार अवस्था में आकर पुरुष को प्रकृति के साथ संयुक्त कर देते हैं। इस अवस्था में पुरुष के साथ बुद्धि और इन्द्रियादि संयुक्त होकर उसके लिए कारण और सूक्ष्म शरीरों का निर्माण कर देते हैं, और पुरुष पुनः संसारचक्र = जन्म-मरणचक्र को प्राप्त हो जाता है; तथा प्रकृति पुनः उसके लिए भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली हो जाती है। यही क्रम अनन्त काल से चल रहा है। क्योंकि यदि यहाँ अविद्या को अनादि न माना जाए तो दो प्रकार के दोषों को महर्षि कपिल सांख्यदर्शन में कहते हैं —

अनादिरविवेकोऽन्यथा दोषद्वयप्रसक्तेः॥ सांख्य० ६.१२॥

१. उस उत्पन्न होने वाली अविद्या का कारण क्या है ? यदि पुरुष के कर्म हों, तो पूर्व में अविद्या न होने से, बन्धन का अभाव होने से, पुरुषों के कर्म कहाँ से बन गए ? और यदि कोई अन्य कारण माना जाए तो उस कारण का क्या कारण हो ? इस प्रकार से अनवस्था दोष होगा।

२. यदि अविद्या को सादि = आरम्भ वाला माना जाये तो संसारचक्र को भी सादि मानना पड़ेगा, जबकि वेद में संसारचक्र को अनादि कहा है (अथवा अविवेक का आरम्भ मानने से मुक्त जीवों को भी स्वाभाविक रूप से अविवेक की प्राप्त होकर बन्धन की प्राप्ति हो जाये)। अतः अविद्या का अनादित्व सिद्ध है।

जैसा कि ऊपर कहा है कि पुरुष न तो स्वभावतः बद्ध है और न ही स्वभावतः मुक्त है। यदि स्वाभवतः मुक्त हो तो अविद्या के होने या उत्पन्न होने से उसकी मुक्तावस्था की हानि नहीं हो सकती; और यदि स्वभावतः बद्ध माना जाए तो उसके लिए मोक्ष और उसके साधनों का उपदेश व्यर्थ होगा। इसी सिद्धान्त को महर्षि कपिल सांख्य दर्शन में कहते हैं — न स्वभावतो बद्धस्य मोक्षसाधनोपदेशविधिः॥ सांख्य १.७॥ अर्थात् स्वभाव से बद्ध पुरुष के लिए मोक्ष साधनों का उपदेश, सम्भव न होने से, नहीं हो सकता।

अतः अनादि काल से ही अविवेक की स्थिति है, यही पुरुष के साथ मिथ्याज्ञान और उसके संस्कारों के रूप में लगा हुआ है। जब पुरुष वर्त्तमान जन्म में प्रकृति, पुरुष = स्वयं और परमात्मा का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर, अपने संस्कारों को दग्धबीजवत् कर देता है, तो पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति, परमात्मा की व्यवस्था में हो जाती है। यहाँ यह जानना चाहिए कि अविद्या और उसके संस्कारों को किसी दृश्य स्थूल पदार्थ के समान दग्ध नहीं किया जा सकता वरन् उन्हें केवल किसी दग्ध हुए बीज के समान स्थिति में पहुँचाया जाता है, जिससे कि उनमें अपने कार्य सम्पादन का सामर्थ्य न रहे। अतः महर्षि व्यास ने इसके लिए योगभाष्य में “दग्धबीजभाव” अथवा “दग्धबीजवत्” का प्रयोग किया है। मोक्ष की अवधि समाप्त होने पर उसके वही संस्कार पुनः उदार अवस्था में आ जाते हैं, और वह पुनः प्रकृति के संयोग को प्राप्त हुआ संसारचक्र में लग जाता है।

महर्षि व्यास ने बुद्धि के अधिकार की समाप्ति हेतु पुरुषख्याति को कहा है। अर्थात् पुरुष जब वर्त्तमान जीवन में स्वयं और परमात्मा का यथार्थज्ञान = साक्षात्कार कर लेता है, जिसके फलस्वरूप वह सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णा रहित हो जाता है, उस अवस्था में बुद्धि का अधिकार समाप्त होता है। इस अवस्था में बुद्धि अपने कार्य, पुरुष के भोग और अपवर्ग, का सम्पादन पूर्ण करती हुई निवृत्त हो जाती है। इस अवस्था में बन्धन के कारण अविद्या के निवृत्त हो जाने पर, यह बुद्धि, पुरुष के साथ फिर से = आगे से संसारचक्र में प्रवृत्त नहीं होती और अपने मूल कारण प्रकृति में लीन हो जाती है। इस अवस्था के लिए विवेकख्याति = प्रकृति-पुरुष के भेद ज्ञान से भी उत्कृष्ट स्थिति पुरुषख्याति को कहा गया है; जिसका अभिप्राय है कि पुरुष स्वयं के साथ-साथ परमपुरुष परमात्मा का भी साक्षात्कार कर ले; इस तथ्य को महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२ के भाष्य में भी कहा है। और यदि उपरोक्त स्थिति की प्राप्ति नहीं होती, तो ऐसी बुद्धि साधिकार = अधिकार वाली होती है। ऐसे में उस पुरुष के मिथ्याज्ञान और उसके संस्कारों के बने रहने से, यह पुरुष को आगे भी संसारचक्र में प्रवृत्त रखती है। अतः बुद्धि के अधिकार की समाप्ति होना = इसकी निवृत्ति होना ही पुरुष = जीवात्मा के लिए मानव-जीवन की सफलता का एक मात्र साधन है।

विद्या की यथार्थ रूप से प्राप्ति, अविद्या की निवृत्ति हेतु आवश्यक है। इस सम्बन्ध में महर्षि दयानन्द के ये वचन महत्त्वपूर्ण हैं — “अविद्या अर्थात् विषयासक्ति, ऐश्वर्यभ्रम अभिमान यह है। बड़े-बड़े पाठान्तर करने से ही केवल विद्या उत्पन्न नहीं होती। पाठान्तर यह विद्या का साधन होगा। यथार्थ दर्शन ही विद्या है। यथाविहित ज्ञान विद्या है। प्रमा के विरुद्ध भ्रम है। विद्या में भ्रम नहीं होता। ‘अनात्मनि आत्मबुद्धिः’, ‘अशुचि पदार्थे शुचि बुद्धिः’ यह भ्रम है। यही अविद्या का लक्षण है और इसके विरुद्ध जो लक्षण हैं, वे विद्या के हैं।

जिस पुरुष को यह अभिमान होता है कि मैं धनाढय हूँ, वा मैं बड़ा राजा हूँ। उसे अविद्या का दोष है। दूसरा शरीर का क्षीण रहना यह अविद्या के कारण ही होता है। इससे सब प्रकार की विद्या सम्पादन करने के विषय में प्रयत्न करना चाहिए। हमारे देश में छोटी अवस्था में विवाह करने की रीति के कारण विद्यासम्पादन करने में अड़चन होती है। अपवित्र पदार्थ में पवित्रता मानना यह अविद्या है। ईश्वर का ध्यान यह पूर्ण विद्या है। यह सारी विद्याओं का मूल है। किसी भी देश में इस विद्या का ह्रास (न्यूनता) होने से उस देश को दुर्दशा आ घेरती है।” (उपदेशमंजरी तृतीय उप०)

अतः बन्धन = प्रकृति और पुरुष के संयोग का कारण अविद्या और उसके संस्कार हैं। और केवल मात्र शाब्दिक ज्ञान, पाठान्तर से विद्या उत्पन्न नहीं होती और न ही ऐसी विद्या, अविद्या के नाश का कारण बनती है।