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Saadhana Paada / Means / 28
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Saadhana Paada / Means / 28

योगाङ्गानुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः॥२८॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 28

In Hindi:

पदपाठ : योगाङ्गानुष्ठानात् अशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिः आविवेकख्यातेः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : सिद्धा भवति विवेकख्यातिर्हानोपाय इति। न च सिद्धिरन्तरेण साधनमित्येतदारभ्यते —

हिंदी में अर्थ : (विवेकख्यातिः) विवेकख्याति रूपी (हानोपायः) हान = मोक्ष का उपाय (सिद्धा भवति इति) सिद्ध होता है। (च) और (साधनम् अन्तरेण) साधन के बिना (न सिद्धिः) सिद्धि नहीं होती। (इति) इसलिए (एतद्) विवेकख्याति की सिद्धि के साधनों को बताने के लिए इस सूत्र का (आरभ्यते) आरम्भ होता है —

हिंदी में अर्थ : (योगाङ्गानुष्ठानात्) यम-नियमादि योग के अङ्गों का अनुष्ठान करने से (अशुद्धिक्षये) अविद्यादि क्लेश रूपी अशुद्धि का नाश होने पर (आविवेकख्यातेः) विवेकख्याति की प्राप्ति पर्यन्त (ज्ञानदीप्तिः) ज्ञान के प्रकाश की वृद्धि होती है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : एषामुपासनायोगाङ्गानामनुष्ठानाचरणादशुद्धिज्ञानं प्रतिदिनं क्षीणं भवति, ज्ञानस्य च वृद्धिर्यावन्मोक्षप्राप्तिर्भवति॥ अर्थात्

(योगाङ्गानुष्ठाना॰) आगे जो उपासना योग के आठ अङ्ग लिखते हैं, जिनके अनुष्ठान से (अशुद्धिक्षये) अविद्यादि दोषों का क्षय और (ज्ञानदीप्तिः) ज्ञान के प्रकाश की वृद्धि होने से जीव यथावत् मोक्ष को प्राप्त हो जाता है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

(आविवेकख्यातेः) जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है। (स० प्र० तृतीयसमु॰)

व्यास भाष्य : योगाङ्गान्यष्टावभिधायिष्यमाणानि। तेषामनुष्ठानात्पञ्चपर्वणो विपर्ययस्याशुद्धिरूपस्य क्षयो नाशः। तत्क्षये सम्यग्ज्ञानस्याभिव्यक्तिः। यथा यथा च साधनान्यनुष्ठीयन्ते तथा तथा तनुत्वमशुद्धिरापद्यते। यथा यथा च क्षीयते तथा तथा क्षयक्रमानुरोधिनी ज्ञानस्यापि दीप्तिर्विवर्धते। सा खल्वेषा विवृद्धिः प्रकर्षमनुभवत्याविवेकख्यातेः। आगुणपुरुषस्वरूपविज्ञानादित्यर्थः।

योगाङ्गानुष्ठानमशुद्धेर्वियोगकारणम्। यथा परशुश्छेद्यस्य। विवेकख्यातेस्तु प्राप्तिकारणं यथा धर्मः सुखस्य। नान्यथा कारणम्। कति चैतानि कारणानि शास्त्रे भवन्ति? नवैवेत्याह तद्यथा—

उत्पत्तिस्थित्यभिव्यक्तिविकारप्रत्ययाप्तयः।

वियोगान्यत्वधृतयः कारणं नवधा स्मृतम्॥ इति।

तत्रोत्पत्तिकारणं मनो भवति ज्ञानस्य। स्थितिकारणं मनसः पुरुषार्थता शरीरस्येवाऽऽहार इति। अभिव्यक्तिकारणं यथा रूपस्यालोकस्तथा रूपज्ञानम्। विकारकारणं मनसो विषयान्तरम्। यथाग्निः पाक्यस्य। प्रत्ययकारणं धूमज्ञानमग्निज्ञानस्य। प्राप्तिकारणं योगाङ्गानुष्ठानं विवेकख्यातेः। वियोगकारणं तदेवाशुद्धेः। अन्यत्वकारणं यथा सुवर्णस्य सुवर्णकारः। एवमेकस्य स्त्रीप्रत्ययस्याविद्या मूढत्वे, द्वेषो दुःखत्वे, रागः सुखत्वे, तत्त्वज्ञानं माध्यस्थ्ये। धृतिकारणं शरीरमिन्द्रियाणाम्। तानि च तस्य। महाभूतानि शरीराणाम्। तानि च परस्परं सर्वेषाम्। तैर्यग्यौनमानुषदैवतानि च परस्परार्थत्वादिति। एवं नव कारणानि। तानि च यथासम्भवं पदार्थान्तरेष्वपि योज्यानि। योगाङ्गानुष्ठानं तु द्विधैव कारणत्वं लभत इति॥

हिंदी में अर्थ : (अभिधायिष्यमाणानि) वक्ष्यमाण = आगे कहे जाने वाले (अष्टौ) आठ (योगाङ्गानि) योग के अङ्ग हैं। (तेषाम्) उन योगाङ्गों के (अनुष्ठानात्) अनुष्ठान = निरन्तर सेवन = सतत अभ्यास करने से (अशुद्धिरूपस्य) अशुद्धि रूपी (पञ्चपर्वणो विपर्ययस्य) पाँच भागों वाले विपर्यय = मिथ्याज्ञान अर्थात् अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश का (क्षयः) क्षय अर्थात् (नाशः) नाश होता है। (तत्क्षये) उस अशुद्धि के क्षय = नाश होने पर (सम्यग्ज्ञानस्य) सम्यक् ज्ञान = यथार्थ ज्ञान की (अभिव्यक्तिः) अभिव्यक्ति होती है। (च) और (यथा-यथा) जैसे-जैसे (साधनानि) साधनों = योग के अङ्गों का (अनुष्ठीयन्ते) अनुष्ठान किया जाता है (तथा-तथा) वैसे-वैसे (अशुद्धिः) अशुद्धि = अविद्यादि क्लेशों की (तनुत्वम् आपद्यते) तनुता = क्षीणता प्राप्त होती जाती है। (च) और (यथा-यथा) जैसे-जैसे (क्षीयते) अशुद्धि क्षीण होती जाती है (तथा-तथा) वैसे-वैसे (क्षयक्रमानुरोधिनी) अशुद्धि क्षीणता के क्रम के अनुसार (ज्ञानस्य) ज्ञान की (दीप्तिः) दीप्ति = प्रकाश (अपि) भी (विवर्धते) बढ़ता जाता है। (सा खलु एषाः) ज्ञान के प्रकाश की यह (विवृद्धिः) वृद्धि (आविवेकख्यातेः) विवेकख्याति पर्यन्त (प्रकर्षम् अनुभवति) प्रकृष्ट = उत्कृष्ट होती जाती है। विवेकख्याति अर्थात् (आगुणपुरुषस्वरूपविज्ञानात्) सत्त्वादि गुणों और पुरुष के स्वरूप का भिन्न-भिन्न ज्ञान होने तक वृद्धि होती रहती है (इति अर्थः) यह अर्थ है।

(योगाङ्गानुष्ठानम्) योग के अङ्गों का अनुष्ठान करना (अशुद्धेः) अविद्या रूपी अशुद्धि को (वियोगकारणम्) दूर करने का कारण है; (यथा) जैसे कि (परशुः) कुल्हाड़ा (छेद्यस्य) काटी गई लकड़ी को अलग करने का कारण होता है। (तु) किन्तु (विवेकख्यातेः) विवेकख्याति को (प्राप्तिकारणम्) प्राप्त करने का वैसा ही कारण है (यथा) जैसे (धर्मः) धर्म का अनुष्ठान (सुखस्य) सुख प्राप्ति का कारण है। (न अन्यथा कारणम्) कोई अन्य कारण इन दोनों कार्यों का नहीं है। (शास्त्रे) शास्त्र में (कति च एतानि कारणानि) ये कितने प्रकार के कारण (भवन्ति) होते हैं ? उत्तर देते हुए कहते हैं — (नव एव इति आह) नौ प्रकार के ही कारण होते हैं (तत् यथा) वह जैसे कि (उत्पत्तिस्थित्यव्यक्तिविकारप्रत्ययाप्तयः) उत्पत्ति, स्थिति, अभिव्यक्ति, विकार, ज्ञान, आप्ति = प्राप्ति, (वियोगान्यत्वधृतयः) वियोग, अन्यत्व और धृति रूपी (कारणम्) कारण (नवधा स्मृतम् इति) नौ प्रकार के कहे गए हैं। (तत्र) उनमें से —

१. (ज्ञानस्य) ज्ञान = विज्ञान की (उत्पत्तिकारणम्) उत्पत्ति का कारण (मनो भवति) मन होता है।

२. (पुरुषार्थता) पुरुषार्थ = भोग और अपवर्ग रूपी प्रयोजन (मनसः) मन की (स्थितिकारणम्) स्थिति का कारण है; जैसे (शरीरस्य इव) शरीर की स्थिति का कारण (आहार इति) आहार = भोजन है।

३. (अभिव्यक्तिकारणम्) अभिव्यक्ति कारण — (यथा) जैसे (रूपस्य) रूप की अभिव्यक्ति का कारण (आलोकः) प्रकाश है (तथा) वैसे (रूपज्ञानम्) रूप का ज्ञान भी रूप की अभिव्यक्ति का कारण है।

४. (मनसः) मन के (विकारकारणम्) विकार का कारण (विषयान्तरम्) विषयान्तर = विभिन्न विषयों = ज्ञानों का होना है; (यथा) जैसे (पाक्यस्य) पकाने योग्य भोजन के विकार का कारण (अग्निः) अग्नि है।

५. (प्रत्ययकारणम्) ज्ञान का कारण — (धूमज्ञानम्) धूम = धुएँ का ज्ञान (अग्निज्ञानस्य) अग्नि के ज्ञान का कारण होता है।

६. (प्राप्तिकारणम्) प्राप्ति का कारण — (योगाङ्गानुष्ठानम्) योग के अङ्गों का अनुष्ठान (विवेकख्यातेः) विवेकख्याति की प्राप्ति का कारण है।

७. (वियोगकारणम्) वियोग का कारण — (तदेव) वही योगाङ्गों का अनुष्ठान ही (अशुद्धेः) अविद्यादि रूपी अशुद्धि के वियोग का कारण है।

८. (अन्यत्वकारणम्) अन्यत्व = भिन्न रूप देने वाला कारण — (यथा) जैसे (सुवर्णस्य) सोने को अन्यत्व = भिन्न रूप देने का कारण (सुवर्णकारः) सुनार होता है। (एवम्) इसी प्रकार (एकस्य स्त्रीप्रत्ययस्य) एक स्त्री के ज्ञान में मनुष्य के अन्यत्व का कारण को निम्न प्रकार से जानना चाहिए — (मूढत्वे) स्त्री के मोहमय ज्ञान में (अविद्या) अविद्या कारण है; (दुःखत्वे) स्त्री ज्ञान के दुःखात्मक होने में (द्वेषः) द्वेष कारण है; (सुखत्वे) स्त्री ज्ञान के सुखात्मक = सुखरूप होने में (रागः) राग कारण है; और (माध्यस्थ्ये) माध्यस्थ = इन तीनों से रहित = तटस्थ हाने में (तत्त्वज्ञानम्) तत्त्वज्ञान = यथार्थ बोध कारण है।

९. धृति कारण — (इन्द्रियाणाम्) इन्द्रियों को (धृतिकारणम्) धारण करने वाला कारण (शरीरम्) शरीर है। (च) और (तस्य) उस शरीर के धारण में (तानि) इन्द्रियाँ कारण हैं। (महाभूतानि) पृथिवी आदि महाभूत (शरीराणाम्) शरीरों के धृति कारण हैं। (च) और (तानि) वे शरीर (परस्परम्) मिलकर (सर्वेषाम्) समस्त शरीरों की धृति का कारण हैं, क्योंकि (तैर्यग्यौनमानुषदैवतानि च) तिर्यक योनि वाले पशु, पक्षी आदि, मनुष्य और देवता (परस्परार्थत्वात्) परस्पर एक दूसरे के सहयोगी = आश्रित होने से (इति) परस्पर धृति के कारण हैं।

(एवम्) इस प्रकार (नव) नौ प्रकार के (कारणानि) कारण हैं। (च) और (तानि) इन नौ कारणों को (यथासम्भवम्) यथासम्भव (पदार्थान्तरेषु) अन्य पदार्थों में (अपि) भी (योज्यानि) घटाना चाहिए = समझना चाहिए। (तु) किन्तु (योगाङ्गानुष्ठानम्) योग के अङ्गों का अनुष्ठान तो (द्विधा एव) दो प्रकार से ही (कारणत्वम्) कारण को (लभते इति) प्राप्त होता है अर्थात् अशुद्धि के वियोग का कारण तथा विवेकख्याति की प्राप्ति का कारण॥

वैदिक योग मीमांसा : मानव जीवन में पुरुष के लिए परम पुरुषार्थ, मोक्ष प्राप्ति को कहा गया है; और उस मोक्ष प्राप्ति का उपाय अविप्लवा विवेकख्याति है। परन्तु यह विवेकख्याति मात्र शाब्दिक ज्ञान से सम्भव नहीं है। मात्र श्रवण अथवा पठन से हुए प्रकृति और पुरुष के भेद ज्ञान से किसी भी पुरुष को कैवल्य की प्राप्ति तो दूर, बल्कि उसके वर्त्तमान जीवन में अविद्यादि क्लेश रूपी अशुद्धि तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार रूपी मनोविकार ही दूर नहीं होते क्योंकि भोगविषयक अनादि वासनायें, पुरुष के चित्त में अत्यन्त बलवान् होती हैं और पुरुष उस भोग मार्ग पर स्वतः अग्रसर रहता है। अतः विवेकख्याति की प्राप्ति का साधन योग के अङ्गों का सम्यक् अनुष्ठान कहा गया है।

इस पथ के किसी भी साधक को ज्ञानपूर्वक योग के अङ्गों का अनुष्ठान = निरन्तर सेवन = आचरण करना होता है। जैसा शास्त्रों में इनके अनुष्ठान = अभ्यास हेतु निर्देश है, वैसा ही आचरण करने से, साधक को इनके अनुष्ठान का लाभ मिलना आरम्भ होता है। योग के आठ अङ्गों के अनुष्ठान से साधक को, शरीर और अन्तःकरण की शुद्धि से लेकर प्रकृति-पुरुष के भेद ज्ञान का साक्षात्कार प्राप्त होता है। महर्षि व्यास कहते हैं कि योग के अङ्गों के निरन्तर अभ्यास से पुरुष के चित्त में उपस्थित अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेश रूपी अशुद्धि का नाश होता है, और उस अशुद्धि के नाश होने पर योगी को यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधक के चित्त में अशुद्धि नाश जिस क्रम एवं स्तर से होता है, उसी क्रम एवं स्तर के अनुसार ही उसके चित्त में ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है। ज्ञान के प्रकाश की यह वृद्धि, विवेकख्याति की प्राप्ति पर्यन्त निरन्तर होती रहती है। इस विषय में कहा है कि जैसे कुल्हाड़ी लकड़ी को काट कर वृक्ष से अलग करती है, वैसे ही योग के अङ्गों का अनुष्ठान चित्त से अविद्यादि मलों को दूर कर देता है; और जैसे धर्म के पालन से सुखप्राप्ति होती है, उसी प्रकार योग के अङ्गों के अनुष्ठान से विवेकख्याति की प्राप्ति होती है। इस प्रकार योग के अङ्गों का अनुष्ठान, चित्तस्थ अविद्या रूपी अशुद्धि नाश में वियोग का कारण होता है, तथा विवेकख्याति में प्राप्ति का कारण होता है।

योगाङ्गों का यह अनुष्ठान मात्र दो प्रकार से ही कारण होकर साधक का उपकारक होता है। जबकि कारण रूप से शास्त्रों में नौ प्रकार के कारण कहे गए हैं, जो कि उत्पत्ति कारण, स्थिति कारण, अभिव्यक्ति कारण, विकार कारण, ज्ञान कारण, प्राप्ति कारण, वियोग कारण, अन्यत्व कारण और धृति कारण हैं। इनका व्याख्यान व्यासभाष्य में स्पष्ट है। महर्षि व्यास ने योगाङ्गों के अनुष्ठान, अशुद्धिक्षय और विवेकख्याति के विषय में “नान्यथा कारणम्” कहा है, जिसका अभिप्राय निम्न दो प्रकार से समझना चाहिए —

१. अशुद्धि नाश और विवेकख्याति की प्राप्ति में यमनियमादि योग के अङ्गों के अनुष्ठान को छोड़कर और कोई अन्य कारण नहीं होता। अतः मोक्षपथ के पथिक हेतु इनका अनुष्ठान वेद तथा योगशास्त्र के निर्देशानुसार करना परम आवश्यक है। उसके लिए आत्मकल्याण का मार्ग केवलमात्र यहीं से आरम्भ होता है।

२. योगाङ्गों का अनुष्ठान, अशुद्धि नाश हेतु वियोग कारण होता; और विवेकख्याति हेतु प्राप्तिकारण होता है। अन्य किसी प्रकार से अर्थात् उत्पत्ति, स्थिति, अभिव्यक्ति, विकार, ज्ञान, अन्यत्व अथवा धृति रूप कारण से नहीं होता।