Donation Appeal Download Our App
Saadhana Paada / Means / 44
Choose Sutra
Saadhana Paada / Means / 44

स्वाध्यायादिष्टदेवतासम्प्रयोगः॥४४॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 44

In Hindi:

पदपाठ : स्वाध्यायात् इष्टदेवतासम्प्रयोगः॥

हिंदी में अर्थ : (स्वाध्यायात्) वेदादि मोक्षशास्त्रों के पठन-पाठन, प्रणवादि मन्त्रों के जप के अनुष्ठान से (इष्टदेवतासम्प्रयोगः) इष्टदेव = परमात्मा के साथ सम्प्रयोग = सम्बन्ध, उसका साक्षात्कार हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (स्वाध्याय०) पूर्वोक्त स्वाध्याय से इष्टदेवता अर्थात् परमात्मा के साथ सम्प्रयोग अर्थात् साझा होता है। फिर परमेश्वर के अनुग्रह का सहाय अपने आत्मा की शुद्धि, सत्याचरण, पुरुषार्थ और प्रेम के सम्प्रयोग से जीव शीघ्र ही मुक्ति को प्राप्त होता है॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : देवा ऋषयः सिद्धाश्च स्वाध्यायशीलस्य दर्शनं गच्छन्ति कार्ये चास्य वर्त्तन्त इति॥

हिंदी में अर्थ : (देवा) सत्यनिष्ठ विद्वान्, (ऋषयः) मन्त्रार्थ द्रष्टा, (च) और (सिद्धाः) योग सिद्ध (स्वाध्यायशीलस्य) स्वाध्याय का अनुष्ठान करने वाले योगी को (दर्शनम् गच्छन्ति) प्राप्त होते हैं; (च) और (अस्य) इस योगी के (कार्ये) कार्य में (वर्त्तन्त इति) सहायक हो जाते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : वेदादि सत्य एवं मोक्षप्रतिपादक शास्त्रों का अध्ययन करने, प्रणव = ओङ्कार का जप और उसके अर्थ की भावना करने रूप स्वाध्याय का बिना किसी वितर्क = अपवाद के अनुष्ठान करने से साधक का इष्टदेव परमात्मा से सम्बन्ध हो जाता है।

महाराज मनु ने वेद के अभ्यास करने का फल निम्नप्रकार से कहा है —

वेदाभ्यासोऽन्वहं शक्त्या महायज्ञक्रिया क्षमा।

नाशयन्त्याशु पापानि महापातकजान्यपि॥

यथैधस्तेजसां वह्निः प्राप्तं निर्दहति क्षणात्।

तथा ज्ञानाग्निना पापं सर्वं दहति वेदविद्॥ मनु॰ ११.२४५-२४६॥

प्रतिदिन वेद का यथासम्भव अध्ययन-मनन, पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान, तप-सहिष्णुता, बड़े पापों से उत्पन्न पाप-भावनाओं एवं दुःसंस्कारों को भी नष्ट कर देती है॥ जैसे अग्नि अपने तेज से समीप आए काष्ठ आदि इन्धन को जला देती है वैसे ही वेद का ज्ञाता वेदज्ञान रूपी अग्नि से सब आने वाली पाप-भावनाओं को जला देता है॥

अतः जब साधक वेद के स्वाध्याय से अपनी सभी पाप-भावनाओं और पाप-संस्कारों को नष्ट कर देता है, तो ऐसा साधक धर्मनिष्ठ हुआ परमात्मा के ज्ञान द्वारा, परमात्मा के सान्निध्य को अनुभव करता है। वह परमात्मा को सर्वव्यापक जानता हुआ, अपने आत्मा में उसे उपस्थित जानता है; और अपने आप को सर्वदा-सर्वथा परमात्मा के मध्य में विचरण करता हुआ जानता और अनुभव करता है। इस प्रकार का ज्ञान होना ही परमात्मा का सान्निध्य = परमात्मा की प्राप्ति है। परमात्मा ही जीवात्मा का इष्टदेव है और साधक परमात्मा द्वारा प्रदत्त वेदज्ञान से ही परमात्मा से सम्बन्ध स्थापित करने में सक्षम होता है।

महर्षि व्यास ने १.२८ के भाष्य में स्पष्ट कहा है — “स्वाध्याययोगसंपत्त्या परमात्मा प्रकाशते॥” अर्थात् स्वाध्याय और योग की सम्पत्ति से परमात्मा का ज्ञान हो जाता है। इसी प्रकार सामवेद में भी कहा है — “वह परमात्मा निश्चित रूपेण वेदादि शास्त्रों के ज्ञाता के हृदय में प्रकट होता है।” (साम० १२५)

महर्षि व्यास ने वेदानुकूल शास्त्रों के स्वाध्यायशील पुरुष को देव = सत्यनिष्ठ विद्वान्, ऋषि = वेद मन्त्रों के अर्थों के द्रष्टा और सिद्ध = योग की सिद्धियों को प्राप्त हुए पुरुषों द्वारा दर्शन देना और इन सब का स्वाध्यायशील साधक के कार्यों में सहायक होना कहा है। यहाँ उक्त पुरुषों द्वारा दर्शन देने का यह अभिप्राय नहीं है कि योग के साधक को योगशास्त्र के रचयिता महर्षि पतञ्जलि, भाष्यकार महर्षि व्यास तथा अन्य ऋषि आदि सशरीर दर्शन देते हैं; वरन् इसका अभिप्राय यह है कि योगशास्त्र का स्वाध्याय और तदनुकूल आचरण करने वाला साधक उन ऋषियों के ज्ञान और अनुभव का स्वयं साक्षात् कर, उनके समान ही, उस-उस शास्त्र में कहे हुए लाभों को भी प्राप्त कर लेता है। पूर्वकाल में हुए देव, ऋषि अथवा सिद्ध सशरीर किसी को दर्शन नहीं दे सकते, क्योंकि वे तो उस-उस शरीर को त्यागने के उपरान्त या तो परमात्मा की व्यवस्था में अपने कर्मानुसार विभिन्न देव, मनुष्य आदि योनियों में, विभिन्न लोकों में होंगे अथवा मोक्ष को प्राप्त होकर परमात्मा का आनन्द भोग रहे होंगे। दोनों की अवस्थाओं में उनका उस त्यागे हुए शरीर के साथ दर्शन होना सम्भव नहीं है। ऐसी किसी मान्यता में एक अन्य दोष यह भी है कि सशरीर दर्शन मानने वाले उस शरीर विशेष को ही पुरुष = आत्मा की पहचान का साधन मानते हैं, तथा वे ये कल्पना भी करते हैं कि ऐसे सिद्ध, ऋषि, देव आदि स्वेच्छा से कालद्वारा नष्ट शरीर को पुनः निर्मित कर, वर्त्तमानकाल में स्वाध्यायशील योगी को दर्शन देने में समर्थ होते हैं। परन्तु ऐसी मान्यता वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों से सर्वथा प्रतिकूल ही है, क्योंकि आत्मा का ज्ञान और अस्तित्व शरीरविशेष से सम्बद्ध नहीं किया जा सकता। अतः उपर्युक्त अर्थ ही महर्षि व्यास की भावना और वेदादि सत्यशास्त्रों की मान्यता के अनुकूल है।