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Saadhana Paada / Means / 7
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Saadhana Paada / Means / 7

सुखानुशयी रागः॥७॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 7

In Hindi:

पदपाठ : सुखानुशयी रागः॥

हिंदी में अर्थ : (सुखानुशयी) सुख भोग के पश्चात् अन्तःकरण में रह जाने वाला संस्कार = सुख और उसके साधनों के प्रति अभिलाषा = आकांक्षा (रागः) राग नामक क्लेश है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “तीसरा (सुखानु॰) राग अर्थात् जो-जो सुख संसार में साक्षात् भोगने में आते हैं, उनके संस्कार की स्मृति से जो तृष्णा के लोभ सागर में बहना है, इसका नाम राग है। जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को होता है कि सब संयोग, वियोग, संयोगवियोगान्त हैं अर्थात् वियोग के अन्त में संयोग और संयोग के अन्त में वियोग तथा वृद्धि के अन्त में क्षय और क्षय के अन्त में वृद्धि होती है, तब इसकी निवृत्ति हो जाती है।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषयः)

व्यास भाष्य : सुखाभिज्ञस्य सुखानुस्मृतिपूर्वः सुखे तत्साधने वा यो गर्धस्तृष्णा लोभः स राग इति॥

हिंदी में अर्थ : (सुखाभिज्ञस्य) सुख के अनुभव करने वाले व्यक्ति को (सुखानुस्मृतिपूर्वः) सुख के अनुरूप स्मृतिपूर्वक (सुखे) सुख में (वा) अथवा (तत्साधने) उस सुख के साधनों में (यः) जो (गर्धः) लालसा, (तृष्णा) इच्छा, (लोभः) लोभ = लोलुपता होती है; (सः) वह (रागः इति) राग नामक क्लेश है॥

वैदिक योग मीमांसा : पुरुष के बन्धन की हेतु अविद्या रूपी माता के कारण उत्पन्न होने वाले स्थूलतम क्लेश राग और द्वेष हैं। पुरुष जन्म-जन्मान्तर की अनवरत यात्रा में, संसार चक्र में उलझा हुआ, मनुष्य शरीर में आकर भी राग-द्वेष रूपी प्रबल क्लेशों से ग्रस्त रहता है।

व्यक्ति जब किन्हीं पदार्थों, साधनों से सुख का अनुभव करता है तो उसके चित्त में उस सुख के संस्कार बन जाते हैं। कालान्तर में उन संस्कारों की स्मृति पुनः उत्पन्न होती है, और वह उस स्मृति के कारण सुख और उस सुख के साधनों को पुनः प्राप्त करने के लिए लालसा, लोभ, आकांक्षा करता है। यह जो उस सुख और सुख-साधनों को प्राप्त करने की तृष्णा, लालसा है; वही राग कहा जाता है। अतः सुख ही राग का कारण है; और विषयों में तन्मयता होने से भी राग उत्पन्न होता है।

यह राग और इसका विरोधी द्वेष, दोनों की अविद्या रूपी माता से उत्पन्न होने वाले स्थूलतम दोष हैं। मानव मात्र इस संसार में आकर उपलब्ध चेतन और अचेतन भोग साधनों के प्रति राग से बंध जाता है। चेतन साधनों में माता, पिता, पत्नी / पति, पुत्र, मित्र, पशु आदि तथा अचेतन साधनों में गृह, सम्पत्ति आदि आते हैं। वह जिस-जिस साधन से जितना-जितना सुख प्राप्त करता है, उस-उस साधन के प्रति उतना-उतना राग से ग्रस्त हो जाता है। राग का विरोधी द्वेष भी इससे सम्बद्ध है अर्थात् इन सुख-साधनों की प्राप्ति में बाधक पदार्थों, व्यक्तियों, कारणों के प्रति वह उतना-उतना द्वेष से भी ग्रस्त हो जाता है। यह ऋषियों का सिद्धान्त है कि हमें जिस विषय में जितना राग होता है, परोक्ष रूप से उतनी मात्रा में द्वेष भी हमारे चित्त में स्थान बनाए होता है। अतः महर्षि कपिल ने कहा है —

रागविरागयोर्योगः सृष्टि॥ सांख्य २.९॥

अर्थात् राग और उसके विरोधी द्वेष रूपी व्यवहारों की भूमि यह सृष्टि है। यहाँ एक से राग है तो दूसरे में द्वेष है; इसी प्रकार किसी से द्वेष है तो दूसरे में राग है। इसी राग रूपी दोष से बन्धा हुआ मनुष्य अपनी स्वतन्त्रता को ही नष्ट कर बैठता है —

न कामचारित्वं रागोपहते शुकवत्॥ सांख्य ४.२५॥

अर्थात् राग के वशीवत् होने वाला मनुष्य त्याज्य मार्ग = अधर्म के त्यागने और ग्राह्य मार्ग = धर्म के ग्रहण करने में भी स्वतन्त्र नहीं हो पाता; जैसे कि पिञ्जरे में बन्द तोता अपनी स्वतन्त्रता से कही आ-जा नहीं सकता, उसी प्रकार राग रूपी पिञ्जरे में बन्धा मनुष्य धर्माधर्म में स्वतन्त्र नहीं हो पाता। राग के कारण ही वह अधर्म मार्ग पर चलता हुआ अपने कर्माशय को क्लिष्ट ही बनाता जाता है।

अतः राग होने पर मनुष्य में बहुत से दोष आ जाते हैं जिनको महर्षि कपिल ने इस प्रकार से कहा है—

न मलिन चेतस्युपदेशबीजप्ररोहोऽजवत्॥ सांख्य ४.२९॥

राग से मलिन हुए चित्त में ज्ञान, वैराग्य, धर्म के उपदेश रूपी बीज का अङ्कुर नहीं उग पाता। जैसे भार्या के राग से भरे हुए अज नामक राजा के चित्त में ऋषि वसिष्ठ का उपदेश फलदायी नहीं हो पाया। विषयों में आसक्ति = राग होने पर, चित्त में ज्ञान स्थिर नहीं होता। ऐसे चित्त में ज्ञान तो ज्ञान, ज्ञान का साधारण आभास भी नहीं होता —

नाभासमात्रामपि मलिनदर्पणवत्॥ सांख्य ४.३०॥

राग से लिप्त चित्त वाले मनुष्य में तो ज्ञान, वैराग्य के उपदेश का आभास उसी प्रकार नहीं हो पाता जैसे मलिन दर्पण में व्यक्ति को अपना प्रतिबिम्ब नहीं दीखता। परन्तु कई बार तो ऐसे उपदेश का भी अन्यथा भाव हो जाता है —

न तज्जस्यापि तद्रूपता पंकजवत्॥ सांख्य ४.३१॥

ऐसे रागयुक्त चित्त में जो उपदेश रूपी बीज बोआ जाता है, वह भी अपने अपेक्षित उत्तम फल को नहीं देता, जैसे उत्तम बीज को कीचड़ में बो देने से वैसा उत्तमगुण वाला फल नहीं होता। अतः राग से लिप्त मलिन चित्त में उत्तम उपदेश का भी अन्यथा भाव हो जाता है और व्यक्ति उलटा ही कार्य करने लग जाता है।

अतः इस विषय में यह जानना चाहिए कि भोगों को भोगने से राग की शान्ति कभी नहीं होती। महर्षि कपिल कहते हैं—

न भोगाद् रागशान्तिर्मुनिवत्॥ सांख्य ४.२७॥

भोगों को भोगने से इच्छाओं का अन्त, राग की शान्ति कभी नहीं होती। जैसे सौभरि मुनि ने राग के कारण, संन्यास आश्रम का त्याग कर, गृहस्थ जीवन में आकर भोगों को प्राप्त किया। परन्तु बहुत काल तक भोगों को भोगने के पश्चात् भी उसका राग शान्त नहीं हुआ, तो अन्त में मुनि ने कहा —

आमृत्युतो नैव मनोरथानामन्तोऽस्ति विज्ञातमिदं मयाद्य।

मनोरथासक्तिपरस्य चित्त न जायते वै परमार्थसङ्गि॥

अर्थात् मृत्यु तक मनोरथों = वासनाओं का अन्त नहीं होता, यह मैंने आज जाना है। वासनाओं में आसक्त चित्त वाला पुरुष कभी परमार्थ की ओर नहीं जाता। इस विषय में महर्षि मनु ने भी कहा है—

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ मनु॰ २.६९॥

अर्थात् यह निश्चय है कि जैसे अग्नि में ईन्धन और घृत डालने से अग्नि बढ़ता जाता है, वैसे ही कामों के उपभोग से काम शान्त नहीं होता किन्तु बढ़ता ही जाता है। इसलिए मनुष्य को विषयासक्त कभी नहीं होना चाहिए॥

अतः राग से बचने हेतु व्यक्ति को निम्न उपायों को यथासम्भव अपनाना चाहिए —

१. बहुभिर्योगे विरोधो रागादिभिः कुमारीशंखवत्॥ सांख्य ४.९॥

बहुत जनों के साथ सम्पर्क = संग से विरोध हो जाता है, क्योंकि उनके चित्त में रागादि भाव उपस्थित होते है; जैसे कि कुमारी के पैरों के घुंघरू परस्पर संघर्षण से आवाज करते तथा टूट-फूट जाते हैं। अतः साधक को राग आदि से बचने हेतु यथासम्भव एकान्त का सेवन करना चाहिए। इसी प्रकार जनसामान्य को भी बहुत लोगों के सम्पर्क में आने से बचना चाहिए, नहीं तो राग-द्वेष से छुटकारा सम्भव नहीं हो पायेगा।

२. महर्षि दयानन्द राग की निवृत्ति का उपाय बताते हुए कहते हैं — “जब ऐसा ज्ञान मनुष्य को होता है कि सब संयोग, वियोग, संयोगवियोगान्त हैं अर्थात् वियोग के अन्त में संयोग और संयोग के अन्त में वियोग तथा वृद्धि के अन्त में क्षय और क्षय के अन्त में वृद्धि होती है, तब इसकी निवृत्ति हो जाती है।” अर्थात् जब व्यक्ति यह जानता है कि जो सुख के साधन अब मिले हैं उनका वियोग अवश्यम्भावी है और न ही ये सब मेरे लक्ष्य हैं। इसी प्रकार इन साधनों की वृद्धि और क्षय भी होता रहता है। जन्म से पूर्व भी ये मेरे नहीं थे, और शरीर के वियोग के उपरान्त भी मेरे नहीं रहेंगे। इस प्रकार के ज्ञान से मनुष्य का राग शान्त होने लगता है।

३. दोषदर्शनादुभयोः॥ सांख्य ४.२८॥

महर्षि कपिल कहते हैं कि पुरुष रूपी भोक्ता के भोक्तापन और प्रकृतिरूपी भोग्य पदार्थों के दोष जानने से भी राग शान्त होता है। जैसे भोक्तापन के दोष है — क्लिष्ट कर्माशय का संचय, पुनर्जन्म का होना, अगले जन्म हेतु गर्भ में वास करना, मरण का भय = अभिनिवेश क्लेश का बना रहना, भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म पाकर दुःखों का पाना आदि। तथा भोग्य पदार्थों के दोष है — परिणाम को प्राप्त होना, विकार को प्राप्त होना, अस्थिरता, नाश = क्षय को प्राप्त होने पर शोकप्रद, भोगने पर भी तृप्ति न होना तथा दूसरे प्राणियों को पीड़ा की प्राप्ति का होना आदि।

इस प्रकार से दोषों को देखने पर राग की शान्ति होती है। महर्षि व्यास ने भी आगे योगसूत्र २.३० के भाष्य में कहा है — “विषयाणामर्जनरक्षणक्षयसंगहिंसादोषदर्शनादस्वीकरणम्” अर्थात् विषयों के अर्जन, रक्षण, क्षय, संग, हिंसा = परपीड़ा रूपी दोषों को देखते हुए इन्हें स्वीकार नहीं करना चाहिए।

४. राग की शान्ति का एक उपाय ध्यान = मन की स्थिरता को भी कहा है — रागोपहतिर्ध्यानम्॥ सांख्य ३.३०॥ अर्थात् संसार में आसक्ति, भोगों की लालसा की राग रूपी प्रवृत्ति की निवृत्ति का उपाय ध्यान है।

अतः उपरोक्त साधनों से, राग की निवृत्ति हेतु, पुरुषार्थ करना चाहिए।