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Saadhana Paada / Means / 43
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Saadhana Paada / Means / 43

कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः॥४३॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 43

In Hindi:

पदपाठ : कायेन्द्रियसिद्धिः अशुद्धिक्षयात् तपसः॥

हिंदी में अर्थ : (तपसः) तप का अनुष्ठान करने से (अशुद्धिक्षयात्) शरीर, इन्द्रिय और अन्तःकरण = चित्त की अशुद्धि का नाश होने से (कायेन्द्रियसिद्धिः) शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि होती है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (कायेन्द्रिय०) अर्थात् पूर्वोक्त तप से उनके शरीर और इन्द्रियों की अशुद्धि के क्षय से दृढ़ होके सदा रोगरहित रहती हैं। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : निर्वर्त्यमानमेव तपो हिनस्त्यशुद्ध्यावरणमलम्। तदावरणमलापगमात्कायसिद्धिरणिमाद्या। तथेन्द्रियसिद्धिर्दूराच्छ्रवणदर्शनाद्येति॥

हिंदी में अर्थ : (निर्वर्त्यमानम्) आचरण में लाया जाने वाला (एव) ही (तपः) तप (अशुद्ध्यावरणमलम्) चित्त की अविद्या रूपी अशुद्धि जनित आवरण = मल को (हिनस्ति) नष्ट करता है। (तत्) उस (आवरणमलापगमात्) आवरण रूपी चित्त के मल के दूर हो जाने से (कायसिद्धिः) स्थूल और सूक्ष्म शरीर की सिद्धियाँ (अणिमाद्या) अणिमा आदि होती है। (तथा) उसी प्रकार (इन्द्रियसिद्धिः) इन्द्रियों की सिद्धियाँ (दूरात्) दूर से (श्रवणदर्शनाद्या इति) श्रवण, दर्शन आदि होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में तप के अनुष्ठान का फल कहा है। तप को शास्त्रकारों ने निम्न प्रकार से कहा है —

— जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य बोलना, वेदादि सत्यशास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म परमात्मा की उपासना कर, ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ (तैत्तिरीयारण्यक १०.८.१ पर महर्षि दयानन्द सरस्वती — संस्कारविधि वेदारम्भप्रकरण)

— ब्राह्मण = विद्वान् के लिए इस संसार में वेदाभ्यास करना परम तप है। (मनु॰ २.१४१)

— द्विज गृहस्थी के लिए प्रतिदिन प्रयत्नपूर्वक वेदों का अध्ययन ही श्रेष्ठ तप है। (मनु॰ २.१४२)

— ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवित् पुरुष के द्वारा विधि के अनुसार प्रणव अर्थात् ओङ्कारपूर्वक और “भूः भुवः स्वः” आदि सप्त व्याहृतियों के द्वारा जप सहित प्राणायाम का अनुष्ठान करना परम तप है। (मनु॰ ६.७०)

उपर्युक्त कर्मों के अनुष्ठान हेतु सभी प्रकार के द्वन्द्वों का सहन करना ही तप है।

इस प्रकार से सभी प्रकार के वितर्कों से रहित तप के अनुष्ठान से साधक = योगी के अन्तःकरण में अविद्या रूपी अशुद्धि तथा अविद्या के संस्कारों का भी क्षय होता है। महाराज मनु ने तप से पुरुष की शुद्धि को कहा है — “विद्यातपोभ्यां भूतात्मा” (मनु॰ ५.१०९) अर्थात् विद्या और तप से जीवात्मा की शुद्धि होती है। अतः अविद्या रूपी अशुद्धि, जो पुरुष के लिए प्रकृति के साथ बन्धन का कारण है, के क्षय होने से चित्त = बुद्धि की आत्मा के समान शुद्धि होने से पुरुष मोक्ष को प्राप्त करने में समर्थ होता है।

महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास यहाँ अविद्या और उसके संस्कारों के क्षय होने से साधक को काया = शरीर और इन्द्रियों की सिद्धियाँ को कहते हैं। काया की सिद्धियों में महर्षि व्यास ने अणिमादि सिद्धियों को कहा है। महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.४४-४५ में अणिमादि सिद्धियों को भूतजय होने पर कहा है। अर्थात् जब साधक योगसूत्र ३.४४ की विधि के अनुसार पञ्च महाभूतों पर विजय प्राप्त कर लेता है तो परिणामस्वरूप योगी को अणिमादि सिद्धियाँ और कायसम्पत्ति की प्राप्ति होती है। इन सिद्धियों का वर्णन योगसूत्र ३.४५-४६ में किया गया है। महर्षि व्यास द्वारा यहाँ “तप के अनुष्ठान से अशुद्धि का क्षय होने पर काया की अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है” कहा गया है। इसका आशय यह है कि अविद्या रूपी अशुद्धि के नाश होने पर ही योगी इस स्थिति में आ पाता है कि भूतजय से अणिमादि सिद्धियों को प्राप्त कर सके। अतः इस प्रकार से तपानुष्ठान द्वारा अविद्या नाश के बिना कायसिद्धियों की प्राप्ति आगे सम्भव नहीं हो सकती। अणिमादि सिद्धियाँ पञ्च महाभूतों पर जय से प्राप्त होने के कारण, विभिन्न भाष्यकारों ने इन अणिमादि सिद्धियों को मात्र स्थूल शरीर से सम्बन्धित मान कर वैसा ही व्याख्यान किया है। परन्तु ऐसा कहना और मानना भ्रान्तिपूर्वक ही है। इनमें से कुछ सिद्धियाँ यथा अणिमा, महिमा मात्र चित्त से ही सम्बन्धित हैं; तथा अन्य सूक्ष्मशरीर के साथ स्थूल शरीर से भी सम्बन्घित हैं। इनका व्याख्यान योगसूत्र ३.४६ की व्याख्या में किया गया है।

इन्द्रियसिद्धियों में महर्षि व्यास ने दूर से श्रवण और दर्शन आदि की प्राप्ति को कहा है। यहाँ इन्द्रिय सिद्धियों का भी कायसिद्धियों के समान सूक्ष्म शरीर के अंग पाँच ज्ञानेन्द्रिय रूप इन्द्रियशक्ति से सम्बन्धित जानना चाहिए, न कि इन्द्रियों के भौतिक गोलकों यथा आँख, कान आदि से सम्बन्धित। अतः इन्द्रिय-सिद्धि से इन्द्रियशक्ति की ही उत्कृष्टता = प्रकृष्टता होती है। दूर श्रवण और दूर दर्शन से श्रोत्रेन्द्रिय, नेत्रेन्द्रिय आदि की सूक्ष्मता की प्राप्ति साधक को होती है; यथा सूक्ष्म शब्द को वह योगी सामान्य अपेक्षित दूरी से अधिक दूरी से भी ग्रहण करने में समर्थ होता है, यही दूर श्रवण का अभिप्राय है। इसी प्रकार अन्य विषयों में भी जानना चाहिए। यथा महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ३.४१ में श्रवणेन्द्रिय और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने से योगी को दिव्य श्रवण शक्ति की प्राप्ति को प्रतिपादित किया है। इस प्रकार इन्द्रियों की कुशलता, सूक्ष्मता इतनी प्रकृष्ट हो जाती है जिससे योगी उन-उन इन्द्रियों के विषयों को दूर से = सूक्ष्मता से ग्रहण करने में समर्थ होता है। इन्द्रियों द्वारा दिव्य = सूक्ष्म विषयों की प्राप्ति को महर्षि पतञ्जलि ने योग सूत्र ३.३६ में प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श, आस्वाद, वार्त्ता के रूप में कहा है। तप के अनुष्ठान से योगी इस प्रकार की योग्यता को प्राप्त कर लेता है कि जिससे काया = सूक्ष्मशरीर और इन्द्रियों = ज्ञानेन्द्रिय रूप इन्द्रिय शक्तियों की उपर्युक्त प्रकार की सिद्धियों को प्राप्त कर सके। इन सिद्धियों की प्राप्ति हेतु संयम के विभिन्न विषयों का वर्णन विभूतिपाद में यथास्थान किया गया है। अतः केवल मात्र तप से ही इन सिद्धियों की पूर्णतया प्राप्ति सम्भव नहीं समझनी चाहिए।