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Saadhana Paada / Means / 50
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Saadhana Paada / Means / 50

बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 50

In Hindi:

पदपाठ : बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः देशकालसंख्याभिः परिदृष्टः दीर्घसूक्ष्मः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : स तु —

हिंदी में अर्थ : (स तु) वह प्राणायाम तो —

हिंदी में अर्थ : (बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिः) बाह्य, आभ्यन्तर और स्तम्भवृत्ति प्राणायाम (देशकालसंख्याभिः) देश, काल और संख्या के साथ (परिदृष्टः) अभ्यास में लाया गया (दीर्घसूक्ष्मः) दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : और यह प्राणायाम चार प्रकार का होता है। (स तु बाह्या॰) अर्थात् एक बाह्यविषय, दूसरा आभ्यन्तर विषय, तीसरा स्तम्भवृत्ति। और चौथा जो बाहर भीतर रोकने से होता है।

वे चार प्राणायाम इस प्रकार से होते हैं कि जब भीतर से बाहर को श्वास निकले तब उसको बाहर ही रोक दे, इसे प्रथम प्राणायाम कहते हैं। जब बाहर से श्वास भीतर को आवे, तब उसको जितना रोक सके, उतना भीतर ही रोक दे, इसको दूसरा प्राणायाम कहते हैं। तीसरा स्तम्भवृत्ति है कि न प्राण को बाहर निकाले और न बाहर से भीतर ले जावे किन्तु जितनी देर सुख से रोक सके, उसको जहाँ का तहाँ, ज्यों का त्यों एकदम रोक दे। और चौथा यह है कि जब श्वास भीतर से बाहर को आवे तब बाहर ही कुछ-कुछ रोकता रहे और जब बाहर से भीतर जावे, तब उसको भी थोड़ा-थोड़ा रोकता रहे, इसको बाह्याभ्यन्तराक्षेपी कहते हैं और इन चारों का अनुष्ठान इसलिये है कि जिससे चित्त निर्मल होकर उपासना में स्थिर रहे। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

एक बाह्यविषय अर्थात् बाहर ही अधिक रोकना, दूसरा आभ्यन्तर अर्थात् जितना प्राण रोका जाय, उतना रोके। तीसरा स्तम्भवृत्ति अर्थात् एक ही बार जहाँ का तहाँ प्राण को यथाशक्ति रोक देना। (स० प्र० तृतीय०)

व्यास भाष्य : यत्र प्रश्वासपूर्वको गत्यभावः स बाह्यः। यत्र श्वासपूर्वको गत्यभावः स आभ्यन्तरः। तृतीयः स्तम्भवृत्तिर्यत्रोभयाभावः सकृत्प्रयत्नाद्भवति। यथा तप्ते न्यस्तमुपले जलं सर्वतः संकोचमापद्यते तथा द्वयोर्युगपद्गत्यभाव इति। त्रयोऽप्येते देशेन परिदृष्टा इयानस्य विषयो देश इति। कालेन परिदृष्टाः क्षणानामियत्तावधारणेनावच्छिन्ना इत्यर्थः। संख्याभिः परिदृष्टा एतावद्भिः श्वासप्रश्वासैः प्रथम उद्घातस्तद्वन्निगृहीतस्यैतावद्भिर्द्वितीय उद्घात एवं तृतीयः एवं मृदुरेवं मध्य एवं तीव्र इति संख्यापरिदृष्टः। स खल्वयमेवमभ्यस्तो दीर्घसूक्ष्मः॥

हिंदी में अर्थ : (यत्र) जिस प्राणायाम में (प्रश्वासपूर्वकः) वायु को बाहर निकालकर (गति-अभावः) श्वास की स्वभाविक गति का अभाव होता है, (सः) वह (बाह्यः) बाह्य प्राणायाम कहाता है। (यत्र) जिस प्राणायाम में (श्वासपूर्वकः) बाहर के वायु को भीतर लेकर (गति-अभावः) प्रश्वास की स्वाभाविक गति का अभाव होता है, (सः) वह (आभ्यन्तरः) आभ्यन्तर प्राणायाम कहाता है। (तृतीयः) तीसरा प्राणायाम (स्तम्भवृत्तिः) स्तम्भवृत्ति है (यत्र) जिसमें (उभयाभावः) श्वास-प्रश्वास दोनों की गतियों का अभाव (सकृत्प्रयत्नात्) एक ही साथ प्रयत्न से (भवति) होता है। (यथा) जैसे (तप्ते उपले) तप्त हुए पत्थर पर (न्यस्तम् जलम्) डाला हुआ जल (सर्वतः) सब ओर से (संकोचम् आपद्यते) संकुचित हो जाता है (तथा) वैसे ही स्तम्भवृत्ति प्राणायाम में (द्वयोः) श्वास-प्रश्वास दोनों की (गति-अभाव) गति का अभाव (युगपत्) एक साथ (इति) हो जाता है। (त्रयः अपि एते) ये तीनों ही प्राणायाम (देशेन) देश से (परिदृष्टाः) परीक्षित होते हैं, जैसे (इयान देशः) इतना देश (अस्य) इस प्राणायाम का (विषय इति) विषय है। इसी प्रकार (कालेन) काल से (परिदृष्टाः) परीक्षित अर्थात् (क्षणानाम्) क्षणों की (इयत्तावधारणेन) इयत्ता = संख्या का निश्चय कराने वाले काल के द्वारा (अवच्छिन्नाः) निर्धारित किए गए अर्थात् इतने-इतने क्षणों तक किया गया (इति अर्थः) यह अर्थ है। (संख्याभिः) संख्याओं के द्वारा (परिदृष्टाः) परीक्षित प्राणायाम अर्थात् (एतावद्भिः) इतने (श्वासप्रश्वासैः) श्वास-प्रश्वासों से (प्रथमः) प्रथम (उद्घातः) उद्घात, (तद्वत्) वैसे ही (निगृहीतस्य) स्तम्भित प्राणायाम का (एतावद्भिः) इतने श्वास-प्रश्वासों से (द्वितीयः) दूसरा (उद्घातः) उद्घात (एवम्) इसी प्रकार (तृतीयः) इतने श्वास-प्रश्वासों से तीसरा उद्घात होता है। (एवम् मृदुः) इस प्रकार मृदु प्राणायाम, (एवम् मध्यः) इस प्रकार मध्य प्राणायाम और (एवम् तीव्रः) इस प्रकार तीव्र प्राणायाम (इति) इस प्रकार (संख्यापरिदृष्टः) संख्या से परिदृष्ट = परीक्षित प्राणायाम होते हैं। (सः खलु अयम्) वह यह तीन प्रकार का प्राणायाम (एवम् अभ्यस्तः) इस प्रकार = देश, काल और संख्या से अभ्यास किया जाने पर (दीर्घसूक्ष्मः) दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : योग साधक के लिए साधना में सम्यक् रूप से आगे बढ़ने हेतु प्राणायाम का विधान है। इस प्राणायाम के सम्यक् अनुष्ठान से ही साधक में आगे के अङ्गों की योग्यता बनती है।

योग साधक के लिए चार प्रकार के प्राणायामों का विधान है, और इन्हीं के सम्यक् अनुष्ठान से ही साधक धारणा, ध्यान और समाधि को क्रमशः सिद्ध करनें में सक्षम हो जाता है। इस सूत्र में प्रथम तीन प्रकार के प्राणायामों का वर्णन है, जो कि निम्न प्रकार से हैं —

१. बाह्यविषय — जब भीतर के वायु को प्रश्वास द्वारा बाहर निकाल कर श्वास को रोक दिया जाता है तो यह बाह्य विषय प्राणायाम कहलाता है। इस प्राणायाम को करते हुए बाहर ही जितना श्वास को सुखपूर्वक रोका जा सके उतना ही रोकना चाहिए, फिर धीरे-धीरे श्वास को भीतर लेना चाहिए। इस प्रकार यह एक प्राणायाम होता है।

सत्यार्थप्रकाश के तृतीय समुल्लास में महर्षि दयानन्द लिखते हैं — “जैसे अत्यन्त वेग से वमन होकर अन्न जल बाहर निकल जाता है वैसे प्राण को बल से बाहर फेंक के बाहर ही यथाशक्ति रोक देवे। जब बाहर निकालना चाहे तब मूलेन्द्रिय को ऊपर खींच रक्खे तब तक प्राण बाहर रहता है। इसी प्रकार प्राण बाहर अधिक ठहर सकता है, जब गभराहट हो तब धीरे-२ भीतर वायु को लेके फिर भी वैसे ही करता जाए जितना सामर्थ्य और इच्छा है। और मन में (ओ३म्) इसका जप करता जाए इस प्रकार करने से आत्मा और मन की पवित्रता और स्थिरता होती है।”

इस प्रकार से निरन्तर नित्यप्रति नियमपूर्वक अभ्यास करने से प्राण साधक के वश में हो जाते हैं।

२. आभ्यन्तर विषय — जब बाहर के वायु को श्वास द्वारा भीतर लेकर भीतर ही रोक दिया जाता है तो यह आभ्यन्तर विषय प्राणायाम कहलाता है। इस प्राणायाम में मूलेन्द्रिय को संकुचित करने की आवश्यकता नहीं होती। वरन् जितना सुखपूर्वक वायु को भीतर रोका जा सके उतना ही रोकना चाहिए। इस प्रकार यह एक प्राणायाम कहलाता है।

३. स्तम्भवृत्ति — इस प्राणयाम में श्वास और प्रश्वास दोनों की गतियों का अभाव होता है; और वायु को एकदम जहाँ का तहाँ, ज्यों का त्यों ध्यान द्वारा रोक दिया जाता है। इस में उदाहरण दिया है कि जैसे तपते हुए पत्थर पर जल डाला जाए तो वह सब ओर से संकुचित हो जाता है। वस्तुतः जल नीचे गिरने पर अपने स्थान से चारों ओर फैलता है परन्तु तप्त हुए पत्थर पर विपरीत आचरण करता है अर्थात् एक स्थान पर सिकुड़ने लगता है। इसी प्रकार इस प्राणायाम में एक साथ प्रयत्नपूर्वक श्वास और प्रश्वास दोनों की गतियों को रोका जाता है। जब तक ऐसा सुखपूर्वक रोका जा सके तभी तक रोकना चाहिए। फिर स्वाभाविक श्वास को लेना चाहिए।

ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के उपासना विषय में महर्षि दयानन्द इस सूत्र पर व्यासभाष्य के उपरान्त लिखते हैं — “बालबुद्धिभिरङ्ल्यङ्गुष्ठाभ्यां नासिकाछिद्रमवरुध्य यः प्राणायामः क्रियते स खलु शिष्टैस्त्याज्य एवास्ति। किन्त्वत्र बाह्याभ्यन्तराङ्गेषु शान्तिशैथिल्ये सम्पाद्य सर्वाङ्गेषु यथावत् स्थितेषु सत्सु, बाह्यदेशं गतं प्राणं तत्रैव यथाशक्ति संरुध्य प्रथमो बाह्याख्यः प्राणायामः कर्त्तव्यः। तथोपासकैर्यो बाह्याद्देशादन्तः प्रविशति तस्याभ्यन्तर एव यथाशक्ति निरोधः क्रियते, स आभ्यन्तरो द्वितीयः सेवनीयः। एवं बाह्याभ्यन्तराभ्यामनुष्ठिताभ्यां द्वाभ्यां कदाचिदुभयोर्युगपत्संरोधो यः क्रियते स स्तम्भवृत्तिस्तृतीयः प्राणायामोऽभ्यसनीयः॥”

अर्थात् — बालबुद्धि अर्थात् प्राणायाम की क्रिया और योगविद्या में अनभिज्ञ लोग अंगुलियों और अंगूठे से नासिका छिद्रों को बन्द करके जो प्राणायाम रूपी क्रिया करते हैं, वह शिष्ट विद्वानों के लिए त्याज्य = छोड़ देने योग्य है। किन्तु बाह्य और आभ्यन्तर इन्द्रियों और अङ्गों में शान्ति और शिथिलता = निश्चलता का सम्पादन कर अर्थात् चित्त की सम्पूर्ण वृत्तियों तथा मन और इन्द्रियों की चञ्चलता और चेष्टा को रोककर अन्तःकरण को रागद्वेषादि दुष्टाचारों से हटाकर; सब अङ्गों को यथावत् स्थिर करके अर्थात् सुख से सुस्थिर आसन में बैठकर बाहर निकाले हुए प्राण को यथाशक्ति रोककर प्रथम “बाह्य प्राणायाम” किया जाता है। तथा बाहर से जो वायु देह में प्रवेश करता है उसको जो उपासक जब भीतर ही यथाशक्ति निरोध करते हैं, वह दूसरा अर्थात् “आभ्यन्तर प्राणायाम” कहाता है। इस प्रकार बाह्य और आभ्यन्तर प्राणायामों का अनुष्ठान सीखकर श्वास और प्रश्वास दोनों का जब कभी जो युगपत् = एकसाथ अच्छे प्रकार निरोध किया जाता है, वह तीसरा “स्तम्भवृत्ति” नामक प्राणायाम अभ्यास करने योग्य हैं॥

ये तीनों प्राणायाम देश, काल और संख्या से परिदृष्ट = उपलक्षित = परीक्षित होते हैं।

१. देशोपलक्षित — महर्षि व्यास के अनुसार देश से परीक्षित प्राणायाम का अभिप्राय है — “इयानस्य विषयो देश इति” अर्थात् इतना देश इस प्राणायाम का विषय है। यहाँ देश दो प्रकार के हैं — बाह्यदेश और आभ्यन्तर देश। स्वाभाविक प्रश्वास के समय प्रश्वास-वायु नासिका से लगभग १२ अंगुल बाहर तक जाता है। प्राणायाम के सम्यक् अभ्यास से प्रश्वास-वायु क्रमशः १२ अंगुल से कम होता हुआ अन्त में नासिका से बाहर नहीं जायेगा। इसी प्रकार से श्वास लेने के समय जब श्वास-वायु हमारे वक्षःस्थल की ओर आता है, उस पर ध्यान रखने से वह आभ्यन्तर देश की गति का नियन्त्रण है। अर्थात् इसप्रकार से यह जानना चाहिए कि श्वास-प्रश्वास इतने देश तक गति कर गया और इतने-इतने देश में गति का अभाव हो गया। इस प्रकार के ज्ञानपूर्वक परीक्षित प्राणायाम को देशोपलक्षित जानना चाहिए।

२. कालोपलक्षित — प्राणायाम का काल में परीक्षित होना। अर्थात् इतने काल = क्षणों तक प्राण की गति का अभाव किया गया। इसके लिए इतनी बार “ओ३म्” का मानसिक जप अथवा प्राणायाम मन्त्र — “ओं भूः, ओं भुवः, ओं स्वः, ओं महः, ओं जनः, ओं तपः, ओं सत्यम्” अथवा गायत्री मन्त्र का जप करना चाहिए। जितनी-जितनी जप की संख्या बढ़ती जाती है, उतना-उतना प्राणायाम का काल भी बढ़ता जाता है।

३. संख्योपलक्षित — प्राणायाम का संख्या द्वारा परीक्षित होना। इसको स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं — इतने श्वास-प्रश्वासों से प्रथम उद्घात, इसी प्रकार द्वितीय और तृतीय उद्घात। उद्घात शब्द का प्राणायाम में निम्न अर्थ किया जाता है — स्वस्थ मनुष्य के एक बार श्वास-प्रश्वास लेने में जो समय लगता है, उसे ‘मात्रा’ कहते हैं। प्रथम उद्घात १२ मात्राओं का होता है; द्वितीय उद्घात २४ मात्राओं का और तृतीय उद्घात ३६ मात्राओं का होता है। साधक इस प्रकार प्राण को बढ़ाता हुआ प्रथम १२ मात्राओं, फिर २४ मात्राओं और फिर ३६ मात्राओं के स्तर तक पहुँच जाता है। एक उद्घात वाला प्राणायाम मृदु कहलाता है; दो उद्घात का प्राणायाम मध्य और तीन उद्घात का प्राणायाम तीव्र कहलाता है।

उपर्युक्त प्रकार से अभ्यास किया हुआ प्राण दीर्घ और सूक्ष्म हो जाता है। इस प्रकार दीर्घ और सूक्ष्म हुआ प्राण आगे चल कर समाधि की सिद्धि में विक्षेप, विक्षेप-सहुभव नहीं बनता।

वर्त्तमान काल में इन प्राणायामों को रेचक, पूरक और कुम्भक नामों से कहा जाता है। महर्षि व्यास ने इन प्राणायामों को इन नामों से नहीं कहा; और न ही महर्षि दयानन्द ने भी इनके लिए इन शब्दों का प्रयोग किया है। रेचक, पूरक, कुम्भक शब्दों का प्रयोग भोजवृत्ति और हठयोग के ग्रन्थों में ही हुआ है। अतः इस शब्दावलि का ऋषि परम्परा में प्रयोग न होने से इनको त्याज्य ही जानना चाहिए और आधुनिक हठयोग के ग्रन्थों में प्रयुक्त शब्दों से इनका सामञ्जस बैठाने का प्रयास सर्वथा अनुचित ही जानना चाहिए।