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Saadhana Paada / Means / 31
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Saadhana Paada / Means / 31

जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥३१॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 31

In Hindi:

पदपाठ : जातिः देशः कालः समयः अनवच्छिन्नाः सार्वभौमाः महाव्रतम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : ते तु—

हिंदी में अर्थ : (ते) वे पाँचो यम (तु) तो —

हिंदी में अर्थ : (जातिः) मनुष्य, पशु, पक्षी आदि जाति, (देशः) स्थान विशेष (कालः) पर्व, अमावस्यादि काल विशेष (समयः) नियम = परम्परा विशेष (अनवच्छिन्नाः) की सीमाओं से न बँधे हुए (सार्वभौमाः) सभी अवस्थाओं में पालन करने योग्य (महाव्रतम्) महाव्रत हैं॥

व्यास भाष्य : तत्राऽहिंसा जात्यवच्छिन्ना मत्स्यबन्धकस्य मत्स्येष्वेव नान्यत्र हिंसा। सैव देशावच्छिन्ना न तीर्थे हनिष्यामीति। सैव कालावच्छिन्ना न चतुर्दश्यां न पुण्येऽहनि हनिष्यामीति। सैव त्रिभिरुपरतस्य समयावच्छिन्ना देवब्राह्मणार्थे नान्यथा हनिष्यामीति। यथा च क्षत्रियाणां युद्ध एव हिंसा नान्यत्रेति। एभिर्जातिदेशकालसमयैरनवच्छिन्ना अहिंसादयः सर्वथैव परिपालनीयाः। सर्वभूमिषु सर्वविषयेषु सर्वथैवाविदितव्यभिचाराः सार्वभौमा महाव्रतमित्युच्यन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन जाति आदि चार सीमाओं में बंधे यमों में से (जात्यवच्छिन्ना अहिंसा) जाति की सीमा से बँधी हुई अहिंसा यह है — (मत्स्यबन्धकस्य) मछली पकड़ने वाले मछुवे की, (मत्स्येषु एव) मछलियों को मारने में ही (हिंसा) हिंसा होती है, (न अन्यत्र) अन्य प्राणियों = जीवों की नहीं। (सा एव) वही अहिंसा (देशावच्छिन्ना) देश = स्थान विशेष से बँधी हुई इस प्रकार है — (न तीर्थे हनिष्यामि इति) तीर्थ = पुण्य कार्य वाले स्थानों यथा गुरुकुल आदि में नहीं मारुँगा। (सा एव) वही अहिंसा (कालावच्छिन्ना) कालविशेष की सीमा में बँधी हुई इस प्रकार है — (न चतुर्दश्याम्) न चतुर्दशी के दिन, और (न पुण्ये अहनि) न किसी अन्य पवित्र दिन में (हनिष्यामि इति) जीवों को मारुँगा। (सा एव) वही अहिंसा (त्रिभिः उपरतस्य) जाति, देश और काल की सीमाओं से रहित व्यक्ति की अहिंसा भी (समयावच्छिन्ना) किसी नियम = शिष्ट परम्परा से बँधी हुई इस प्रकार भी हो सकती है — (देवब्राह्मणार्थे) देव = माता, पिता और आचार्य अथवा ब्राह्मण = वेदादि सत्यशास्त्रों के विद्वानों अथवा ब्रह्मज्ञान वाले विद्वानों के लिए (हनिष्यामि) मारुँगा (न अन्यथा इति) अन्य किसी प्रयोजन के लिए नहीं मारुँगा। इसमें दूसरा उदाहरण दिया है — (यथा च) और जैसे (क्षत्रियाणाम्) क्षत्रियों को (युद्धे एव हिंसा) युद्ध में ही हिंसा उचित होती है (न अन्यत्र इति) युद्ध से अन्य स्थलों में नहीं।

(एभिः जातिदेशकालसमयैः) इन जाति, देश, काल और समयों की (अनवच्छिन्ना) सीमाओं से रहित (अहिंसादयः) अहिंसादि यमों का (सर्वथा एव) सब प्रकार से (परिपालनीयाः) परिपालन करना चाहिए। (सर्वभूमिषु) सभी अवस्थाओं में (सर्वविषयेषु) सभी प्रकार के विषयों = कार्यों में (सर्वथा एव) सब प्रकार से ही, (अविदितव्यभिचाराः) जिसका किसी प्रकार से व्यभिचार नहीं देखा गया, ऐसे अहिंसादि यम (सार्वभौमाः) सार्वभौम = सर्वत्र प्रसिद्ध (महाव्रतम् इति) महाव्रत (उच्यन्ते) कहे जाते हैं।

वैदिक योग मीमांसा : आत्मकल्याण के पथ पर चलने वाले सभी साधकों को अहिंसा आदि पाँच यमों के पालन से आरम्भ करना होता है। ये पाँचों यम उसके लिए पालन करने योग्य व्रत हैं। परन्तु जब ये अहिंसा आदि यम किसी भी प्रकार के अपवाद के बिना पालन किए जाते हैं तो ये महाव्रत कहलाते हैं। व्यक्ति अपनी सुविधा अथवा परिस्थितियों के अनुसार विभिन्न प्रकार के अपवादों को बनाकर इन अहिंसा आदि यमों की विरोधी भावनाओं अर्थात् हिंसा आदि वितर्कों को अपना कर भी, अपने आप को अहिंसा आदि यमों का पालन करने वाला मानता है। परन्तु योगपथ पर चलने वाले साधक के लिए, किसी भी प्रकार का कोई भी अपवाद, अहिंसा आदि यमों के पालन में लागू नहीं होता। महर्षि पतञ्जलि कहते हैं कि जाति, देश, काल और समय की सीमा = अपवादों से रहित पालन किए जाते हुए ही यम महाव्रत कहलाते हैं। इन अपवादों को निम्न प्रकार से जानना चाहिए —

अहिंसा में जाति की सीमा — जैसे कि मछुआरा कहे कि मैं तो केवल मछली को ही मारूँगा, अन्य किसी जीव को नहीं मारूँगा। यह तो मेरा व्यवसाय है और इस प्रकार मैं अन्य जीवों की हिंसा न करने से अहिंसा का पालन करता हूँ।

अहिंसा में देश की सीमा — जैसे कोई कहे कि यज्ञशाला, गुरुकुल, तथा अन्य धार्मिक = पवित्र कार्यों के होने वाले स्थलों पर किसी की हिंसा नहीं करूँगा, अन्य स्थलों में अपनी सुविधा अनुसार करूँगा।

अहिंसा में काल की सीमा — जैसे कोई कहे कि मैं चतुर्दशी, एकादशी आदि तिथियों में हिंसा नहीं करूँगा, अन्य दिनों में अपनी सुविधानुसार रहँूगा। यथा वर्त्तमान काल में लोगों द्वारा मंगलवार अथवा नवरात्रों आदि में मांसभक्षण न करना और शेष दिनों में करना, काल की सीमा है।

अहिंसा में समय = नियम की सीमा — जैसे कोई कहे कि देव = माता, पिता, आचार्य तथा ब्राह्मण = ब्रह्मविद्या के विद्वान् आदि के प्रयोजन के लिए अथवा यज्ञ आदि कार्यों के लिए हिंसा करूँगा, अन्य किसी प्रयोजन के लिए नहीं करूँगा। यह अहिंसा पालन में समय = नियम का अपवाद है। इससे यह अनार्ष मान्यता भी खण्डित हो जाती है कि ‘वैदकी हिंसा हिंसा न भवति’।

इसी प्रकार सत्य आदि अन्य यमों के पालन में भी समझना चाहिए —

सत्यादि यमों में जाति की सीमा — जैसे किसी गाय आदि पशु, ब्राह्मण आदि की जीवन रक्षा असत्य से हो सकती हो तो असत्य भाषण करुँगा, अन्य प्रयोजन के लिए न बोलूँगा। ब्राह्मण = विद्वान् के पदार्थों की चोरी न करूँगा, अन्य की करूँगा। ब्राह्मण वर्णस्थ स्त्रियों के प्रति अष्टविध मैथुन का निषेध करूँगा, अन्यों से कामचार रहेगा। देव, ब्राह्मण अथवा गाय आदि पशुओं के लिए परिग्रह करूँगा अथवा ब्राह्मण आदि के द्रव्य का परिग्रह न करूँगा, अन्य के लिए कामचार है।

सत्यादि यमों में देश की सीमा — जैसे गुरुकुल, यज्ञ स्थान आदि में सत्य का पालन करूँगा, अन्य स्थानों में सुविधानुसार असत्य भी बोलूँगा। गुरुकुल, यज्ञ स्थान आदि में चोरी नहीं करूँगा, अन्य स्थानों में अपने लाभ को देखते हुए चोरी भी करूँगा। गुरुकुल, यज्ञ स्थान आदि में ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा, अन्य स्थानों में व्यभिचार भी करूँगा। गुरुकुल, यज्ञ स्थान आदि में परिग्रह का त्याग करूँगा, अन्य स्थानों में परिग्रह करूँगा।

सत्यादि यमों में काल की सीमा — जैसे चतुर्दशी आदि तिथियों में सत्य का पालन करूँगा, अन्य तिथियों में सुविधानुसार असत्य भी बोलूँगा। चतुर्दशी आदि तिथियों में चोरी नहीं करूँगा, अन्य तिथियों में अपने लाभ को देखते हुए चोरी भी करूँगा। चतुर्दशी आदि तिथियों में ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा, अन्य तिथियों में व्यभिचार भी करूँगा। चतुर्दशी आदि तिथियों में परिग्रह का त्याग करूँगा, अन्य तिथियों में परिग्रह करूँगा।

सत्यादि यमों में समय = नियम की सीमा — जैसे देव, ब्राह्मणों के हितार्थ असत्य भी बोलूँगा अथवा उपासना काल में सत्य का पालन करूँगा, अन्यत्र स्वेच्छानुसार करूँगा। देव, ब्राह्मणों के हितार्थ चोरी भी करूँगा अथवा उपासना काल में अस्तेय का पालन करूँगा, अन्यत्र स्वेच्छानुसार करूँगा। विद्याप्राप्ति के काल तक, देव, ब्राह्मणों के समक्ष ब्रह्मयर्च और उपासना काल में ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा, अन्यत्र स्वेच्छानुसार करूँगा। इसी प्रकार ग्रहस्थ आश्रम में अथवा देव, ब्राह्मण आदि के हितार्थ परिग्रह करूँगा, अन्य आश्रमों में अपरिग्रह का पालन करूँगा। इत्यादि

उपर्युक्त प्रकार से किसी भी सीमा से बँधे हुए, अपवाद-रूप से पालन किए जाने वाले अहिंसा आदि यम महाव्रत की श्रेणी में नहीं आते। अतः यमों के पालन में किसी भी प्रकार के अपवाद को मानकर, किसी प्रकार से, किसी भी काल में, किसी भी स्थान पर, किसी भी व्यक्तिगत नियम में बँधकर, इन यमों = व्रतों का परित्याग करना किसी भी साधक के लिए, किसी भी प्रकार से, उचित नहीं है। ऐसा करने से यमों का सार्वभौम रूप से परिपालन नहीं हो सकता और न ही साधक अविद्यादि क्लेशों को क्षीण करने में सर्वथा समर्थ हो सकेगा। क्योंकि इन यमों के पूर्णरूपेण परिपालन से ही अहिंसा का सर्वभावेन, सर्वरूपेण परिपालन होने पर साधक के चित्त में हिंसा के भावों का सर्वथा और सर्वदा के लिए अन्त सम्भव होता है, जिसके फलस्वरूप अविद्या के स्थूल रूपों राग और द्वेष का निराकरण भी सम्भव हो सकता है।