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Saadhana Paada / Means / 42
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Saadhana Paada / Means / 42

सन्तोषादनुत्तमः सुखलाभः॥४२॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 42

In Hindi:

पदपाठ : सन्तोषात् अनुत्तमः सुखलाभः॥

हिंदी में अर्थ : (सन्तोषात्) वितर्क रहित सन्तोष के अनुष्ठान से (अनुत्तमः) तुलना से रहित सर्वोत्तम (सुखलाभः) सुख की प्राप्ति होती है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (सन्तोषाद्०) अर्थात् पूर्वोक्त सन्तोष से जो सुख मिलता है, वह सबसे उत्तम है और उसी को मोक्षसुख कहते हैं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : तथा चोक्तम्—

यच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्।

तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्॥ इति॥

हिंदी में अर्थ : (तथा च) और वैसा ही (उक्तम्) कहा गया है (महाभारत शान्तिपर्व १७४.४६) —

(लोके) इस लोक में (यच्च) जो भी (कामसुखम्) कामनाओं की पूर्त्ति से होने वाला सुख है, (च) और (यत्) जो (दिव्यम्) दिव्य = सूक्ष्म विषयों से होने वाले (महत्सुखम्) महान् सुख हैं, (एते) ये दोनों प्रकार के सुख (तृष्णाक्षयसुखस्य) तृष्णा के क्षय = नाश से होने वाले सुख की (षोडशीम्) सोलहवीं (कलाम्) कला के भी (न अर्हतः इति) तुल्य नहीं हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : जो योगी मन, वाणी और शरीर से सभी कालों में बिना किसी प्रकार के वितर्क = अपवाद के सन्तोष का पालन करता है उस योगी को सर्वोत्तम = सर्वश्रेष्ठ सुख की प्राप्ति होती है। वस्तुतः सन्तोष का पालन करने वाले व्यक्ति को अपने पूर्ण पुरुषार्थ के उपरान्त लाभ प्राप्त होने पर न तो हर्ष करना चाहिए अथवा हानि होने पर न ही शोक करना चाहिए, और न ही प्राप्त हुए पदार्थ से अधिक प्राप्ति की लालसा करनी चाहिए। साधक इस प्रकार सन्तोष का पालन करता हुआ तृष्णा का नाश करता है।

महर्षि व्यास कहते हैं कि संसार में जो कामनाओं की पूर्त्ति से होने वाले सुख हैं, अथवा जो दिव्य = सूक्ष्म विषयों से प्राप्त होने वाले महान् सुख हैं, वे सभी सुख तृष्णा नाश से होने वाले सुख की अपेक्षा से तुच्छ हैं। महर्षि दयानन्द ने तो सन्तोष के परिपालन से प्राप्त होने वाले अत्युत्तम = सर्वोत्तम सुख की तुलना मोक्ष सुख से की है।

जब साधक लौकिक सुखों = भोगों की प्राप्ति पर हर्ष करता तो उसमें राग की वृद्धि होती है। राग के साथ-साथ उस साधक के चित्त में उस प्रकार के सुखों के न होने अथवा उन सुखों के बाधकों के प्रति द्वेष की भावना भी उत्पन्न होती है, और इस प्रकार व्यक्ति राग-द्वेष में लगा हुआ अविद्याग्रस्त रहता है। इस प्रकार तृष्णा की पूर्त्ति में सुख मानने वाला व्यक्ति इस संसारचक्र में ही उलझा रहता है। अतः महर्षि मनु ने स्पष्ट रूप से कहा है —

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति॥ मनु॰ २.६९॥

अर्थात् कामनाओं के भोग से कामनाएँ कभी शान्त नहीं होती वरन् बढ़ती ही जाती है। इसी प्रकार भर्तृहरि ने भी भी कहा है —

तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥ वैराग्यशतक ७॥

व्यक्ति तृष्णाओं की पूर्त्ति में लगा हुआ स्वयं वृद्ध, जीर्ण हो जाता है परन्तु तृष्णाएँ जीर्ण = नष्ट नहीं होती। अतः शास्त्रकारों ने तृष्णा नाश को ही सुख प्राप्ति का सर्वोत्तम उपाय कहा है। यथा

सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत्।

सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः॥ मनु॰ ४.१२॥

सुख चाहने वाला व्यक्ति अन्यन्त संतोष को धारण करके संयत = अधिक भोगों की प्राप्ति की इच्छा न करने वाला बने, क्योंकि सन्तोष सुख का आधार है, उससे विपरीत अर्थात् अंसतोष दुःख का मूल कारण है॥ इसी प्रकार आचार्य चाणक्य भी कहते हैं —

सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्।

न च तद्धनलुब्धानामितश्चेतश्च धावताम्॥ चाणक्यनीति ७.३॥

अर्थात् सन्तोष रूपी अमृत से तृप्त और शान्तचित्त वाले मनुष्य को जो सुख की प्राप्ति होती है, वह धन = भोगों के लोभ में इधर-उधर दौड़ने वाले मनुष्यों को प्राप्त हो नहीं सकती।