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Saadhana Paada / Means / 34
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Saadhana Paada / Means / 34

वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्॥३४॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 34

In Hindi:

पदपाठ : वितर्काः हिंसादयः कृतकारितानुमोदिताः लोभक्रोधमोहपूर्वकाः मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफलाः इति प्रतिपक्षभावनम्॥

हिंदी में अर्थ : (हिंसादयः) हिंसादि यम-नियमों के विरोधी भाव (वितर्काः) वितर्क हैं, वे (कृतकारितानुमोदिताः) कृत = स्वयं किए हुए, कारित = दूसरों से करवाए हुए, और अनुमोदित = समर्थन किए हुए (लोभक्रोधमोहपूर्वकाः) लोभपूर्वक, क्रोधपूर्वक और मोहपूर्वक होते हुए (मृदुमध्याधिमात्रा) मृदु = हल्के, मध्य = मध्य और अधिमात्र = तीव्र भेद वाले, (दुःखाज्ञानानन्तफलाः) दुःख और अज्ञान रूप अनन्त फल को देने वाले होते हैं, (इति) इस प्रकार साधक को (प्रतिपक्षभावनम्) प्रतिपक्ष = वितर्कों की विरोधी भावना करनी चाहिए॥

व्यास भाष्य : तत्र हिंसा तावत्—कृतकारिताऽनुमोदितेति त्रिधा। एकैका पुनस्त्रिधा लोभेन मांसचर्मार्थेन, क्रोधेनापकृतमनेनेति, मोहेन धर्मो मे भविष्यतीति। लोभक्रोधमोहाः पुनस्त्रिविधा मृदुमध्याधिमात्रा इति। एवं सप्तविंशतिर्भेदा भवन्ति हिंसायाः। मृदुमध्याधिमात्राः पुनस्त्रिविधाः — मृदुमृदुर्मध्यमृदुस्तीव्रमृदुरिति। तथा मृदुमध्यो मध्यमध्यस्तीव्रमध्य इति। तथा मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽधिमात्रतीव्र इति। एवमेकाशीतिभेदा हिंसा भवति। सा पुनर्नियमविकल्पसमुच्चयभेदादसंख्येया प्राणभृद्भेदस्यापरिसंख्येयत्वादिति। एवमनृतादिष्वपि योज्यम्।

ते खल्वमी वितर्का दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्। दुःखमज्ञानं चानन्तं फलं येषामिति प्रतिपक्षभावनम्। तथा च हिंसकस्तावत्प्रथमं वध्यस्य वीर्यमाक्षिपति। ततश्च शस्त्रादिनिपातेन दुःखयति। ततो जीवितादपि मोचयति। ततो वीर्याक्षेपादस्य चेतनाचेतनमुपकरणं क्षीणवीर्यं भवति। दुःखोत्पादान्नरकतिर्यक्प्रेतादिषु दुःखमनुभवति। जीवितव्यपरोपणात्प्रतिक्षणं च जीवितात्यये वर्त्तमानो मरणमिच्छन्नपि दुःखविपाकस्य नियतविपाकवेदनीयत्वात् कथञ्चिदेवोच्छ्वसिति। यदि च कथञ्चित्पुण्यावापगता हिंसा भवेत्तत्र सुखप्राप्तौ भवेदल्पायुरिति। एवमनृतादिष्वपि योज्यं यथासम्भवम्। एवं वितर्काणां चामुमेवानुगतं विपाकमनिष्टं भावयन्न वितर्केषु मनः प्रणिदधीत॥

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन सब वितर्कों में (तावत्) प्रथम जो (हिंसा) हिंसा है, वह (कृतकारिताऽनुमोदिता) कृत = व्यक्ति द्वारा स्वयं की हुई, कारित = दूसरों से करवाई हुई, तथा अनुमोदित = दूसरों द्वारा कृत हिंसा का अनुमोदन = समर्थन करना, (इति त्रिधाः) ये तीन प्रकार की हिंसा है। (एका एका पुनः त्रिधा) ये पूर्वोक्त तीन प्रकार की हिंसा प्रत्येक पुनः लोभ, क्रोध और मोह पूर्वक होने से तीन-तीन प्रकार की है। (लोभेन) लोभ के कारण कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा (मांसचर्मार्थेन) अन्य प्राणियों के मांस, चमड़ा अथवा अन्य पदार्थ की प्राप्ति के लिए होती है; (क्रोधेन) क्रोध के कारण कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा इसलिए की जाती है कि (अपकृतम् अनेन इति) इसने मेरा अपकार = अनिष्ट किया है इसिलए मैं भी इसका अपकार करूँगा; (मोहेन) मोह के कारण कृत, कारित और अनुमोदित हिंसा इसलिए की जाती है कि (धर्मो मे भविष्यति इति) इस हिंसा से मुझे धर्म लाभ होगा अथवा परिवार आदि के प्रति मेरा धर्म = कर्त्तव्य पूरा होगा। इस प्रकार ये नौ प्रकार की हिंसा होती है।

(लोभक्रोधमोहाः) ये लोभ, क्रोध और मोह (पुनः) भी पुनः (त्रिविधाः) तीन-तीन प्रकार के होते हैं — (मृदुमध्याधिमात्राः इति) मृदु = हल्के स्तर के, मध्य = मध्यम स्तर के और अधिमात्र = तीव्र स्तर के। (एवम्) इस प्रकार (हिंसायाः) हिंसा के (सप्तविंशतिः भेदाः) २७ सर्त्ताइस भेद (भवन्ति) होते हैं।

(मृदुमध्याधिमात्राः) मृदु, मध्य और अधिमात्र (पुनः) भी पुनः (त्रिविधाः) तीन प्रकार के होते हैं। जैसे (मृदुमृदुर्मध्यमृदुतीव्रमृदुः इति) मृदुमृदु = कुछ हल्के, मध्यमृदुः = मध्य स्तर के हल्के, तथा तीव्रमृदुः = अत्यन्त हल्के, इस प्रकार मृदु के तीन भेद हुए। (तथा) वैसे ही (मृदुमध्यो मध्यमध्यस्तीव्रमध्य इति) मृदुमध्यः = कुछ मध्यम कोटि के, मध्यमध्यः = उससे अधिक मध्यम स्तर के, तथा तीव्रमध्यः = अत्यन्त मध्यम स्तर के, इस प्रकार मध्य के तीन भेद हुए। । (तथा) वैसे ही (मृदुतीव्रो मध्यतीव्रोऽधिमात्रतीव्र इति) मृदुतीव्रः = हल्के प्रबल, मध्यतीव्रः = मध्य स्तर के प्रबल, तथा अधिमात्रतीव्रः = अत्यन्त प्रबल, इस प्रकार तीव्र स्तर के तीन भेद हुए। (एवम्) इस प्रकार (एकाशीतिः) ८१ इक्यासी (भेदाः) भेद वाली (हिंसा) हिंसा (भवति) होती है।

(सा पुनः) यह ८१ भेद वाली हिंसा फिर (नियमविकल्पसमुच्चयभेदात्) नियम, विकल्प और समुच्चय के भेद से (असंख्येया) असंख्य = अगणित भेद वाली होती है। क्योंकि (प्राणभद् भेदस्य) नियम, विकल्प और समुच्चय भेदों को करने वाले प्राणियों के भेद (अपरिसंख्येत्वात् इति) असंख्य होते हैं। (एवम्) इस प्रकार (अनृतादिषु) असत्य आदि वितर्कों में (अपि) भी (योज्यम्) योजना करनी चाहिए।

(ते खलु अमी वितर्काः) वे ये समस्त प्रकार के वितर्क निश्चय से (दुःखाज्ञानानन्तफलाः) दुःख और अज्ञान रूप अनन्त फलों को देने वाले हैं, (इति) इस प्रकार विचार कर (प्रतिपक्षभावनम्) प्रतिपक्ष = वितर्क विरोधी भावना करनी चाहिए। इसको दोहराते हुए कहते हैं — (दुःखम्) दुःख (च) और (अज्ञानम्) अज्ञान रूप (अनन्तम्) अनन्त (फलम्) फल हैं (येषाम्) जिन हिंसादि वितर्कों के (इति) ऐसा जानकर (प्रतिपक्षभावनम्) प्रतिपक्ष भावना करनी चाहिए। अर्थात् हिंसादि वितर्कों के प्रति अहिंसा आदि की भावना करनी चाहिए। (तथा च) तथाहि = क्योंकि (हिंसकः) हिंसा करने वाला (तावत् प्रथमम्) तो सबसे पहले (वध्यस्य) वध्य = जिसका वध करना है, ऐसे प्राणी के (वीर्यम्) वीर्य = उस हिंसक से छूटने के सामर्थ्य = बल को (आक्षिपति) नष्ट = अवरुद्ध करता है। (ततश्च) और उसके पश्चात् (शस्त्रादिनिपातेन) शस्त्रादि से प्रहार के द्वारा उस प्राणी को (दुःखयति) दुःख देता है = अतिशय पीड़ा पहुँचाता है; (ततः) उसके पश्चात् उस प्राणी को (जीवितात्) जीवन से (अपि) भी (मोचयति) वियुक्त कर देता है। (ततः) उस प्राणी के (वीर्याक्षेपात्) वीर्य = बल के नाश करने से (अस्य) इस हिंसा करने वाले पुरुष के (चेतनाचेतनम् उपकरणम्) चेतन = स्त्री, पुत्र आदि तथा अचेतन = धनादि साधन (क्षीणवीर्यम्) सामर्थ्यहीन = निर्बल = निस्तेज (भवति) होते हैं। (दुःखोत्पादात्) प्राणियों को वध आदि के द्वारा अथवा अन्य रूप से अतिशय पीड़ा पहुँचाने से, यह पीड़ा देने वाला पुरुष (नरकतिर्यकप्रेतादिषु) नरक = दुःखदायी योनियों, तिर्यक् = कीट, पतङ्गादि और प्रेतादि = मृत शरीरों में सूक्ष्म कीट आदि के रूप में जन्म लेकर (दुःखम्) दुःखों को (अनुभवति) अनुभव करता = प्राप्त करता है।

(जीवितव्यपरोपणात्) वध्य प्राणी के जीवन को नष्ट करने के परिणामस्वरूप यह हिंसक पुरुष भी (प्रतिक्षणम् जीवितात्यये च वर्त्तमानः) क्षण-क्षण जीवन नाश का प्रयत्न करता हुआ (मरणम् इच्छन् अपि) मरण की इच्छा करता हुआ भी (दुःखविपाकस्य नियतविपाकवेदनीयत्वात्) दुःख रूप फल के नियत होने से (कथञ्चित् एव) किसी प्रकार से (उच्छ्वसिति) साँस भर लेता हुआ जीवित रहता है। (च) और (यदि कथञ्चित्) यदि किसी तरह (हिंसा) वह हिंसा (पुण्यावापगता भवेत्) पुण्य कर्म के साथ मिलकर फल देने वाली हो जाये तो (तत्र सुखप्राप्तौ) तो पुण्यकर्म के कारण सुखप्राप्ति में भी (अल्पायुः भवेत् इति) अल्प आयु वाला होता है। (एवम्) इस प्रकार (अनृतादिषु अपि) असत्य आदि वितर्कों में भी (यथासम्भवम्) यथासम्भव दुःख और अज्ञान के अनन्त फलों की (योज्यम्) योजना कर लेनी चाहिए। (एवम्) इस प्रकार साधक को (वितर्काणाम्) हिंसा आदि वितर्कों के (अनुगतम्) बाद में मिलने वाले (अमुम् एव) दुःख रूप इस (अनिष्टम्) अनन्त दुःख-अज्ञान रूप अप्रिय = अनिष्ट (विपाकम्) फल को (भावयन्) विचारते हुए (वितर्केषु) हिंसादि वितर्कों में (मनः न प्रणिदधीत) मन नहीं लगाना चाहिए॥

वैदिक योग मीमांसा : हिंसा आदि वितर्कों के चित्त में उठने पर साधक के लिए उन वितर्कों की निवृत्ति हेतु प्रतिपक्षभावना करने का विधान किया गया है। इस प्रतिपक्ष भावना को किस प्रकार से करना और जानना चाहिए, इसके बारे में महर्षि पतञ्जलि इस सूत्र में स्पष्ट कर रहे हैं। सर्वप्रथम सूत्र में हिंसा आदि वितर्कों के विभिन्न भेद गिनाए हैं। यहाँ अहिंसा की विरोधी हिंसा के भेदों के साथ-साथ, असत्य आदि कारणों को भी कहा गया है। अन्य वितर्कों के भेदों और कारणों को भी हिंसा के भेदों और कारणों के समान जानना चाहिए। इन हिंसा आदि वितर्कों के विभिन्न रूपों को बताने का एक कारण यह भी है कि सामान्य व्यक्ति केवल स्वयं द्वारा होने वाली = कृत हिंसा के लिए ही अपने को दोषी मानता और अन्य प्रकार से होने वाली हिंसा अर्थात् कारित और अनुमोदित हिंसा, से अपने को असम्बद्ध मानकर वैसी हिंसा को जीवन भर करता रहता है।

हिंसा के प्रथम तीन प्रकार इस प्रकार हैं — कृत = अर्थात् व्यक्ति द्वारा स्वयं की जाने वाली हिंसा; कारित = अर्थात् जिसमें व्यक्ति हिंसा का प्रत्यक्ष रूप से स्वयं तो नहीं करता परन्तु दूसरों को प्रेरणा देकर परोक्ष रूप से करवाता है; और तीसरी अनुमोदित = इसमें व्यक्ति न तो स्वयं हिंसा करता और न ही दूसरों से करवाता परन्तु दूसरों व्यक्तियों द्वारा की गई हिंसा का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से समर्थन करता है। जैसे कि हमारे किसी शत्रु को किसी दूसरे व्यक्ति ने मारा, तो हमने मन में सोचा कि अच्छा हुआ उसको मारा गया क्योंकि वह तो बुरा व्यक्ति था; अथवा हिंसा करने वाले व्यक्ति के पास जाकर उसको वाणी से प्रोत्साहित किया / उसके कार्य का समर्थन किया; अथवा अपने व्यवहार से ही उस हिंसा करने वाले व्यक्ति का समर्थन कर दिया। इसी प्रकार दूसरे व्यक्तियों ने प्राणियों की हिंसा कर उनके चमड़े आदि से उपयोग में आने वाले विभिन्न पदार्थों को बनाया और हमारे द्वारा उन पदार्थों को क्रय करके उनका उपयोग किया जाना भी अनुमोदित हिंसा में आता है।

यह तीन प्रकार की हिंसा भी लोभ, क्रोध और मोह रूपी कारणों से होती है। लोभ पूर्वक हिंसा अन्य प्राणियों के मांस और चमड़े आदि को प्राप्त करने हेतु होती है; क्रोध पूर्वक हिंसा अपने तथा अपने चेतन और अचेतन साधनों के अपकारी व्यक्ति के प्रति अपकार करने हेतु होती है; और मोह पूर्वक हिंसा व्यक्ति यह सोच कर करता है कि इस प्रकार मुझे धर्म का लाभ होगा अथवा मेरे अपने परिवार आदि के प्रति धर्म = कर्त्तव्य का पालन होगा। इस प्रकार से हिंसा ९ प्रकार की हुई। यह ९ नौ प्रकार की हिंसा मृदु, मध्य और अधिमात्र भेद से और इनके भी आगे मृदु, मध्य और अधिमात्र भेद होने से यह हिंसा ८१ इक्यासी प्रकार की होती है।

यह ८१ इक्यासी प्रकार की हिंसा भी नियम, विकल्प और समुच्चय भेद होने से असंख्य प्रकार की कही गयी है। नियम, विकल्प और समुच्चय का भेद निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

नियम — जैसे कोई व्यक्ति कहे कि मैं केवल मछली को ही मारूँगा, अन्य किसी प्राणी को नहीं; क्योंकि यह मेरा व्यवसाय है अथवा मछली खाना हमारे परिवार की परम्परा है अथवा मछली ही हमारे यहाँ का सामान्य भोजन है अथवा मछली खाना मुझे अच्छा लगता है अथवा मछली खाने से मेरा रोग ठीक होता है आदि-आदि, इस नियम का ऐसा कोई भी कारण हो सकता है, अथवा इन कारणों से भी भिन्न कोई कारण हो सकता है।

विकल्प — केवल मछली अथवा बकरी में से किसी एक को मारूँगा, अन्य प्राणियों को नहीं।

समुच्चय — किसी भी उपलब्ध प्राणी को मारूँगा, किसी को भी नहीं छोडूँगा। जैसे कि इस संसार के बहुत से भागों में मनुष्यों द्वारा सर्प, काक्रोच, केचुएँ, शेर, बिल्ली, कुत्ते आदि को भी मारकर खाया जाता हैं।

यहाँ महर्षि व्यास कहते हैं कि नियम, विकल्प और समुच्चय के भेद को करने वाले प्राणियों की संख्या अगणित होने से हिंसा भी असंख्य प्रकार की होती है।

इस हिंसा आदि को किसी भी प्रकार से अपनाने वाले मनुष्य को दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फलों की प्राप्ति होती है। दुःख की प्राप्ति क्यों होती है ? इसमें कारण कहते हुए महर्षि व्यास कहते हैं कि हिंसा करने वाला पुरुष प्रथम जिस प्राणी का वध करना होता है, उसे पकड़ कर चलने-फिरने से असमर्थ करता और फिर चाकू आदि से उस प्राणी पर प्रहार कर उसे पीड़ा पहुँचाता और अन्त में उसे उसके जीवन से भी वियुक्त कर देता है। इस प्रकार हिंसा करने वाले पुरुष द्वारा अन्य प्राणियों को सामर्थ्यहीन करने से उसके अपने चेतन और अचेतन साधन भी सामर्थ्यहीन होते जाते हैं। ऐसा व्यक्ति जीते हुए भी विभिन्न प्रकार के दुःखों को प्राप्त करता और शरीर छूटने के उपरान्त परमात्मा की व्यवस्था में विभिन्न निकृष्ट योनियों में जाकर दुःखों को ही प्राप्त करता है। यदि इस हिंसा का फल उसके किन्हीं प्रधान पुण्य-कर्मों से मिलकर मिलना आरम्भ हो जाये, तो उन पुण्य कर्मों के फलस्वरूप सुखप्राप्ति में भी वह अल्पायु हो जाता है, और शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त होने से, उसको प्राप्त हुए सुख के साधन छिन जाते हैं।

इन हिंसा आदि वितर्कों को जीवन में अपनाने = करने वाला व्यक्ति, यथार्थ ज्ञान से दूर रहने से, अज्ञान से ही ग्रस्त रहता है। इनसे प्राप्त होने वाले दुःख-भोगों से उसके वैसे ही संस्कार बनते और उन संस्कारों से वह फिर वैसे ही कर्मों को करता है; जिसे संस्कार दुःख के रूप में योगसूत्र २.१५ में स्पष्ट किया है। इस प्रकार हिंसादि वितर्क —उससे दुःख प्राप्ति — तदनुकूल संस्कार — उन संस्कारों के प्रभाव से फिर वैसे ही कर्म — उनसे फिर दुःख प्राप्ति — तदनुकूल संस्कार और फिर वैसे ही कर्म; इस प्रकार यह अनन्त चक्र चलता ही रहता है। इस प्रकार इस अनन्त चक्र में फंसा हुआ व्यक्ति, दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फलों को ही प्राप्त करता है। अतः साधक को इस अनवरत चक्र को जानते हुए, इस चक्र को तोड़ने हेतु इन हिंसा आदि वितर्कों के प्रति आरम्भ में ही प्रतिपक्ष भावना कर, इन हिंसा आदि वितर्कों के सभी स्थूल और सूक्ष्म प्रकारों का परित्याग कर देना चाहिए।