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Saadhana Paada / Means / 45
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Saadhana Paada / Means / 45

समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्॥४५॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 45

In Hindi:

पदपाठ : समाधिसिद्धिः ईश्वरप्रणिधानात्॥

हिंदी में अर्थ : (ईश्वरप्रणिधानात्) ईश्वर की भक्ति विशेष तथा समस्त कर्मों को उसके प्रति अर्पित करना रूप ईश्वरप्रणिधान के दृढ़ हो जाने से (समाधिसिद्धिः) समाधि की सिद्धि होती है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (समाधि॰) पूर्वोक्त प्रणिधान से उपासक मनुष्य सुगमता से समाधि को प्राप्त होता है॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : ईश्वरार्पितसर्वभावस्य समाधिसिद्धिर्यया सर्वमीप्सितमवितथं जानाति देशान्तरे देहान्तरे कालान्तरे च। ततोऽस्य प्रज्ञा यथाभूतं प्रजानातीति॥

हिंदी में अर्थ : (ईश्वरार्पितसर्वभावस्य) अपने सभी भावों = मन, वाणी और शरीर से होने वाली क्रियाओं और उनके फलों को ईश्वर को समर्पित करने वाले साधक को (समाधिसिद्धिः) समाधि की सिद्धि होती है। (यया) जिससे योगी (देशान्तरे) दूसरे देशों में, (देहान्तरे) दूसरे देहों में (च) और (कालान्तरे) दूसरे कालों में होने वाले (सर्वम् ईप्सितम्) सभी अभीष्ट पदार्थों को (अवितथम्) यथार्थ रूप से (जानाति) जानता है। (ततः) तब (अस्य) इस योगी की (प्रज्ञा) समाधिप्रज्ञा (यथाभूतम्) पदार्थों के यथार्थ रूप को (प्रजानाति इति) प्रकृष्ट रूप से जनाती है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में ईश्वर-प्रणिधान का फल कहा है। जब साधक अपनी सभी क्रियाओं को परम गुरु परमात्मा के प्रति समर्पित कर देता है, और उनके फल की आकांक्षा को त्यागने का अभ्यास दृढ़ कर लेता है, तो ऐसे साधक को समाधि की सिद्धि ईश्वर की अनुकम्पा से होती है। वस्तुतः ईश्वर-प्रणिधान का पालन करने वाला साधक अहिंसा का पूर्णतया पालन करता हुआ अपने चित्त की अशुद्धि अर्थात् अविद्या और उसकी सन्तान अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश क्लेशों को तनु = क्षीण = निर्बल करने में समर्थ हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके द्वारा मन, वाणी और शरीर से होने वाले सभी कर्म धर्मानुकूल, ईश्वर की आज्ञा अर्थात् वेद के अनुकूल ही होते हैं। क्योंकि अधर्माचरण = वेद विरुद्ध की जाने वाली किसी भी प्रकार की क्रिया को, ईश्वर को अर्पित करने के विचार और उसके फल की कामना न करने से भी, कोई भी मनुष्य उसके दुःख और अज्ञान रूप फल से बच नहीं सकता; क्योंकि ऐसा समर्पण न केवल व्यर्थ का आडम्बर ही है, बल्कि इससे व्यक्ति की चित्तगत अशुद्धि = अविद्या ही दृढ़ होती है। योगसूत्र २.३० में महर्षि व्यास ने स्पष्ट कहा है कि अहिंसा के बाद के यम तथा नियमों का पालन अहिंसा की सिद्धि के लिए आवश्यक है। अतः सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह रूपी यमों तथा शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय रूपी नियमों का पालन किए बिना मात्र ईश्वर-प्रणिधान से अहिंसा रूपी लक्ष्य की सम्यक् प्राप्ति साधक को नहीं हो सकती। अतः ईश्वर-प्रणिधान के सम्यक् अनुष्ठान हेतु पूर्व के यमों और नियमों का परिपालन भी सर्वतोभावेन अपेक्षित है।

अतः साधक, यमों के अनुष्ठान द्वारा, दूसरे प्राणियों के प्रति सभी प्रकार के वैरभाव का परित्याग करता हुआ तथा यमों के साथ नियमों के अनुष्ठान द्वारा चित्त की अशुद्धियों का ही नाश करता हुआ, सत्त्वगुण प्रधान चित्त-वृत्तियों द्वारा समाधि को प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। इस प्रकार से होने वाली समाधि से तात्पर्य “सम्प्रज्ञात समाधि” है।

इस प्रकार से समाधि को प्राप्त हुआ साधक सभी अभीष्ठ = प्राप्त करने = जानने योग्य पदार्थों को यथार्थ रूप से जान लेता है। साधक के लिए ज्ञान हेतु अभीष्ठ पदार्थ, केवल मात्र तीन ही है — प्रकृति, जीव और ईश्वर। साधक इन तीनों पदार्थों को यथाक्रम अर्थात् वितर्कानुगत और विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि से स्थूल भूतों से मूल प्रकृति का; अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि द्वारा जीवात्मा = स्वयं का और अन्त में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ईश्वर का भी साक्षात्कार = सम्यग्दर्शन प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। इन तीनों ही पदार्थों का देशान्तर, देहान्तर और कालान्तर में, किसी भी प्रकार का स्वरूप परिवर्तन नहीं होता।

देशान्तर से अभिप्राय है कि ये पदार्थ सभी देशों में एक से ही होते हैं, यथा — सभी लोक प्रकृति रूपी उपादान कारण से बने, सभी लोकों में जीव एक से ही होते और वे अपने कर्मफलों के भोग हेतु विभिन्न शरीरों को प्राप्त करते, तथा सभी लोक ईश्वर की व्यवस्था में तथा उससे आच्छादित हैं। इसी प्रकार देहान्तर का अभिप्राय भी जानना चाहिए — सभी देह स्थूल महाभूतों तथा इन्द्रियों से ही बनते, सभी देहों में निवास करने वाले जीव समान हैं और अपने कर्मफलों को भोग रहे हैं; और इसी प्रकार ईश्वर सभी देहों में समान रूप से व्यापक और इनका निमित्त कारण है। इसी प्रकार कालान्तर का अभिप्राय भी निम्न प्रकार से जानना चाहिए — पूर्व कल्पों में भी जगत् का निर्माण प्रकृति रूपी उपादान कारण से हुआ था, वर्त्तमान कल्प में भी प्रकृति ही उपादान कारण है तथा भविष्यत् में भी प्रकृति ही उपादान कारण होगी; पूर्व कल्पों में जीव कर्मानुसार विभिन्न योनियों = शरीरों को प्राप्त करते थे, वर्त्तमान कल्प में भी कर्मानुसार ही संसार चक्र में पड़े हुए हैं तथा आगे के कल्पों में भी यही व्यवस्था रहेगी; पूर्व कल्पों में ईश्वर ही जगत् का निमित्त कारण और कर्मफल प्रदाता था, वर्त्तमान कल्प में भी जगत् का निमित्त कारण तथा कर्मफल प्रदाता है, और भविष्यत् में भी ऐसा ही होगा। अर्थात् तीनों नित्य पदार्थों का स्वरूप और कार्य सभी देशों, देहों और कालों में एक सा ही रहता है। समाधिप्रज्ञा को प्राप्त हुआ योगी इस प्रकार से शाब्दिक ज्ञान को मनन, निदिध्यासन और साक्षात्कार द्वारा वैसा ही जानता है, और सभी प्रकार के संशयों से निवृत्त हो जाता है।