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Samaadhi Paada / Trance / 12
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Samaadhi Paada / Trance / 12

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥१२॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 12

In Hindi:

पदपाठ : अभ्यासवैराग्याभ्याम् तत् निरोधः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथाऽऽसां निरोधे क उपाय? इति—

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (आसाम्) इन वृत्तियों के (निरोधे) निरोध करने में (कः) कौन सा (उपायः इति) उपाय है?—

हिंदी में अर्थ : (अभ्यासवैराग्याभ्याम्) अभ्यास और वैराग्य के द्वारा (तत्) उन पाँचों चित्त वृत्तियों का (निरोधः) निरोध होता है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “इन पाँच वृत्तियों के बुरे कामों और अनीश्वर के ध्यान से हटाने का उपाय कहते है कि — (अभ्यास०) जैसा अभ्यास उपासना प्रकरण में आगे लिखेंगे वैसा करें और वैराग्य अर्थात् सब बुरे कामों और दोषों से अलग रहें। इन दोनों उपायों से (तत् निरोधः) पूर्वोक्त पांच वृत्तियों को रोक के उनका उपासना योग में प्रवृत्त रखना।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : चित्तनदी नामोभयतो वाहिनी। वहति कल्याणाय वहति पापाय च। या तु कैवल्यप्राग्भारा विवेकविषयनिम्ना सा कल्याणवहा। संसारप्राग्भाराऽविवेकविषयनिम्ना पापवहा। तत्र वैराग्येण विषयस्रोतः खिलीक्रियते, विवेकदर्शनाभ्यासेन विवेकस्रोत उद्घाट्यत इत्युभयाधीनश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥

हिंदी में अर्थ : (चित्तनदी नाम) चित्त रूप नदी (उभयतो वाहिनी) दो ओर बहने वाली है। (वहति कल्याणाय) वह कल्याण के लिए बहती है; (च) और (वहति पापाय) पाप के लिए बहती है। (या तु) जो तो (कैवल्यप्राग्भारा) कैवल्य = मोक्ष की ओर उन्मुख होकर (विवेकविषयनिम्ना) विवेक मार्ग = विवेकख्याति की ओर झुकी हई है; (सा) वह (कल्याणवहा) कल्याण के लिए बहती है। और जो (संसारप्राग्भारा) संसार = सांसारिक विषय भोगों की ओर उन्मुख होकर (अविवेकविषयनिम्ना) अविवेक = अज्ञान मार्ग की ओर झुकी हुई है; वह (पापवहा) पाप की ओर बहती है। (तत्र) उन दोनों में से, जो पाप की ओर बहने वाली वृत्ति है, उसका (वैराग्येण) वैराग्य के द्वारा (विषयस्रोतः) सांसारिक विषयों की ओर जाने वाला प्रवाह (खिलीक्रियते) बन्द किया जाता है। और (विवेकदर्शनाभ्यासेन) विवेक ज्ञान = सत्त्वपुरुषान्यताख्याति रूप विवेकज्ञान के अभ्यास द्वारा (विवेकस्रोतः) मोक्ष = कैवल्य की ओर जाने वाला प्रवाह (उद्घाट्यते) खोला जाता है। (इति) इस प्रकार (उभयाधीनः) अभ्यास और वैराग्य के आधीन (चित्तवृत्तिनिरोधः) चित्तवृत्ति का निरोध है।

वैदिक योग मीमांसा : उपासना काल में चित्त की पाँचों वृत्तियों का निरोध आवश्यक है। न केवल उपासना काल में, वरन् व्यवहार काल में भी व्यक्ति के लिए, अपनी वृत्तियों को क्लिष्ट = क्लेश सहित न होने देना भी, जीवन की सफलता तथा योगमार्ग पर आगे बढ़ने हेतु परम आवश्यक है। इन वृत्तियों के निरोध के उपाय, अभ्यास और वैराग्य हैं। दोनों ही उपाय एक दूसरे के पूरक होने से, इन दोनों का प्रयोग और सहयोग वृत्तिनिरोध हेतु आवश्यक है। वैराग्य के द्वारा विषयों में दोष दृष्टि से, अनादि काल से चला आ रहा स्वाभाविक बहिर्मुखी = संसार की ओर जाने वाला प्रवाह रोककर; विवेकज्ञान के अभ्यास से आन्तर = आत्माभिमुख प्रवाह को चालू करने से ही चित्तवृत्ति निरोध होता है।

चित्त रूपी नदी अपनी दो धाराओं में से, एक धारा द्वारा कल्याण के लिए = मोक्ष के लिए विवेकख्याति के मार्ग पर बहती है; और दूसरी धारा सांसारिक विषयों की प्राप्ति के लिए, अविवेक = अज्ञान के मार्ग पर बहने के कारण, पाप की ओर बहती है। दूसरी धारा का मार्ग अविद्या होने से, यह धारा क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को ही प्रशस्त करती है; अतः यह धारा पापवहा कही गई है। पहली धारा पर चलकर जीव मोक्ष को प्राप्त करता है, और दूसरी धारा में बहता हुआ संसार के आवागमन के विषम चक्र में ही लगा रहता है।

सामान्यतः मनुष्य के लिए चित्त की दोनों प्रकार की धाराएँ होती हैं; परन्तु कल्याण पथ वाली धारा बहुत ही हल्की तथा कटी-फटी सी होती है, जैसे कि इस पर जन्म-जन्मान्तर से रुख ही न हुआ हो, तथा दूसरी धारा जो कि संसार सागर की ओर, विषयभोगों के मार्ग पर बहती है, वह पापवाहिनी धारा सुदृढ़ और ठीक प्रकार से बह रही होती है। अतः योगमार्ग के पथिक के लिए दो सूत्री कार्यक्रम निम्न प्रकार से बताया गया है :—

१. वैराग्य के द्वारा विषयों के दोष = दुःख, क्लेश, अज्ञान आदि को देखते हुए, इस पापवहिनी = संसार मार्ग पर बहने वाली धारा को अवरुद्ध करे अर्थात् इस मार्ग से विमुख होकर इसके अनवरत प्रवाह को सुखाए। तथा,

२. विवेकज्ञान = प्रकृति और पुरुष के भेदज्ञान रूप विवेकख्याति के अभ्यास के द्वारा कल्याणवाहिनी = मोक्ष पथ की ओर जाने वाली धारा के प्रवाह को चालू करे एवम् सुदृढ़ बनाए।

संसार की ओर बहने वाली धारा में बहने हेतु अविद्या, राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार रूपी द्वार हैं। इन्हीं द्वारों के माध्यम से, व्यक्ति की वृत्तियाँ विषयों = भोगों को प्राप्त करने से संसार पथ पर अग्रसर रहती हैं। इस धारा को सुखाने हेतु विषयों में दोषदर्शन द्वारा, इन द्वारों को धीरे-धीरे बन्द करना होता है; जिसके लिए आरम्भ से ही यम-नियम रूपी साधन परम सहायक सिद्ध होते हैं। यम-नियमों के परिपालन से ही व्यक्ति के लिए कल्याणपथ की ओर जाने वाली धारा धीरे-धीरे सुदृढ़ होती जाती है। मोक्षमार्ग के पथिक के लिए संसार के विषयों से सम्बन्ध तोड़ना परमावश्यक है। परन्तु जन्म-जन्मान्तर के संस्कारों और बहिर्मुखी वृत्ति प्रवाह के अभ्यास के कारण से राग, द्वेष, काम, क्रोध, अहंकार आदि दोषों को छोड़ना कोई सरल कार्य नहीं है। जन्म-जन्मान्तर के अभ्यास के कारण पुरुष, मन के माध्यम से इस क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति के सुदृढ़़ पथ पर अनायास ही दौड़ता है। अतः गीता में भी श्रीकृष्ण इसी उपाय को कहते हैं —

असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम्।

अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ ६.३५॥

हे अर्जुन! इसमें सन्देह नहीं कि मन अत्यन्त चंचल है, बड़ी कठिनता से वश में आता है। किन्तु निरन्तर अभ्यास और बुराई के प्रति वैराग्य से उसे अवश्य वश में किया जा सकता है।

अतः अभ्यास और वैराग्य के द्वारा ही इस दुर्गम पथ पर चलना सम्भव हो पाता है और योगमार्ग का पथिक अपने परम लक्ष्य कैवल्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है।