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Saadhana Paada / Means / 26
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Saadhana Paada / Means / 26

विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥२६॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 26

In Hindi:

पदपाठ : विवेकख्यातिः अविप्लवा हानोपायः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ हानस्य कः प्राप्त्युपाय इति—

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (हानस्य) हान = कैवल्य की (प्राप्ति उपायः) प्राप्ति का उपाय (कः) क्या है ? (इति) इसको कहते हैं —

हिंदी में अर्थ : (अविप्लवा) अविद्या के दग्धबीजभाव को प्राप्त होने से विप्लव रहित जो (विवेकख्यातिः) विवेकख्याति = प्रकृति और उसके विकारों बुद्धि आदि का तथा पुरुष की भिन्नता का साक्षात्कार रूप यथार्थ ज्ञान (हानोपायः) हान = कैवल्य का उपाय है॥

व्यास भाष्य : सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययो विवेकख्यातिः। सा त्वनिवृत्तमिथ्याज्ञाना प्लवते। यदा मिथ्याज्ञानं दग्धबीजभावं वन्ध्यप्रसवं सम्पद्यते तदा विधूतक्लेशरजसः सत्त्वस्य परे वैशारद्ये परस्यां वशीकारसंज्ञायां वर्त्तमानस्य विवेकप्रत्ययप्रवाहो निर्मलो भवति। सा विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः। ततो मिथ्याज्ञानस्य दग्धबीजभावोपगमः पुनश्चाप्रसवः। इत्येष मोक्षस्य मार्गो हानस्योपाय इति॥

हिंदी में अर्थ : (सत्त्वपुरुषान्यताप्रत्ययः) सत्त्व = बुद्धि और पुरुष की भिन्नता का ज्ञान (विवेकख्यातिः) विवेकख्याति है। (सा) वह विवेकख्याति (तु) तो (अनिवृत्तमिथ्याज्ञाना) मिथ्याज्ञान = अविद्या के निवृत्त न होने पर (प्लवते) खण्डित = भ्रष्ट हो जाती है। (यदा) जब = जिस अवस्था में (मिथ्याज्ञानम्) मिथ्याज्ञान = अविद्या (दग्धबीजभावम्) दग्धबीजभाव की स्थिति को प्राप्त होकर (वन्ध्यप्रसवम्) कार्य सम्पादन = अङ्कुरोत्पत्ति में सामर्थ्यहीन (सम्पद्यते) हो जाती है (तदा) तब = उस अवस्था में (विधूतक्लेशरजसः) अविद्यादि क्लेशों और रजोगुण के प्रभाव से रहित (सत्त्वस्य) बुद्धि के, (परे वैशारद्ये) उत्कृष्ट निर्मल होने पर और (परस्याम् वशीकारसंज्ञायाम्) उत्कृष्ट वशीकार अनुभूति की अवस्था में, (वर्त्तमानस्य) वर्त्तमान = स्थित होने पर (विवेकप्रत्ययप्रवाहः) विवेकज्ञान का प्रवाह (निर्मलः) निर्मल = सर्वथा शुद्ध = किसी प्रकार की अशुद्धि से रहित (भवति) होता है। (सा) वह, उपरोक्त प्रकार से निर्मल हुई, (विवेकख्यातिः) विवेकख्याति (अविप्लवा) विप्लव रहित = अविद्यादि दोषों से रहित होने से (हानोपायः) हान = मोक्ष का उपाय है। (ततः) उस विवेकख्याति से (मिथ्याज्ञानस्य) मिथ्याज्ञान का (दग्धबीजभावोपगमः) दग्धबीजभाव वाला हो जाना (च) और (पुनः) फिर से (अप्रसवः) अङ्कुरित न होना = अपने कार्य को न करना; (इति) इस प्रकार (एषः) यह (मोक्षस्य) मोक्ष का (मार्गः) मार्ग है अर्थात् (हानस्य) हान का (उपायः इति) उपाय है॥

वैदिक योग मीमांसा : (इस सूत्र की व्याख्या समझने हेतु योगसूत्र १.१६ तथा १.५१ पर वैदिकयोगमीमांसा को पुनः पढ़ लेवें।)

महर्षि पतञ्जलि हेय, हेय का कारण, हान = कैवल्य को बताने के पश्चात् क्रम प्राप्त कैवल्य के उपाय को बताते हुए कहते हैं कि विवेकख्याति अर्थात् प्रकृति और पुरुष की भिन्नता का यथार्थ ज्ञान = साक्षात्कार होना, हान = कैवल्य का उपाय है। इस लक्ष्य प्राप्ति के लिए यह विवेकख्याति विप्लव को प्राप्त नहीं होनी चाहिए अर्थात् यह अविद्यादि क्लेशों के कारण विचलित नहीं होनी चाहिए। जब तक पुरुष के चित्त में अविद्या आदि क्लेश और उसके संस्कार प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न अथवा उदार अवस्था में रहते हैं, तब तक विवेकख्याति अविप्लवा = सर्वथा दोष रहित नहीं हो सकती।

साधक आरम्भ में वेदादि सत्यशास्त्रों से अथवा गुरुजनों = आचार्यों से प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार श्रवण, पठन आदि से प्राप्त हुआ ज्ञान शाब्दिक कहाता है। यह शाब्दिक विवेकज्ञान हान का उपाय नहीं होता। क्योंकि इस अवस्था में उसके चित्त में विभिन्न प्रकार की वृत्तियाँ, संस्कार उपस्थित रहते हैं; तथा अविद्या आदि क्लेश भी प्रसुप्तादि अवस्थाओं में उपस्थित रहते हुए साधक को संतप्त, त्रस्त करते रहते हैं। यह शाब्दिक ज्ञान जब तक मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार की अवस्था तक नहीं पहुँचता, तब तक इसका कोई लाभ साधक को नहीं मिलता। इस शाब्दिक ज्ञान को प्राप्त कर साधक जब दृष्ट और आनुश्रविक विषयों से तृष्णा रहित हो जाता है तो यह अपर वैराग्य की स्थिति होती है। पुरुष के चित्त में सत्त्व गुण प्रधान होने पर वह वितर्क और विचार सम्प्रज्ञात समाधियों से प्रकृति के स्थूल विकारों से लेकर सूक्ष्म विकारों तथा मूल प्रकृति का यथार्थ ज्ञान = साक्षात्कार करता है। इस काल में साधक को उपरोक्त साक्षात्कार से प्रकृति विषयक यथार्थज्ञान की प्राप्ति तो होती है, परन्तु इस अवस्था में पुरुषख्याति नहीं होती। इस स्थिति से आगे बढ़कर साधक अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में स्वार्थसंयम से स्वयं का सम्प्रज्ञान प्राप्त करता है। इस प्रकार वह पुरुष = चेतन जीवात्मा को जड़ प्रकृति से श्रेष्ठ जानता हुआ प्रकृति के सत्त्वादि गुणों के प्रति भी तृष्णा रहित हो जाता है, जिसे परवैराग्य कहा गया है।

इस प्रकार गुणों के प्रति भी तृष्णा रहित हुआ साधक, चेतन आत्मा द्वारा चेतन परमात्मा का यथार्थज्ञान = साक्षात्कार करता है। इसी अवस्था में ही उस योगी के अविद्या आदि क्लेश और उसके संस्कार दग्धबीजभाव को प्राप्त हुए पुनः अपने कार्यों को करने में असमर्थ हो जाते हैं।

इस प्रकार से पुरुषख्याति के उपरान्त ही बुद्धि के सभी प्रकार के अविद्यादि क्लेशों और सत्त्वादि गुणों के मलों से सर्वथा रहित हो जाने से, उसमें उत्कृष्ट निर्मलता और पुरुष को स्वात्मवशीकार अनुभूति होने से, उस चित्त में वैसे ही समाधिप्रज्ञा के संस्कार बनते है। इस प्रकार समाधिप्रज्ञा के संस्कारों का प्रवाह बना रहने से विवेकज्ञान का प्रवाह सर्वथा शुद्ध अर्थात् किसी भी प्रकार की अशुद्धि = दोषों से रहित होने से अविचलित रहता है; और इस प्रकार से प्रकृति और उसके विकारों के सम्यग्दर्शन तथा पुरुष = स्वयं और परमात्मा के साक्षात्कार से उत्पन्न हुई, विवेकख्याति ही हान = मोक्ष का उपाय होती है।

पुरुषख्याति से पूर्व की अवस्था अर्थात् मात्र प्रकृति और उसके विकारों के यथार्थ ज्ञान से उत्पन्न होने वाली, अथवा इनके साथ अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में स्वयं के सम्प्रज्ञान से उत्पन्न होने वाली प्रज्ञा भी, परवैराग्य के अभाव में कभी भी विचलित = दोष युक्त हो सकती है। क्यों ? क्योंकि उस अवस्था में अविद्यादि क्लेश तनु तो हो जाते हैं, परन्तु किसी भी प्रबल आलम्बन के उपस्थित होने पर पुनः उदार अवस्था में आकर अपने कार्यों को आरम्भ कर देते हैं। अतः जब पुरुष साक्षात्कार के उपरान्त योगी परवैराग्य को प्राप्त कर क्लेशों और उसके संस्कारों को दग्धबीजभाव वाली अवस्था में लाता है, तभी विवेकख्याति अविप्लवा = विचलित न होने वाली = सर्वथा शुद्ध कहाती है, और यही विवेकख्याति ही मोक्ष का उपाय होती है॥