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Samaadhi Paada / Trance / 18
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Samaadhi Paada / Trance / 18

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 18

In Hindi:

पदपाठ : विराम प्रत्यय अभ्यासपूर्वः संस्कारशेषः अन्यः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथासम्प्रज्ञातः समाधिः किमुपायः किं स्वभावो वेति —

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (असम्प्रज्ञातः समाधिः) असम्प्रज्ञात समाधि (किम् उपायः) किस उपाय वाली, (किम् स्वभावः वा) और किस स्वभाव वाली होती है (इति) यह कहते हैं ? —

हिंदी में अर्थ : (विराम) सभी वृत्तियों के विराम = निरोध (प्रत्यय) के कारण परवैराग्य के (अभ्यासपूर्वः) अभ्यास से होने वाली तथा (संस्कारशेषः) संस्कारशेष रूप चित्त की स्थिति = समाधि (अन्यः) सम्प्रज्ञात से भिन्न असम्प्रज्ञात कहलाती है॥

व्यास भाष्य : सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये संस्कारशेषो निरोधश्चित्तस्य समाधिरसम्प्रज्ञातः। तस्य परं वैराग्यमुपायः। सालम्बनो ह्यभ्यासस्तत्साधनाय न कल्पत इति, विरामप्रत्ययो निर्वस्तुक आलम्बनीक्रियते। स चार्थशून्यः। तदभ्यासपूर्वकं हि चित्तं निरालम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येष निर्बीजः समाधिरसम्प्रज्ञातः॥

हिंदी में अर्थ : (सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये) चित्त की सभी वृत्तियों के अस्त हो जाने = निरोध हो जाने पर (संस्कारशेषः) संस्कारमात्र वाली = संस्कारशेष वाली (चित्तस्य) चित्त की (निरोधः) निरुद्ध स्थिति = निरोध रूप (समाधिः) समाधि (असम्प्रज्ञातः) असम्प्रज्ञात है। (तस्य) उस असम्प्रज्ञात समाधि का (उपायः) उपाय = साधन (परं वैराग्यम्) परवैराग्य है। (हि) क्योंकि (सालम्बनो) वितर्क आदि सम्प्रज्ञात समाधियों में चित्त के आलम्बन = आश्रय से किया गया (अभ्यासः) एकाग्रता रूप अभ्यास (तत्साधनाय) असम्प्रज्ञात समाधि के साधन होने में (न कल्पत) समर्थ नहीं होता (इति) इसलिए (विरामप्रत्ययः) वृत्तियों के निरोध के उपाय परवैराग्य का अभ्यास (निर्वस्तुकः) बिना बाह्यवस्तुओं के (आलम्बनीक्रियते) आलम्बन = आश्रय से किया जाता है। (स च) और वह अभ्यास (अर्थशून्यः) बाह्य पदार्थों = अर्थों से रहित है। (हि) क्योंकि (तदभ्यासपूर्वकम्) उस परवैराग्य के अभ्यास वाला (चित्तम्) चित्त (निरालम्बनम्) आलम्बन = आश्रय रहित होता हुआ (अभावप्राप्तम् इव) अभावरूप जैसा (भवति) हो जाता है; (इति) इस प्रकार से (एषः) यह (निर्बीजः) बाह्यवस्तु बीज रहित = निर्बीज (समाधिः) समाधि (असम्प्रज्ञातः) असम्प्रज्ञात है॥

वैदिक योग मीमांसा : सम्प्रज्ञात समाधि की अन्तिम अवस्था अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में जीवात्मा चित्त = बुद्धि की सहायता से अपने स्वरूप को जानता है। इस अवस्था में अपने चैतन्य स्वरूप की अनुभूति ही उसे अपने से पृथक् जड़ पदार्थों से विरक्त करने में सहायक सिद्ध होती है। ये सभी जड़ पदार्थ प्रकृति का विकार होने से त्रिगुणात्मक ही हैं, अतः इस अवस्था में उसे गुणों के प्रति तृष्णा का अभाव हो जाता है। यह स्थिति परवैराग्य की है। परवैराग्य होने पर जीवात्मा = पुरुष एकाग्रावस्था एवं अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में उपस्थित प्रबल सत्त्वगुण का भी निरोध करना आरम्भ कर देता है, और चित्त में उठने वाली सभी वृत्तियों का एक-एक करके निरोध करता जाता है। हर वृत्ति के उठने पर पुरुष यह विचार करता है कि “यह वृत्ति आत्मा का स्वरूप नहीं है; यह वृत्ति आत्मा का स्वरूप नहीं है।” इस प्रकार वृत्ति निरोध हेतु निरन्तर इस भावना को करता हुआ इस वृत्ति निरोध के ज्ञान को भी लगातार बनाए रखता है।

ऐसी अवस्था में जब चित्त की सभी वृत्तियों का = चित्त के सभी विषयों = स्थूल, सूक्ष्म और आनन्द आदि का भी निरोध हो जाता है; पुरुष के लिए अब तक जाना हुआ कोई भी पदार्थ ध्येय विषय नहीं रहता और इनका आलम्बन = आश्रय न होने से इनका किसी भी प्रकार से सम्प्रज्ञान भी नहीं होता। चित्त में अब तक के प्रत्यक्ष हुए किसी भी प्रकार के विषय का आलम्बन समाप्त हो जाता है; और बाह्य आलम्बन के अभाव में चित्त का यह अभ्यास निरालम्बन ही रहता है। इस प्रकार के अभ्यास से चित्त में संस्कारमात्र ही शेष रहते हैं। इस अवस्था में चित्त कृतकार्य होता हुआ अभावरूप हो जाता है अर्थात् वह वृत्ति रूप कार्य को कर पाने में असमर्थ होकर अभावरूप होकर जीवात्मा = पुरुष के समान पवित्र होकर रहता है।

इसी निरालम्बन अभ्यास के कारण ही यह समाधि असम्प्रज्ञात समाधि कहलाती है। इस में बाह्य आलम्बन समाप्त होने पर जीवात्मा = पुरुष को स्वरूपस्थिति की प्राप्ति होती है। सम्प्रज्ञात समाधि की अन्तिम अवस्था में होने वाला पुरुष का सम्प्रज्ञान = साक्षात्कार बुद्धि के माध्यम से होता है, परन्तु इस अवस्था में होने वाला पुरुष साक्षात्कार बुद्धि के माध्यम से न होकर, परमात्मा के आश्रय से होता है। पुरुष जब तक प्रकृति और उसके विकारों का आश्रय करता है, तो सर्वव्यापक एवं स्वयं में स्थित परमात्मा से वह अज्ञानतावश ही दूर रहता है; परन्तु जब प्रकृति और उसके विकारों का आश्रय, परवैराग्य के अभ्यास से, दूर हो जाता है तो सर्वव्यापक परमात्मा के आश्रय से ही स्वयं को जानता है। इस अवस्था में ही पुरुष = जीवात्मा ज्ञानपूर्वक परमात्मा के स्वरूप में स्थित होता है। पुरुष को इस अवस्था की प्राप्ति होने पर, चेतन पुरुष की चेतन परमात्मा में ज्ञानपूर्वक स्थिति हो जाती है और जीवात्मा परमपुरुष परमात्मा के स्वरूप में निमग्न हो जाता है। स्थान और काल से सर्वदा प्राप्त परमात्मा में इस प्रकार से ज्ञानपूर्वक स्थिति ही जीवात्मा के लिए “परमात्म-साक्षात्कार” का अनुभव होता है।

भोज ने इस सूत्र पर वृत्ति में — तत्र या काचित् वृत्तिरुल्लसति, तस्या नेति नेतीति नैरन्तर्येण पर्युदसनं विरामप्रत्ययाभ्यासः कहा है अर्थात् उसमें जो कोई चित्तवृत्ति ऊपर उठती है उस वृत्ति को नेति-नेति = “यह आत्मस्वरूप नहीं है, यह आत्मस्वरूप नहीं है” इस प्रकार से निरन्तर = लगातार त्यागना ही निरुद्ध वृत्ति के ज्ञान का अभ्यास है। इस विषय में महर्षि कपिल भी तत्त्वाभ्यास हेतु इसी उपाय को सार्थक कहते हैं —

तत्त्वाभ्यासन्नेति नेतीति त्यागाद् विवेकसिद्धिः॥ सांख्य ३.७५॥

अर्थात् तत्त्वचिन्तन = आत्मा, परमात्मा के मनन, निदिध्यासन में जो-जो वस्तु किसी भी साधन से, मन से भी, अनुभव में आये उसके बारे में नेति = न इति = वह नहीं है; नहीं है तत्त्व परमात्मा अर्थात् वह पदार्थ = तत्त्व न तो आत्मा का स्वरूप है, और न ही परमात्मा है; इस प्रकार उन सभी वृत्तियों / पदार्थों / विषयों का त्याग करने से विवेक की = परमात्मा के साक्षात्कार की सिद्धि स्वात्मा में होती है॥

देखो, ब्रह्म का उपदेश = आदेश “नेति-नेति” शब्द से होता है। यथा बृहदारण्यकोपनिषद् में महर्षि याज्ञवल्क्य, शाकल्य के एक प्रश्न के उत्तर में कहते हैं — “.... स एष नेति नेत्यात्मा .....” (बृ॰ ३.९.२६) अर्थात् उस आत्मा = परमात्मा का “नेति-नेति” शब्द से कहा है। इसी प्रकार अजातशत्रु भी बालाकि को उपदेश करते हुए कहते हैं —

अथात आदेशो नेति नेति न ह्येतस्मादिति नेत्यन्यत्परमस्त्यथ नामधेयं सत्यस्य सत्यमिति प्राणा वै सत्यं तेषामेष सत्यम्॥ बृ॰ २.३.६॥

अर्थात् अब इस कारण ब्रह्म के विषय में आदेश “नेति-नेति” शब्द से होता है क्योंकि इससे बढ़कर कोई आदेश नहीं है। इस परमात्मा से बढ़कर दूसरा कोई उत्कृष्ट देव = पदार्थ नहीं है। उसका नाम “सत्य का सत्य” है; प्राणों का नाम सत्य है और उन प्राणों का भी, यह परमात्मा ही, सत्ता रखने वाला त्रिकालाबाध्य सच्चिदानन्दस्वरूप एक अद्वितीय है।

इस अवस्था को संस्कारशेष अवस्था भी कहा गया है। यहाँ पर चित्त के संस्कारों और उनके निरोध की स्थिति को समझने हेतु भोजवृत्ति सहायक है। व्युत्थान अवस्था = चित्त की क्षिप्त और मूढ अवस्था, के संस्कारों को समाधि-प्रारम्भ अवस्था = चित्त की विक्षिप्त अवस्था में उत्पन्न संस्कार नष्ट कर देते हैं; इस अवस्था के संस्कारों को एकाग्रावस्था के संस्कार नष्ट कर देते हैं; और निरोध अवस्था के संस्कार एकाग्रावस्था के संस्कारों और स्वयं के संस्कारों को भी नष्ट कर देते हैं। निरुद्धावस्था में एकाग्रावस्था तक के सभी संस्कार नष्ट हो जाने पर केवल मात्र निरुद्ध अवस्था के उत्पन्न संस्कार ही शेष रहते हैं। और धीरे-धीरे निरुद्धावस्था की परिपक्वास्था में निरोध समाधि से उत्पन्न मोक्षप्रापक संस्कारों के साथ चित्त अपनी प्रकृति में प्रविलीन = प्रलय को प्राप्त हो जाता है और इस प्रकार पुरुष निरालम्बन समाधि को प्राप्त कर आत्मस्वरूप में स्थित हो ज्ञानपूर्वक परमात्मा के स्वरूप में स्थित हो जाता है।

यह असम्प्रज्ञात समाधि चित्त के आश्रय से न होने से निरालम्बन और इसमें प्रकृति और उसके विकारों का आश्रय न रहने से, पुरुष की प्रवृत्ति भोगोन्मुख न रहने से, क्लेश एवं कर्माशय रूप बीजों के भी दग्धबीज भाव हो जाने से यह निर्बीज समाधि कहलाती है; और इसी अवस्था में ही संसार में जन्म-मरण के बीज अविद्या, कर्माशय संस्कारों का भी नाश = दग्धबीजभाव हो जाने पर योगी चरम देह वाला कहलाता है।

शंका — योगदर्शन में सम्प्रज्ञात समाधि को सालम्बन तथा सबीज समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि को निरालम्बन तथा निर्बीज समाधि कहा गया है। इनका अभिप्राय स्पष्ट करें।

समाधान — सम्प्रज्ञात समाधि के चारों भेदों को १.१७ के भाष्य में महर्षि व्यास ने सालम्बन समाधियाँ कहा है (सर्वे एते सालम्बनाः समाधयः॥)। और १.१८ के भाष्य में असम्प्रज्ञात समाधि के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए कहा है — सालम्बनोऽह्यभ्यासस्तत्साधनाय न कल्पत इति विरामप्रत्ययो निर्वस्तुक आलम्बनीक्रियते। स चार्थशून्यः। तदभ्यासपूर्वं चित्तं निरालम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येष निर्बीजः समाधिरसम्प्रज्ञातः॥ अर्थात् क्योंकि वितर्क आदि सम्प्रज्ञात समाधियों में चित्त के आलम्बन = आश्रय से किया गया एकाग्रता रूप अभ्यास असम्प्रज्ञात समाधि के साधन होने में समर्थ नहीं होता, इसलिए वृत्तियों के निरोध के उपाय “परवैराग्य” का अभ्यास बिना बाह्यवस्तुओं के आलम्बन = आश्रय से किया जाता है। और वह अभ्यास बाह्य पदार्थों = अर्थों से रहित है। क्योंकि उस परवैराग्य के अभ्यास वाला चित्त आलम्बन रहित होता हुआ अभावरूप जैसा हो जाता है; इस प्रकार से यह बाह्यवस्तु बीज रहित = निर्बीज समाधि असम्प्रज्ञात है॥

असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में चित्त अभाव को प्राप्त हुआ जैसा होता है, परन्तु सम्प्रज्ञात समाधि में भावरूप सत्ता वाला होता है। अतः सम्प्रज्ञात समाधि में सालम्बन से यह अभिप्राय है कि इन सभी वितर्कादि समाधियों में अभ्यास चित्त के आश्रय से होते हैं; जबकि असम्प्रज्ञात समाधि में निरालम्बन से यह अभिप्राय है कि चित्त सभी प्रकार के आलम्बनों से रहित होता हुआ अभावरूप होता है। इसी तथ्य को महर्षि व्यास ने सूत्र १.५ के भाष्य में इस प्रकार से कहा है — तदेवंभूतं चित्तमवसिताधिकारमात्मकल्पेन व्यवतिष्ठते प्रलयं वा गच्छतीति॥ सम्प्रज्ञात समाधि के निर्वितर्क भेद के लिये सूत्रकार ने “स्वरूपशून्या एव” तथा निर्विचार भेद के लिये महर्षि व्यास ने “प्रज्ञा च स्वरूपशून्या एव” कहा है जबकि असम्प्रज्ञात समाधि में “अभावप्राप्तमिव” होना कहा गया है। अर्थात् निर्वितर्क और निर्विचार में चित्त अपने स्वरूप से शून्य हुआ आलम्बन किए हुए अर्थ = पदार्थ का ही प्रधानता से साक्षात् कराता है परन्तु अभाव को प्राप्त नहीं होता।

महर्षि पतञ्जलि ने सम्प्रज्ञात समाधि के सवितर्क, निर्वितर्क, सविचार और निर्विचार भेदों को सबीज समाधियाँ कहा है (योग० १.४६), जिसका अर्थ करते हुए महर्षि व्यास ने इन्हें “बहिर्वस्तुबीजाः” कहा है अर्थात् ये चारों बाह्यवस्तुओं के बीज = आश्रय से होती हैं। और असम्प्रज्ञात समाधि को निर्बीज समाधि कहा है (योग० १.५१), जिसका अभिप्राय हुआ कि इसमें बाह्य वस्तुओं का आश्रय = आलम्बन नहीं होता और यह समाधि निरालम्बन होने से इसमें पुरुष अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा का आलम्बन भी चित्त के माध्यम से नहीं होता। इसमें यह जानना चाहिए कि प्रकृति के त्रिगुणात्मक विकार जड़ चित्त के माध्यम से परमचेतन परमात्मा का साक्षात्कार होना सम्भव नहीं है, क्योंकि चित्त में ऐसा कोई सामर्थ्य नहीं है।

शंका — महर्षि व्यास असम्प्रज्ञात समाधि को निरालम्बन कहते हैं। ऐसे में आप द्वारा परमात्मा के आलम्बन को कहने से असम्प्रज्ञात समाधि निरालम्बन नहीं रहती, अतः यह व्याख्यान योगदर्शन की भावना और सिद्धान्तों के प्रतिकूल प्रतीत होता है?

समाधान — इस शंका का समाधान हम योगसूत्र १.२ की व्याख्या में कर चुके हैं। इस विषय में इतना विशेष समझना चाहिए कि यहाँ पर निरालम्बन से प्रकृति और उसके विकारों के आलम्बन का ही निषेध है न कि परमात्मा का। योग का फल कैवल्य है, और कैवल्य परमात्म-साक्षात्कार के बिना सम्भव नहीं होता, ऐसा वेदादि सत्यशास्त्रों में प्रतिपादित है। असम्प्रज्ञात समाधि के आलम्बन के लिए सभी कुछ का निषेध महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास के बहुत बाद में परमात्मा के स्वरूप को न समझने तथा वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन न रहने से हुआ है। महर्षि पतञ्जलि को परमात्मा के आलम्बन का निषेध करना होता तो समाधि लाभ के उपायों के रूप में ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥ योग० १.२३॥ से ईश्वरप्रणिधान और तज्जपस्तदर्थभावनम्॥ योग० १.२८॥ से ईश्वर के नाम प्रणव = ओ३म् का जप और उसके अर्थ का विधान ही न करते। इसी प्रकार भोजवृत्ति में भी योग० १.१७ के भाष्य में आनन्दानुगत समाधि की प्राप्ति पर पुरुष और परमात्मा को न देखने वालों को विदेह पद वाच्य और अस्मितानुगत समाधि की प्राप्ति पर परमात्मा को लक्ष्य न करने वाले को प्रकृतिलय कहा है और इन दोनों के लिए योग० १.१९ में भवप्रत्यय समाधि में परमात्म-साक्षात्कार के अभाव में मुक्ति = कैवल्य की प्राप्ति को नहीं माना है। और इसी हेतु उपायों = श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि, प्रज्ञापर्वक होने वाली सम्प्रज्ञात समाधि और अन्त में असम्प्रज्ञात समाधि को ही श्रेष्ठ मानते हुए इसके द्वारा कैवल्य प्राप्ति को माना है।

असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में परमात्म-साक्षात्कार का वर्णन श्वेताश्वेतरोपनिषद् में इस प्रकार से आया है —

यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासच्छिव एव केवलः।

तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्मात्प्रसृता पुराणी॥ श्वेता॰ ४.१८॥

इसका अर्थ करते हुए पण्डित भीमसेन शर्मा अपने उपनिषद्भाष्य में लिखते हैं — (यदाऽतमस्तन्न दिवा न रात्रिः) जब निर्बीज वा असम्प्रज्ञात नामक समाधिस्थ हो जाने के समय तमोगुण के कार्य अविद्यादि क्लेश तथा अति कठिनता से निवृत्त होने वाली अविद्यादि की सूक्ष्म वासनाओं का भी अभाव हो जाता है तब न दिन है ऐसा कह सकते न रात्रि (न सन्न चासच्छिव एव केवलः) जगत् विद्यमान है ऐसा भी नहीं कहा जाता तथा मेरा शरीर वा मेरे पदार्थ तथा अन्य मनुष्यादि हैं, ऐसा भी भान नहीं होता किन्तु किसी प्रकार की भी चित्त की वृत्ति उस समय नहीं होती, अपने स्वरूप से शून्य हुए, केवल ध्येय के आकार में लगे हुए, उसी की ओर झुकावट और तन्मय होना रूप समापत्ति की अन्तिम सीमा को प्राप्त जीवात्मा को कल्याणमय एक परमात्मा ही दीखने लगता है अन्य कोई नहीं (तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यम्) वह आत्मतत्त्व स्वभाव से ही अविनाशी उदयकाल के सूर्य से भी अधिक शुद्ध प्रकाशस्वरूप तेजोमय है, क्योंकि वह सूर्यादि प्रकाशकों का भी प्रकाशक है (तस्मात्पुराणी प्रज्ञा प्रसृता) उसी ईश्वर से सर्वोत्तम ज्ञान ही हेतु सनातन वेदवाणी पर्वत से निकल के नदी के समान जगत् में फैली है।

अतः “समाधिद्वारा क्लेश और कर्मों की निवृत्तिपूर्वक शुद्ध हुए पुरुष को परमात्मा में तन्मय होने से जो सुख होता है वह वाणी से कहने में नहीं आता। इस अलौकिक सर्वोत्तम अद्भुत सुख का अनुभव करने के लिये समाधि को छोड़कर अन्य कोई उपाय नहीं है, ऐसा मानकर उस आनन्द का स्वाद प्राप्त करने हेतु पुरुष प्रयत्न के साथ योगाभ्यास का अधिमात्रतीव्रसंवेग उपाय करे।”

यहाँ जिस स्थिति का वर्णन है वह निस्सन्देह असम्प्रज्ञात समाधि की स्थिति है और उसमें जीवात्मा को परमात्म-साक्षात्कार का होना स्पष्ट रूप से कहा है।

शंका :— न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः। (व्यासभाष्य १.२) असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में आप परमात्म-साक्षात्कार को कह रहे हैं, जबकि अन्य भाष्यकारों के अनुसार इस अवस्था में कुछ भी सम्यक् प्रकार से ज्ञात नहीं होता ?

समाधान :— यह शंका शास्त्र की अनभिज्ञता के कारण है। व्यासभाष्य के वाक्य का जो अर्थ आप कर रहे हैं, वह प्रकरण विरुद्ध है। इसका वास्तविक अभिप्राय हमने उक्त सूत्र की व्याख्या में दर्शा दिया है।

देखो, इसी शरीर में ही पुरुष प्रतिदिन जब सुषुप्ति अवस्था में होता है, तब उसकी अवस्था का वर्णन शास्त्रों में निम्न प्रकार से मिलता है —

तद्यत्रैतत्सुप्तः समस्तः सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विज्ञानात्यासु तदा नाडीषु सृप्तो भवति। तन्न कश्चन् पाप्मा स्पृशति तेजसा हि तदा सम्पन्नो भवति॥ छान्दो॰ ८.६.३॥

अर्थात् जिस काल में यह जीवात्मा सुषुप्तावस्था को प्राप्त अपने में लीन अर्थात् इन्द्रियों की सकल वृत्तियों को अपने में संहार कर, अतः एव सम्प्रसन्नः = बाह्यविषयों के सम्बन्ध जनित सांसारिक सुखदुःख से रहित, आनन्द स्वरूप होता है; उस समय में स्वप्न को नहीं देखता, तब इन नाडि़यों में से पुरीतति नामक नाडी में प्रविष्ट रहता है, उस समय कोई पाप अर्थात् सुखदुःखादि द्वन्द्व उस जीवात्मा को स्पर्श नहीं करता, क्योंकि तब वह अपने तेज से संयुक्त रहता है।

अथ यदा सुषुप्तो भवति यदा न कस्यचन वेद हिता नाम नाडयो द्वासप्ततिः सहस्राणि हृदयात्पुरीततमभि- प्रतिष्ठन्ते ताभिः प्रत्यवसृप्य पुरीतति शेते ....... ॥ बृहदा॰ २.१.१९॥

अर्थात् वह जीवात्मा जब सुषुप्ति अवस्था को प्राप्त होता है, और जब किसी पदार्थ के विषय में कुछ नहीं जानता, उस समय जो हित = सुख देने हारी ७२००० नाडि़याँ हृदय देश से सम्पूर्ण शरीर में फैली हुई हैं, उन नाडि़यों के द्वारा इधर-उधर जा, अन्त में इन्द्रियों को अपने में लीन करके सोता है। ........ इसी प्रकार —

यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति॥ बृहदा॰ ४.३.१९॥

अर्थात् जिस सुषुप्ति में सोकर उस अवस्था को पाकर किसी कामना को नहीं चाहता, किसी स्वप्न को नहीं देखता।

महर्षि व्यास योगसूत्र १.१० की व्याख्या में निद्रावृत्ति के विषय में कहते हैं कि पुरुष को जागने पर पुरुष के चित्त में एक प्रकार का ज्ञान होता है, कि मैं सुखपूर्वक सोया, या मैं दुःखपूर्वक सोया, या मैं मूढ़ होकर सोया। यह ज्ञान बिना किसी अनुभव के नहीं होता। परन्तु उस अवस्था में चित्त के भी निश्चेष्ठ = निष्क्रिय होने से आत्मा में होने वाला अनुभव चित्त की वृत्तिरूप में उपलब्ध नहीं होता और न ही कहीं उस अनुभव = ज्ञान को शब्द रूप में कहा गया है। यह स्थिति सांसारिक सुखदुःख से रहित स्थिति कहलाती है। सुषुप्ति अवस्था की ये अनुभूति भी सम्यक् रूप से ज्ञात नहीं कही जा सकती, परन्तु होती है और जीवात्मा यहाँ बाह्य जगत् से सर्वर्था असम्बद्ध हुआ, परमात्मा में ही स्थित होता है। परन्तु तमोगुण के प्रभाव के कारण उसको ऐसा ज्ञान नहीं हो पाता।

इस रहस्य को समझने हेतु बृहदारण्यकोपनिषद् ४.३.२३-३२ का प्रकरण द्रष्टव्य है। महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को सुषुप्ति अवस्था का उपदेश करते हुए कहते हैं —

यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्। न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत्॥२३॥

अर्थात् वह जीवात्मा (तत् न पश्यति) उस अवस्था में कुछ नहीं देखता, ऐसा जो (यत् वै) माना जाता है सो ठीक नहीं क्योंकि (वै) निश्चयपूर्वक (पश्यन्) देखता हुआ वह आत्मा विद्यमान है परन्तु (तत् न पश्यति) अपने से भिन्न बाह्य वस्तु को नहीं देखता। (हि) क्योंकि उस अवस्था में भी (द्रष्टुः) देखने वाले जीवात्मा की (दृष्टिः) दर्शन शक्ति का (विपरिलोपः) सर्वथा विनाश (न विद्यते) नहीं है, क्योंकि (अविनाशित्वात्) वह दर्शनशक्ति अविनाशी है। तब अन्य वस्तु को क्यों नहीं देखता इसको कहते हैं (तु तत्) परन्तु उस सुषुप्ति अवस्था में (ततः) उस अपने से (अन्यविभक्तम्) अन्य भिन्न (द्वितीयम्) दूसरी वस्तु (न अस्ति) नहीं है, (यत् पश्येत्) जिसको वह देखे। अर्थात् देखने को वहाँ अन्य कोई पदार्थ = सामग्री नहीं, इस हेतु वह अन्य वस्तु को नहीं देखता॥२३॥

इसी प्रकार से अगली कण्डिकाओं में कहा है —

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा नहीं सूंघता है, सो नहीं किन्तु सूंघता हुआ वह उसको नहीं सूंघता क्योंकि घ्राता की घ्राणशक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न वस्तु हो, जिसको वह सूंघे॥२४॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा स्वाद नहीं लेता। सो नहीं किन्तु स्वाद लेता हुआ वह उसको नहीं स्वादता क्योंकि रसयिता की स्वादग्रहण शक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसका वह स्वाद ले॥२५॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा नहीं बोलता। ऐसा जो मानते हैं सो ठीक नहीं। किन्तु बोलता हुआ वह उसको नहीं बोलता क्योंकि वक्ता की भाषणशक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसका वह बोले॥२६॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा नहीं सुनता। ऐसा जो मानते हैं सो ठीक नहीं। किन्तु सुनता हुआ वह उसको नहीं सुनता क्योंकि श्रोता की श्रवणशक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसका वह सुने॥२७॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा मनन नहीं करता। ऐसा जो मानते हैं सो ठीक नहीं। किन्तु मनन करता हुआ वह उसको नहीं मनन करता क्योंकि मन्ता की मननशक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसका वह मनन करे॥२८॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा स्पर्श नहीं करता। ऐसा जो मानते हैं सो ठीक नहीं। किन्तु स्पर्श करता हुआ वह उसको नहीं स्पर्श करता क्योंकि स्प्रष्टा की स्पर्शशक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसका वह स्पर्श करे॥२९॥

यद्वै तन्न विजानाति विजानन्वै तन्न विजानाति न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्न तु तद् द्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यद्विजानीयात्॥३०॥

निश्चय उस अवस्था में वह जीवात्मा नहीं जानता। ऐसा जो मानते हैं सो ठीक नहीं। किन्तु जानता हुआ वह उसको नहीं जानता क्योंकि विज्ञाता की विज्ञाति = जानने की शक्ति का विपरिलोप नहीं होता क्योंकि वह अविनाशी है। परन्तु उस अवस्था में द्वितीय वस्तु नहीं, जो उससे अन्य = भिन्न हो, जिसको वह जाने॥३०॥

इसी का आगे स्पष्ट करते हुए कहते हैं —

यत्र वाऽन्यदिव स्यात्तत्रान्योऽन्यत्पश्येदन्योऽन्यज्जिघ्रेदन्योऽन्यद्रसयेदन्योऽन्यद् वदेदान्योऽन्यच्छृणुयाद-न्योऽन्यन्मन्वीतान्योऽन्यत्स्पृशेदन्योऽन्यद्विजानीयात्॥३१॥

अर्थात् (यत्र वै) निश्चय जिस अवस्था में (अन्यद् इव) अपने से अन्य ही वस्तु (स्यात्) होवे (तत्र) उस अवस्था में (अन्यः) अन्य पुरुष (अन्यद् पश्येत्) अपने से अन्य वस्तु को देखे (अन्यः अन्यत् जिघ्रेत्) अपने से अन्य वस्तु को सूंघे (अन्यः अन्यत् रसयेत्) अपने से भिन्न अन्य पदार्थों का रस लेवे (अन्यः अन्यत् वदेत्) अन्य अन्य शब्दों को बोले (अन्यः अन्यत् शृणुयात्) अपने से अन्य को सुने (अन्यः अन्यत् मन्वीत्) अन्य अन्य वस्तु का मनन करे (अन्यः अन्यत् स्पृशेत्) अपने से अन्य वस्तुओं का स्पर्श करे (अन्यः अन्यत् विजानीयात्) अपने से अन्य पदार्थों एवं विषयों को जाने॥३१॥

इसके आगे महर्षि याज्ञवल्क्य कहते हैं —

हे सम्राट! वह परमात्मा जल के समान, एक है, द्रष्टा = देखने वाला है, अद्वितीय है। ऐसा जो परमात्मा है वही ब्रह्मलोक है, अन्य नहीं। यही अनुशासन है, यही उपदेश है। इस जीवात्मा की यह ब्रह्मप्राप्ति ही परम गति है, इस जीवात्मा की यही सर्वोत्कृष्ट सम्पत्ति है। इसका यही परमलोक है। इसका यही परम आनन्द है। इसी ब्रह्मानन्द की एक कला को लेकर ही सब प्राणी भोग करते हैं॥३२॥

इस प्रकार से महर्षि याज्ञवल्क्य राजा जनक को स्पष्ट करते हुए कह रहे हैं कि सुषुप्ति अवस्था में जीवात्मा अपने सभी शक्तियों से युक्त होता हुआ भी न कुछ देखता, न कुछ सूंघता, न कुछ रस लेता, न कुछ बोलता, न कुछ सुनता, न कुछ मनन करता, न कुछ स्पर्श करता, न कुछ जानता है क्योंकि उस अवस्था में उसके अपने से भिन्न कोई बाह्य पदार्थ या विषय है ही नहीं जिसको वह देखे, सूंघे, सुने, स्पर्श करे अथवा जिसका रस ले, जिसके विषय में बोले, जिसका मनन करे, और जिसको जाने। इस अवस्था में जीवात्मा अपने में ही स्थित होता हुआ परमात्मा के आश्रय में होता है परन्तु तमोगुण की अधिकता के कारण वह यह नहीं जान रहा होता।

जब इसी शरीर में ही सामान्य मनुष्य प्रतिदिन इस अवस्था को प्राप्त करता है, तो ऐसे में असम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में चेतन पुरुष द्वारा परमात्म-साक्षात्कार की अवस्था का होना कैसे असम्भव है? उस सुषुप्ति अवस्था के अनुभवों = ज्ञानों को वृत्तिरूप में व्यक्त कदापि नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर जो अनुभूति शब्द रूप में = वृत्तिरूप में उपलब्ध होती है, वह अनुभूति परमात्म-साक्षात्कार नहीं कहला सकती। परमात्मा के स्वरूप, गुण, धर्मों के चिन्तन-मनन से होने वाला ज्ञान परमात्म-साक्षात्कार में सहायक होता है, यह चित्त की सत्त्वगुण विशिष्ट उत्कृष्ट अवस्था है, परन्तु फिर भी यह स्थिति असम्प्रज्ञात समाधि की पूर्वावस्था कहलायेगी।

समाधिसुषुप्तिमोक्षेषु ब्रह्मरूपता॥ सांख्य ५.११६॥ के अनुसार सुषुप्ति और समाधि = (असम्प्रज्ञात समाधि) की अवस्था में समानता है। अतः असम्प्रज्ञात समाधि में वह जीवात्मा न कुछ देखता, न कुछ सूंघता, न कुछ रस लेता, न कुछ बोलता, न कुछ सुनता, न कुछ मनन करता, न कुछ स्पर्श करता, न कुछ जानता है। उस अवस्था में वह स्वरूपस्थिति को प्राप्त हुआ परमात्मा में ही स्थित होता है, और यह अवस्था ज्ञानपूर्वक होती है। इस अवस्था में तमोगुण का किसी प्रकार से कोई भी प्रभाव न होने से, जीवात्मा अपनी स्थिति के बारे में जान रहा होता है। परन्तु यह ज्ञान आत्मा से चित्त की ओर प्रवाहित न होने से व्युत्थान अवस्था में अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि से भिन्न अवस्था में इसके लिए यही कहा जाता है कि न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः।

“असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्म-साक्षात्कार” को हमने इस ग्रन्थ की भूमिका में भी उठाकर विशेष रूप से प्रतिपादित किया है। इस विषय में शास्त्र के प्रमाणों को वहीं देखें। अतः असम्प्रज्ञात समाधि में परमात्मा के आलम्बन का निषेध नहीं माना जा सकता। वस्तुतः तो इसमें केवल मात्र परमात्मा का ही आलम्बन रहता है।