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Saadhana Paada / Means / 6
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Saadhana Paada / Means / 6

दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता॥६॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 6

In Hindi:

पदपाठ : दृग्दर्शनशक्त्योः एकात्मता एव अस्मिता॥

हिंदी में अर्थ : (दृक्-दर्शन-शक्त्योः) दृक्शक्ति = पुरुष = जीवात्मा = ज्ञान प्राप्त करने वाला और दर्शन शक्ति = बुद्धि = ज्ञान का साधन = ज्ञान प्राप्त कराने वाली की (एकात्मता इव) एक रूपता जैसी प्रतीति (अस्मिता) अस्मिता नामक क्लेश है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “(अस्मिता) दूसरा क्लेश ‘अस्मिता’ कहाता है अर्थात् जीव और बुद्धि को मिले के समान देखना, अभिमान और अंहकार से अपने को बड़ा समझना इत्यादि व्यवहार को अस्मिता जानना। जब सम्यक् विज्ञान से अभिमान आदि के नाश होने से इसकी निवृत्ति हो जाती है, तब गुणों के ग्रहण में रुचि होती है।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषयः)

व्यास भाष्य : पुरुषो दृक्शक्तिर्बुद्धिर्दर्शनशक्तिरित्येतयोरेकस्वरूपापत्तिरिवास्मिता क्लेश उच्यते। भोक्तृभोग्य- शक्त्योरत्यन्तविभक्तयोरत्यन्तासंकीर्णयोरविभागप्राप्ताविव सत्यां भोगः कल्पते। स्वरूपप्रतिलम्भे तु तयोः कैवल्यमेव भवति कुतो भोग इति। तथा चोक्तम्—‘बुद्धितः परं पुरुषमाकारशीलविद्यादिभिर्विभक्तम- पश्यन्कुर्यात्तत्राऽऽत्मबुद्धिं मोहेन इति ॥

हिंदी में अर्थ : (पुरुषः) पुरुष = जीवात्मा (दृक्शक्तिः) देखने = ज्ञान प्राप्त करने वाली शक्ति है; और (बुद्धिः) बुद्धि (दर्शनशक्तिः) ज्ञान कराने का साधन रूप शक्ति है। (इति एतयोः) इस प्रकार इन दोनों की पृथक्-पृथक् सत्ता होने पर भी, (एकस्वरूपापत्तिः इव) एक स्वरूप = एकरूपता जैसी प्रतीति का होना ही (अस्मिता क्लेशः) अस्मिता नामक क्लेश (उच्यते) कहा जाता है। (भोक्तृभोग्यशक्त्योः) भोक्तृशक्ति अर्थात् भोगने वाला पुरुष = चेतन आत्मा और भोग्यशक्ति अर्थात् भोक्ता के अधीन जड़, अनात्मा बुद्धि (अत्यन्तविभक्तयोः) सर्वथा भिन्न और (अत्यन्तासंकीर्णयोः) परस्पर अमिश्रित, विलक्षण होते हुए भी इन दोनों की (अविभागप्राप्तौ इव) मिली हुई = एकाकार = एकरूप जैसी प्रतीति के (सत्याम्) होने पर ही (भोगः) सुख-दुःख आदि साक्षात्कार रूप भोग (कल्पते) सिद्ध होता है। और (तयोः) इन दोनों के (स्वरूपप्रतिलम्भे) स्वरूप की ख्याति = विवेकख्याति हो जाने पर (तु) तो (कैवल्यम् एव) कैवल्य = मोक्ष ही (भवति) हो जाता है; ऐसी स्थिति होने पर (कुतो भोगः इति) भोग कैसे ? (तथा च उक्तम्) और ऐसा कहा भी है — (बुद्धितः) परिणामी, जड़, अनात्म, अनित्य बुद्धि से भिन्न (परम्) परे उत्कृष्ट = सूक्ष्म (पुरुषम्) पुरुष जो कि (आकारशीलविद्यादिभिः) आकार = शुद्ध, अविकारी, चेतन स्वरूप; शील = नित्य, असङ्ग; विद्या = ज्ञानादि गुणों = धर्मों वाला है, को (विभक्तम्) बुद्धि से पृथक् (अपश्यन्) न देखता हुआ सांसारिक मनुष्य (मोहेन) मोह = अविद्या के कारण (तत्र) उस अचेतन बुद्धि में (आत्मबुद्धिम्) आत्मा की भ्रान्ति (कुर्यात् इति) करता है; अर्थात् बुद्धि को ही आत्मा समझता है॥

वैदिक योग मीमांसा : अविद्या की व्याख्या करने के पश्चात् अविद्या के कारण होने वाले अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश क्लेशों में सर्वप्रथम अस्मिता के स्वरूप को बताया जा रहा है।

जीवात्मा = पुरुष ज्ञान गुण वाला है, ज्ञान प्राप्त करने वाला तथा भोगों को प्राप्त करने एवं भोगने वाला है। वह स्वरूपतः शुद्ध = सत्त्वादि गुणों से रहित, अविकारी, अपरिणामी, चेतन, नित्य, असङ्ग है। दूसरी ओर बुद्धि जो जीवात्मा से सर्वथा पृथक् स्वभाव एवं स्वरूप वाली है, यथा — ज्ञान प्राप्त कराने का साधन तथा पुरुष के आधीन जड़, पुरुष से भिन्न अनात्म पदार्थ, प्रकृति का प्रथम विकार, सत्त्व बहुल परिणाम परन्तु रजोगुण और तमोगुण के मिश्रण से भी युक्त, आगे भी विकार एवं परिणाम को प्राप्त होने वाली, अहंकार का कारण, अनित्य = कार्य पदार्थ है। यह दोनों ही पदार्थ स्वभाव और स्वरूप से सर्वथा भिन्न-भिन्न है तथा एक दूसरे से विलक्षण तथा आपस में किसी भी प्रकार के मिश्रण से सर्वथा रहित है। दोनों ही एक-दूसरे के स्वरूप को न तो प्राप्त करते, और न ही कर सकते हैं। अर्थात् पुरुष के गुण बुद्धि में नहीं आ सकते और इसी प्रकार बुद्धि के गुण भी पुरुष आरोपित नहीं किए जा सकते। ऐसी अवस्था में भी इन दोनों की एकरूपता जैसी प्रतीति का होना ही “अस्मिता” नामक क्लेश है। वस्तुतः इन दोनों की एकरूपता जैसी प्रतीति के होने पर ही जीवात्मा सुख-दुःखादि भोगों को प्राप्त करता है। इन दोनों के पृथक्-पृथक् स्वरूप की ख्याति = विवेकख्याति हो जाने पर तो पुरुष को मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।

अस्मिता रूपी क्लेश से ग्रस्त होने के कारण ही व्यक्ति बुद्धि गुणों को स्वयं में आरोपित करता है और अंहकार से ग्रस्त रहता हुआ वह “अहमस्मि” — “मैं हूँ” जैसा व्यवहार करता है। मनुष्य मात्र सामान्यतया यह व्यवहार करता है कि “मैं मूढ़ हूँ”; “मैं शान्त हूँ”; “मैं बुद्धिमान् हूँ”; “मैं क्रोधित हूँ”; “मैं लोभ से ग्रस्त हूँ”; “मैं घोर हूँ” इत्यादि। इस प्रकार के व्यवहारों से ही व्यक्ति अपने आप को प्रभुता-सम्पन्न, भोग-सम्पन्न, सिद्ध, बलवान्, सुखी, दुःखी आदि मानता है और समाज में अपने को सर्वश्रेष्ठ भी मानता है। वह अल्प सामर्थ्यवान् होता हुआ भी अपने को सामर्थ्यशाली मानता है। इस प्रकार के अज्ञान से ही मोहित रहने के कारण व्यक्ति अपना तथा दूसरों का भी अहित ही करता है। इसी अविद्या के कारण ही व्यक्ति इस बुद्धि और प्रकृति के गुणों को आत्म-गुण मानता हुआ, इन गुणों के अनुकूल ही व्यवहार करता हुआ, इनको दूर करने हेतु पुरुषार्थ नहीं करता।

महर्षि दयानन्द ने इस क्लेश की निवृत्ति का उपाय सम्यक् विज्ञान कहा है। बुद्धि और आत्मा के स्वरूप और गुणों का सम्यक् यथार्थ ज्ञान = साक्षात्कार होने से ही अभिमान का नाश होने पर अस्मिता रूपी क्लेश की भी निवृत्ति हो जाती है।