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Saadhana Paada / Means / 47
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Saadhana Paada / Means / 47

प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्॥४७॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 47

In Hindi:

पदपाठ : प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्॥

हिंदी में अर्थ : (प्रयत्नशैथिल्यानन्तसमापत्तिभ्याम्) समस्त शारीरिक प्रयत्नों = चेष्टाओं को रोक देने से और अनन्त = आकाश अथवा असीम सर्वव्यापक परमात्मा में समापत्ति = तद्रूपता = तदाकार प्रतीति करने से आसन की सिद्धि होती है॥

व्यास भाष्य : भवतीति वाक्यशेषः। प्रयत्नोपरमात्सिध्यत्यासनं येन नाङ्गमेजयो भवति। अनन्ते वा समापन्नं चित्तमासनं निर्वर्त्तयतीति॥

हिंदी में अर्थ : (भवति इति वाक्यशेषः) “भवति = होती है” यह सूत्र का शेष है।

(प्रयत्नोपरमात्) शरीर के प्रयत्नों = चेष्टाओं को रोक देने से (आसनम्) आसन (सिध्यति) सिद्ध होता है, (येन) जिससे (अङ्गमेजयो) शरीर के अङ्गों में कम्पन (न भवति) नहीं होता। (वा) और (अनन्ते) अनन्त = असीम आकाश वा परमात्मा में (समापन्नम्) समापत्ति = तदाकारता को प्राप्त हुआ (चित्तम्) साधक का चित्त (आसनम्) आसन को (निर्वर्त्तयति इति) दृढ़ = सिद्ध करता है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में आसन की स्थिरता और सुखपूर्वक सिद्धि के लिए दो उपायों का निर्देश किया गया है। १. शरीर के प्रयत्नों को शिथिल करना; तथा २. अनन्त = असीम सर्वव्यापक परमात्मा में समापत्ति। इन दोनों उपायों को अपनाने से साधक आसन की सिद्धि को प्राप्त करता है।

साधक जिस किसी भी आसन का अभ्यास करे, उस आसन के अभ्यास काल में सर्वप्रथम कर्त्तव्य यह होता है कि वह शरीर के बाह्य प्रयत्नों, अङ्गों की चेष्टाओं को शिथिल कर देवे = रोक देवे। बाहर से ज्ञान प्राप्त करने के साधन — इन्द्रियों से किसी भी प्रकार के प्रयत्न को न करे। अर्थात् आँख को खोलना-बन्द करना, घ्राण से गन्ध आदि को लेना, कान से बाहर के शब्द, ध्वनि = संगीत आदि को सुनना, रसना से किसी रस को ग्रहण करना, त्वचा से बाह्य स्पर्श आदि के रूप में किसी भी प्रकार के प्रयत्न को न करे। इसके लिए यह आवश्यक है कि साधक को आसन का अभ्यास किसी एकान्त, स्वच्छ स्थल में करना चाहिए। उसे ऐसा प्रयास करना चाहिए कि शरीर के किसी भी अङ्ग में किसी भी प्रकार से कम्पन न हो क्योंकि किसी भी प्रकार के बाह्य प्रयत्न के होने से आसन की स्थिरता नहीं रह पाती।

आसन सिद्धि के लिए दूसरा महत्त्वपूर्ण उपाय है — अनन्त में समापत्ति। भोज ने अनन्त शब्द से अनन्त आकाश का ग्रहण किया है। परन्तु बाद के पौराणिक काल के भाष्यकारों ने अनन्त शब्द से शेषनाग का ग्रहण कर उसमें समापत्ति को कहा है। यह व्यर्थ की कल्पना वेद विरुद्ध ग्रन्थों में प्रतिपादित मान्यताओं के कारण बनी है। वस्तुतः परमात्मा ही एकमात्र अनन्त = असीम और सर्वव्यापक है; और परमात्मा के बाद अनन्त शब्द से आकाश का ही ग्रहण सम्भव हो सकता है। अतः भोज द्वारा अनन्त शब्द से आकाश का ग्रहण उत्तर काल में भाष्यकारों की अपेक्षा से अधिक उचित है।

“न विद्यतेऽन्तोऽवधिर्मर्यादा यस्य तदनन्तम्” अर्थात् जिसका अन्त, अवधि मर्यादा अर्थात् इतना लम्बा, चौड़ा, छोटा, बड़ा है ऐसा परिणाम नहीं है इसलिए परमेश्वर का नाम अनन्त है। (सत्यार्थप्रकाश प्रथम समुल्लास) जब साधक अनन्त परमात्मा में समापत्ति = तदाकारता को करता, उसमें चित्त को पूर्णरूपेण तल्लीन कर देता तो आसन सिद्ध होता है। वस्तुतः चित्त में वृत्ति बाहुल्य से चित्त स्वभावतः विभिन्न पदार्थों = विषयों से सम्बद्ध होता ही रहता है। परन्तु अनन्त परमात्मा का आश्रय होने से चित्त जहाँ कही भी जाता है वहाँ परमात्मा की उपस्थित पाकर, विकार रहित होकर, स्थिर हो जाता है। अतः आसन सिद्धि हेतु “अनन्त” शब्द से परमात्मा में समापत्ति का ग्रहण किया गया है।

परन्तु आरम्भ में साधक परमात्मा में तदाकारता को प्राप्त करने में समर्थ नहीं हो पाता। ऐसा साधक “अनन्त” शब्द से आकाश का ग्रहण कर उसमें समापत्ति करने से आसन को सिद्ध करने में सफल हो सकता है। क्योंकि परमात्मा के बाद आकाश ही सूक्ष्म, अनन्त और निराकार है; और साधक वहाँ भी चित्त को व्यवधान रहित तदाकारता की प्राप्ति द्वारा, एकाग्र करने में सक्षम हो जाता है।