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Saadhana Paada / Means / 5
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Saadhana Paada / Means / 5

अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु नित्यशुचिसुखाऽऽत्मख्यातिरविद्या॥५॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 5

In Hindi:

पदपाठ : अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु नित्यशुचिसुखाऽऽत्मख्यातिः अविद्या॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : तत्राविद्यास्वरूपमुच्यते—

हिंदी में अर्थ : (तत्र) उन पाँचों क्लेशों में (अविद्यास्वरूपम्) अविद्या का स्वरूप (उच्यते) कहा जाता है —

हिंदी में अर्थ : (अनित्याऽशुचिदुःखाऽनात्मसु) अनित्य, अशुचि = अपवित्र, दुःख और अनात्म पदार्थों में (नित्यशुचिसुखाऽऽत्मख्यातिः) नित्य, शुचि = पवित्र, सुख और आत्मा का ज्ञान (अविद्या) अविद्या है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “जो अनित्य संसार और देह आदि में नित्य अर्थात् जो कार्य जगत् देखा सुना जाता है, सदा रहेगा, सदा से है और योगबल से यही देवों का शरीर सदा रहता है ऐसी विपरीत बुद्धि का होना अविद्या का प्रथम भाग है। अशुचि अर्थात् मलमय स्त्र्यादि के (शरीर) और मिथ्याभाषण, चोरी आदि अपवित्र में पवित्र बुद्धि दूसरा, अत्यन्त विषयसेवन रूप दुःख में सुखबुद्धि आदि तीसरा, अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या का चौथा भाग है। यह चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहाती है।

इससे विपरीत अर्थात् अनित्य में अनित्य और नित्य में नित्य, अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्र, दुःख में दुःख और सुख में सुख, अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है। अर्थात् ‘वेत्ति यथावत् तत्त्वं पदार्थस्वरूपं यया सा विद्या, यया तत्त्वस्वरूपं न जानाति, भ्रमादन्यस्मिन्नन्यन्निश्चिनोति साऽविद्या’ जिससे पदार्थों का यथार्थस्वरूप बोध होवे, वह विद्या और जिससे तत्त्वस्वरूप न जान पड़े, अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहाती है। ”

(सत्यार्थप्रकाश नवम् समुल्लास)

“अविद्या के लक्षण ये हैं (अनित्या) अनित्य अर्थात् कार्य जो शरीरादि स्थूल पदार्थ तथा लोकलोकान्तर में नित्यबुद्धि तथा जो (नित्य) अर्थात् ईश्वर, जीव, जगत् का कारण, क्रिया, क्रियावान्, गुण-गुणी और धर्म-धर्मी हैं, इन नित्य पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध है, इनमें अनित्य बुद्धि का होना यह अविद्या का प्रथम भाग है। तथा (अशुचि) मलमूत्रादि के समुदाय दुर्गन्ध रूप मल से परिपूर्ण शरीर में पवित्र बुद्धि करना तथा तलाब, बावरी, कुण्ड, कूंआ और नदी आदि में तीर्थ और पाप छुड़ाने की बुद्धि करना और उनका चरणामृत पीना, एकादशी आदि मिथ्या व्रतों में भूख प्यास आदि दुःखों का सहना, स्पर्श-इन्द्रिय के भोग में अत्यन्त प्रीति करना इत्यादि अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना और सत्यविद्या, सत्यभाषण, धर्म, सत्संग, परमेश्वर की उपासना, जितेन्द्रियता, सर्वोपकार करना, सब में प्रेम भाव से वर्त्तना आदि शुद्ध व्यवहार और पदार्थों में अपवित्र बुद्धि करना, यह अविद्या का दूसरा भाग है। तथा दुःख में सुख बुद्धि अर्थात् विषय-तृष्णा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, ईर्ष्या, द्वेष आदि दुःख रूप व्यवहारों से सुख मिलने का आशा करना तथा जितेन्द्रियता, निष्काम, शम, सन्तोष, विवेक, प्रसन्नता, प्रेम, मित्रता आदि सुखरूप व्यवहारों में दुःखबुद्धि करना यह अविद्या का तीसरा भाग है। इसी प्रकार अनात्मा में आत्म बुद्धि अर्थात् जड़ में चेतन भाव और चेतन में जड़ भावना करना अविद्या का चतुर्थ भाग है। यह चार प्रकार की अविद्या संसार के अज्ञानी जीवों को बन्धन का हेतु होकर उनको सदा नचाती रहती है। परन्तु विद्या अर्थात् पूर्वोक्त अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्मा में अनित्य, अशुचि, दुःख और अनात्म बुद्धि होना तथा नित्य, शुचि, सुख और आत्मा में नित्य, शुचि, सुख और आत्म बुद्धि करना यह चार प्रकार की विद्या है। जब विद्या से अविद्या की निवृत्ति होती है, तब बन्धन से छूट के जीव मुक्ति को प्राप्त होता है। ”॥(ऋ० भू॰ मुक्तिविषय)॥

व्यास भाष्य : अनित्ये कार्ये नित्यख्यातिः। तद्यथा-ध्रुवा पृथिवी, ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौः; अमृता दिवौकस इति। तथाऽशुचौ परमबीभत्से काये

स्थानाद् बीजादुपष्टम्भान्निःस्यन्दान्निधनादपि। कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः॥

इत्यशुचौ शरीरे शुचिख्यातिर्दृश्यते। नवेव शशाङ्कलेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते, नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयन्तीवेति कस्य केनाभिसम्बन्धो भवति चैवमशुचौ शुचिविपर्यासप्रत्ययः इति। एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययस्तथैवानर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः।

तथा दुःखे सुखख्यातिं वक्ष्यति — “परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः” (यो. सू. २.१५) इति। तत्र सुखख्यातिरविद्या। तथाऽनात्मन्यात्मख्यातिर्बाह्योपकरणेषु चेतनाचेतनेषु भोगाधिष्ठाने वा शरीरे पुरुषोपकरणे वा मनस्यनात्मन्यात्मख्यातिरिति। तथैतदत्रोक्तम् — “व्यक्तमव्यक्तं वा सत्त्वमात्मत्वेनाभिप्रतीत्य तस्य सम्पदमनुनन्दत्यात्मसम्पदं मन्वानः तस्य व्यापदमनुशोचत्यात्मव्यापदं मन्यमानः स सर्वोऽप्रतिबुद्धः” इति।

एषा चतुष्पदा भवत्यविद्या मूलमस्य क्लेशसन्तानस्य कर्माशयस्य च सविपाकस्येति। तस्याश्चामित्रागोष्पद- वद्वस्तुसतत्त्वं विज्ञेयम्। यथा नामित्रो मित्राभावो न मित्रमात्रं किन्तु तद्विरुद्धः सपत्नः। यथा चागोष्पदं न गोष्पदाभावो न गोष्पदमात्रं, किन्तु देश एव ताभ्यामन्यद्वस्त्वन्तरम्। एवमविद्या न प्रमाणं न प्रमाणाभावः, किन्तु विद्याविपरीतं ज्ञानान्तरमविद्येति॥

हिंदी में अर्थ : (अनित्ये कार्ये) अनित्य अर्थात् कार्य = बने हुए पदार्थों में (नित्यख्यातिः) नित्य पदार्थ का ज्ञान होना अविद्या है। (तद्यथा) वह जैसे कि (पृथिवी) पृथिवी (ध्रुवा) नित्य है; (सचन्द्रतारका) चन्द्र और तारों सहित (द्यौः) द्युलोक (ध्रुवा) नित्य है; और (दिवौकस) देवगण (अमृताः) अमृत अर्थात् नित्य हैं (इति) यह अविद्या का प्रथम प्रकार है।

(तथा) वैसे ही (अशुचौ) अपवित्र अर्थात् (परमबीभत्से) अत्यन्त विकृत एवम् घृणित (काये) शरीर में पवित्र बुद्धि का होना भी अविद्या है। शरीर की अपवित्रता में कारण कहते हैं —

(स्थानात्) मल-मूत्रादि लिप्त योनि एवम् गर्भाशय से उत्पन्न होने से; (बीजात्) माता-पिता के रज-वीर्य रूपी अत्यन्त मलिन बीजों से बनने के कारण से; (उपष्टम्भात्) शरीर का आधार खाये-पीये भोजन का परिपाक रूप रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य आदि होने के कारण से; (निःस्यन्दात्) शरीर के सभी छिद्रों से मल, मूत्र, स्वेद आदि अपवित्र पदार्थों के निकलते रहने से; (निधनात्) शरीर का निधन = मरण होने से; तथा (आधेयशौचत्वात् अपि) स्नानादि के द्वारा शुद्धि की सदैव अपेक्षा होने से भी (पण्डिताः) विद्वान् पुरुष (कायम्) इस शरीर को (हि) निश्चय पूर्वक (अशुचिम्) अपवित्र ही (विदुः) कहते हैं। (इति) इस प्रकार से (अशुचौ) अपवित्र (शरीरे) शरीर में (शुचिख्यातिः) शुद्ध = पवित्र बुद्धि (दृश्यते) देखी जाती है। कैसे ? जैसे स्त्री शरीर के विषय में लोग कल्पना करते हैं कि (नवेव शशाङ्कलेखा) चन्द्रमा की नवीन कला के समान (कमनीया) कमनीय = मनोरम = प्रिय (इयम् कन्या) यह कन्या (मध्वमृतावयवनिर्मिता इव) मधु और अमृत के अवयवों से बनी हुई सी है; और (चन्द्रं भित्त्वा) चन्द्रमा = चन्द्र बिम्ब को भेदकर (निःसृता इव) निकली हुई सी (ज्ञायते) ज्ञात होती है; (नीलोत्पलपत्रायताक्षी) नील कमल की पंखुरियों के समान विशाल नेत्रों वाली (हावगर्भाभ्याम् लोचनाभ्याम्) श्रृंगार भावनाओं से युक्त नेत्रों से मानों (जीवलोकम्) प्राणी जगत् को (आश्वासयन्ती इव) आश्वासन देती हुई है। (इति) इस प्रकार (कस्य) किस दुर्गन्ध पूरित अपवित्र शरीर का (केन) किस मधु, अमृत, चन्द्र आदि पदार्थों से (अभिसम्बन्धः) सम्बन्ध है? (च) और (एवम्) इस प्रकार (अशुचौ) अपवित्र शरीर में (शुचिविपर्यासप्रत्ययः) पवित्र = शुद्ध पदार्थ का मिथ्या ज्ञान (भवति) होता है; (इति) यह अविद्या का दूसरा रूप है। (एतेन) इसी प्रकार इस लक्षण के द्वारा (अपुण्ये) पाप में (पुण्यप्रत्ययः) पुण्य का ज्ञान (च) और (तथैव) वैसे ही (अनर्थे) अनर्थकारी पदार्थों में (अर्थप्रत्ययः) अर्थ ज्ञान = सार्थकता की प्रतीति (व्याख्यातः) व्याख्यात हो गई। अर्थात् ये भी अविद्या ही हैं।

(तथा) वैसे ही (दुःखे) दुःख में (सुखख्यातिम्) सुख के ज्ञान = प्रतीति को स्वयं सूत्रकार “परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः” (योगसूत्र २.१५) के द्वारा (वक्ष्यति इति) कहेंगे। (तत्र) उस दुःख में (सुखख्यातिः) सुख का ज्ञान (अविद्या) तीसरे प्रकार की अविद्या है।

(तथा) उसी प्रकार (अनात्मनि) आत्मा से भिन्न पदार्थों में (आत्मख्यातिः) आत्मा का ज्ञान चौथे प्रकार की अविद्या है। जैसे (बाह्योपकरणेषु) बाह्य साधनों (चेतनाचेतनेषु) स्त्री, पुत्र, पशु आदि चेतन तथा गृह, धनादि भोग्य अचेतन पदार्थों में; (वा) अथवा (भोगाधिष्ठाने) भोग के आधार = आश्रय (शरीरे) शरीर में; (वा) अथवा (पुरुषोपकरणे) पुरुष = जीवात्मा के उपकरण = साधन (अनात्मनि) आत्मा से भिन्न (मनसि) मन = अन्तःकरण में (आत्मख्यातिः) आत्मा का ज्ञान = आत्मबुद्धि होना (इति) यह अविद्या है।

(तथा) वैसे ही (अत्र एतत्) इस विषय में अन्य आचार्य द्वारा भी (उक्तम्) कहा गया है — (व्यक्तम्) चेतन यथा स्त्री, पुत्र, मित्र, पशु आदि (वा) और (अव्यक्तम् सत्त्वम्) अचेतन यथा गृह, धन-सम्पत्ति, भूमि, वस्त्र, शरीर आदि पदार्थों को (आत्मत्वेन) आत्मरूप = अपना स्वरूप (अभिप्रतीत्य) मानकर = समझकर (तस्य) उस चेतन-अचेतन पदार्थ की (सम्पदम्) समृद्धि = सम्पन्नता को (आत्मसम्पदम्) अपनी = आत्मा की समृद्धि = सम्पन्नता (मन्वानः) मानता हुआ (अनुनन्दति) प्रसन्न होता है; और (तस्य) उस चेतन-अचेतन पदार्थों की (व्यापदम्) विपत्ति, क्षय को (आत्मव्यापदम्) अपनी = आत्मा की विपत्ति, क्षय (मन्यमानः) मानता हुआ (अनुशोचति) शोकग्रस्त होता है। (सर्वः सः) ऐसा मानने वाला प्रत्येक व्यक्ति (अप्रतिबुद्धः इति) अज्ञानी है, अविद्या ग्रस्त है। (एषा) यह (चतुष्पदा) चार प्रकार की (अविद्या) अविद्या ही (अस्य) इस (क्लेशसन्तानस्य) क्लेश सन्तान = अस्मिता, राग, द्वेष आदि प्रवाह का (च) और (सविपाकस्य कर्माशयस्य) जाति, आयु तथा भोग रूप फलसहित कर्माशय का (मूलम्) मूल कारण (भवति इति) होता है।

(तस्याश्च) उस अविद्या का (वस्तुसतत्त्वम्) वस्तु स्वरूप = भावात्मक सत्ता (अमित्रागोष्पदवत्) ‘अमित्र’ एवम् ‘अगोष्पद’ के समान (विज्ञेयम्) जाननी चाहिए। (यथा) जैसे (अमित्रः) ‘अमित्र’ का अर्थ (न मित्राभावः) मित्र का अभाव नहीं है; और (न मित्रमात्रम्) न मित्रमात्र ही है (किन्तु) किन्तु (तद्विरुद्धः) उस मित्र का विरोधी (सपत्नः) शत्रु है। (च) और, इसी प्रकार (यथा) जैसे (अगोष्पदम्) ‘अगोष्पद’ का अर्थ (न गोष्पदाभावः) न गोष्पद = गाय के पैर के चिह्न का अभाव है; और (न गोष्पदमात्रम्) न गोष्पदमात्र ही है (किन्तु) किन्तु (ताभ्याम्) उन दोनों अर्थों से (अन्यत्) भिन्न (वस्त्वन्तरम्) अन्य वस्तु (देश एव) स्थान है। (एवम्) इसी प्रकार से (अविद्या) अविद्या भी (न प्रमाणम्) न प्रमाण = ज्ञान = विद्या है और (न प्रमाणाभावः) न प्रमाण = ज्ञान का अभाव है (किन्तु) किन्तु (विद्याविपरीतम्) विद्या = ज्ञान से विपरीत = विरुद्ध ज्ञान और (ज्ञानान्तरम्) ज्ञान से भिन्न अन्य ज्ञान ही (अविद्या इति) अविद्या है॥

वैदिक योग मीमांसा : पुरुष के बन्धन का मूल कारण अविद्या, जो उसे कर्म और भोग के अनवरत चक्र में लगाए हुए है, का स्वरूप बताते हुए कहा है कि अनित्य पदार्थों में नित्यता का ज्ञान, अपवित्र में पवित्रता का ज्ञान, दुःख में सुख का ज्ञान और अनात्मा में आत्मा का ज्ञान अविद्या है। इसी प्रकार नित्य पदार्थों में अनित्य का ज्ञान, पवित्र में अपवित्रता का ज्ञान, सुख में दुःख का ज्ञान और आत्मा में अनात्मा का ज्ञान भी अविद्या है।

इससे विपरीत जो पदार्थ जैसा है, उसमें वैसा ही ज्ञान होना विद्या है; अर्थात् अनित्य में अनित्य और नित्य में नित्य; अपवित्र में अपवित्र और पवित्र में पवित्र; दुःख में दुःख और सुख में सुख; तथा अनात्मा में अनात्मा और आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना विद्या है, क्योंकि इसमें पदार्थों के यथार्थ स्वरूप का बोध होता है। अविद्या के चार भागों को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. अनित्य में नित्य :— अनित्य अर्थात् बने हुए पदार्थों में नित्यता का ज्ञान अविद्या का पहला भाग है। जैसे पृथिवी, सूर्य, चन्द्रादि सहित द्युलोकादि पदार्थ नित्य हैं अर्थात् कभी बने नहीं, सदा से ऐसे ही हैं और अनन्त काल तक ऐसे ही रहेंगे; ऐसा मानना और तदानुकूल व्यवहार करना, अविद्या है; क्योंकि कोई भी संयोग जन्य पदार्थ संयोग के पूर्व सत्तावान् नहीं होता, अतः उसे नित्य मानना अविद्या है। अविद्या के इसी स्वरूप को दूसरे रूप में भी महर्षि दयानन्द कहते हैं — “नित्य” अर्थात् ईश्वर, जीव, जगत् का कारण, क्रिया, क्रियावान्, गुण-गुणी और धर्म-धर्मी हैं, इन नित्य पदार्थों का परस्पर सम्बन्ध है; इन्हें अनित्य अर्थात् संयोग जन्य = कार्य पदार्थ = बना हुआ मानना भी अविद्या है।

जो पदार्थ बना है अथवा अन्य पदार्थों से मिलकर बना है, वह जड़ होता हुआ, अनित्य होता है। इन निर्मित पदार्थो में परमात्मा की व्यवस्था में बने मानव, पशु, पक्षी आदि के शरीर तथा वृक्ष आदि भी आते हैं; और मनुष्यों द्वारा, उपलब्ध प्राकृतिक पदार्थों से अपनी सुविधा और आवश्यकता हेतु बनाए गए अन्य पदार्थ भी आते हैं, यथा घर, वस्त्र, गाड़ी, कागज आदि। मानव अपने द्वारा बनाए गए साधनों / पदार्थों को सरलता पूर्वक जड़ तथा अनित्य मानता है, और ये सभी पदार्थ समय पाकर उसके सामने नष्ट भी होते हैं, और इनके नष्ट होने पर सामान्यतः वह शोक भी नहीं करता। दूसरी ओर वह अपने शरीर आदि के सम्बन्ध में ऐसी बुद्धि सरलतापूर्वक नहीं बना पाता। बना हुआ, उत्पन्न हुआ शरीर भी अनित्य है। उसके सामने उसकी सन्तान आदि उत्पन्न होकर युवा होते, उसके माता-पिता आदि मृत्यु से नष्ट भी होते, यह सब देख जानकर भी, वह अपने शरीर के सदा बने रहने की कामना करता, इसको अनित्य न मानता हुआ, अधर्म पथ पर अग्रसर रहता है। अपने शरीर वियोग की होने वाली अवश्यम्भावी घटना को वह स्वीकार नहीं कर पाता। इस अनित्य शरीर में नित्य बुद्धि, सभी प्रकार के अधर्म, अज्ञान की जड़ है। नित्य चेतन पदार्थ = पुरुष में कभी भी, कोई भी विकार नहीं आता; दूसरी ओर जड़ प्रकृति में सभी प्रकार के विकार होते, इसी के तत्त्वान्तर परिणाम भी होते तथा पञ्च महाभूतों में धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भी होते हैं। इस प्रकार से होने वाले सभी परिणाम ही इनकी अनित्यता को सिद्ध करते हैं। महर्षि यास्क ने निरुक्त १.२ में कहा है कि प्राकृतिक पदार्थ उत्पन्न होता, अस्तित्व में आता, परिणाम को प्राप्त होता, बढ़ता, घटना प्रारम्भ होता और नष्ट हो जाता है। यह प्रक्रिया प्रकृति के सभी विकारों एवं परिणामों में समान रूप से उपलब्ध होती है।

२. अपवित्रता में पवित्रता :— संसार में शरीर ही परम अपवित्र = परम विकृत और घृणित पदार्थ है, जिसे महर्षि व्यास ने “परम बीभत्स काया” शब्द से कहा है और इसकी अपवित्रता में निम्न हेतु दिए गए हैं —

(अ) स्थानात् — जिस स्थान से यह उत्पन्न होता है, अर्थात् माता का गर्भाशय = इस शरीर का निर्माणस्थल, और मल-मूत्रादि से लिप्त योनि = जिस मार्ग से यह शरीर गर्भाशय से बाहर निकलता है; यह मल, मूत्र, रक्त आदि युक्त स्थान पवित्र नहीं कहा जा सकता। यह शरीर इन्हीं घृणित पदार्थों के मध्य विकसित होता है, जिन्हें अलग से कोई भी व्यक्ति संभाल कर रखना नहीं चाहता।

(आ) बीजात् — यह शरीर माता-पिता के रज-वीर्य रूपी अत्यन्त मलिन बीजों से बनता है; जो कि शरीर से पृथक् संग्रहणीय पदार्थ नहीं कहे और माने जाते।

(इ) उपष्टम्भात् — इस शरीर द्वारा खाये-पीये जाने वाले पदार्थों के परिपाक होने पर रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य आदि बनते हैं; जो कि जीवन काल में शरीर के अंगरूप, शरीर की पुष्टि हेतु, तो आवश्यक हैं, परन्तु पृथक्-पृथक् रूप में ये सभी पदार्थ प्रत्येक व्यक्ति में घृणा और विकार को ही उत्पन्न करते हैं।

(ई) निःस्यन्दात् — इस शरीर के सभी छिद्रों से सर्वदा मल, मूत्र, कफ, स्वेद-पसीना आदि पदार्थ ही निकलते रहते हैं। बाहर से श्वास द्वारा ग्रहण होने वाली शुद्ध वायु भी शरीर के मलों द्वारा अशुद्ध हो कर ही बाहर निकलती है।

(उ) निधनात् — इस शरीर का निधन = आत्मा से वियोग होने पर कोई भी इसे अपने पास रखना नहीं चाहता।

(ऊ) आधेयशौचत्वात् — इस शरीर को जल आदि द्वारा शुद्धि की सर्वदा अपेक्षा रहती है। अतः स्नान आदि द्वारा शरीर के मलों को यथासम्भव दूर किया जाता है।

इन्हीं हेतुओं से विद्वान् लोग इस शरीर को अपवित्र मानते हैं। और इस अपवित्र शरीर में भी लोग कल्पना करते हैं कि यह चन्द्रमा की कला के समान, प्रिय, मनोहर, कमनीय स्त्री, जिसके अंग मानों शहद और अमृत से बने हुए हैं, विशाल नेत्रों वाली, श्रृंगार युक्त होकर परम आर्कषण का केन्द्र बन कर प्राणी मात्र को मोहित कर रही है, आकृष्ट कर रही है। और फिर इस दुर्गन्ध पूरित इस शरीर की तुलना पवित्र, ग्रहण करने योग्य अमृत और मधु से की जाती है। यह अविद्या है।

इस शरीर से लगातार मलों के निकलने से यह जाना जाता है, कि यह शरीर इन्हीं से ही पूरित है। जो मल इस शरीर से बाहर निकलता है उस मल को कोई भी संभाल कर रखना नहीं चाहता, चाहे वह मल किसी भी तथाकथित विश्वसुन्दरी, सर्वांगसुन्दरी स्त्री के शरीर से ही क्यों न निकला हो। जब शरीर से मल बाहर निकल आता है, तो उसे हर व्यक्ति अपने से दूर कर देना चाहता है, और प्रयत्नपूर्वक दूर करता भी है। इस शरीर में मलों के कारण होने वाली दुर्गन्धि को दबाने हेतु मनुष्य कई प्रकार के सुगन्धित पदार्थों का प्रयोग करता जिससे लगातार उत्पन्न होने वाली दुर्गन्धि दब जाए और आसपास के मनुष्यों को असुविधा न हो। यह शरीर तो मानों ऐसा घट है जिसमें मल ही मल भरा हुआ है परन्तु उसे बाहर से लीप-पोत कर सुन्दर बना दिया गया हो। यह जब भी फूटेगा तो दुर्गन्धि ही फैलाएगा। अतः सभी प्रकार से यह शरीर अपवित्र ही है, और इसे पवित्र मानना और वैसा ही व्यवहार करना अविद्या है।

अविद्या के इसी लक्षण में पाप में पुण्य का ज्ञान तथा अनर्थकारी पदार्थों एवम् कार्यों में अर्थज्ञान होना भी अविद्या कहा गया है, जिसे महर्षि दयानन्द इस प्रकार से स्पष्ट करते हैं — तथा तलाब, बावरी, कुण्ड, कूंआ और नदी आदि में तीर्थ और पाप छुड़ाने की बुद्धि करना और उनका चरणामृत पीना, एकादशी आदि मिथ्या व्रतों में भूख प्यास आदि दुःखों का सहना, स्पर्श-इन्द्रिय के भोग में अत्यन्त प्रीति करना इत्यादि अशुद्ध पदार्थों को शुद्ध मानना और सत्यविद्या, सत्यभाषण, धर्म, सत्संग, परमेश्वर की उपासना, जितेन्द्रियता, सर्वोपकार करना, सब में प्रेम भाव से वर्त्तना आदि शुद्ध व्यवहार और पदार्थों में अपवित्र बुद्धि करना, यह अविद्या का दूसरा भाग है।

३. दुःख में सुख :— संसार में दुःख देने वाले विषय-तृष्णा, काम, क्रोध, लोभ, मोह, शोक, ईर्ष्या, द्वेष आदि व्यवहारों से सुख की आशा करना अविद्या है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र २.१५ में परिणाम, ताप, संस्कार दुःख और गुणवृत्तिविरोध से विवेकी के लिए सभी कुछ दुःख ही कहा है। अतः संसार में आसक्ति, इसमें सुखबुद्धि का होना अविद्या है। दुःख के विषय में विशेष व्याख्यान आगे योगसूत्र २.१५ में देखें।

४. अनात्मा में आत्मा :— (अ) अनात्मा = आत्मा से भिन्न पदार्थ यथा स्त्री, पुत्र, मित्र, पशु आदि चेतन पदार्थ तथा गृह, धन आदि अचेतन पदार्थों में; (आ) आत्मा के भोग के अधिष्ठान = आधार शरीर में; तथा (इ) आत्मा के साधन मन, बुद्धि में आत्मा का ज्ञान होना, अविद्या है। इन पदार्थों को आत्मा मानता हुआ अथवा अपनी आत्मा का स्वरूप मानता हुआ व्यक्ति इनकी समृद्धि को आत्मा की समृद्धि मानकर प्रसन्न होता है और इसी प्रकार इनके विनाश को आत्मा का नाश, तथा इनकी विपत्ति को आत्मा की विपत्ति मानता है। तत्त्वद्रष्टा = यथार्थद्रष्टा ऋषि एवं शास्त्रकार ऐसा मानने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अविद्याग्रस्त कहते हैं।

यह अविद्या ही पुरुष = आत्मा के लिए संसार में बन्धन का कारण है और इसके नाश के लिए विद्या अर्थात् जो पदार्थ जैसा है उसे वैसा ही मानना चाहिए, जिससे बन्धन का नाश होकर मुक्ति की प्राप्ति होती है। महर्षि व्यास ने अविद्या के लिए “विद्याविपरीतम्” तथा “ज्ञानान्तरम्” का प्रयोग करते हुए दो उदाहरण दिए हैं — “अमित्र” तथा “अगोष्पद”। इसका अभिप्राय है कि जैसे “अमित्र” मित्र का विरोधी शत्रु होता है उसी प्रकार यह अविद्या भी “अमित्र” के समान विद्या का अभाव मात्र न होकर बल्कि विद्या से विपरीत ज्ञान = मिथ्याज्ञान है; और जैसे “अगोष्पद” का अभिप्राय गाय के पैर के चिह्न का अभाव न होकर, उस स्थान से है जहाँ गाय के पैर का चिह्न है उसी प्रकार अविद्या भी “अगोष्पद” के समान विद्या से अन्य ज्ञान है; यथा रजत में शुक्ति का ज्ञान होना।

ज्ञानान्तरम् = अन्य में अन्य का ज्ञान का एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण वर्त्तमान काल में लोक में बहुसंख्यक जनों को ग्रस्त किए हुए है — अन्य आत्मा में अन्य आत्मा का ज्ञान। अर्थात् जीवात्मा में परमात्मा का ज्ञान। वर्त्तमान काल में लोक में विभिन्न शरीरधारी पुरुषों (वर्त्तमान में विद्यमान अथवा भूतकाल में हुए — यथा श्री कृष्ण, राम, शिव आदि तथा अन्य प्रचारित शक्तिसम्पन्न देव आदि, इसी प्रकार अन्य मतावलम्बियों द्वारा बुद्ध, ईसामसीह, मोहम्मद आदि अथवा उस मत के गुरु) में ईश्वर की मान्यता अथवा इनको ईश्वर का दूत / पुत्र अथवा ईश्वर के समकक्ष अथवा ईश्वर से भी श्रेष्ठ मानते। लोक में वेदज्ञान से अनभिज्ञ लोगों द्वारा जीवात्मा, जो कि अल्पज्ञ और परिछिन्न आदि विशेषणों वाला तथा क्लेश, कर्म, कर्मफल और उनकी वासनाओं = संस्कारों से ग्रस्त है, उसको ईश्वर, जो कि सर्वज्ञ और सर्वव्यापक आदि विशेषणों वाला तथा क्लेश, कर्म, कर्मफल तथा उनकी वासनाओं से सर्वथा रहित होता है, मानना तथा वैसा ही व्यवहार करना अविद्या का महत्त्वपूर्ण स्वरूप है। ऐसा मानने वाले तथा ऐसा ही प्रचार करने वाले (वेदज्ञान से रहित तथाकथित गुरु आदि) सभी जन अविद्या से ही पूर्णतया ग्रस्त हैं; परन्तु ऐसे सभी लोग इस प्रकार से जीवात्मा विशेष में ईश्वर को मानते हुए, जो अपना कल्याण अथवा मुक्ति की कामना वाले भी होते हैं, वे सभी अपने आप को ईश्वर का सच्चा अनुयायी तथा भक्त मानते तथा अपने आप को धार्मिक तथा ज्ञानी भी जानते हैं। परन्तु वेदज्ञान के अभाव में, जीवात्मा में ईश्वर का ज्ञान होने से, न तो वे वास्तव में ज्ञानी, न धार्मिक होते और न ही वास्तविक रूप से ईश्वर के अनुयायी और न ही ईश्वर के भक्त होते हैं।

महर्षि दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के मुक्तिविषय में लिखते हैं कि “यह चार प्रकार की अविद्या संसार के अज्ञानी जीवों को बन्धन का हेतु होकर सदा उनको नचाती रहती है।” पुरुष के लिए संसार में बन्धन का कारण अविद्या है; इसी के कारण व्यक्ति दोषों = रागद्वेषादि से सम्बद्ध होकर, प्रवृत्ति = पुण्य-पाप कर्मों को करता हुआ, विभिन्न जन्मों को प्राप्त करता हुआ दुःखों को ही प्राप्त करता है और अविद्या से छूटने पर दोष, प्रवृत्ति और जन्म का भी क्रमशः नाश होकर दुःखों से पुरुष छूट जाता है।

परन्तु इस अविद्या का नाश श्रवण और पठन-पाठन मात्र से ही नहीं होता, वरन् इसके नाश हेतु मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार रूपी प्रक्रिया को अपनाना होता है। अन्यथा अविप्लवा = बाधारहित विवेकख्याति नहीं होती (योग० २.२६) और अविद्या बनी रहती है, और परिणामस्वरूप पुरुष बन्धन में उलझा रहता है। अतः अविद्या के नाश हेतु श्रवण के पश्चात् मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार परम आवश्यक हैं। यह निदिध्यासन ही योग की भाषा में सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि है, जिसमें पदार्थ के यथार्थ स्वरूप का बोध होता है। अगर योग की उपरोक्त प्रक्रिया को नहीं अपनाया गया, तो व्यक्ति शाब्दिक ज्ञान से विद्या को जानता हुआ भी अविद्याग्रस्त रहेगा और संसारचक्र में उलझा हुआ दुःखसागर में डूबा रहेगा।