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Saadhana Paada / Means / 32
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Saadhana Paada / Means / 32

शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥३२॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 32

In Hindi:

पदपाठ : शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥

हिंदी में अर्थ : (शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि) शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान (नियमाः) ये पाँच नियम हैं॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : पहिला (शौच) अर्थात् पवित्रता करनी, सो भी दो प्रकार की है। एक भीतरी और दूसरी बाहर की। भीतर की शुद्धि धर्माचरण, सत्यभाषण, विद्याभ्यास, सत्संग आदि शुभगुणों के आचरण से होती है और बाहर की पवित्रता जल आदि से शरीर, स्थान, मार्ग, वस्त्र, खाना, पीना आदि शुद्ध करने से होती है। दूसरा (सन्तोष) जो सर्वदा धर्मानुष्ठान से अत्यन्त पुरुषार्थ करके प्रसन्न रहना और दुःख में शोकातुर न होना। किन्तु आलस्य का नाम सन्तोष नहीं है। तीसरा (तपः) जैसे — सोने को अग्नि में तपाके निर्मल कर देते हैं। वैसे ही आत्मा और मन को धर्माचरण और शुभकर्मों के आचरण रूप तप निर्मल कर देना। चौथा (स्वाध्याय) अर्थात् मोक्षविद्या-विधायक वेद शास्त्र का पढ़ना-पढ़ाना और ओंकार के विचार से ईश्वर का निश्चय करना-कराना और पाँचवाँ (ईश्वर- प्रणिधानम्) अर्थात् सब सामर्थ्य, सब गुण, प्राण, आत्मा और मन के प्रेमभाव से आत्मादि सत्य द्रव्यों का ईश्वर के लिए समर्पण करना। ये पांच नियम भी उपासना का दूसरा अंग हैं। (ऋ० भू॰ उपासना)

(शौच) अर्थात् स्नानादि से पवित्रता (सन्तोष) सम्यक् प्रसन्न होकर निरुद्यम रहना सन्तोष नहीं, किन्तु पुरुषार्थ जितना हो सके उतना करना, हानि-लाभ में हर्ष वा शोक न करना (तप) अर्थात् कष्ट सेवन से भी धर्मयुक्त कर्मों का अनुष्ठान, (स्वाध्याय) पढ़ना-पढ़ाना (ईश्वर-प्रणिधान) ईश्वर की भक्ति विशेष में आत्मा को अर्पित रखना, ये पांच नियम कहाते हैं। यमों के बिना केवल इन नियमों का सेवन न करे, किन्तु इन दोनों का सेवन किया करे। जो यमों का सेवन छोड़कर केवल नियमों का सेवन करता है, वह उन्नति को प्राप्त नहीं होता, किन्तु अधोगति अर्थात् संसार में गिरा रहता है। (स० प्र० तृतीय समुल्लास)

और इनके साथ ५ पाँच नियम अर्थात् (शौच) बाहर-भीतर से पवित्र रहना (सन्तोष) पुरुषार्थ करते जाना और लाभ-हानि में प्रसन्न और अप्रसन्न न होना (तपः) सदा पक्षपात रहित न्यायरूप धर्म का सेवन, प्राणायामादि योगाभ्यास करना (स्वाध्याय) सदा प्रणव का जप अर्थात् मन में चिन्तन और उसके अर्थ ईश्वर का विचार करते रहना (ईश्वरप्रणिधान) अर्थात् अपने आत्मा को वेदोक्त परमेश्वर की आज्ञा में समर्पित करके परमानन्द परमेश्वर के सुख को जीते हुए भोगकर, शरीर छोड़के सर्वानन्दयुक्त मोक्ष को प्राप्त होना संन्यासियों के मुुख्य कर्म हैं॥ (सं॰ वि॰ संन्यास०)

व्यास भाष्य : तत्र शौचं मृज्जलादिजनितं मेध्याभ्यवहरणादि च बाह्यम्। आभ्यन्तरं चित्तमलानामाक्षालनम्। सन्तोषः सन्निहितसाधनादधिकस्यानुपादित्सा। तपो द्वन्द्वसहनम्। द्वन्द्वश्च जिघत्सापिपासे शीतोष्णे स्थानासने काष्ठमौनाकारमौने च। व्रतानि चैषां यथायोगं कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तपनादीनि। स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणाम- ध्ययनं प्रणवजपो वा। ईश्वरप्रणिधानं तस्मिन्परमगुरौ सर्वकर्मार्पणम्।

शय्याऽऽसनस्थोऽथ पथि व्रजन्वा, स्वस्थः परिक्षीणवितर्कजालः।

संसारबीजक्षयमीक्षमाणः, स्यान्नित्यमुक्तोऽमृतभोगभागी॥

यत्रेदमुक्तम्—ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च (यो. सू. १।२९) इति॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन पाँच नियमों में से (शौचम्) शौच दो प्रकार का है — (मृज्जलादिजनितम्) मिट्टी जल आदि के संयोग से उत्पन्न होने वाला (च) और (मेध्याभ्यवहरणादि) मेध्य = पवित्र पदार्थों के खाने से (बाह्यम्) बाह्य शौच = पवित्रता होती है। और (चित्तमलानाम्) चित्त के अविद्यादि दोषों से उत्पन्न राग-द्वेष आदि मलों को (आक्षालनम्) यथार्थ ज्ञान और क्रियायोग से धोना = दूर करना (आभ्यन्तरम्) आभ्यन्तर शौच = पवित्रता है।

(सन्निहितसाधनाद्) अपने निकट विद्यमान = उपलब्ध जीवन निर्वाह के साधनों से (अधिकस्य) अधिक साधनों के (अनुपादित्सा) ग्रहण करने की इच्छा का अभाव होना (सन्तोषः) सन्तोष है।

(द्वन्द्वसहनम्) द्वन्द्वों का सहन करना (तपः) तप है। (च) और (जिघत्सापिपासे) भूख-प्यास, (शीतोष्णे) सर्दी-गर्मी, (स्थानासने) खड़ा होना - बैठे रहना, (च) और (काष्ठमौनाकारमौने) काष्ठमौन = इशारे = संकेत से भी अपने भाव को प्रकट न करना; आकारमौन = वाणी से न बोलना, परन्तु इशारे = संकेत से अपने भावों को प्रकट करना (द्वन्द्वम्) द्वन्द्व को सहन करना तप कहलाता है। (च) और (एषाम्) इन द्वन्द्वों से अतिरिक्त (यथायोगम्) शरीर की क्षमता, अनुकूलता के अनुसार, (कृच्छ्रचान्द्रायणसान्तापनादीनि) कृच्छ, चान्द्रायण तथा सान्तापन आदि (व्रतानि) व्रतों का अनुष्ठान करना भी तप कहलाता है।

(मोक्षशास्त्राणाम्) मोक्ष का उपदेश करने वाले वेदादि सत्यशास्त्रों का (अध्ययनम्) अध्ययन = पठन-पाठन करना (वा) और (प्रणवजपः) प्रणव = ओङ्कार का जप करना (स्वाध्यायः) स्वाध्याय है।

(तस्मिन् परमगुरौ) उस परम गुरु परमात्मा में (सर्वकर्मार्पणम्) अपने सभी कर्मों = मानसिक, वाचिक और शरीरिक कर्मों का अर्पण करना (ईश्वरप्रणिधानम्) ईश्वर-प्रणिधान है। (अथ) योगी पुरुष ईश्वरप्रणिधान द्वारा (शय्यासनस्थः) शय्या वा आसन पर स्थित हुआ (वा) और (पथि व्रजन्) मार्ग में चलता हुआ (स्वस्थः) स्वरूप में स्थित = आत्मनिष्ठ हुआ (परिक्षीणवितर्कजालः) समस्त वितर्कों = हिंसा आदि से रहित हुआ, (संसारबीजक्षयम् ईक्षमाणः) संसार के बीज अविद्यादि क्लेशों तथा उसके संस्कारों का नाश करता हुआ (नित्यमुक्तः) नित्यमुक्त और (अमृतभोगभागी) अमृत = आनन्द को प्राप्त करने वाला (स्यात्) होता है। (यत्र) जिसके विषय में (इदम् उक्तम्) सूत्रकार ने भी कहा है — (“ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च” इति) अर्थात् (ततः) उस ईश्वर-प्रणिधान से (प्रत्यक्चेतनाधिगमः) आत्मा के भी आत्मा अन्तर्यामी चेतन परमात्मा की प्राप्ति (अपि) भी आत्म-साक्षात्कार के साथ हो जाती है; (च) और (अन्तराय-अभावः इति) योग के विघ्नों = अन्तरायों का अभाव हो जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : यमों के परिपालन के साथ-साथ नियमों का पालन करना भी साधक के लिए आवश्यक है। जहाँ यमों का सम्बन्ध अन्य प्राणियों के साथ अधिक है वहाँ नियमों का सम्बन्ध स्वयं के साथ है। शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान रूपी पाँच नियम हैं। इनके परिपालन से साधक शरीर की शुद्धि से आरम्भ करता हुआ अन्तःकारण की पूर्ण पवित्रता का प्राप्त करता है। परन्तु यमों के परिपालन के बिना नियमों का परिपालन किसी प्रकार से लाभ नहीं देता। क्योंकि अन्य प्राणियों के प्रति व्यवहार को पवित्र, शुद्ध किए बिना आन्तरिक पवित्रता हो ही नहीं सकती। इसीलिए महर्षि व्यास ने योगसूत्र २.३० के भाष्य में स्पष्ट रूप से कहा है कि “अहिंसा के बाद कहे गए यम और नियम अहिंसा पर ही आश्रित हैं।” अतः अहिंसामूलक होने से नियमों का पालन, अहिंसा के सर्वभावेन परिपालन के लिए आवश्यक है। इस विषय में महर्षि मनु भी यमों को नियमों पर प्राथमिकता देते हैं —

यमान्सेवेत सततं न नित्यं नियमान्बुधः।

यमान्पतत्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन्॥ मनु॰ ४.२०४॥

अर्थात् यमों के सेवन के बिना नियमों का सेवन न करे, किन्तु इन दोनों का ही सेवन किया करे। जो यमों का सेवन छोड़कर केवल नियमों का सेवन करता है, वह उन्नति को प्राप्त नहीं होता, किन्तु अधोगति अर्थात् संसार में गिरा रहता है। (सत्यार्थप्रकाश तृतीय समुल्लास)।

महर्षि मनु द्वारा कहे गए इस नियम में भी यही रहस्य है कि अन्य प्राणियों के प्रति हिंसा करने वाला, वैरभाव रखने वाला, असत्य का आचरण करने वाला, चोरी करने वाला, परस्त्रियों से व्यभिचार, अष्टविध मैथुन करने वाला, परिग्रह करने वाले व्यक्ति के व्यक्तिगत नियम यथा शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान मात्र बाह्य-आडम्बर होने से उसे कोई लाभ नहीं देते। ऐसा व्यक्ति अविद्याग्रस्त रहता हुआ संसारचक्र में ही लगा रहता है।

१. शौच — शौच का अर्थ है पवित्रता। बिना बाह्य और आन्तरिक पवित्रता के कोई भी साधक योगमार्ग पर आगे नहीं चल सकता। बाह्य शरीर की पवित्रता जल आदि तथा मेध्य = पवित्र पदार्थों के खाने पीने से होती है। आन्तरिक मन की पवित्रता का एक मुख्य कारण अन्न भी है। छान्दोग्योपनिषद् में ऋषि कहता है —

एवमेव खलु सोम्यान्नस्याश्यमानस्य योऽणिमा स ऊर्ध्वः समुदीषति तन्मनो भवति॥ ६.६.२॥

अर्थात् इस प्रकार हे सोम्य! मनुष्यों से खाद्यमान अन्न का जो अणुभाग है वह मिलकर ऊपर उठता है, वह मन होता है अर्थात् मन को प्रवद्ध करने वाला होता है। अतः अन्नमयᳬ हि मनः (छान्दो॰ ६.५.४) मन को अन्नमय कहा है।

अतः मन की पवित्रता हेतु भी साधक को मात्र सात्त्विक भोजन का ही ग्रहण करना चाहिए अन्य राजसिक और तामसिक तथा हिंसा से प्राप्त होने वाले अखाद्य मांस, मदिरा आदि पदार्थों का सर्वथा परित्याग करना चाहिए। शरीर की बाह्य और आन्तरिक शुद्धि हेतु जल के महत्त्व को दर्शाते हुए कहा है “आपोऽअस्मान् मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु।” (यजु॰ ४.२) इस मन्त्र के भावार्थ में महर्षि दयानन्द कहते हैं — “मनुष्यों को उचित है कि जो सब सुखों को प्राप्त कराने, प्राणों को धारण कराने तथा माता के समान पालने के हेतु जल हैं उनसे सब प्रकार पवित्र होके, इनको शोधकर मनुष्यों को नित्य सेवन करना चाहिए जिससे सुन्दर वर्ण रोग रहित शरीर को सम्पादन कर निरन्तर प्रयत्न के साथ धर्म का अनुष्ठान कर पुरुषार्थ से आनन्द भोगना चाहिए।”

इसी प्रकार सत्यभाषण से; तथा क्रोधयुक्त, कटु, कठोर, अधर्मयुक्त वाणी का परित्याग कर वाणी की पवित्रता करनी चाहिए। आन्तरिक शौच में मन की पवित्रता का निर्देश है। इसके लिए महर्षि दयानन्द लिखते हैं — “धर्माचरण, सत्यभाषण, विद्याभ्यास, सत्संग आदि साधनों से भीतर की शुद्धि होती है।” उपर्युक्त प्रकार से चित्त के मलों अविद्या, राग, द्वेष आदि क्लेशों तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, अंहकार आदि मनोविकारों को दूर करने से आन्तरिक पवित्रता का सम्पादन होता है।

२. सन्तोष — शरीर से पूर्ण धर्मानुकूल पुरुषार्थ करने के पश्चात्, लाभ-हानि में हर्ष अथवा शोक न करना तथा अधिक की प्राप्ति की लालसा न करना सन्तोष कहाता है। अतः अपने पास विद्यमान = उपलब्ध साधनों से अधिक साधनों को प्राप्त करने की इच्छा का भी अभाव होना, सन्तोष है। परन्तु पुरुषार्थ रहित, निकम्मेपन की स्थिति का नाम सन्तोष नहीं है। साधक को आवश्यकता अनुकूल साधनों की प्राप्ति न होने पर भी — (१) मानसिक सन्तोष का पालन करते हुए चित्त में किसी प्रकार के विकार, अवसाद, अधैर्य अथवा क्रोध को न लाना चाहिए; (२) वाचिक सन्तोष का पालन करते हुए उस स्थिति में वाणी से दूसरों के प्रति प्रकट भी न करना चाहिए; तथा (३) शारीरिक सन्तोष का पालन करते हुए इन साधनों की प्राप्ति हेतु अत्यधिक शारीरिक श्रम को न करना चाहिए अर्थात् जीवन-निर्वाह के साधनों की प्राप्ति रूप गौण लक्ष्य को, आत्मकल्याण रूपी प्रधान लक्ष्य पर प्राथमिकता न देनी चाहिए।

३. तप — द्वन्द्वों का सहन करना तथा कृच्छ, चान्द्रायण आदि व्रतों को यथाशक्ति करना।

४. स्वाध्याय — मोक्ष शास्त्रों का अध्ययन करना तथा ओङ्कार का जप करना।

५. ईश्वर-प्रणिधान — परमगुरु परमात्मा में अपने सभी कर्मों को अर्पण करना।

इन तीनों का विशेष व्याख्यान योगसूत्र २.१ की व्याख्या में कर दिया गया है। पाठक इन्हें वहीं देखें। ईश्वर प्रणिधान पर यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए —

साधक अपने सभी कार्यों को ईश्वर के प्रति अर्पण करता हुआ सर्वकाल में अर्थात् शय्या अथवा आसन पर बैठा हुआ, अथवा मार्ग में चलता हुआ, अपने स्वरूप में स्थित होता हुआ समस्त प्रकार के वितर्कों अर्थात् हिंसा, असत्य, स्तेय = चोरी, व्यभिचार, परिग्रह, अपवित्रता, असन्तोष, अतप, अनाध्याय से रहित होता हुआ अर्थात् यम-नियमों का सर्वथा, सर्वदा पालन करता हुआ, संसार में अपने शरीरधारण = जन्म लेने अर्थात् प्रकृति और उसके (=आत्मा के) संयोग के कारण अविद्या और उसके संस्कारों को नष्ट करता हुआ जीवन मुक्त हुआ, परमपिता परमात्मा के सानिध्य को प्राप्त हुआ शाश्वत् आनन्द = सुख को प्राप्त करने वाला होता है। इसी ईश्वरप्रणिधान से ही योगी परमात्म-साक्षात्कार के साथ-साथ आत्म-साक्षात्कार को भी परमपिता परमात्मा के आश्रय से कर लेता है। अतः जो विद्वान् यह कहते हैं कि ईश्वर का ध्यान, उपासना आदि सर्वकाल में नहीं हो सकती वे भ्रान्ति में हैं, क्योंकि महर्षि व्यास ने शय्या, आसन, मार्ग आदि सभी स्थानों पर ईश्वरप्रणिधान की आवश्यकता को कहा है।

उपर्युक्त सभी नियम भी अहिंसा के पूर्णरूपेण पालन हेतु आवश्यक है। इस विषय में कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं, यथा — शौच हेतु अमेध्य = अभक्ष्य पदार्थों के असेवन से हिंसा का निराकरण होता; सन्तोष से क्रोध, अधैर्य आदि की स्थिति न आने से भी अहिंसा का ही पालन होता; तप से द्वन्द्व सहन तथा विपरीत = विरोधी स्थितियों को सहन करने की क्षमता आने से दूसरों के प्रति अपकारी न होने से अहिंसा का ही परिपालन होता; वेदादि सत्यशास्त्रों के स्वाध्याय से साधक यथार्थता को जानकर हिंसा से सर्वथा दूर रहता; तथा ईश्वरप्रणिधान करने वाले साधक के लिए सर्व कर्मों को ईश्वर के अर्पण का विधान होने से, वह कैसे अन्य प्राणियों के प्रति वैरभाव को रखता हुआ, अपने अशुभ कर्मों को भी ईश्वर के प्रति अर्पित कर पायेगा ?

अतः सभी सत्यादि यमों तथा नियमों का सर्वथा और सर्वदा पालन भी, अहिंसा के परमशुद्ध रूप से परिपालन हेतु आवश्यक है।