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Saadhana Paada / Means / 52
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Saadhana Paada / Means / 52

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥५२॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 52

In Hindi:

पदपाठ : ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥

हिंदी में अर्थ : (ततः) उस प्राणायाम के अभ्यास से (प्रकाशावरणम्) विवेकज्ञान का आवरण = अज्ञान, अविद्या (क्षीयते) क्षीण हो जाता है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : एवं प्राणायामभ्यासाद्यत्परमेश्वरस्यान्तर्यामिनः प्रकाशे सत्यविवेकस्यावरणाख्यमज्ञानमस्ति, तत्क्षीयते क्षयं प्राप्नोतीति॥” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

संस्कृत का भावार्थ — इस प्रकार प्राणायाम के अभ्यास से, (जीवात्मा की बुद्धि में) अन्तर्यामी परमेश्वर के प्रकाश = ज्ञान में जो सत्य विवेक का आवरण नामक अज्ञान है, वह क्षीणता को प्राप्त होता है॥

और इन चारों का अनुष्ठान इसलिये है कि जिस से चित्त निर्मल होकर उपासना में स्थिर रहे।

इस प्रकार प्राणायाम पूर्वक उपासना करने से आत्मा के ज्ञान का ढकने वाला आवरण जो अज्ञान है वह नित्यप्रति नष्ट होता जाता है और ज्ञान का प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ता जाता है। (ऋ० भू॰ उपासना॰)

ऐसे एक दूसरे के विरुद्ध क्रिया करें तो दोनों की गति रुककर प्राण अपने वश में होने से मन और इन्द्रियाँ भी स्वाधीन होते हैं। बल पुरुषार्थ बढ़कर बुद्धि तीव्र सूक्ष्मरूप हो जाती है कि जो बहुत कठिन और सूक्ष्म विषय को भी शीघ्र ग्रहण करती है। इससे मनुष्य शरीर में वीर्यवृद्धि को प्राप्त होकर स्थिर, बल, पराक्रम, जितेन्द्रियता, सब शास्त्रों को थोड़े ही काल में समझकर उपस्थित कर लेगा। स्त्री भी इसी प्रकार योगाभ्यास करे॥ (स० प्र० तृतीय०)

जब मनुष्य प्राणायाम करता है तब प्रतिक्षण उत्तरोत्तर काल में अशुद्धि का नाश और ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। जब तक मुक्ति न हो तब तक उसके आत्मा का ज्ञान बराबर बढ़ता जाता है॥ (स० प्र० तृतीय०)

व्यास भाष्य : प्राणायामानभ्यस्यतोऽस्य योगिनः क्षीयते विवेकज्ञानावरणीयं कर्म। यत्तदाचक्षते—महामोहमयेनेन्द्रजालेन प्रकाशशीलं सत्त्वमावृत्य तदेवाकार्ये नियुङ्क्त इति। तदस्य प्रकाशावरणं कर्म संसारनिबन्धनं प्राणायामाभ्यासाद् दुर्बलं भवति प्रतिक्षणं च क्षीयते। तथा चोक्तम्—तपो न परं प्राणायामात्ततो विशुद्धिर्मलानां दीप्तिश्च ज्ञानस्येति॥

हिंदी में अर्थ : (प्राणायामान्) प्राणायामों का (अभ्यस्यतः) अभ्यास करने वाले (अस्य) इस (योगिनः) योगी के (विवेकज्ञानावरणीयम्) विवेकज्ञान को आवरण करने वाले (कर्म) कर्म = अविद्या, अज्ञान जनित कर्म और उसके संस्कार तथा ऐसे कर्मों का कारण अविद्यादि क्लेश (क्षीयते) क्षीण हो जाते हैं। (यत् तत्) जिसके सम्बन्ध में (आचक्षते) अन्य आचार्य भी कहते हैं कि (महामोहमयेन) महामोहमय = राग से परिपूर्ण (इन्द्रजालेन) इन्द्रजाल = कलात्मक आवरण करने वाले जाले से (प्रकाशशीलम् सत्त्वम्) प्रकाश = ज्ञान स्वरूप बुद्धि को (आवृत्य) आच्छादित = आवृत्त कर (तदेव) वह कर्म संस्कार ही (अकार्ये) अकार्य = अकर्त्तव्य एवं निषिद्ध कर्मों में (नियुङ्क्त इति) लगाता है। (तत्) वह (अस्य) इस योगी का (प्रकाशावरणम्) प्रकाश = विवेक ज्ञान को आवृत्त करने वाला और (संसारनिबन्धनम्) संसारचक्र = आवागमन के चक्र में बाँधने वाला (कर्म) अविद्या-अज्ञान जनित कर्म और उसका संस्कार (प्राणायामाभ्यासात्) प्राणायाम के अभ्यास से (दुर्बलम्) दुर्बल (भवति) होता है, (च) और (प्रतिक्षणम्) प्रतिक्षण = लगातार (क्षीयते) क्षीण होता है। (तथा च उक्तम्) और वैसा कहा भी है — (प्राणायामात्) प्राणायाम से (परम्) श्रेष्ठ अन्य कोई (तपः न) तप नहीं है, (ततः) उससे (मलानाम्) चित्त के मलों की (विशुद्धिः) शुद्धि = निवृत्ति होती है (च) और (ज्ञानस्य) ज्ञान की (दीप्तिः इति) दीप्ति होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : साधक जब प्राणायाम का सम्यक् अभ्यास करता हुआ प्राण को दीर्घ और सूक्ष्म करने में सफल हो जाता है तो प्राणायाम रूपी तप के बल से उसके चित्त में विवेक ज्ञान को ढकने वाला, अविद्या अज्ञान जनित कर्म क्षीण होता है। इस अवस्था में केवल अविद्या अज्ञान जनित कर्म ही क्षीण नहीं होता वरन् इन कर्मों का कारण अविद्या भी क्षीण होती है, और उसके साथ-साथ इन कर्मों के संस्कार भी क्षीण होते हैं। अतः जो-जो कारण चित्त की प्रकाशात्मक = ज्ञानात्मक वृत्ति को आवरण करने वाले होते हैं वे-वे क्षीण होते हैं। यहाँ महर्षि व्यास ने इन कर्मों के लिए इन्द्रजाल शब्द का प्रयोग किया है। इन्द्रजाल का अभिप्राय है कि जो पदार्थ जैसा है उसे उससे भिन्न रूप में दर्शाना। अतः यहाँ परिणाम, ताप और संस्कार दुःख और गुणवृत्ति विरोध के कारण दुःख बहुल विषयों और संसार का, सुखरूप में प्रतीत होना ही इन्द्रजाल है। अविद्या जनित कर्म, इन्द्रजाल के समान, संसार के विषयों में राग-मोह को उत्पन्न कर, वैसे ही संस्कारों को बनाते हुए, पुरुष को अकार्यों में लगाते हैं। यहाँ अकार्यों में सभी प्रकार के अधर्म; अकर्त्तव्य कर्म = जिन कर्मों का शास्त्रों में विधान नहीं है; निषिद्ध कर्म = जिन कर्मों का शास्त्रों में निषेध है; रागादि से युक्त होकर किया जाने वाला धर्म; तथा सभी प्रकार के पाप-पुण्य से मिश्रित कर्मों का ग्रहण होता है। इस प्रकार के कर्म, चित्त की ज्ञानात्मक वृत्ति के आवरण बनकर, पुरुष को संसारचक्र में बाँधने वाले बनते हैं।

इस आवरण को दूर करने का एक उपाय, वेद तथा अन्य वेदानुकूल शास्त्रों में प्राणायाम को भी कहा है। प्राणायाम के अभ्यास से विवेकज्ञान का आवरण क्षीण होता है। प्राणायाम से यह आवरण नष्ट नहीं होता, वरन् यह दुर्बल = क्षीण ही होता है। क्लेश और कर्मों की निवृत्ति तो धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति के बाद ही होती है, उससे पूर्व किसी अवस्था में नहीं। प्राणायाम के अभ्यास से होने वाले लाभों को वेद और उपनिषद् के आधार पर योगसूत्र १.३४ कर व्याख्या में विस्तारपूर्वक कहा है। प्राणायाम को महर्षि व्यास ने परम तप भी कहा है। इस सम्बन्ध में महाराज मनु के निम्न श्लोक द्रष्टव्य हैं —

प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः।

व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः॥

दह्यन्ते ध्यायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात॥

प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्विषम्।

प्रत्याहारेण संसर्गान्ध्यानेनानीश्वरान्गुणान्॥ मनु॰ ६.७०-७२॥

अर्थात् ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मवित् संन्यासी को उचित है कि ओंकारपूर्वक सप्तव्याहृतियों से विधिपूर्वक प्राणायाम, जितनी शक्ति हो उतने, करे; परन्तु तीन से तो न्यून प्राणायाम कभी न करे। यही संन्यासी का परम तप है॥१॥ क्योंकि जैसे अग्नि में तपाने और गलाने से धातुओं के मल नष्ट हो जाते हैं वैसे ही प्राणों के निग्रह से मन आदि इन्द्रियों के दोष भस्मीभूत हो जाते हैं॥२॥ इसलिए संन्यासी लोग नित्यप्रति प्राणायामों से आत्मा, अन्तःकरण और इन्द्रियों के दोष, धारणाओं से पाप, प्रत्याहार से संगदोष, ध्यान से अनीश्वरता के गुणों अर्थात् हर्ष, शोक और अविद्यादि जीव के दोषों को भस्मीभूत करे॥३॥

अतः इस प्रकार से, प्राणायाम के अभ्यास से दोष क्षीण होते, क्लेश-कर्म-संस्कार भी क्षीण होते और परिणामस्वरूप चित्त में ज्ञान का प्रकाश बढ़ता जाता है॥