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Saadhana Paada / Means / 3
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Saadhana Paada / Means / 3

अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः॥३॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 3

In Hindi:

पदपाठ : अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ के ते क्लेशाः कियन्तो वेति—

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (ते) वे (क्लेशाः) क्लेश (के) कौन से हैं ? (कियन्तो वा) और कितने हैं ? (इति) यह कहा गया है —

हिंदी में अर्थ : (अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश ये (पञ्च) पाँच (क्लेशाः) क्लेश हैं॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “चित्त की पांच वृत्तियों को यथावत् रोकने और मोक्ष के साधन में सब दिन प्रवृत्त रहने से नीचे लिखे हुए पांच क्लेश नष्ट हो जाते हैं, वे क्लेश हैं — (अविद्या॰) एक अविद्या, दूसरा अस्मिता, तीसरा राग, चौथा द्वेष और पाँचवाँ अभिनिवेश।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

“इनमें अविद्या का स्वरूप कह आये। पृथक् वर्त्तमान बुद्धि को आत्मा से भिन्न न समझना अस्मिता, सुख में प्रीति राग, दुःख में अप्रीति द्वेष, और सब प्राणिमात्र को यह इच्छा सदा रहती है कि मैं सदा शरीरस्थ रहूँ, मरूँ नहीं, मृत्यु दुःख से त्रास अभिनिवेश कहाता है। इन पांच क्लेशों को योगाभ्यास विज्ञान से छुड़ाके ब्रह्म को प्राप्त होके मुक्ति के परमानन्द को भोगना चाहिये।” (स० प्र० नवमसमु॰)

व्यास भाष्य : क्लेशा इति पञ्च विपर्यया इत्यर्थः। ते स्यन्दमाना गुणाधिकारं दृढयन्ति, परिणाममवस्थापयन्ति, कार्यकारणस्रोत उन्नमयन्ति, परस्परानुग्रहतन्त्रीभूत्वा कर्मविपाकं चाभिनिर्हरन्तीति॥

हिंदी में अर्थ : (क्लेशाः इति) क्लेश अर्थात् (पञ्च विपर्ययाः) पाँच प्रकार का मिथ्याज्ञान है, (इति अर्थः) यह अर्थ है। (ते) वे अविद्यादि क्लेश (स्यन्दमानाः) उदार अवस्था में अर्थात् वर्त्तमान में प्रवृत्त हुए = वृत्ति रूप को प्राप्त हुए (गुणाधिकारम्) सत्त्वादि गुणों के कार्य उत्पादन रूप अधिकार को (दृढयन्ति) दृढ़ = बलवान् करते हैं; (परिणामम्) गुणों के कार्यरूप परिणाम = प्रकृति के कार्यों को (अवस्थापयन्ति) अवस्थापित करते हैं = चलाते हैं; (कार्यकारणस्रोतः) कार्य-कारण के स्रोत = कार्य और कारण अर्थात् प्रकृति, महत्तत्त्व, अंहकार आदि की परम्परा को (उन्नमयन्ति) बढ़ाते हैं; (च) और (परस्परानुग्रहतन्त्रीभूत्वा) परस्पर = एक-दूसरे का काम साधने वाले = अनुग्रह कारक होकर अर्थात् क्लेश कर्मों के और कर्म क्लेशों के साथ मिलकर (कर्मविपाकम्) कर्मफल अर्थात् जाति, आयु और भोग रूप फलों को (अभिनिर्हरन्ति इति) निष्पादित करते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : तनु = क्षीण किए जाने योग्य क्लेश पाँच प्रकार के हैं जो कि अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नाम से जाने जाते हैं। क्लेश को विपर्यय = मिथ्याज्ञान कहा गया है; अतः अविद्या आदि क्लेश मिथ्याज्ञान हैं। अविद्यादि क्लेशों का आगे के सूत्रों में व्याख्यान किया गया है।

इसी अविद्या को सांख्यदर्शनकार महर्षि कपिल ने अविवेक कहा है अर्थात् प्रकृति और पुरुष का भेद ज्ञान न होना। इसी अविवेक = अविद्या के कारण ही पुरुष = जीवात्मा, प्रकृति के अविद्याजन्य संयोग को प्राप्त हुआ, जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में फँसा हुआ, विभिन्न योनियों = विभिन्न शरीरों को प्राप्त करता हुआ, विभिन्न प्रकार के दुःखों को भोग रहा है। महर्षि कपिल ने विपर्यय ज्ञान = मिथ्या ज्ञान को ही बन्धन का कारण कहा है — बन्धो विपर्ययात्॥ सांख्य ३.२४॥ इसी प्रकार महर्षि गौतम ने भी दुःखों का मूल कारण मिथ्याज्ञान ही कहा है — दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्या-ज्ञानानामुत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः॥ न्याय० १.१.२॥ अर्थात् मिथ्याज्ञान से राग-द्वेष रूपी दोष उत्पन्न होते हैं, दोषों से शुभाशुभ कर्मों में प्रवृत्ति होती, प्रवृत्ति से जन्म-मरण रूपी संसार चक्र, और जन्म-मरण से दुःखों की प्राप्ति होती है। अतः मिथ्याज्ञान के नष्ट होने से ही दोष, प्रवृत्ति, जन्म-मरण का क्रमशः नाश होकर दुःखों का नाश होता है।

इसी तथ्य को महर्षि पतञ्जलि ने योगदर्शन में कहा है — “द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः॥” योग० २.१७॥ अर्थात् दुःख का कारण पुरुष और प्रकृति का अविद्याजन्य संयोग है और “तस्य हेतुरविद्या॥” योग० २.२४॥ इस संयोग का कारण अविद्या है।

महर्षि व्यास ने इन अविद्यादि क्लेशों की मनुष्य के जीवन में वर्त्तमानता = प्रवृत्ति होने पर, चार प्रकार के परिणामों को सूत्र की व्याख्या में कहा है —

१. अविद्या से सत्त्व, रज और तम गुणों के कार्य उत्पादन रूपी अधिकार दृढ होता है। ये अविद्यादि क्लेश चित्त को, पुरुष के लिए, भोग सम्पादन रूपी कार्य को दृढता से लगाए रखते हैं।

२. अविद्यादि क्लेश ही गुणों के कार्य रूप परिणाम को = प्रकृति के कार्यों महत्तत्त्व आदि को चलाए रखते हैं। जब तक अविद्या का पुरुष रूपी जीवों के साथ सम्बन्ध रहेगा तब तक यह, प्रकृति के परिणाम को प्राप्त होने की, प्रक्रिया चालू रहेगी।

३. ये अविद्या आदि क्लेश कार्य-कारण स्रोत को उन्नत करते हैं अर्थात् प्रकृति के कार्य-कारण रूपी प्रवाह — प्रकृति से महत्तत्त्व, महत्तत्त्व से अंहकार, अंहकार से तन्मात्राएँ और इन्द्रियाँ तथा तन्मात्राओं से स्थूल भूतों रूपी कार्य-कारण प्रवाह को उन्नत करते हैं। और

४. क्लेश कर्मों के, तथा कर्म क्लेशों के परस्पर सहयोगी बन कर पुरुष को कर्मफल = जाति, आयु और भोग रूप फलों को प्राप्त कराते हैं।

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि किसी भी पुरुष = जीवात्मा को, अविद्या के कारण ही, प्रकृति से संयोग होकर संसार के जन्म-मरण रूपी चक्र में दुःखों की प्राप्ति होती है। जड़ प्रकृति के विकार ही, जीवात्मा के कारण और सूक्ष्म शरीर के अंग बनकर, अपवर्ग पर्यन्त उसके साथ रहते हुए, उसे विभिन्न शरीरों में घुमाते हुए, सुख-दुःख रूपी भोगों की प्राप्ति कराते हैं। जब तक पुरुष क्लेशों को क्रियायोग से निर्बल कर, उन्हें विवेकख्याति से दग्धबीज के तुल्य नहीं करता, तब तक यह संसारचक्र उसके लिए चालू रहता है। अतः इस क्रियायोग का सम्पादन पुरुष को पूर्ण पुरुषार्थ से निरन्तर करना चाहिए।