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Saadhana Paada / Means / 4
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Saadhana Paada / Means / 4

अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥४॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 4

In Hindi:

पदपाठ : अविद्या क्षेत्रम् उत्तरेषाम् प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥

हिंदी में अर्थ : (अविद्या) अविद्या (क्षेत्रम्) उत्पत्ति स्थल = जननी है (उत्तरेषाम्) अविद्या के बाद पढ़े गए — अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशों की; जो कि (प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्) प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्था वाले हैं॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (अविद्याक्षेत्र०) उनमें से अस्मिताादि चार क्लेशों और मिथ्याभाषणादि दोषों की माता अविद्या है, जो कि मूढ़ जीवों को अंधकार में फँसा के जन्ममरणादि दुःखसागर में सदा डुबाती है। परन्तु जब विद्वान् और धर्मात्मा उपासकों की सत्यविद्या से अविद्या विच्छिन्न अर्थात् छिन्न-भिन्न होके (प्रसुप्ततनु॰) नष्ट हो जाती है, तब वे जीव मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं॥ (ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)

व्यास भाष्य : अत्राविद्या क्षेत्रं प्रसवभूमिरुत्तरेषामस्मितादीनां चतुर्विधविकल्पानां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्। तत्र का प्रसुप्तिः? चेतसि शक्तिमात्रप्रतिष्ठानां बीजभावोपगमः। तस्य प्रबोध आलम्बने सम्मुखीभावः। प्रसंख्यानवतो दग्धक्लेशबीजस्य सम्मुखीभूतेऽप्यालम्बने नासौ पुनरस्ति, दग्धबीजस्य कुतः प्ररोह इति। अतः क्षीणक्लेशः कुशलश्चरमदेह इत्युच्यते। तत्रैव सा दग्धबीजभावा पञ्चमी क्लेशावस्था नान्यत्रेति। सतां क्लेशानां तदा बीजसामर्थ्यं दग्धमिति विषयस्य सम्मुखीभावेऽपि सति न भवत्येषां प्रबोध इति। उक्ता प्रसुप्तिर्दग्धबीजानाम- प्ररोहश्च।

तनुत्वमुच्यते—प्रतिपक्षभावनोपहताः क्लेशास्तनवो भवन्ति। तथा विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनाऽऽत्मना पुनः पुनः समुदाचरन्तीति विच्छिन्नाः। कथम्? रागकाले क्रोधस्यादर्शनात्। न हि रागकाले क्रोधः समुदाचरति। रागश्च क्वचिद् दृश्यमानो न विषयान्तरे नास्ति। नैकस्यां स्त्रियां चैत्रो रक्त इत्यन्यासु स्त्रीषु विरक्तः। किन्तु तत्र रागो लब्धवृत्तिरन्यत्र तु भविष्यद्वृत्तिरिति। स हि तदा प्रसुप्ततनुविच्छिन्नो भवति। विषये यो लब्धवृत्तिः स उदारः।

सर्व एवैते क्लेशविषयत्वं नातिक्रामन्ति। कस्तर्हि? विच्छिन्नः प्रसुप्तस्तनुरुदारो वा क्लेश इति? उच्यते—सत्यमेवैतत्। किन्तु विशिष्टानामेवैतेषां विच्छिन्नादित्वम्। यथैव प्रतिपक्षभावनातो निवृत्तस्तथैव स्वव्यञ्जकाञ्जनेनाभिव्यक्त इति। सर्व एवामी क्लेशा अविद्याभेदाः। कस्मात्? सर्वेष्वविद्यैवाभिप्लवते। यदविद्यया वस्त्वाकार्यते तदेवानुशेरते क्लेशा विपर्यासप्रत्ययकाल उपलभ्यन्ते क्षीयमाणां चाविद्यामनु क्षीयन्त इति॥

हिंदी में अर्थ : (अत्र) इन पाँचों क्लेशों में से (अविद्या) अविद्या रूपी क्लेश (उत्तरेषाम्) अविद्या के बाद कहे गए (प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्) प्रसुप्त = सोये हुए; तनु = सूक्ष्म, निर्बल हुए; विच्छिन्न = दबे हुए; तथा उदार = उभरे हुए, कार्य रूप में प्रवृत्त हुए, इन (चतुर्विधविकल्पानाम्) चार प्रकार की अवस्था वाले (अस्मितादीनाम्) अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक क्लेशों की (क्षेत्रम्) खेत अर्थात् (प्रसवभूमिः) उत्पत्ति स्थल = जननी है।

(तत्र) उन अस्मितादि क्लेशों की प्रसुप्तादि अवस्थाओं में (का प्रसुप्तिः) प्रसुप्ति कौन सी अवस्था है? (चेतसि) चित्त में (शक्तिमात्रप्रतिष्ठानाम्) केवल शक्तिरूप से स्थित क्लेशों का जो (बीजभावोपगमः) बीज भाव से रहना अर्थात् बीजरूप से कार्योत्पादन सामर्थ्य से युक्त होकर रहना है; वह प्रसुप्ति अवस्था है। (तस्य) उस प्रसुप्त अस्मितादि क्लेशों का (आलम्बने) अपने विषय के आलम्बन के (सम्मुखीभावः) उपस्थित होने पर अभिव्यक्त = प्रकट होना ही (प्रबोधः) उनका जागरण है।

विवेकख्याति को प्राप्त योगी के क्लेशों की अवस्था क्या होती है ? इसका वर्णन करते हुए कहते हैं — (प्रसंख्यानवतः) विवेकख्याति को प्राप्त हुए योगी, जिसके (दग्धक्लेशबीजस्य) क्लेशों के बीज दग्ध हो गए हैं, के प्रति क्लेशों का (आलम्बने) आलम्बन = विषय (सम्मुखीभूते) उपस्थित हो जाने पर (अपि) भी (असौ) वह प्रबोध = क्लेशों का जागरण (पुनः) फिर से (न अस्ति) नहीं होता। क्योंकि (दग्धबीजस्य) जले हुए बीज का (प्ररोहः) अङ्कुरित होना = उगना (कुतः इति) कैसे सम्भव है? (अतः) इसलिए विवेकख्याति प्राप्त योगी (क्षीणक्लेशः) नष्ट हुए क्लेशों वाला (कुशलः) कुशल और (चरमदेहः) चरम देह = अन्तिम देह वाला (इति उच्यते) कहा जाता है।

(सा) वह (दग्धबीजभावा) दग्धबीज भाव वाली (पञ्चमी) पाँचवीं (क्लेशावस्था) क्लेशों की अवस्था (तत्रैव) उस विवेकख्याति सम्पन्न योगी में ही होती है, (न अन्यत्र इति) अन्य पुरुषों में नहीं होती। (तदा) उस समय = योगी के चित्त में (सताम् क्लेशानाम्) क्लेशों की सत्ता होते हुए भी, उनका (बीजसामर्थ्यम्) बीजरूप शक्ति = अङ्कुरित होने का सामर्थ्य (दग्धम् इति) दग्ध = नष्ट हो जाने से (विषयस्य) उनके विषय = आलम्बन के (सम्मुखीभावे अपि सति) सम्मुख = उपस्थित होने पर भी (एषाम्) इन क्लेशों का (प्रबोधः) जागरण = प्रकट होना (न भवति) नहीं होता। (इति) इस प्रकार (प्रसुप्तिः) क्लेशों की प्रसुप्ति अवस्था (च) और (दग्धबीजानाम्) दग्धबीजभाव को प्राप्त हुए क्लेशों का (अप्ररोहः) अङ्कुरित न होना (उक्ता) कहा गया।

(तनुत्वम्) क्लेशों की तनु अवस्था (उच्यते) कही जाती है — (प्रतिपक्षभावनोपहताः) क्रियायोग के अनुष्ठान के द्वारा प्रतिपक्ष भावना से प्रताडि़त हुए = दबे हुए (क्लेशाः) क्लेश (तनवः) तनु = सूक्ष्म = निर्बल (भवन्ति) हो जाते हैं।

(तथा) उसी प्रकार (विच्छिद्य विच्छिद्य) बीच-बीच में टूट-टूट कर = रुक-रुक कर (तेन तेन आत्मना) अपने उस-उस रूप से (पुनः पुनः) बारम्बार (समुदाचरन्ति) आविर्भूत = प्रकट होते हैं (इति) इसलिए यह (विच्छिन्नाः) क्लेशों की विच्छिन्न अवस्था है। । (कथम्) कैसे ? (रागकाले) राग नामक क्लेश के काल में (क्रोधस्य) क्रोध = द्वेष नामक क्लेश के (अदर्शनात्) न देखे जाने से। (हि) क्योंकि (रागकाले) राग के काल में (क्रोधः) क्रोध (न समुदाचरति) प्रकट नहीं होता। यह क्रोध की कालिक विच्छिन्नावस्था है। (च) और (क्वचित्) किसी एक विषय = आलम्बन में (दृश्यमानः) दिखाई देता हुआ (रागः) राग नामक क्लेश (विषयान्तरे) अन्य विषयों = आलम्बनों में (न अस्ति) नहीं है, (न) ऐसा नहीं है = अर्थात् उन अन्य आलम्बनों में भी राग होता है। जैसे (एकस्याम् स्त्रियाम्) एक स्त्री में (रक्तः) आसक्त = रागयुक्त (चैत्रः) चैत्र नामक पुरुष, (अन्यासु स्त्रीषु) अन्य स्त्रियों में (विरक्तः) विरक्त = रागरहित है, (इति न) ऐसा नहीं जानना चाहिए। (किन्तु) बल्कि (तत्र) वहाँ पर = उस स्त्री में (रागः) राग नामक क्लेश (लब्धवृत्तिः) लब्ध = वर्त्तमान में प्रकट रूप वाला = उदार अवस्था वाला है, और (अन्यत्र तु) अन्य स्त्रियों के प्रति तो (भविष्यद्वृत्तिः इति) भविष्यत काल में प्रकट होने वाला है। इस प्रकार (हि) निश्चय रूपेण (सः) वह भविष्यतकाल में होने वाला राग नामक क्लेश (तदा) वर्त्तमान वृत्ति काल में (प्रसुप्ततनुविच्छिन्नः) प्रसुप्त, तनु और विच्छिन्न अवस्था वाला (भवति) होता है। (यह दैशिक विच्छिन्नता है।)

(यः) जो क्लेश (विषये) अपने विषय के प्रति (लब्धवृत्तिः) अपने पूरे स्वरूप से प्रकट होकर रहे (सः) वह क्लेश (उदारः) उदार अवस्था वाला है।

(एते सर्वम् एव) इन सभी अवस्थाओं वाले ये क्लेश (क्लेशविषयत्वम्) क्लेशविषयता को (न अतिक्रामन्ति) नहीं छोड़ते। अर्थात् सभी अवस्थाओं में ये क्लेश ही कहाते हैं। (कः तर्हि) तो कैसे (क्लेशः) क्लेश (विच्छिन्नः) विच्छिन्न, (प्रसुप्तः) प्रसुप्त, (तनुः) तनु (वा) और (उदारः इति) उदार अवस्था वाले कहे जाते हैं। (उच्यते) कहा जाता है — (एतत्) इन प्रसुप्तादि अवस्थाओं में ये सभी क्लेश ही हैं; यह (सत्यम् एव) सत्य ही है। (किन्तु) किन्तु (विशिष्टानाम् एव) विशेष अवस्थाओं में स्थित होने से ही (एतेषाम्) इन क्लेशों के (विच्छिन्नादित्वम्) विच्छिन्न आदि नाम होते हैं। (यथैव) जिस प्रकार से ये क्लेश (प्रतिपक्षभावनातः) प्रतिपक्षभावना = क्रियायोग के अनुष्ठान द्वारा उत्पन्न हुई विरोधी भावनाओं से (निवृत्तः) निवृत्त होते हैं (तथैव) उसी प्रकार (स्वव्यञ्जकाञ्जनेन) अपने अभिव्यञ्जक = प्रकाशक कारण से (अभिव्यक्त इति) अभिव्यक्त = प्रकट होते हैं।

(अमी सर्व एव क्लेशाः) ये सभी अस्मितादि क्लेश (अविद्याः भेदाः) अविद्या के ही भेद हैं। (कस्मात्?) किस कारण से, क्यों ? क्योंकि (सर्वेषु) सभी क्लेशों में (अविद्या एव) अविद्या ही (अभिप्लवते) व्याप्त है = आधार रूप से स्थित है। (यद् वस्तु) जो वस्तु = विषय (अविद्यया) अविद्या से (आकार्यते) प्रस्तुत = प्रतिभासित की जाती है; (क्लेशाः) अस्मितादि क्लेश (तदेव) उसी वस्तु = विषय का (अनुशेरते) अनुगमन करते हैं। क्योंकि (विपर्यासप्रत्ययकाले) मिथ्याज्ञान के काल में ही (उपलभ्यन्ते) ये क्लेश उपलब्ध = प्रकट होते हैं; (च) और (क्षीयमाणाम् अविद्याम्) अविद्या के क्षीण होने के साथ (अनुक्षीयन्ते इति) क्षीण = नष्ट हो जाते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : पुरुष = जीवात्मा के लिए बन्धन का मूल कारण अविद्या है, और यह क्लेश नाम से व्यवहृत होती है। यह अविद्या ही सभी पाँचों क्लेशों में प्रधान = मुख्य है। महर्षि पतञ्जलि ने अविद्या को अन्य क्लेशों का क्षेत्र अर्थात् उत्पत्ति स्थल कहा है। अर्थात् जब तक अविद्या का सद्भाव रहता है तभी तक अन्य क्लेश = अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश भी पुरुष के चित्त में उपस्थित रहते हैं; और अविद्या को नष्ट करने से ही, शेष चारों क्लेश भी निर्मूल = नष्ट हो जाते हैं। महर्षि पतञ्जलि ने इन क्लेशों की चार प्रकार की अवस्थाएँ कही हैं, जो कि निम्न प्रकार से हैं —

१. प्रसुप्त अवस्था :— क्लेशों का चित्त में सुप्तावस्था में, अपने कार्योत्पादन की क्षमता से युक्त होकर, रहना प्रसुप्त अवस्था है। इस अवस्था में क्लेशों को जब भी अनुकूल परिस्थितियाँ, आलम्बन उपलब्ध होते हैं, तो ये क्लेश कार्यरूप में परिणित होकर उदार अवस्था वाले बन जाते हैं। जैसे बाल्यकाल में बालक के चित्त में क्लेश वासना रूप में स्थित होते हुए भी, उनको कार्यरूप में परिणित करने वाले सहायक उपलब्ध = उपस्थित न होने से, ये प्रसुस्त रहते हैं। वही बालक जब कुछ बड़ी अवस्था वाला होता है, तब अविद्या के कारण उसमें राग, द्वेष रूपी क्लेश कार्यरत दिखते हैं। इसी प्रकार युवावस्था तक आते-आते अन्य क्लेश भी कार्यरत होकर उदार अवस्था वाले हो जाते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के चित्त में जन्म-जन्मान्तर के असंख्य संस्कार भी प्रसुप्त दशा में पड़े हुए हैं जो कि उपयुक्त आलम्बन के उपस्थित होने पर अपने कार्यों को करने में समर्थ होते हैं।

२. तनु अवस्था :— जब क्लेश सूक्ष्म = निर्बल अवस्था वाले होते हैं, तो तनु कहलाते हैं। इनको तनु करने हेतु क्रियायोग के सम्पादन का निर्देश दिया गया है। इस क्रियायोग के सम्यक् अनुष्ठान द्वारा, प्रतिपक्ष भावना से ही अविद्यादि क्लेश निर्बल हो कर वासना रूप से चित्त में विद्यमान रहते हैं। इस अवस्था वाले क्लेश, किन्हीं आलम्बनों के सामान्य रूप से, उपस्थित होने पर भी, कार्य रूप में परिणित नहीं होते। जैसे योगी के चित्त में तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान के अनवरत सम्पादन से निर्बल = दुर्बल हुए क्लेश वासना रूप में उपस्थित रहते हुए भी अपने कार्य सम्पादन में असमर्थ रहते हैं। परन्तु इस अवस्था वाले क्लेशों के प्रति भी जब कोई प्रबल आलम्बन उपस्थित हो जाता है अथवा योग का अभ्यास शिथिल हो जाता है, तो ये फिर से कार्यरूप में परिणित होकर उदार अवस्था वाले हो जाते हैं।

प्रसुप्त अवस्था में क्लेश सोये हुए होते हैं, परन्तु सामान्य आलम्बन के उपस्थित होने पर कार्यरत हो जाते हैं; दूसरी ओर तनु अवस्था वाले क्लेश निर्बल होने से प्रबल आलम्बनों के उपस्थित होने पर ही कार्यरत हो पाते हैं।

३. विच्छिन्न अवस्था :— जब कोई क्लेश किसी अन्य बलवान् क्लेश के उदार अवस्था में होने से दब जाता है, तो इस प्रकार से दबा हुआ क्लेश विच्छिन्न अवस्था वाला कहलाता है। ये विच्छिन्न अवस्था वाले क्लेश बीच-बीच में रुक-रुक कर, पुनः अपने उदार अवस्था वाले रूप में प्रकट हो जाते हैं। यह क्लेशों की विच्छिन्नता दो प्रकार की कही गयी है जो कि कालिक और दैशिक नाम से जानी जाती है। कालिक विच्छिन्नता में अपने प्रबल अवस्था में कार्यरत विजातीय क्लेश से दूसरा क्लेश दब जाता है — जैसे कि “राग” नाम क्लेश के कार्यरत होने से “द्वेष” नामक क्लेश दबा रहता है। और इसी प्रकार “द्वेष” के कार्यरत होने से “राग” दबा रहता है। दैशिक विच्छिन्नता में अपने प्रबल सजातीय क्लेश के एक आलम्बन के प्रति कार्यरत होने से वही क्लेश अन्य आलम्बनों के प्रति दबा रहता है — जैसे कि “चैत्र” नामक व्यक्ति किसी एक स्त्री के प्रति, जब राग युक्त होता है, तो उसका “राग” अन्य स्त्रियों के प्रति उस काल में दबा रहता है; अर्थात् एक देश में उदार रूप में “राग” अन्य देशों के प्रति “राग” का दबाए रखता है।

४. उदार अवस्था :— जब कोई क्लेश अपने आलम्बन के प्रति अपने पूरे रूप से प्रकट होता है = कार्यरत होता है तो वह क्लेश की उदार अवस्था कहलाती है।

क्लेशों की यह चारों अवस्थाएँ सभी पुरुषों में समान रूप से पायी जाती हैं। महर्षि व्यास ने सूत्र पर भाष्य करते हुए विवेकख्याति को प्राप्त किये हुए योगी के चित्त में क्लेशों की पाँचवी अवस्था भी कहते हैं जो कि इस प्रकार से है —

५. दग्धबीज अवस्था :— विवेकख्याति सम्पन्न योगी के चित्त में, क्लेशों के बीज दग्ध अवस्था में हो जाने से, ये क्लेश अपने आलम्बनों के उपस्थित हो जाने पर भी पुनः कार्यरत होने में समर्थ नहीं हो पाते। क्योंकि जिस प्रकार जला हुआ बीज पुनः अङ्कुरित नहीं होता, उसी प्रकार ये क्लेश भी, प्रसंख्यान अग्नि से दग्धभाव को प्राप्त हो जाने से, चित्त में उपस्थित रहते हुए भी, असमर्थ होने से, अपने विषयों के प्रति कार्यरत नहीं हो पाते। ऐसे योगी को चरमदेह = अन्तिम देह वाला कहा गया है।

ये सभी अविद्यादि क्लेश अपनी सभी प्रसुप्तादि अवस्थाओं में क्लेश ही रहते हुए, पुरुष के लिए बन्धन एवम् दुःख का कारण बने रहते हैं, ना कि केवल उदार अवस्था में। ये क्लेश चित्त में क्रियायोग के सम्पादन से, विभिन्न प्रकार के आलम्बनों के होने अथवा न होने से, शारीरिक क्षमताओं के होने या न होने से ही प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्था वाले होते हुए, सभी अवस्थाओं में क्लेश ही रहते हैं।

इन सभी क्लेशों को दग्धबीज अवस्था में लाना ही परम पुरुषार्थ है। यदि कोई भी क्लेश, किसी भी अवस्था में चित्त में उपस्थित होगा, तो पुरुष के दुःख और बन्धन का अन्त सम्भव नहीं हो सकता। कोई साधक यदि क्लेशों की उदार अथवा विच्छिन्न अवस्था को ही दुःख आदि का कारण मान कर, उन्हीं के नियन्त्रण का उपाय कर भी ले, तो प्रसुप्त और तनु अवस्था वाले क्लेश कभी भी किसी भी निमित्त को पाकर पुनः उदार अवस्था में आ जायेगें और साधक उनसे उसी प्रकार त्रस्त होगा जैसा कि अन्य उदार अवस्था वाले क्लेशों से। कुछ साधक इन प्रसुप्त और तनु अवस्था वाले क्लेशों के निमित्तों को प्रस्तुत = उपस्थित कर यह देखना चाहते हैं कि ये क्लेश पुनः उदार अवस्था में आते हैं या नहीं; यह विधि सुनने और जानने में चाहे अच्छी प्रतीत हो रही हो, परन्तु जीव के जन्म-जन्मान्तर के अनादि कालीन संस्कारों के कारण, इस प्रकार का प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। क्योंकि चित्त में अनादि कालीन संस्कारों के स्थित होने के कारण कोई भी क्लेश, किसी प्रबल निमित्त को पाकर पुनः कब उदार अवस्था में आ जाये, यह नहीं का जा सकता। अतः दग्धबीज अवस्था से पूर्व इस प्रकार का कोई भी परीक्षण, कभी भी साधक को संसार चक्र में और अधिक प्रबल रूप से लगा दे, यह कहा नहीं जा सकता। इसमें स्वामी दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित्र अनुकरणीय है। स्वामी जी के जीवन चरित्र से यह पता चलता है कि स्वामी जी अपने स्थान पर स्त्रियों को नहीं आने देते थे और न ही उनको प्रत्यक्ष उपदेश ही देते थे। स्वामी जी जैसा योगी और आजीवन ब्रह्मचारी भी यदि इस प्रकार की सावधानी रखता था, तो इसमें सम्भवतः उपरोक्त कारण ही रहा होगा; अन्यथा वे भी स्त्रियों के प्रति राग या आकर्षण को जानने हेतु ऐसा कोई प्रयोग कर सकते थे। परन्तु उनका ऐसा न करना ही इस बात का संकेत है कि किसी भी साधक को अपने क्लेशों अथवा दोषों की उदार अवस्था में आने की सम्भावना की जानकारी हेतु, किसी आलम्बनों को उपस्थित करने का प्रयोग नहीं करना चाहिए; वरन् ऐसे किसी भी आलम्बन और निमित्त में दोष देखते हुए, उससे दूर रह कर, उन क्लेशों को दग्धबीज अवस्था में लाने हेतु पुरुषार्थ करना चाहिए।

इन अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूपी चारों क्लेशों का मुख्य कारण अविद्या है। अविद्या के कारण ही ये चारों उस अयथार्थ ज्ञान का अनुगमन करते हुए ही चित्त में उपस्थित रहते हैं = उपलब्ध होते हैं; और अविद्या रूपी मूल के क्षीण होने पर ये चारों भी क्षीण हो जाते हैं। अतः साधक को बन्धन एवम् दुःखों के मूल कारण अविद्या के नाश का उपाय करना चाहिए।