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Saadhana Paada / Means / 46
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Saadhana Paada / Means / 46

स्थिरसुखमासनम् ॥४६॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 46

In Hindi:

पदपाठ : स्थिरसुखम् आसनम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : उक्ताः सह सिद्धिभिर्यमनियमाः। आसनादीनि वक्ष्यामः। तत्र—

हिंदी में अर्थ : (सिद्धिभिः सह) सिद्धियों सहित (यमनियमाः) यम और नियम (उक्ताः) कहे गए। अब क्रम प्राप्त (आसनादीनि) आसन आदि योग के अङ्गों को (वक्ष्यामः) कहेंगे। (तत्र) उन में से —

हिंदी में अर्थ : (स्थिरसुखम्) जिस अवस्था में शरीर सुखपूर्वक स्थिर हो, वह (आसनम्) आसन कहलाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : ऋषिकृत अर्थ में व्यासभाष्य से अतिरिक्त निम्न शब्द हैं — “पद्यासनादिकमासनं विदध्यात्, यद्वा यादृशीच्छा तादृशमासनं कुर्य्यात्।”

(तत्र स्थिर०) अर्थात् जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हों, उसको आसन कहते हैं, अथवा जैसी रुचि हो वैसा आसन करे॥ (ऋ० भू॰ उपासना॰)

व्यास भाष्य : तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यङ्कं क्रौञ्चनिषदनं हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि॥

हिंदी में अर्थ : (तद्यथा) वह जैसे कि (पद्मासनम्) पद्मासन, (वीरासनम्) वीरासन, (भद्रासनम्) भद्रासन (स्वस्तिकम्) स्वस्तिकासन, (दण्डासनम्) दण्डासन, (सोपाश्रयम्) सोपाश्रय = सहारे के साथ आसन, (पर्यङ्कम्) पर्यङ्कासन, (क्रौञ्चनिषदनम्) क्रौञ्च पक्षी के समान बैठना, (हस्तिनिषदनम्) हाथी के समान बैठना, (उष्ट्रनिषदनम्) ऊँट के समान बैठना, और (समसंस्थानम्) समसंस्थान, (स्थिरसुखम्) ये सभी आसन स्थिरता और सुख देने वाले हैं। (च) और (यथासुखम्) जिस आसन में सुखपूर्वक बैठा जा सके उसी आसन का अभ्यास करना चाहिए। (इति एवम् आदीनि) इत्यादि नामों से आसन हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : चित्त-वृत्तियों का निरोध करने वाले साधक को एक आसन में बैठने का भी अभ्यास करना होता है। साधक को ऐसे आसन का अभ्यास करना चाहिए, जिसमें वह लम्बे काल तक बिना किसी प्रकार की असुविधा के स्थिर होकर बैठ सके। शरीर की चेष्ठाएँ भी चित्त की एकाग्रता में बाधक होती हैं। जब साधक किसी एक आसन में बैठा हुआ भी शारीरिक = बाह्य गतियों, प्रयत्नों का निरोध नहीं करता, तो उसका चित्त स्वतः ही शरीर के अङ्गों की गति = चेष्टा के साथ उस ओर लग जाता है। अतः चित्त की स्थिरता का सम्पादन करने से पूर्व साधक के लिए स्थूल शरीर की स्थिरता का सम्पादन करना आवश्यक है। इसीलिए महर्षि पतञ्जलि ने अष्टाङ्ग योग के तीसरे अङ्ग के रूप में आसन का विधान किया है।

सूत्र पर भाष्य करते हुए महर्षि व्यास ने आसन के रूप में पद्मासन, वीरासन, भद्रासन आदि को कहा है। इन आसनों में सबसे महत्त्वपूर्ण यह है कि साधक चाहे किसी भी आसन का अभ्यास करे, परन्तु उस आसन में शरीर की स्थिरता और सुखपूर्वक स्थिति का होना अनिवार्य है। अर्थात् जिस आसन में शरीर के अङ्गों की चेष्टाओं = गतियों = प्रयत्नों का निषेध हो सके, ताकि बाह्य अङ्गों की किसी प्रकार की गति = चेष्टा चित्त की स्थिरता में बाधक न बन सके। और आसन में सुखपूर्वक स्थिति से अभिप्राय है कि आसन के दीर्घकालीन सम्पादन से शरीर के अङ्गों में किसी प्रकार की पीड़ा का न होना। जब साधक आसन के एक-आध घण्टे के अभ्यास से ही पीड़ा का अनुभव करेगा तो आसन में स्थिरता नहीं रह पायेगी और परिणामस्वरूप चित्त की एकाग्रता भी नष्ट हो जायेगी। गीता में आसन की विधि को निम्न प्रकार से कहा है—

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥

गीता॰ ६.१०-१३॥

अर्थात् एकान्त में स्थित, अकेला, चित्त और आत्मा को वश में किये हुए, परमात्मचिन्तन से अतिरिक्त अन्य विषयवासनाओं से रहित, अन्य पदार्थों में ममता रहित योगी निरन्तर अपने आपको एकाग्र करता रहे॥ ऐसे स्थान में जहाँ भूमि, जल, वायु शुद्ध हो, जो न बहुत ऊँचा और न बहुत नीचा हो, वहाँ नीचे वस्त्र, फिर मृगचर्म और उसके ऊपर कुश का आसन बिछाकर उस पर एकाग्र मन से चित्त और इन्द्रियों की वृत्तियों का निरोध करके, निश्चल दृढ़ आसनपूर्वक स्वयं बैठकर अपने आत्मा की शुद्धि के लिए योगसाधना करे॥ अपने धड़ शिर और गर्दन को अचल और सीधा धारण किए हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग में ध्यान ठहराकर स्थिर होकर बैठे। और इधर-उधर किसी दिशा में दृष्टि न करे॥

अतः आसन समतल स्थल पर, शरीर की अवस्था के अनुकूल, एकान्त, पवित्र एवं शुद्ध वायु वाले स्थान में होना चाहिए। महर्षि व्यास ने आसनों में सोपाश्रय को कहा है जिसका तात्पर्य है कि सहारे के साथ आसन। इसका अभिप्राय यह है कि अगर शरीर में किसी प्रकार का रोग, यथा पीड़ादि हो और साधक को आसन के अभ्यास में किसी दीवार आदि का सहारा लेने से सुविधा होती हो, तो वैसा ही उपाय कर लेना चाहिए।

साधना में आसन-विशेष का कोई नियम नहीं है, परन्तु आसन का स्थिर और सुखपूर्वक होना ही आवश्यक है। अतः महर्षि व्यास ने यथासुखम् कहा है अर्थात् साधक जिस किसी आसन में सुखपूर्वक स्थिर होकर बैठ सके, उसी आसन का अभ्यास करना चाहिए। योग-साधना करने वाले बहुधा पद्मासन या सिद्धासन का प्रयोग करते हैं। कुछ लोग रोगविशेष होने पर शवासन को भी सहायक मानते हैं, परन्तु शवासन में निद्रा का प्रभाव शीघ्र हो जाने से यह आसन साधना में विशेष सहायक नहीं हो पाता। यदि साधक निद्रा पर विजय प्राप्त कर सके तो विशेष परिस्थितियों में शवासन भी सहायक हो सकता है। वरन् साधक को बैठने वाले ही किसी आसन का अभ्यास करना चाहिए॥