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Saadhana Paada / Means / 40
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Saadhana Paada / Means / 40

शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः॥४०॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 40

In Hindi:

पदपाठ : शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैः असंसर्गः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : नियमेषु वक्ष्याम:—

हिंदी में अर्थ : (नियमेषु) अब नियमों की स्थिरता में सिद्धियाँ (वक्ष्यामः) कहेंगे —

हिंदी में अर्थ : (शौचात्) वितर्करहित बाह्य और आन्तरिक शौच के अनुष्ठान के फलस्वरूप (स्वाङ्गजुगुप्सा) योगी अपने शरीर के अङ्गों के प्रति घृणा = ग्लानि होने से अनासक्त होता है तथा (परैः) अन्य लोगों के शरीरों से भी (असंसर्गः) संसर्ग = सम्पर्क की प्रवृत्ति का अभाव हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : परन्तु यमों का नियम सहकारी कारण है जो कि उपासना का दूसरा अङ्ग कहाता है और जिसका सेवन करने से उपासक लोगों का अत्यन्त सहाय होता है, सो भी पांच प्रकार का है। उसमें से प्रथम शौच का फल लिखा जाता है —

(शौचात्स्वां॰) पूर्वोक्त दो प्रकार के शौच करने से भी जब अपना शरीर और उसके सब अवयव बाहर भीतर से मलिन ही रहते हैं, जब औरों के शरीर की भी परीक्षा होती है कि सबके शरीर मल आदि से भरे हुए हैं। इस ज्ञान से वह योगी दूसरे से अपना शरीर मिलाने में घृणा अर्थात् संकोच करके सदा अलग रहता है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : स्वाङ्गे जुगुप्सायां शौचमारभमाणः कायावद्यदर्शी कायानभिष्वङ्गी यतिर्भवति। किञ्च परैरसंसर्गः कायस्वभावावलोकी स्वमपि कायं जिहासुर्मृज्जलादिभिराक्षालयन्नपि कायशुद्धिमपश्यन्कथं परकायैरत्यन्तमेवाप्रयतैः संसृज्येत॥

हिंदी में अर्थ : (स्वाङ्गे) अपने शरीर के अङ्गों में मलिनता होने से (यतिः) योगी (जुगुप्सायाम्) घृणा = ग्लानि होने पर (शौचमारभमाणः) शौच का अभ्यास करता हुआ (कायावद्यदर्शी) शरीर के मलिनता आदि दोषों को देखता हुआ (कायानभिष्वङ्गी) शरीर के प्रति राग = आसक्ति से रहित (भवति) होता है। (किञ्च) और भी, (परैः) अन्य लोगों के साथ (असंसर्गः) संसर्ग से रहित हो जाता है। क्योंकि (कायस्वभावावलोकी) काया = शरीर के मलिनता रूपी स्वभाव को देखने वाला (स्वम्) अपने ही (कायम्) शरीर को (अपि) भी (जिहासुः) दोषमय होने के कारण छोड़ने = त्यागने की इच्छा वाला योगी (मृज्जलादिभिः) मिट्टी, जल आदि से (आक्षालयन्नपि) धोता = साफ करता हुआ भी (कायशुद्धिम्) शरीर की शुद्धि को (अपश्यन्) न देखता हुआ, (अत्यन्तम् एवाप्रयतैः) शरीर की शुद्धि हेतु अत्यन्त ही प्रयत्न न करने वाले (परकायैः) दूसरे लोगों के शरीरों से (कथम्) किस प्रकार से (संसृज्येत) संसर्ग = सम्पर्क करेगा ?

वैदिक योग मीमांसा : शरीर की बाह्य शुद्धि का वितर्क रहित सम्पादन करने से, योगी यह यथार्थ रूप से जानता है कि शरीर के सभी अङ्गों से सदा विभिन्न प्रकार के मलों का विसर्जन = त्याग होता ही रहता है। शरीर के रोम-छिद्रों से स्वेद = पसीना; आँखों से मल; कानों से मल; नासिका से मल = कफ; मुख से भी विभिन्न प्रकार के मल = कफ, वमन आदि; गुदा और उपस्थ से मल-मूत्र का त्याग, इसप्रकार शरीर से मलों का विसर्जन स्वाभाविक रूप होता रहता है। और तो और शरीर में श्वास द्वारा बाहर से ली गई शुद्ध वायु भी, शरीर के मलों से दूषित = अशुद्ध हो कर ही, प्रश्वास द्वारा बाहर निकलती है। शरीर की दुर्गन्धादि को दूर करने हेतु शरीर की शुद्धि की सर्वदा अपेक्षा रहती है। जन-साधारण भी जल, मिट्टी, साबुन आदि से इन मलों को निरन्तर दूर कर शरीर को शुद्ध करता रहता है। अतः शरीर एक ऐसा कारखाना है जिसके सभी छिद्रों से सर्वदा दूषित पदार्थ = मल आदि ही बाहर निकलते रहते हैं।

महर्षि व्यास ने तो योग सूत्र २.५ में काया को विभिन्न कारणों से सर्वथा अपवित्र ही कहा है —

स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निस्यन्दान्निधनादपि।

कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः॥

अर्थात् मल-मूत्रादि लिप्त योनि एवम् गर्भाशय से उत्पन्न होने से; माता-पिता के रज-वीर्य रूपी अत्यन्त मलिन बीजों से बनने के कारण से; शरीर का आधार खाये-पीये भोजन का परिपाक रूप रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य आदि होने के कारण से; शरीर के सभी छिद्रों से मल, मूत्र, स्वेद आदि अपवित्र पदार्थों के निकलते रहने से; और शरीर का निधन = मरण होने से; तथा स्नानादि के द्वारा श्ुाद्धि की सदैव अपेक्षा होने से विद्वान् पुरुष इस शरीर को निश्चय पूर्वक अपवित्र ही कहते हैं।

इसी प्रकार महाराज मनु ने भी शरीर की अशुद्धि के सम्बन्ध में कहा है —

अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम्। चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः।

जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम्। रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत्॥ मनु॰ ६.७६-७७॥

हड्डियों के ढांचे रूप, स्नायु रूपी रस्सी वाले, मांस और रक्त से भरे, चमड़ी से ढके, मूत्र और विष्ठा की दुर्गन्धि से भरे, वृद्धावस्था और शोक से युक्त, रोगों के घर, भूख-प्यास आदि से पीडि़त होने वाले, मिट्टी रूप नष्ट होने वाले इस महाभूतों के आश्रय स्थान शरीर में त्याग की भावना रखे॥

शरीर की ऐसी यथार्थता को जानकर योगी को अपने ही शरीर के अङ्गों से घृणा होती है, वह इस शरीर के प्रति आसक्ति का त्याग करता है। जब उसे अपने ही शरीर से आसक्ति नहीं रहती तो ऐसे में उपर्युक्त प्रकार के दोषों से युक्त अन्य मनुष्यों के शरीर से भी आसक्ति नहीं हो पाती, और वह अन्यों के शरीरों के साथ सम्पर्क = संयोग करने की कामना से रहित होता है। वह जानता है कि मेरे द्वारा इतना अधिक शौच का पालन करने पर भी मेरा शरीर अशुद्ध ही रहता है, और समयानुसार विभिन्न मलों का विसर्जन करता रहता है, तो दूसरे व्यक्ति जो मेरे समान भी शौच का पालन नहीं करते, उनके शरीर तो मुझ से भी अधिक दुर्गन्ध युक्त होंगे, चाहे वे बाह्य सुगन्धित पदार्थों के प्रयोग से कुछ काल के लिए दुर्गन्ध को दबा लेते हों, परन्तु शरीर से मलों का विसर्जन तो समाप्त नहीं होता।

दूसरे स्त्री / पुरुष के बाह्य सुन्दर एवं आकर्षक रूप को देखकर, उस शरीर से संसर्ग = सम्पर्क करने की कामना उत्पन्न होने पर, साधक को यह जानना चाहिए कि मेरी अविद्या अभी शेष है; मेरा शरीर की यथार्थता विषयक ज्ञान अभी शाब्दिक है; मेरा शौच का परिपालन अभी सभी प्रकार के वितर्कों से रहित और दृढ़ नहीं है, इसके लिए अभी और अभ्यास की आवश्यकता है; मेरा, शरीर की मलिनता एवं दोषों का ज्ञान, व्यवहार में नहीं आया है; आदि-आदि।

योगी पुरुष उपर्युक्त प्रकार से जानता हुआ दूसरों के शरीरों से संसर्ग = सम्पर्क की अपेक्षा से भी रहित होता है। ऐसे दोषयुक्त शरीर से सम्पर्क कर, किसी प्रकार के सुख की कामना करना तो ऐसा है जैसे कि मल के ढेर में बैठना अथवा मलपूर्ण घट से लिपटना, और सुगन्धि की अभिलाषा !!! कैसे सम्भव है?