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Saadhana Paada / Means / 30
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Saadhana Paada / Means / 30

अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥३०॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 30

In Hindi:

पदपाठ : अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः यमाः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्र —

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन आठ योग के अङ्गों में से —

हिंदी में अर्थ : (अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहाः) अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (यमाः) यम हैं॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (तत्राहिंसा) उन आठों अङ्गों में पहिला यम है, सो पांच प्रकार का है — एक (अहिंसा) अर्थात् सब प्रकार से सब काल में, सब प्राणियों के साथ वैर छोड़के प्रेम प्रीति से वर्त्तना। दूसरा (सत्य) अर्थात् जैसा अपने ज्ञान में है, वैसा ही बोले, करे और माने। तीसरा (अस्तेय) अर्थात् पदार्थ वाले की आज्ञा के बिना किसी पदार्थ की इच्छा भी न करना, इसी को चोरी त्याग कहते हैं। चौथा (ब्रह्मचर्य) अर्थात् विद्या पढ़ने के लिए बाल्यावस्था से लेकर सर्वथा जितेन्द्रिय होना और पच्चीसवें वर्ष से लेके अड़तालीस वर्ष पर्यन्त विवाह का करना, परस्त्री, वेश्या आदि का त्यागना, सदा ऋतुगामी होना, विद्या को ठीक-ठीक पढ़के सदा पढ़ाते रहना और उपस्थ-इन्द्रिय का सदा नियम करना। पांचवां (अपरिग्रह) अर्थात् विषय और अभिमानादि दोषों से रहित होना। इन पांचों का ठीक-ठीक अनुष्ठान करने से उपासना का बीज बोया जाता है। (ऋ०भू॰ उपासना॰)

अर्थात् (अहिंसा) वैरत्याग, (सत्य) सत्य मानना, सत्य बोलना, और सत्य ही करना (अस्तेय) अर्थात् मन, वचन, कर्म से चोरी त्याग (ब्रह्मचर्य) अर्थात् उपस्थेन्द्रिय का संयम (अपरिग्रह) अत्यन्त लोलुपता, स्वत्वाभिमानरहित होना, इन पांचों यमों का सेवन सदा करें॥ (स० प्र० तृतीय०)

सर्वदा (अहिंसा) निवैरता (सत्यम्) सत्य बोलना, सत्य मानना, सत्य करना (अस्तेय) मन, कर्म, वचन से अन्याय करके परपदार्थ का ग्रहण न करना चाहिए, न किसी को करने का उपदेश करे (ब्रह्मचर्यम्) सदा जितेन्द्रिय = अष्टविध मैथुन का त्याग रखके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सदा सबका उपकार करता रहें, (अपरिग्रहः) अभिमान आदि दोष-रहित किसी संसार के धनादि पदार्थों में मोहित होकर कभी न फंसे। इन पांचों यमों का सेवन सदा किया करे॥ (सं॰ वि॰ संन्यास०)

व्यास भाष्य : तत्राऽहिंसा सर्वथा सर्वदा सर्वभूतानामनभिद्रोहः। उत्तरे च यमनियमास्तन्मूलास्तत्सिद्धिपरतयैव तत्प्रतिपादनाय प्रतिपाद्यन्ते। तदवदातरूपकरणायैवोपादीयन्ते। तथा चोक्तम् — स खल्वयं ब्राह्मणो यथा यथा व्रतानि बहूनि समादित्सते तथा तथा प्रमादकृतेभ्यो हिंसानिदानेभ्यो निवर्त्तमानस्तामेवावदातरूपामहिंसां करोति।

सत्यं यथार्थे वाङ्मनसे। यथा दृष्टं यथानुमितं यथा श्रुतं तथा वाङ्मनश्च। परत्र स्वबोधसंक्रान्तये वागुक्ता सा यदि न वञ्चिता भ्रान्ता वा प्रतिपत्तिवन्ध्या वा भवेदिति। एषा सर्वभूतोपकारार्थं प्रवृत्ता न भूतोपघाताय। यदि चैवमप्यभिधीयमाना भूतोपघातपरैव स्यान्न सत्यं भवेत्पापमेव भवेत्। तेन पुण्याभासेन पुण्यप्रतिरूपकेण कष्टतमं प्राप्नुयात्। तस्मात्परीक्ष्य सर्वभूतहितं सत्यं ब्रूयात्।

स्तेयमशास्त्रपूर्वकं द्रव्याणां परतः स्वीकरणम्। तत्प्रतिषेधः पुनरस्पृहारूपमस्तेयमिति। ब्रह्मचर्यं गुप्तेन्द्रियस्योपस्थस्य संयमः। विषयाणामर्जनरक्षणक्षयसङ्गहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणमपरिग्रह इत्येते यमाः॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन पाँच यमों में (सर्वथा) सब प्रकार से = मन, वाणी और शरीर से (सर्वदा) सब कालों में (सर्वभूतानाम्) सभी प्राणियों को (अनभिद्रोहः) पीड़ा न देना, पीड़ा देने की भावना भी न करना, एवं द्रोह = वैर की भावना न करना, (अहिंसाः) अहिंसा है। (च) और (उत्तरे) अहिंसा के बाद कहे गए (यमनियमाः) यम और नियम (तन्मूलाः) अहिंसामूलक = अहिंसा पर आश्रित हैं। (तत्सिद्धिपरतया) अहिंसा की सिद्धि के हेतु होने के कारण (एव) ही (तत्प्रतिपादनाय) अहिंसा की सिद्धि करने के लिए, सत्य आदि चार यमों तथा पाँचों नियमों का (प्रतिपाद्यन्ते) प्रतिपादन किया जाता है। (तत्) उस अहिंसा को (अवदातरूपकरणाय) सर्वथा निर्मल = निर्दोष करने के लिए (एव) ही (उपादीयन्ते) अन्य यमों और नियमों का अनुष्ठान किया जाता है। (तथा च उक्तम्) और वैसा कहा है — (स खलु अयम् ब्राह्मणः) वह यह योग साधक ब्राह्मण (यथा-यथा) जैसे-जैसे (बहूनि) बहुत से (व्रतानि) यम-नियम आदि व्रतों को (समादित्सते) अपनाना चाहता है (तथा-तथा) वैसे-वैसे (प्रमादकृतेभ्यः) प्रमाद, असावधानी के कारण किए गए (हिंसानिदानेभ्यः) हिंसा के कारणों से (निवर्त्तमानः) पराङ्गमुख = निवृत्त होता हुआ (ताम् एव अहिंसाम्) उसी अहिंसा को ही (अवदातरूपाम्) शुद्ध रूप में = निर्दोष रूप में (करोति) करता = अपनाता है।

(यथार्थे) जो पदार्थ जैसा हो उसके सम्बन्ध में (वाङ् मनसे) वैसी ही वाणी और वैसा ही मन का होना (सत्यम्) सत्य कहाता है। (यथा दृष्टम्) इन्द्रियों से जैसा देखा = प्रत्यक्ष किया, (यथा अनुमितम्) अनुमान से जैसा जाना और (यथा श्रुतम्) जैसा सुना गया हो (तथा) उसी प्रकार (वाक्) वाणी (च) और (मनः) मन का होना सत्य है। और (परत्र) अन्य पुरुषों में (स्वबोधसंक्रान्तये) अपने ज्ञान को पहुँचाने के लिए (उक्ता वाक्) जो वाणी बोली गई हो (यदि सा) यदि वह वाणी (वञ्चिता) धोखा देने वाली = ठगने वाली (वा) अथवा (भ्रान्ता) भ्रान्ति पैदा करने वाली (वा) और (प्रतिपत्तिवन्ध्या) निरर्थक = अभिप्राय को व्यक्त करने में असमर्थ (न भवेत् इति) न हो तो, ऐसी वाणी सत्य है। (एषा) ऐसी सत्य वाणी (सर्वभूतोपकारार्थम्) सभी प्राणियों के उपकार के लिए (प्रवृत्ता) प्रवृत्त हो (न भूतोपघाताय) न कि प्राणियों को अपघात = पीड़ा देने के लिए प्रवृत्त हो। (यदि च) और यदि (एवम्) इस प्रकार वञ्चना रहित, भ्रान्ति रहित, ज्ञान बोधक यथार्थ रूप से (अभिधीयमाना अपि) कही जाती हुई वाणी भी (भूतोपघातपरा एव स्यात्) प्राणियों के अपघात = अपकार के लिए हो तो वह वाणी (न सत्यम् भवेत्) सत्य न होवे, किन्तु (पापम् एव भवेत्) पाप ही होवे। (तेन पुण्याभासेन) उस पुण्याभास से अर्थात् (पुण्यप्रतिरूपकेण) पुण्य के समान प्रतीत होने वाले अपुण्य से (कष्टतमम् प्राप्नुयात्) अतिशय दुःख ही प्राप्त होगा। (तस्मात्) इसलिए (परीक्ष्य) वाणी की परीक्षा करके (सर्वभूतहितम्) सभी प्राणियों के लिए हितकर (सत्यम्) सत्य को (ब्रूयात्) बोले।

(अशास्त्रपूर्वकम्) शास्त्रों में दिए विधान से विरुद्ध (परतः) दूसरों के (द्रव्याणाम्) द्रव्यों = पदार्थों का (स्वीकरणम्) स्वीकार करना = ग्रहण करना (स्तेयम्) स्तेय = चोरी है। (पुनः) और (तत्प्रतिषेधः) उसका प्रतिषेध = अभाव होना अर्थात् (अस्पृहारूपम्) मन से भी दूसरे के द्रव्य के ग्रहण की इच्छा भी न करना (अस्तेयम् इति) अस्तेय है।

(गुप्तेन्द्रियस्य उपस्थस्य) गुप्तेन्द्रिय उपस्थ का (संयमः) संयम करना (ब्रह्मचर्यम्) ब्रह्मचर्य है।

(विषयाणाम्) विषयों = भोग्य पदार्थों के (अर्जनरक्षणक्षयसङ्गहिंसादोषदर्शनात्) अर्जन, रक्षण, क्षय, सङ्ग और हिंसा दोषों को देखने से (अस्वीकरणम्) उनको स्वीकार न करना (अपरिग्रहः) अपरिग्रह है। (इति एते) इस प्रकार ये पाँच (यमाः) यम हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : अष्टाङ्ग योग का पहला अङ्ग “यम” है जोकि अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह रूप पाँच हैं। यम शब्द “यमु उपरमे” धातु से बना है जिसका अर्थ है उपरमण का साधन। अतः यम का अर्थ होगा चित्त की वृत्तियों का नियन्त्रण = नियमन करना। यमों में प्रथम अहिंसा ही मूल यम है। महर्षि व्यास कहते हैं कि आगे के चार यम = सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह और पाँचों नियम अहिंसा की सिद्धि के लिए हैं, अर्थात् अहिंसा पर ही आश्रित हैं। अहिंसा की निर्दोष सिद्धि = आचरण हेतु ही शेष यमों और नियमों का निर्देश है। इसका तात्पर्य यह है कि सत्य आदि चार यमों तथा शौच आदि पाँचों नियमों के पूर्णरूपेण पालन के बिना, अहिंसा का पूर्णरूपेण आचरण सम्भव नहीं है। क्योंकि असत्य भाषण करने वाला, चोरी करने वाला, व्यभिचारी व्यक्ति दूसरों के प्रति वैर, द्रोह को स्वभाविक रूप से आचरण में लाता है; इसी प्रकार परिग्रह करने में दोष को महर्षि व्यास ने इस प्रकार कहा है — नानुपहत्य भूतान्युपभोगः संभवतीति। (योग० २.१५) अर्थात् भूतों = प्राणियों को पीड़ा दिए बिना सुख का उपभोग सम्भव नहीं होता। इस प्रकार सत्यादि यमों के पूर्णरूपेण पालन के बिना अहिंसा रूपी यम का निर्दोष पालन भी सम्भव नहीं है। नियमों के पालन का, अहिंसा से सम्बन्ध आगे कहा जायेगा।

महर्षि व्यास ने अहिंसा की व्याख्या में “सर्वथा सर्वदा” कहा है, अर्थात् सभी प्रकार से और सब कालों में। अतः साधक को सत्य आदि शेष चारों यमों के परिपालन में भी “सर्वथा सर्वदा” की अनिवार्य स्थिति को, अहिंसा के परिपालन के समान ही, स्वीकार करना चाहिए, तभी यमों का अनुष्ठान पूरा होगा।

१. अहिंसा — अहिंसा का अर्थ है सर्वथा = सभी प्रकार से अर्थात् मन, वाणी और शरीर से, सर्वदा = सभी कालों में सर्वभूतानाम् = सभी प्राणियों के प्रति, अनभिद्रोह = वैर भाव का त्याग करना। अतः साधक मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्राणी के प्रति वैरभाव न रखे; वह किसी भी प्रकार से किसी को न तो पीड़ा देवे, और न ही पीड़ा देने की भावना रखे अर्थात् लोभ, क्रोध, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि पूर्वक अन्य प्राणियों का अनिष्ट, हानि आदि न करे और न ही इस प्रकार की कोई भावना रखे। भोज ने मात्र प्राणियों के प्राणहरण रूपी कार्य को ही हिंसा कहा है, जो कि संकुचित परिभाषा है। पुरुष का कर्म सर्वप्रथम मन से आरम्भ होता, फिर वाणी और शरीर से होता है। अहिंसा के तीनों रूपों को निम्न प्रकार से जानना चाहिए —

अ. शरीरिक अहिंसा — अहिंसा का सबसे स्थूल रूप शरीर से अहिंसा का पालन है। मन में उपस्थित हिंसा का भाव ही वाणी और शरीर से हिंसा रूप में परिणित होता है। महर्षि मनु ने मनुस्मृति में शरीरिक अधर्मों के रूप में चोरी, हिंसा और व्यभिचार को कहा है। ये तीनों ही शरीरिक हिंसा के रूप हैं, और इनसे दूर रहकर ही साधक अहिंसा व्रत का पालन करता है। सभी हिंसा जन्य कार्य राग और द्वेष के कारण किए जाते हैं। अतः साधक को इन रागद्वेषादि दोषों से सर्वथा दूर रहते हुए शरीरिक अहिंसा का पालन करना चाहिए।

आ. वाचिक अहिंसा — शरीरिक अहिंसा की अपेक्षा से अधिक सूक्ष्म तथा मानसिक अहिंसा से स्थूल वाचिक अहिंसा है। वाचिक हिंसा में व्यक्ति दूसरों के प्रति कठोर, असत्य भाषण से उन्हें पीड़ा पहुँचाता, उनसे वैरभाव को प्रकट करता है। ऐसा व्यक्ति वाणी से उपर्युक्त प्रकार का व्यवहार करता हुआ भी, स्वयं को अहिंसक और धर्मात्मा कहता और मानता है। महर्षि मनु ने वाचिक अधर्मों में पारूष्य = कठोर भाषण, अनृत भाषण, पैशून्य = चुगली करना तथा असम्बद्ध प्रलाप रूपी चार प्रकार के अधर्म कहे हैं। ये सभी वाचिक हिंसा के ही रूप है। अतः साधक को इन सभी से सर्वथा दूर रहते हुए वाचिक अहिंसा का पालन करना चाहिए।

इ. मानसिक अहिंसा — अहिंसा का सबसे सूक्ष्म रूप मानसिक अहिंसा का है। साधक को अपने मन = चित्त से ही सभी प्राणियों के प्रति वैर, द्वेष, पीड़ा देने की भावना तक का परित्याग करना होता है। मन में रजोगुण तथा तमोगुण के कारण ही व्यक्ति मानसिक हिंसा में प्रवृत्त होता है। मानसिक हिंसा में संलग्न व्यक्ति का चित्त शान्त न होने से, ऐसा व्यक्ति योग के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता। अतः मानसिक अहिंसा का पालन सबसे कठिन है, क्योंकि वाणी और शरीर से किसी भी प्रकार का प्रयत्न किए बिना ही, मात्र चिन्तन से ही दूसरों के प्रति वैर = द्रोह किया जाता है, जिसके लिए अन्य किसी बाह्य साधन की आवश्यकता ही नहीं है। अतः साधक को सर्वप्रथम यथार्थता को जानते और समझते हुए मन = चित्त से वैरभाव का परित्याग करना चाहिए। महर्षि मनु ने तीन मानसिक अधर्म कहे हैं — परद्रव्यहरण = चोरी का विचार; लोगों का बुरा चिन्तन, ईर्ष्या, द्वेष करना; तथा मिथ्या निश्चय करना। ये तीनों ही मानसिक हिंसा के रूप हैं।

साधक को ध्यान रखना चाहिए कि शरीर से होने वाले अधर्मों की तुलना में वाणी से होने वाले अधर्म अधिक होते, और वाणी से होने वाले अधर्मों की अपेक्षा मन से होने वाले अधर्म सबसे आधिक होते। अतः साधक को इनसे बचने हेतु यथाक्रम तीव्रता से प्रयत्न करना चाहिए।

योगपथ के साधक का लक्ष्य परमात्म-साक्षात्कार और मोक्ष की प्राप्ति है और इसके लिए शास्त्रकारों ने अहिंसा का परिपालन सर्वोपरि कहा है। यथा —

अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः। तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम्॥ मनु॰ ६.७५॥

अर्थात् सब भूतों से निर्वैर, इन्द्रियों के विषयों का त्याग, वेदोक्त कर्म और अत्युग्र तपश्चरण से इस संसार में मोक्षपद को पूर्वोक्त संन्यासी ही सिद्ध कर और करा सकते हैं, अन्य नहीं। (स० प्र० पञ्चम् समु॰)

महर्षि मनु द्वारा कहे गए सभी साधन यमनियमों में ही आ जाते हैं।

२. सत्य — जो पदार्थ जैसा हो उसे वैसा ही मन में मानना और वैसा ही कहना सत्य कहाता है। अर्थात् किसी विषय या पदार्थ को जिस प्रकार से इन्द्रियों से प्रत्यक्ष किया हो अथवा अनुमान से जाना हो अथवा जैसा आगम प्रमाण से जाना गया हो उस पदार्थ को उसी प्रकार का मानना तथा वैसा ही दूसरों को बताने के लिए कथन करना। परन्तु इस प्रकार कहने में भी, किसी प्रकार की वञ्चना = धोखा, भ्रान्ति न हो तथा वह वाक्य निरर्थक भी न हो, तो सत्य है। ऐसी वाणी सभी प्राणियों के उपकार = कल्याण के लिए होनी चाहिए नाकि उनके अपघात = नाश = हानि के लिए। क्योंकि प्राणियों को पीड़ा देने अथवा अपघात करने वाली वाणी को सत्य समान कल्याणकारी न कहकर पाप कहा है। इस विषय में यह जानना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति सत्य वाणी को कहता हुआ, सभी धार्मिक और अधार्मिक पुरुषों को प्रसन्न नहीं कर सकता; परन्तु इस में मूल भावना यह है कि वह सत्य वाणी प्राणियों की उपकारक हो, नाकि अपघात करने वाली। अतः अधार्मिक व्यक्ति उस सत्य वाणी से वर्त्तमान में चाहे पीड़ा का अनुभव करे, परन्तु परिणाम में उसका उपकार ही होगा। अतः सत्य वक्ता पुरुष राग, द्वेषादि से रहित होकर सत्य का ही उपदेश करे, उसके हृदय में सभी प्राणियों के कल्याण की ही कामना हो, उनके विनाश अथवा अपकार की नहीं। इसी भावना को महाभारत में इस प्रकार कहा है — यद्भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यम्॥ महाभारत शान्तिपर्व॥ अर्थात् जिससे प्राणियों का अत्यधिक हित होता है, वही सत्य का परिणाम है।

वेद में सत्यव्रत का निर्देश है —

ओ३म् अग्ने॑ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑राध्यताम्।

इ॒दम॒हमनृ॑तात् स॒त्यमुपै॑मि॥ यजु॰ १.५॥

अर्थात् हे (व्रतपते) सत्यभाषण आदि धर्मों के पालन करने और (अग्ने) सत्य का उपदेश करने वाले परमेश्वर! मैं (अनृतात्) जो झूठ से अलग (सत्यम्) वेदविद्या, प्रत्यक्षादि प्रमाण, सृष्टिक्रम, विद्वानों का संग, श्रेष्ठ विचार तथा आत्मा की शुद्धि आदि प्रकारों से जो निर्भ्रम, सर्वहित, तत्त्व अर्थात् सिद्धान्त के प्रकाश करने हारों से सिद्ध हुआ, अच्छी प्रकार से परीक्षा किया गया (व्रतम्) सत्य बोलना, सत्य मानना और सत्य करना है उसका (उपैमि) अनुष्ठान अर्थात् नियम से ग्रहण करने वा जानने और उसकी प्राप्ति की इच्छा करता हूँ। (मे) मेरे (तत्) उस सत्यव्रत को आप (राध्यताम्) अच्छी प्रकार सिद्ध कीजिए जिससे कि (अहम्) मैं उक्त सत्यव्रत के नियम करने का (शकेयम्) समर्थ होऊँ और मैं (इदम्) इसी प्रत्यक्ष सत्यव्रत के आचरण का नियम (चरिष्यामि) करुँगा॥ (महर्षि दयानन्द सरस्वती)

इसी प्रकार महर्षि दयानन्द अन्य मन्त्रों के भावार्थ में भी कहते हैं —

— हे मनुष्यों! तुम लोग सत्य धर्म के धारण से अनुपम सुख को प्राप्त करो। (ऋ० ५.५१.२)

— जो संयमी विद्वान् जन प्रेमपूर्वक सत्यभाषणादि रूप धर्मकर्म के साथ परमेश्वर की उपासना करते हैं, वे सुख सम्पन्न बनते हैं। (ऋ० ३.६२.१२)

— जो मनुष्य धर्म के सत्यभाषण आदि व्रतों अथवा कर्मों को करते हैं, वे सूर्य के समान सत्य से प्रकाशित होते हैं। (ऋ० ४.६३.७)

— मनुष्यों को सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करके तथा अपने पुरुषार्थ से बल और ऐश्वर्य प्राप्त करके अपने अन्तःकरण और अपनी इन्द्रियों को सत्यकर्म में प्रवृत्त करना चाहिए। (ऋ० १.१३९.२)

और यदि सत्य का पालन न किया जाये तो भयंकर हानि होती है — “जिस पुरुष ने जिसके सामने एक बार चोरी, जारी, मिथ्याभाषणादि कर्म किया, उसकी प्रतिष्ठा उसके सामने मृत्यु-पर्यन्त नहीं होती। जैसी हानि प्रतिज्ञा मिथ्या करने वाले की होती है, वैसी अन्य किसी की नहीं। ......... इसलिए सदा सत्यभाषण और सत्यप्रतिज्ञायुक्त सबको होना चाहिए॥” (स० प्र० द्वितीय०)

अतः जो वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों के अनुकूल, सृष्टिक्रम के अनुसार, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से प्रमाणित, आत्मानुकूल व्यवहार, आप्त विद्वानों के संग के अनुकूल हो वही सत्य कहाता इससे भिन्न नहीं; और इसी सत्य का मन, वाणी और शरीर से पालन करना, योगपथ के साधक के लिए परमावश्यक है। इस प्रकार का सत्याचरण ही साधक के अहिंसा व्रत के पालन को शुद्धि और निर्दोष करता है।

३. अस्तेय — किसी अन्य पुरुष के पदार्थ का उसकी आज्ञा के बिना ग्रहण करना, स्तेय = चोरी कहलाती है। उस चोरी का मन, वाणी और शरीर से त्याग करना अस्तेय कहाता है। स्तेय = चोरी दूसरों के साथ द्वेष के बिना नहीं हो सकती और इससे दूसरों को पीड़ा रूपी क्लेश की प्राप्ति होती है, जिसे हिंसा कहा गया है। अतः अस्तेय का परिपालन भी अहिंसा के परिपालन हेतु अनिवार्य है। साधक को अपने मन में किसी दूसरे के पदार्थ को ग्रहण करने की भी अभिलाषा = कामना नहीं करनी चाहिए। जो इस प्रकार की कामना मन में ही न होगी, तो वाणी या शरीर द्वारा उसका होना सम्भव ही नहीं हो पायेगा। यजुर्वेद में दूसरे प्राणियों के पदार्थ की अभिलाषा का निषेध इस प्रकार से किया है — “मा गृधः कस्य स्विद्धनम्” ॥ यजु॰ ४०.१॥ अर्थात् किसी के धन का लालच = लोभ न करे। चोरी करने से व्यक्ति, पाप से ग्रस्त हुआ, ईश्वर की व्यवस्था में दुःखों को ही पाता है।

४. ब्रह्मचर्य — ब्रह्मचर्य के पालन हेतु महर्षि व्यास ने उपस्थ इन्द्रिय के संयम को कहा है, और इसमें कई रहस्य सन्निहित हैं। इस सूत्र पर महर्षि दयानन्द संस्कारविधि में लिखते हैं — “सदा जितेन्द्रिय = अष्टविध मैथुन का त्याग करके वीर्य की रक्षा और उन्नति करके चिरञ्जीवी होकर सदा सब का उपकार करता रहे।”

पुरुष के मन में काम वासना का विचारमात्र ही, उसके ब्रह्मचर्य व्रत का नाश करने हेतु पर्याप्त है। उसके लिए अन्य विषयों की उपस्थिति की आवश्यकता ही नहीं है। अतः शास्त्रकारों ने अष्टविध मैथुन से अलग रहने को कहा है। यथा “दर्शन, स्पर्शन, एकान्तसेवन, भाषण, विषयकथा, परस्पर क्रीड़ा, विषय का ध्यान और संग इन आठ प्रकार के मैथुनों से अलग रहे।” (सत्यार्थप्रकाश तृतीयसमुल्लास)। उपर्युक्त वर्णन किसी प्राचीन दक्षस्मृति में इस प्रकार से उपलब्ध होता है—

ब्रह्मचर्यं सदा रक्षेदष्टधा मैथुनं पृथक्। स्मरणं कीर्त्तनं केलिः प्रेक्षणं गुह्यभाषणम्॥

सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च क्रियानिष्पत्तिरेव च। एतन्मैथुनष्टाङ्गं प्रवदन्ति मनीषिणः॥ दक्षस्मृति ७.३१-३२॥

अर्थात् ब्रह्मचर्य की रक्षा सदा करे, आठ प्रकार के मैथुनों से पृथक् रहे। स्त्री का स्मरण, उसकी चर्चा करना, उसके साथ क्रीड़ा, उसे देखते रहना, उसके साथ गुप्त भाषण, उसके साथ संभोग का संकल्प = विचार करना, संभोग के हेतु प्रयास करना तथा उसे निष्पन्न करना — विद्वानों ने ये आठ प्रकार के मैथुन कहे हैं।

उपर्युक्त प्रकार के दोषों से ब्रह्मचर्य का नाश होता और व्यभिचार से दूसरे के प्रति हिंसा तथा स्वयं के शरीर का भी नाश होता तथा पुरुष बलहीन होता है। बलहीन व्यक्ति को आत्मा, परमात्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती।

अतः ब्रह्मचर्य पालन हेतु साधक को नित्यप्रति आत्मनिरीक्षण कर, दोषों का परिहार कर, सद्गुण, सत्कर्म तथा सत्स्वभाव का धारण करना; तामसिक, बुद्धि नाशक भोजन का परित्याग कर सात्त्विक भोजन करना; दुष्ट एवं अधर्मी लोगों के संग का त्याग करना; वेदादि सत्यशास्त्रों का अध्ययन करना; प्राणायाम द्वारा मन, इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना; कामवासना को बढ़ाने वाले विषयों, पदार्थों और विचारों से पृथक् रहना; सादा जीवन व्यतीत करना; अष्टविध मैथुन का सर्वथा परित्याग करना; आदि उपाय हैं। इसी ब्रह्मचर्य सेवन से साधक दीर्घायु को प्राप्त करता और इसप्रकार से रक्षित वीर्य परम सूक्ष्म ब्रह्मविद्या प्राप्ति में इन्धनवत् कार्य करता है।

५. अपरिग्रह — विषय भोगों में अर्जन, रक्षण, क्षय, सङ्ग, हिंसा आदि दोषों को देखकर उनको ग्रहण न करना अपरिग्रह कहाता है। संसार में भोगों की प्राप्ति हेतु व्यक्ति सामान्यतः विभिन्न पदार्थों का संग्रह करता है। परन्तु इन भोगसाधनों का भोग भी पुरुष के लिए अधिकतम इस शरीर के रहते ही सम्भव है। इस शरीर से वियोग के पश्चात् अथवा विभिन्न रोगादि के कारण भी इस जीवन-काल में भी, ये भोग-साधन संग्रह करने वाले व्यक्ति के लिए, किसी प्रकार से उपयोगी नहीं रहते। परिग्रह वृत्ति के कारण पुरुष विभिन्न प्रकार से रागज, द्वेषज, मोहजन्य, और हिंसाजन्य कर्माशय को संग्रहीत करता है। इनका विस्तार से वर्णन योगसूत्र २.१५ की व्याख्या में किया गया है। इन भोगसाधनों के संग्रह में रागज, द्वेषज, मोहज और हिंसज कर्माशय भी किसी न किसी प्रकार से बनता ही है। महर्षि व्यास ने परिग्रह वृत्ति के निम्न दोष कहे हैं —

अ. अर्जन दोष — अनित्य संसारी भोग्य पदार्थों को अर्जित करने हेतु पुरुष को कई बार धर्म-पालन का भी त्याग करते हुए, घोर परिश्रम = पुरुषार्थ करना पड़ता है। इस प्रकार भोगसाधनों का संचय एवं संग्रह कष्टसाध्य है।

आ. रक्षण दोष — उपर्युक्त प्रकार से अर्जित भोगसाधनों की रक्षा करने में पुरुष को अत्याधिक श्रम करना होता है। व्यक्ति इन साधनों की रक्षा हेतु धर्म-अधर्म का पालन करता, उचित-अनुचित तरीकों को अपनाता हुआ बहुधा अधर्म का ही संचय करता है।

इ. सङ्ग दोष — अनित्य, प्रकृति जन्य भोगसाधनों को भोगते हुए पुरुष इन विषयों के प्रति तृष्णा की वृद्धि करता, उन भोगसाधनों के प्रति राग रखता हुआ उन्हें और अधिक प्राप्त करने और भोगने की कामना करता हुआ, इनकी वासनाओं को ही सुदृढ़ करता है।

ई. क्षय दोष — उपर्युक्त प्रकार से अर्जित और रक्षित भोग्य पदार्थ, अनित्य होने से, समय पाकर नष्ट होते अथवा दूसरों के कृत्यों के कारण भोग हेतु उपलब्ध नही रह पाते; जिससे पुरुष दुःख का अनुभव करता है।

उ. हिंसा दोष — विभिन्न प्रकार के भोग्य पदार्थों = साधनों की प्राप्ति में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कई प्रकार की हिंसा होती है। महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.१५ में स्पष्ट ही कहा है कि — नानुपहत्य भूतान्युपभोगः संभवतीति। (योग० २.१५) अर्थात् भतों = प्राणियों को पीड़ा दिए बिना सुख का उपभोग सम्भव नहीं होता।

अतः साधक को, इन दोषों को देखते हुए यथासम्भव लौकिक भोग प्रदान करने वाले साधनों की प्राप्ति से ही दूर रहना चाहिए। सामान्य जीवन के अत्यावश्यक उपभोग के साधनों को छोड़, अन्य भोगप्रधान साधनों का परित्याग करना ही उचित है। योगी इन भोग्य पदार्थों = साधनों से दूर रहता हुआ अभिमान आदि दोषों से भी बच जाता है। अतः अपरिग्रह का पालन भी अहिंसा के शुद्ध रूप से पालन हेतु आवश्यक है।

अपरिग्रह के पालन को भोगसाधनों तक ही सीमित नहीं जानना चाहिए वरन् योगी को अपने लक्ष्य से भिन्न विषयों का ज्ञान प्राप्त करने से भी पृथक् रहना चाहिए। क्योंकि इस प्रकार से अन्य विषयों में उलझ कर योगी का मोक्षप्राप्ति रूप मुख्य लक्ष्य ही गौण हो जाता है; तथा गौण और अनावश्यक विषय दैनिक जीवन में प्रधान बन जाते हैं और व्यक्ति के कर्म उसी प्रकार से होने लगते हैं। बुद्धि में इन अनावश्यक विषयों के चिन्तन से साधक के समय का भी दुरूपयोग होता है। चित्त में इस प्रकार की अपरिग्रह की अवस्था आने पर, वाणी तथा शरीर से भी उपर्युक्त परिग्रह वृत्ति विषयक कार्यों का निषेध सम्भव हो जाता है। इसी प्रकार विषयों, भोगसाधनों के संचय हेतु वाणी का प्रयोग न करना वाचिक अपरिग्रह है। सब प्रकार से वाणी का संयम करना भी अपरिग्रह पालन हेतु आवश्यक है।

साधक के लिए यमों का परिपालन सामाजिक व्यवहार की परिशुद्धि के लिए परमावश्यक है। क्योंकि अहिंसा आदि यमों का सम्बन्ध स्वयं की अपेक्षा दूसरों के प्रति अधिक है; हिंसा, असत्य, स्तेय आदि से अन्य प्राणियों को पीड़ा, दुःख आदि की प्राप्ति होती है। अतः साधक को सर्वप्रथम अन्य प्राणियों के प्रति होने वाले दोषों को दूर करने का विधान है। इन दोषों के निवारण से आन्तरिक शुद्धि भी स्वतः ही होती है।