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Samaadhi Paada / Trance / 11
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Samaadhi Paada / Trance / 11

अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः॥११॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 11

In Hindi:

पदपाठ : अनुभूतविषयाः असम्प्रमोषः स्मृतिः॥

हिंदी में अर्थ : (अनुभूतविषयाः) अनुभव किए हुए विषयों का (असम्प्रमोषः) न भूलना = उपस्थित बने रहना = लुप्त न होना (स्मृतिः) स्मृति वृत्ति है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “पाँचवी स्मृति (अनुभूत०) अर्थात् जिस व्यवहार वा वस्तु को प्रत्यक्ष देख लिया हो, उसी का संस्कार ज्ञान में बना रहता और उस विषय को (असंप्रमोष) भूले नहीं, इस प्रकार की वृत्ति को स्मृति कहते हैं” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : किं प्रत्ययस्य चित्तं स्मरत्याहोस्विद्विषयस्येति? ग्राह्योपरक्तः प्रत्ययो ग्राह्यग्रहणोभयाकारनिर्भासस्तज्जातीयकं संस्कारमारभते। स संस्कारः स्वव्यञ्जकाञ्जनस्तदाकारामेव ग्राह्यग्रहणोभयात्मिकां स्मृतिं जनयति। तत्र ग्रहणाकारपूर्वा बुद्धिः। ग्राह्याकारपूर्वा स्मृतिः। सा च द्वयी भावितस्मर्त्तव्या चाभावितस्मर्त्तव्या च। स्वप्ने भावितस्मर्त्तव्या। जाग्रत्समये त्वभावितस्मर्त्तव्येति। सर्वाश्चैताः स्मृतयः प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतीनामनुभवात् प्रभवन्ति।

सर्वाश्चैता वृत्तयः सुखदुःखमोहात्मिकाः। सुखदुःखमोहाश्च क्लेशेषु व्याख्येयाः। सुखानुशयी रागः। दुःखानुशयी द्वेषः। मोहः पुनरविद्येति। एताः सर्वा वृत्तयो निरोद्धव्याः। आसां निरोधे सम्प्रज्ञातो वा समाधिर्भवत्यसम्प्रज्ञातो वेति॥

हिंदी में अर्थ : (किम् चित्तम्) क्या चित्त (प्रत्ययस्य) अनुभव रूप ज्ञान का (स्मरति) स्मरण करता है (आहोस्वित्) अथवा (विषयस्य इति) अनुभूत विषय = पदार्थ का? उत्तर — अनुभवकाल में (ग्राह्योपरक्तः) ग्रहण करने योग्य पदार्थों = विषयों से उपरक्त = उपरञ्जित = रंगा हुआ ही (प्रत्ययः) ज्ञान होता है; अतः (ग्राह्यग्रहण उभयाकारनिर्भासः) पदार्थ (= विषय) और ज्ञान दोनों के स्वरूप को लिए हुए (तत् जातीयकम्) उसी प्रकार के पदार्थ और ज्ञान वाले ही (संस्कारम्) संस्कार को (आरम्भते) आरम्भ करता है। पुनः (स संस्कारः) वह (ग्राह्य-ग्रहण रूप उभयाकार) संस्कार (स्वव्यञ्जकाञ्जनः) अपने निमित्त से व्यक्त हुआ (तदाकाराम् एव) उस जैसी = अपने समान (ग्राह्यग्रहण उभयात्मिकाम्) पदार्थ / विषय और ज्ञान दोनों के आकार वाली (स्मृतिम्) स्मृति को (जनयति) उत्पन्न करता है। (तत्र) इस उभयाकार स्मृति में (ग्रहणाकारपूर्वा) इन्द्रियों के आधीन, ज्ञानाकार प्रधान अंश रूप (बुद्धिः) प्रतीतिरूप ज्ञान = अनुभव होता है; और (ग्राह्याकारपूर्वा) विषय = पदार्थ के आकार के प्रधान अंश वाली (स्मृतिः) स्मृति होती है। (सा च) और वह स्मृति (द्वयी) दो प्रकार की होती है — (भावितस्मर्त्तव्या च) भावित = कल्पित, मिथ्या पदार्थ का स्मरण करने वाली; और दूसरी (अभावितस्मर्त्तव्या च) अभावित = अकिल्पत, यथार्थ पदार्थ का स्मरण करने वाली। (स्वप्ने) स्वप्न अवस्था में होने वाली स्मृति (भावितस्मर्त्तव्या) कल्पित, अयथार्थ पदार्थ विषयक होती है; और (जाग्रत्समये) जाग्रत अवस्था में होने वाली स्मृति (तु) तो (अभावितस्मर्त्तव्येति) यथार्थ पदार्थ विषयक होती है।

(सर्वाः च एताः) और यह सभी (स्मृतयः) स्मृतियाँ (प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतीनामनुभवात्) प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति के अनुभव के पश्चात् (प्रभवन्ति) उत्पन्न होती हैं।

(सर्वाः च एताः) और ये सभी (वृत्तयः) वृत्तियाँ (सुखदुःखमोहात्मिकाः) सुख, दुःख और मोहरूप हैं। (सुखदुःखमोहाः च) सुख, दुःख और मोह (क्लेशेषु) क्लेशों के प्रसंग (योग २.३) में (व्याख्येयाः) व्याख्यान करने योग्य हैं। (सुखानुशयी) सुख भोग के पीछे रहने वाला (रागः) राग है; (दुःखानुशयी) दुःख भोग के पीछे रहने वाला (द्वेषः) द्वेष है; (मोहः पुनः) और मोह (अविद्या इति) अविद्या है। (एताः सर्वाः) ये सभी प्रमाण आदि (वृत्तयः) वृत्तियाँ (निरोद्धव्याः) निरोध करने योग्य हैं। (आसाम्) इन वृत्तियों के (निरोधे) निरोध होने पर (सम्प्रज्ञातो वा समाधिः भवति) सम्प्रज्ञात समाधि होती है और तत्पश्चात् (असम्प्रज्ञातो वा इति) असम्प्रज्ञात समाधि होती है॥

वैदिक योग मीमांसा : मनुष्य, सामान्य रूप से, संसार में अनेकों विषयों एवं पदार्थों का अनुभव एवं भोग करता है; उस भोग से सुख-दुःख का अनुभव भी करता है। वे समस्त अनुभूत एवं भुक्त विषय, चित्त में संस्कारों के रूप में संचित होते है, एवं चित्त में उपस्थित रहते हैं। जब उनमें से किसी का निमित्त = कारणविशेष सामने आता है, तो वह विषय अपने समस्त वृत्त के साथ मनुष्य के समक्ष आ खड़ा होता है, इसी का नाम स्मृति है।

स्मृति के सम्बन्ध में मूल शंका उठायी गयी है कि “क्या चित्त में अनुभूत विषय के प्रतीति रूप ज्ञान का स्मरण होता है या फिर अनुभूत विषय = पदार्थ का ?” अर्थात् क्या घट की स्मृति होती है या घट का जो ज्ञान = अनुभव हुआ है — उस अनुभव की स्मृति होती है ? स्मृति की पूरी प्रक्रिया को समझाते हुए कहा है कि अनुभवकाल में ग्राह्यविषय = ग्रहण करने योग्य घटादि पदार्थों से सम्बद्ध अनुभवरूप ज्ञान होता है; अतः वह घटादि अनुभवरूप ज्ञान, ग्राह्यविषय ‘घट’ तथा ग्रहण = ज्ञान दोनों के आकार को लिए हुए, वैसे ही संस्कार को उत्पन्न करता है। विषय = पदार्थ के अनुभव से उत्पन्न ये संस्कार ही आगे चलकर स्मृति को उत्पन्न करते हैं। फिर यह संस्कार अपने निमित्त से अभिव्यक्त हुआ अपने समान आकार वाली अर्थात् पदार्थ और ज्ञान दोनों के आकार वाली, स्मृति को उत्पन्न करता है। अतः स्मृति न केवल विषय = पदार्थ की और न केवल अनुभवरूप ज्ञान की होती है, परन्तु दोनों के रूप की होती है। उदाहरण के लिए घट को जान लेने पर व्यक्ति कहता है कि मैं घट को जानता हूँ। इस ज्ञान को व्यवसाय ज्ञान कहते हैं। इस ज्ञान के होने के पश्चात् व्यक्ति सोचता है कि मैं घट विषयक ज्ञान वाला हूँ। इस ज्ञान को अनुव्यवसाय ज्ञान कहते हैं। स्मृति को उत्पन्न करने वाला अनुव्यवसाय ज्ञान होता है। अतः स्मृति में विषय = पदार्थ और अनुभवरूप ज्ञान दोनों ही कारण हैं।

इस उभयाकार स्मृति में अनुभव और स्मृति में भेद को बताते हुए कहा है कि ज्ञानाकार रूप प्रधान अंश बुद्धि = प्रतीति रूप ज्ञान = अनुभव है और विषय = पदार्थ के आकार के प्रधान अंश वाली स्मृति है। अतः स्मृति अनुभूत विषय की ही होती है; केवल मात्र विषय के अनुभव की नहीं। स्मृति दो प्रकार की है —

१. भावित स्मर्तव्या — जिस स्मृति का विषय कल्पित अथवा अयथार्थ होता है; उसे भावित स्मर्तव्या स्मृति कहते हैं।

२. अभावित स्मर्तव्या — जिस स्मृति का विषय अकल्पित, यथार्थ होता है; उसे अभावित स्मर्तव्या स्मृति कहते हैं।

स्वप्न अवस्था में होने वाली स्मृति भावित स्मर्तव्या होती है; क्योंकि स्वप्नकाल में पदार्थों की यथार्थ स्मृति नहीं होती। घटनाओं और पदार्थों की अनुभूति विसंगत रहने से वास्तविक रूप में न होकर कृत्रिम होती है। कहीं का जाना गया पदार्थ = विषय, किसी भिन्न स्थिति में और भिन्न घटनाक्रम में घुला-मिला स्मृत होता है। जैसे किसी ने स्वप्न में सिर कटे बच्चे के धड़ के साथ हाथी का सिर रखा देख लिया होगा और पौराणिक जगत् में हाथी के सिर वाले बच्चे की काल्पनिक मूर्त्ति बन गई जो गणेश के नाम से प्रसिद्ध कर दी गई; जो कि वास्तविक जीवन में परमात्मा की व्यवस्था और सृष्टिक्रम के अनुसार सम्भव ही नहीं है। अतः इसे भावित स्मर्तव्या स्मृति कहते हैं।

जाग्रत अवस्था की स्मृति में जो पदार्थ जैसा अनुभूत हुआ है; उसका उसी प्रकार स्मरण होने से इस अवस्था की स्मृति अकृत्रिम, यथार्थ होने से अभावित स्मर्तव्या स्मृति कहलाती है।

सभी प्रकार की स्मृतियाँ प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति के अनुभव के पश्चात् उत्पन्न होती हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि स्मृति की भी स्मृति होती है।

ये सभी पाँचों प्रकार की वृत्तियाँ चित्त के त्रिगुणात्मक होने के कारण सुख, दुःख और मोह रूप हैं। इन, सुख, दुःख और मोह, को क्लेशों में गिना जाता है। सुख भोग के पीछे रहने वाला राग है; दुःख भोग के पीछे रहने वाला द्वेष है; और मोह तो अविद्या ही है। अतः सुखदुःखमोह रूप ये सभी वृत्तियाँ क्लिष्ट होने के कारण, क्लेशों के सहित होने से, क्लेशों से आक्रान्त, सम्बद्ध होने के कारण निरोध करने योग्य है। उपासना काल में तो इन सभी की सभी पाँचों वृत्तियों का निरोध आवश्यक है, तभी योग अर्थात् सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधि की सिद्धि सम्भव हो सकेगी। परन्तु व्यवहार काल में भी विपर्यय वृत्ति का निरोध होना परमावश्यक है। शेष वृत्तियों में प्रमाण तो पदार्थो = विषयों के ज्ञान के लिए, विकल्प बहुधा प्रयुक्त होने से, निद्रा स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होने से तथा स्मृति इन सब के कारण उत्पन्न होने से, व्यवहार काल में इन सभी का सर्वांश में निरोध सम्भव नहीं हो सकता। परन्तु विपर्यय वृत्ति के निरोध के साथ-साथ यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि शेष चारों वृत्तियाँ विपर्यय = अविद्या से किसी भी प्रकार से प्रभावित न हो; तभी ये शेष चारों वृत्तियाँ अक्लिष्ट हो पायेंगी तथा उपासना काल में सभी वृत्तियों का निरोध सम्भव हो पायेगा।