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Saadhana Paada / Means / 8
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Saadhana Paada / Means / 8

दुःखानुशयी द्वेषः॥८॥

Padas Name : Saadhana Paada / Means | Sutra No : 8

In Hindi:

पदपाठ : दुःखानुशयी द्वेषः॥

हिंदी में अर्थ : (दुःखानुशयी) दुःखभोग के पश्चात् अन्तःकरण में दुःख और उसके साधनों के प्रति रह जाने वाला संस्कार (= यथा विनाश की इच्छा, आक्रोश, क्रोध) (द्वेषः) द्वेष है॥

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “(दुःखानु॰) चौथा द्वेष कहाता है अर्थात् जिस अर्थ का पूर्व अनुभव किया गया हो, उस पर और उसके साधनों पर सदा क्रोधबुद्धि होना। इसकी निवृत्ति भी राग की निवृत्ति से ही होती है।” (ऋ० भू॰ मुक्तिविषयः)

व्यास भाष्य : दुःखाभिज्ञस्य दुःखानुस्मृतिपूर्वो दुःखे तत्साधने वा यः प्रतिघो मन्युर्जिघांसा क्रोधः स द्वेषः॥

हिंदी में अर्थ : (दुःखाभिज्ञस्य) दुःख का अनुभव करने वाले व्यक्ति को (दुःखानुस्मृतिपूर्वः) दुःख के अनुरूप स्मृतिपूर्वक (दुःखे) दुःख में (वा) अथवा (तत्साधने) उस दुःख के साधनों में (यः) जो (प्रतिघः) प्रतिकार करने का भाव, (मन्युः) क्रोध का मानसिक भाव = प्रतिहिंसा हेतु आवेश (जिघांसा) मारने की इच्छा, और (क्रोधः) क्रोध (बाह्यचेष्टा) है (सः) वह (द्वेषः) द्वेष कहा जाता है॥

वैदिक योग मीमांसा : प्रस्तुत सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ने द्वेष का स्वरूप कहा है। व्यक्ति जब लोक में दुःख का अनुभव करता है तो उसके चित्त में उस दुःख के संस्कार बनते हैं। ऐसा व्यक्ति उस दुःख और दुःख प्रदान करने वाले साधनों, विषयों की प्रतिकूलात्मक अनुभव की स्मृति के कारण उस दुःख और उसके साधनों से दूर रहना चाहता है। पुनः जीवन में जब कभी भी उस प्रकार के भोगों की प्राप्ति उसे होती है अथवा होने की सम्भावना होती है, तो उसके चित्त में दुःख प्रदान करने वाले साधनों, विषयों, पुरुषों के प्रति प्रतिकूल भावनाएँ उत्पन्न होती हैं, यही भावना द्वेष कहलाती है। ऐसे में वह व्यक्ति उन दुःख प्रदान करने वाले साधनों, पुरुषों के प्रति निम्न प्रकार से व्यवहार करता है —

१. प्रतिकार करने का भाव करता और यथासम्भव प्रतिकार करता;

२. मानसिक रूप से क्रोध करता, प्रतिहिंसा करने का आवेश उत्पन्न होता;

३. दुःख प्रदान करने वाले साधनों को नष्ट करना चाहता, नष्ट करता; और इसी प्रकार दुःख देने वाले प्राणियों को मारने की इच्छा करता और मारता;

४. शारीरिक रूप से क्रोध करता।

यह चारों ही प्रकार के कार्य व्यक्ति के अन्तःकरण को मलिन करते हुए, क्लिष्ट कर्माशय को घनीभूत करते हुए, उसे जन्म-जन्मान्तर की अन्धश्रृंखला में और अधिक बाँधते हैं।

द्वेष को आत्मा = जीवात्मा का एक गुण भी कहा गया है — इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्॥ न्याय० १.१.१०॥ पुरुष की सदा ही दुःखों से दूर रहने की स्वाभाविक इच्छा रहती है। महर्षि पतञ्जलि ने दुःख भोग के पश्चात् होने वाले संस्कार के कारण उस दुःख और दुःख-साधनों को दूर करने की इच्छा को ही द्वेष कहा है, जो कि अविद्याजनित है। दुःखों से दूर रहने की अभिलाषा को दो प्रकार से समझना चाहिए —

१. पुरुष विवेक-वैराग्य के सम्पादन द्वारा प्रकृति के विकारों की नश्वरता जानता हुआ; प्रकृति और उसके विकारों को अचेतन, परार्थ = पुरुष के भोग और अपवर्ग हेतु जानता हुआ; भोग्य पदार्थों के कारण से प्राप्त होने वाले दुःखों को भी जानता हुआ; दुःखों का कारण जन्म-मृत्यु = संसारचक्र को मानता हुआ; इस संसारचक्र से छूटने के लिए आत्मसाक्षात्कार और परमात्मसाक्षात्कार हेतु पुरुषार्थ करता है।

इसप्रकार दुःख और उसके साधन प्रकृति और उसके विकार के संयोग रूप कारण तथा उनके दोषों को जानकर उनको दूर करने की इच्छा के कारण ही, पुरुष श्रेय पथ को अपनाता है। परन्तु इस स्थिति में उसके चित्त में किसी प्रकार का प्रतिघात, मन्यु, जिघांसा, क्रोध आदि नहीं होता। विद्या के कारण उत्पन्न हुई, दुःखों को दूर करने की अभिलाषा वस्तुतः द्वेष न होकर इन पदार्थों की उपादेयशून्यता के ज्ञान के कारण उत्पन्न होती है। इस प्रकार की स्थिति = इच्छा = प्रकृति के दोषों को जानकर उससे दूर होने की अभिलाषा पुरुष = आत्मा का स्वाभाविक गुण है। परन्तु इस प्रकार की इच्छा का होना यथार्थ ज्ञान के बिना सम्भव नहीं होता।

२. सांसारिक दुःखों के कारण होने वाला द्वेष नैमित्तिक है, जो कि व्यक्ति को सांसारिक सुखों की प्राप्ति में अवरोधक = बाधक के प्रति अथवा सांसारिक दुःखों = प्रतिकूलताओं को दूर करने हेतु, उसके साधनों के प्रति होता है। यह द्वेष अविद्या के कारण होने से व्यक्ति प्रतिघात, मन्यु, जिघांसा, क्रोध आदि को करता हुआ अपने कर्माशय को क्लिष्ट और क्लिष्टतम बनाता हुआ जन्म-मृत्यु के अन्धचक्र में और अधिक फँस जाता है।

सूत्रकार महर्षि पतञ्जलि और भाष्यकार महर्षि व्यास को यहाँ दूसरे प्रकार की स्थिति रूप द्वेष ही अभीष्ट है, जो कि अविद्या रूपी माता की सन्तान है, जिसे हेय कहा गया है। इसका राग के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। राग की निवृत्ति के साथ ही इसकी भी निवृत्ति होती है। अतः राग की निवृत्ति के साधनों को द्वेष निवृत्ति हेतु समान रूप से उपयोगी जानना चाहिए।

अगर प्रथम स्थिति के कारण होने वाली अभिलाषा को भी द्वेष कहा जाये तो यह मोक्षार्थी के लिये अभीष्ट नहीं होगा। क्योंकि वैराग्य प्राप्ति का रूप बताते हुए महर्षि व्यास ने कहा है हेयोपादेयशून्या वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् (योगसूत्र १.१५) अर्थात् चित्त की द्वेष और राग से रहित वशीकार भावना = स्वाधीन अनुभूति वैराग्य है। अतः द्वेष युक्त चित्त समाधि के योग्य नहीं होता। ऐसी स्थिति में मनुष्य के लिये समाधि सिद्ध न होने से आत्म-साक्षात्कार और परमात्म-साक्षात्कार सम्भव नहीं होगा।