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Samaadhi Paada / Trance / 19
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Samaadhi Paada / Trance / 19

भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्॥१९॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 19

In Hindi:

पदपाठ : भवप्रत्ययः विदेहप्रकृतिलयानाम्॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : स खल्वयं द्विविधः, उपायप्रत्ययो भवप्रत्ययश्च। तत्रोपायप्रत्ययो योगिनां भवति—

हिंदी में अर्थ : (स खलु अयम्) वह योग में होने वाली समाधि (द्विविधः) दो प्रकार से होती है; (उपायप्रत्ययः) उपाय प्रत्यय = उपायों के कारण (च) और (भवप्रत्ययः) भवप्रत्यय = संसार के ज्ञान के कारण। (तत्र) उन दोनों में से (उपायप्रत्ययः) उपायप्रत्यय (योगिनाम्) योगियों की (भवति) होती है —

हिंदी में अर्थ : (विदेहप्रकृतिलयानाम्) विदेह और प्रकतिलय नामक विद्वानों को होने वाली समाधि (भवप्रत्ययः) भव = संसार (के ज्ञान) प्रत्यय = के कारण = आधार पर होती है ॥

व्यास भाष्य : विदेहानाम् देवानाम् भवप्रत्ययः। ते हि स्वसंस्कारमात्रोपयोगेन चित्तेन कैवल्यपदमिवानुभवन्तः स्वसंस्कारविपाकं तथाजातीयकमतिवाहयन्ति।

तथा प्रकृतिलयाः साधिकारे चेतसि प्रकृतिलीने कैवल्यपदमिवानुभवन्ति यावन्न पुनरावर्त्ततेऽ- धिकारवशाच्चित्तमिति॥

हिंदी में अर्थ : (विदेहानाम् देवानाम्) विदेह नामक देवों = विद्वानों की समाधि (भवप्रत्ययः) संसार के ज्ञान के कारण = आधार पर होती है। (हि) क्योंकि (ते) वे विदेह नामक विद्वान् (स्वसंस्कारमात्रोपयोगेन चित्तेन) अपने संस्कार मात्र से उपयोग में आने वाले चित्त के द्वारा (कैवल्यपदम् इव) कैवल्य = मोक्षपद के समान (अनुभवन्तः) अनुभव करते हुए; (स्वसंस्कार) अपने संस्कारों के (तथाजातीयकम्) अनुरूप = उसी प्रकार के (विपाकम्) फलों को (अतिवाहयन्ति) भोगते हुए समाप्त करते हैं। (तथा) उसी प्रकार (प्रकृतिलयाः) प्रकृतिलय नामक विद्वान् उपासक = योग मार्ग का अनुसरण करने वाले (साधिकारे चेतसि) चित्त के निवृत्त न होने पर ही = अकृत्कृत्य चित्त के (प्रकृतिलीने) प्रकृति में लीन होने पर (कैवल्यपदम् इव) कैवल्य = मोक्षपद के समान (अनुभवन्ति) अनुभव करते हैं, (यावत् चित्तम्) जबतक कि उनका चित्त (अधिकारवशात्) अधिकारवश = भोगापवर्ग रूपी कार्य पूरा न होने के कारण (न पुनरावर्त्तते इति) फिर से नहीं लौटता = लौकिक स्थिति में नहीं आता॥

वैदिक योग मीमांसा : योगपक्ष में होने वाली सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों का प्रकार तथा उपायों = अभ्यास और वैराग्य (पर और अपर), को संक्षेप में बताने के पश्चात्, इन समाधियों को प्राप्त करने के अन्य उपायों = कारणों को कहा गया है। ये समाधियाँ भवप्रत्यय और उपायप्रत्यय से होती हैं। यहाँ प्रत्यय का अर्थ कारण है। इन समाधियों की प्राप्ति का एक कारण भव अर्थात् संसार का यथार्थ ज्ञान है, जिसे भवप्रत्यय के नाम से कहा गया है। इन समाधियों की प्राप्ति के अन्य उपायों का वर्णन अगले सूत्र में किया गया है।

इस सूत्र में तीन पद हैं — १. भवप्रत्यय; २. विदेह तथा ३. प्रकृतिलय। इन तीनों को यथार्थ में समझे बिना इस सूत्र का अर्थ नहीं समझा जा सकता। विदेह और प्रकृतिलय स्थितियों का शास्त्रों में नाम मात्र को उल्लेख मिलता है। अतः विभिन्न व्याख्याकारों ने इस सूत्र की विभिन्न प्रकार से व्याख्या की है।

विदेह :— विदेह स्थिति क्या है ? विगतोदेहऽभिमानादिदेहधर्मो यस्य स विदेहः। अर्थात् जिसको देह, इन्द्रिय का अभिमान आदि धर्म दूर हो गया हो उसे विदेह कहते हैं। इसी भावना को भोज ने सूत्र १.१७ के भाष्य में इस प्रकार से कहा है “यदा तु रजस्तमोलेशानुविद्धमन्तःकरणसत्त्वं भाव्यते, तदा गुणभावाच्चितिशक्तेः सुखप्रकाशमयस्य सत्त्वस्य भाव्यमानस्योद्रेकात् सानन्दः समाधिर्भवति। तस्मिन्नेव समाधौ ये बद्धधृतयस्तत्त्वान्तरं प्रधानपुरुषरूपं न पश्यन्ति, ते विगतदेहाहङ्कारत्वाद्विदेहशब्दवाच्याः।” अर्थात् जब तो रजोगुण और तमोगुण के किञ्चित् लेश से युक्त अन्तःकरण बुद्धि का विचार = ध्यान करता है, तब ध्येय बुद्धि की प्रधानता = प्रबलता के कारण सत्त्वगुण बहुल बुद्धि के सुख प्रकाशमय हो जाने से चितिशक्ति = चैतन्य पुरुष को बुद्धि के गुणरूप होने से आनन्द प्रतीत होता है; वह आनन्द नामक सम्प्रज्ञात समाधि होती है। उस ही आनन्दानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में जिन साधकों ने यह निश्चय कर लिया है कि यही चरम गति = परम गति है; इस कारण दूसरे नित्य पदार्थ जो प्रकृति, पुरुष = जीवात्मा और परमात्मा हैं उनको नहीं देखते, वे विद्वान् देह के अंहकार दूर हो जाने के कारण से विदेह नाम से कहे जाते हैं।

स्वामी ब्रह्ममुनि जी के अनुसार “जो देह अर्थात् शरीर-इन्द्रिय और मन आदि अन्तःकरण के सम्बन्ध से विगत हो चुके योग के ग्रहणमार्ग द्वारा अंहकार का भी निरोध कर असम्प्रज्ञात समाधि पर पहुँच चुके है, वे विदेह कहलाते हैं। ये विद्वान् परमात्मा में जीव के धर्मों का अभाव-दर्शन रूप असम्प्रज्ञात समाधि का अभ्यास करते हैं।”

उपरोक्त दोनों ही स्थितियों के अनुसार साधक परमात्मा के यथार्थ स्वरूप तक नहीं पहुँचता, परमात्मा का साक्षात्कार नहीं करता।

प्रकृतिलय :— प्रकृतिलय विद्वान् = साधक = योगी कौन से हैं ? भोज के अनुसार “ततः परं रजस्तमोलेशानभिभूतशुद्धसत्त्वमालम्बनीकृत्य या प्रवर्त्तते भावना, तस्यां ग्राह्यस्य न्यग्भावाच् चितिशक्ते उद्रेकात् सत्तामात्रावशेषत्वेन समाधिः सास्मित इत्युच्यते। न चाहङ्कारास्मितयोरभेदः शङ्कनीयः, यतो यत्रान्तःकरणम् ‘अहमिति’ उल्लेखेन विषयान् वेदयते, सोऽहङ्कारः; यत्रान्तर्मुखतया प्रतिलोमपरिणामे प्रकृतिलीने चेतसि सत्तामात्रम् अवभाति, साऽस्मिता। अस्मिन्नेव समाधौ ये कृतपरितोषाः परं परमात्मानं पुरुषं न पश्यन्ति, तेषां चेतसि स्वकारणे लयमुपागते; प्रकृतिलया इत्युच्यन्ते।” अर्थात् इसके पश्चात् आगे चलकर रजोगुण और तमोगुण के सम्बन्ध से अभिभूत न हुई = सर्वथा रहित सत्त्वगुणमयी बुद्धि को आलम्बन करके जो ध्यान किया जाता है, उस ध्यान में ग्राह्य बुद्धि का न्यून स्वरूप होने से पुरुष की प्रधानता से सत्तामात्र के रह जाने से अर्थात् अन्य विषयों का ज्ञान कराने वाली बुद्धि के भी विलय हो जाने से, अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कही जाती है। और अंहकार और अस्मिता में अभेद की शंका नहीं करनी चाहिए; क्योंकि ये दोनों भिन्न वस्तु हैं, क्योंकि जिस काल में अन्तःकरण द्वारा “मैं हूँ” इस अहम् भाव से ज्ञानपूर्वक अहम् भावना से चित्रित हुआ चित्त विषयों का ज्ञान प्राप्त कराता है, वह अंहकार है। जिस काल में बाह्य विषयों को छोड़कर अन्तर्मुखी भावना द्वारा विलोम परिणाम में बुद्धि का अपने कारण प्रकृति में विलीन हो जाने पर चित्त में सत्तामात्र की ही = पुरुष के स्वरूप की ही प्रतीति होती है वह अस्मिता है। इसी अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि में जिस योगी ने सन्तोष प्राप्त कर लिया है और सर्वश्रेष्ठ परमात्मा पुरुष को नहीं देखता है, उनका चित्त अपने कारण प्रकृति में लय होने पर, वे योगी प्रकृतिलय कहे जाते हैं।”

स्वामी ब्रह्ममुनि जी के अनुसार “जो प्रकृति अर्थात् गन्धतन्मात्रा, रसतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, शब्दतन्मात्रा, अहंकाररूप विकार, महत्तत्त्व और प्रकृति का लय कर चुके योग के ग्राह्यमार्ग द्वारा प्रकृति (उपादान कारण रूप अव्यक्त वस्तु) का भी निरोध कर असम्प्रज्ञात समाधि तक पहुँच चुके है, वे प्रकृतिलय कहलाते हैं। ये साधक परमात्मा में प्रकृति के धर्मों का अभाव-दर्शन रूप असम्प्रज्ञात समाधि का अभ्यास करते हैं।”

अतः प्रकृतिलय विद्वान् = साधक = योगी भी परमात्मा के यथार्थ स्वरूप तक नहीं पहुँचते; परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाते।

“विदेह” और “प्रकृतिलय” की व्याख्या पर उपरोक्त दोनों विद्वानों, भोज तथा स्वामी ब्रह्ममुनि जी का मत अलग-अलग है; इसी प्रकार अन्य भाष्यकारों ने भी अपने विचारानुसार अर्थ किए हैं। व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के आधार पर, हमारे विचार से भोज की व्याख्या अधिक उचित है।

योगसूत्र १.१५ के भाष्य में महर्षि व्यास कहते हैं “स्वर्गविदेह्यप्रकृतिलयत्वप्राप्तावानुश्रविक विषये वितृष्णस्य” अर्थात् स्वर्ग, विदेह, प्रकृतिलयत्व प्राप्ति रूप आनुश्रविक विषयों में तृष्णा रहित = वासना रहित होना” अपर वैराग्य कहलाता है। ये दोनों स्थितियाँ, विदेह और प्रकृतिलय, आनुश्रविक विषय हैं। इनमें से किसी भी स्थिति में सन्तुष्ट हुआ साधक, मोक्ष पद को प्राप्त नहीं कर सकता। इन दोनों स्थितियों में साधक = योगी कैवल्य जैसा अनुभव करता है परन्तु कैवल्य = मोक्ष को प्राप्त नहीं करता। इसीलिए महर्षि व्यास ने इस सूत्र के भाष्य में इन दोनों स्थितियों के लिए “कैवल्यपदमिव” का प्रयोग किया है। ऐसे साधक = योगी आसक्ति से युक्त होने और परवैराग्य के अभाव में मोक्ष को प्राप्त नहीं कर सकते।

सांख्यदर्शनकार महर्षि कपिल ने भी प्रकृतिलय के लिए कृतकृत्यता का निषेध किया है। सांख्यसूत्र के तीसरे अध्याय में इस विषय पर शंका उठायी कि उत्कृष्ट योनि को प्राप्त करके भी पुनरावृत्ति होती है, उसके कार्य होने से क्योंकि कार्यों की शरण स्थायी नहीं होती किन्तु कार्यों के कारण प्रकृति में लय हो जाने से तो पुनरावृत्ति न होगी तब कारणलयता से कृतकृत्यता मानी जाए, माता की गोद प्राप्ति के समान। इस शंका का समाधान करते हुए कहा है —

न कारणलयात् कृतकृत्यता मग्नवदुत्थानात्॥ सांख्य ३.५४॥

अर्थात् कारणलयता से कृतकृत्यता नहीं होती, पुनरावृत्ति का अभाव नहीं होता, जैसे जलाशय में मग्न हुए = अन्दर डुबकी लगाए हुए का पुनरुत्थान होता है, फिर बाहर आना होता है, उसी प्रकार प्रकृति में लीन होने से कृतकृत्यता नहीं होती, प्रकृतिलीन को भी पुनर्जन्म हेतु वापिस संसार में आना होता है। यहाँ प्रकृतिलीन का अर्थ मूल प्रकृति को साक्षात् कर उसका सम्यक् ज्ञान होना है।

महर्षि व्यास ने योग० १.२४ के भाष्य में कहा है “यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटिः सम्भाव्यते” अर्थात् प्रकृतिलीन योगी को चित्त के अकृतकृत्य होने के कारण से निकट भविष्य में बन्धन की स्थिति की सम्भावना होती है। प्रकृतिलीन को इस बन्धन के कारण पुनः संसारचक्र में आना होता है। वे मुक्ति को प्राप्त हुए जीवों के समान नहीं माने गए हैं।

बिल्कुल इसी भावना को महर्षि व्यास इसी सूत्र के भाष्य में भी कह रहे हैं “तथा प्रकृतिलयाः साधिकारे चेतसि प्रकृतिलीने कैवल्यपदमिवानुभवन्ति यावन्न पुनरावर्ततेऽधिकारवशाच्चित्तमिति॥”

विदेह और प्रकृतिलय देवों = विद्वानों की अवस्था अन्य बद्ध जीवात्माओं की अपेक्षा अधिक दिव्य, सूक्ष्म, सात्त्विक और उच्चतर है; किन्तु चित्त के साधिकार होने के कारण कैवल्य प्राप्ति नहीं होती। इनकी उच्च दशा का वर्णन विभूतिपाद ३.२६ में महर्षि व्यास ने इस प्रकार से किया है —

त एते सप्तलोकाः सर्व एव ब्रह्मलोकाः। विदेहप्रकतिलयास्तु मोक्षपदे वर्तन्ते, न लोकमध्ये न्यस्ता इति।

वस्तुतः तो सभी लोक ब्रह्म से व्याप्त होने से ब्रह्मलोक ही है। उस सूत्र में विभिन्न प्राणियों के चित्तस्तर के अनुसार उनकी भूः से लेकर सत्यलोक पर्यन्त की स्थिति को कहा गया है। परन्तु इन सभी को लोक मध्य ही माना गया है। योगसूत्र १.१५ और १.२४ पर व्यासभाष्य की अन्तःसाक्षी के सन्दर्भ में यहाँ पर भी विदेह और प्रकृतिलय हेतु “मोक्षपदे” का अभिप्राय “मोक्षपदमिव” ही जानना चाहिए। (योगसूत्र ३.२६ के उक्त सन्दर्भ की व्याख्या यथास्थान देखें।) इस प्रकार ये विदेह और प्रकृतिलय योगी जन्म-मरण के विराम-हीन चक्र से कुछ काल तक दूर रहते हैं। वायुपुराण में दस या सौ मन्वन्तर आदि का कथित काल किसी प्रामाणिक ग्रन्थ में नहीं है। यह काल कितना है यह तो परमात्मा ही जानता है। इस विषय में छान्दोग्योपनिषद् ५.१०.५ में कहा है “तस्मिन्यावत्सम्पातमुषित्वाऽथैतमेवाध्वानं पुनर्निवर्त्तन्ते।”अर्थात् वहाँ कर्मों का जब तक क्षय नहीं हुआ है तब तक निवासकर अनन्तर जिस मार्ग से आगमन होता है, और जिससे गये थे उसी मार्ग के प्रति पुनः लौटते हैं। यहाँ देवयान और पितृयान मार्ग का वर्णन है। देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होते और पितृयान मार्ग से इष्टापूर्त्त आदि कर्मों का फल भोग पुनः मृत्युलोक में आगमन होता है। इसी प्रकार जो इन दोनों मार्गों में से किसी को प्राप्त नहीं होते, उनकी गति का वर्णन छान्दोग्योपनिषद् ५.१०.८ में किया गया है। इस पर विशेष व्याख्यान हेतु छान्दोग्योपनिषद् में वर्णित पंचाग्निविद्या को देखें।

भवप्रत्यय :— भव का अर्थ है संसार और प्रत्यय का अर्थ है कारण। अर्थात् जिस समाधि का कारण यह संसार और उसका ज्ञान हो, वह समाधि भवप्रत्यय कहलाती है। इस समाधि में साधक = योगी के चित्त में संसार का ज्ञान बना रहता है। योगसूत्र १.१७ में महर्षि व्यास ने वितर्क और विचार समाधि में स्थूल और सूक्ष्म को विषय माना है। इस दशा तक योगी, सत्त्वगुण विशिष्ट चित्त के आधार से, प्रकृति के स्थूल विकारों से लेकर सूक्ष्म विकारों तथा मूल प्रकृति का साक्षात् कर लेता है। योगी संसार में सभी पदार्थों को जड़ प्रकृति से निर्मित तथा नाशवान् जानता है। अतः इस का ज्ञान साधक के चित्त में रहना और इस के आधार पर सम्पादित समाधि को भवप्रत्यय कहा गया है।

विदेह नामक विद्वान् प्रकृति का ज्ञान तो प्राप्त कर लेते हैं परन्तु इनको आत्मा और परमात्मा विषयक यथार्थ अभी नहीं हो पाया है। ऐसे में अगर साधक इस अवस्था में प्राप्त होने वाले सुख को ही लक्ष्य मान लेता है (आनन्दानुगत समाधि), और वहीं सन्तुष्ट हो जाता है तो ऐसा विदेह नामक विद्वान् इस समाधि के सम्पादन होने पर अपने संस्कारों के आधार से, संसार से अपने को श्रेष्ठ मानते हुए, अपने आपको कृतकृत्य सा मानता हुआ, इसी स्थिति में सन्तुष्ट हो कर, अपने चित्त में दुःखरहित अवस्था का अनुभव करता है। ऐसा साधक संसारचक्र = जन्म-मरण चक्र से कुछ काल दूर रहता हुआ, सत्त्वगुण विशिष्ट चित्त के कारण, चित्तगत अपने संस्कारों को, संस्कारों के अनुरूप फलों को, परमात्मा की व्यवस्था में, भोगते हुए समाप्त करता हैं।

इसी प्रकार जब साधक = योगी उस पूर्वोक्त दशा से आगे निकलकर आत्मविषयक ज्ञान को भी प्राप्त कर लेता है, तब इस अवस्था में साधक आत्मानुभूति से अभिभूत हुआ (अस्मितानुगत समाधि) अपने आप को संसार के अन्य लोगों और साधकों से श्रेष्ठ जानता है। इस अवस्था में साधक आत्मतत्त्व का बोध तो करता है परन्तु यह बोध भी उसे चित्त के द्वारा ही होता है, अतः इस अवस्था में भी चित्त कृतकृत्य नहीं होता। इस अवस्था में तृप्त हुए साधक प्रकृतिलय योगी कहलाते हैं। ऐसा प्रकृतिलय नामक विद्वान् = योगी इस समाधि के सम्पादित होने पर प्रकृति का पूर्ण साक्षात्कार होने के पश्चात्, आत्मानुभूति को प्राप्त करता हुआ, अपने आपको कृतकृत्य मानता हुआ, इसी स्थिति में सन्तुष्ट होकर, कैवल्य जैसा अनुभव करता है। इस अवस्था में योगी का चित्त अपने अधिकारवश, अपवर्ग प्राप्ति न हो पाने कारण, जब तक संसारचक्र में नहीं लौटता, तब तक वे संसारचक्र से दूर रहते हैं।

इसी तथ्य को महर्षि याज्ञवल्क्य बृहदारण्यक उपनिषद् में इस प्रकार से कहते हैं —

यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्मिँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स कृपणोऽथ य एतदक्षरं गार्गि विदित्वाऽस्माल्लोकात्प्रैति स ब्राह्मणः॥ बृ॰ ३.८.१०॥

अर्थात् हे गार्गि! जो अज्ञानी पुरुष इस अक्षर = ब्रह्म को न जानकर इस लोक में होम और यज्ञ करता है, अनेक सहस्र वर्ष तप करता है उसका वह कर्म अन्तवत् अर्थात् विनश्वर = नाशवाला होता है। हे गार्गि् जो ही इस अक्षर = ब्रह्म को न जानकर इस लोक से चला जाता है वह कृपण है। और हे गार्गि! जो इस अक्षर = ब्रह्म को जानकर इस लोक से गमन करता है वही ब्राह्मण है॥ अर्थात् परमात्मा साक्षात्कार के बिना किए जाने वाले सभी यज्ञादि शुभ कर्म तथा समाधि आदि आन्तरिक कर्म अन्त वाले है, इस प्रकार के कर्मों से पुरुष मुक्ति को प्राप्त नहीं कर सकता।

यहाँ यह समझना चाहिए कि शास्त्रों में स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया गया है कि मुक्ति एक जन्म की साधना से नहीं होती, उसके लिए जन्म-जन्मान्तर की साधना की आवश्यकता होती है। अतः छान्दोग्य और बृहदाराण्यक उपनिषदों में वर्णित श्रेष्ठ लोकों की प्राप्ति को, महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास द्वारा विदेह और प्रकृतिलय देवों की गतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन जानना चाहिए। ऐसे साधक या तो इन अवस्थाओं को प्राप्त कर स्वयं ही सन्तुष्ट हो जाते है, और शेष जीवन में आगे नहीं बढ़ते; या फिर इसी स्थिति को प्राप्त कर शरीरवियोग के कारण आगे की स्थितियों को सम्पादन नहीं कर पाते। इनकी आगे की साधना, अपने संस्कारों और कर्माशय के आधार पर, परमात्मा की व्यवस्था में, श्रेष्ठ कुलों में जन्म लेकर आगे बढ़ती है।

बहुधा व्याख्याकारों ने भवप्रत्यय और उपायप्रत्यय को असम्प्रज्ञात समाधि के दो भेद माने हैं। वस्तुतः यहाँ “भवप्रत्यय” और “उपायप्रत्यय” दोनों ही संज्ञा शब्द नहीं है। इन्हें असम्प्रज्ञात समाधि के दो भेद मानना युक्तियुक्त नहीं है। भवप्रत्यय के द्वारा होने वाली विदेह और प्रकृतिलय देवों = विद्वानों की समाधि को असम्प्रज्ञात समाधि कहना उचित नहीं है। असम्प्रज्ञात समाधि के लिए निम्न विशेषताएँ, योग्यताएँ, आधार का होना आवश्यक है —

१. असम्प्रज्ञात समाधि निरुद्धावस्था = सर्ववृत्तिनिरोध में ही सम्भव है (योगसूत्र १.१ पर व्यासभाष्य — “सर्ववृत्तिनिरोधे त्वसम्प्रज्ञात समाधिः”। तथा “चितिशक्तिरपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमा दर्शितविषया शुद्धा चानन्ता च सत्त्वगुणात्मिका चेयमतो विपरीता विवेकख्यातिरिति। अतस्तस्यां विरक्तं चित्तं तामपि ख्यातिं निरुणद्धि। तदवस्थं संस्कारोपगं भवति। स निर्बीजः समाधिः। न तत्र किञ्चित्संप्रज्ञायत इत्यसंप्रज्ञातः।” योग० १.२ पर व्यासभाष्य);

२. असम्प्रज्ञात समाधि का उपाय परवैराग्य है। (योगसूत्र १.१८ पर व्यासभाष्य — तस्य परं वैराग्यमुपायः।); न कि अपरवैराग्य।

३. असम्प्रज्ञात समाधि में संस्कारशेष अवस्था होती है (योगसूत्र १.१८ — विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः)

४. असम्प्रज्ञात समाधि में निरालम्बन अभ्यास से चित्त आश्रय रहित होता हुआ स्वभावशून्य जैसा हो जाता है। (योग० १.१८ पर व्यासभाष्य — तदभ्यासपूर्वं चित्तं निरालम्बनमभावप्राप्तमिव भवतीत्येष निर्बीजः समाधिरसम्प्रज्ञातः)।

उपरोक्त विशेषताओं के आधार पर “भवप्रत्यय” को असम्प्रज्ञात समाधि की श्रेणी में निम्न कारणों से नहीं माना जा सकता :—

१. विदेह और प्रकृतिलय साधकों = योगियों को होने वाली समाधि में भव = संसार का ज्ञान रहता है अतः यह सर्ववृत्तिनिरोध की अवस्था नहीं है। इसी प्रकार विदेह अवस्था में आत्मख्याति तथा परमात्मख्याति और प्रकृतिलय अवस्था में परमात्मख्याति नहीं होती, अतः यहाँ चितिशक्ति से विपरीत विवेकख्याति का निरोध भी नहीं होता।

२. योगसूत्र १.१५ के अनुसार विदेह और प्रकृतिलयत्व अवस्थाएँ आनुश्रविक विषय है और इनसे विरक्ति अपरवैराग्य के लिए अत्यावश्यक है। अतः विदेह और प्रकृतिलय साधकों को पूर्णतया अपरवैराग्य ही नहीं हो पाया, तो ऐसे में पुरुष-दर्शन अभ्यास से गुणों के प्रति तृष्णा का अभाव होकर परवैराग्य की प्राप्ति नहीं मानी जा सकती। इसी प्रकार योग० १.१६ के भाष्य में महर्षि व्यास ने ज्ञान की पराकाष्ठा को ही वैराग्य कहा है। मात्र संसार के ज्ञान से, परमात्मज्ञान के बिना, ज्ञान की पराकाष्ठा वेदादि सत्यशास्त्रों में नहीं मानी गयी है।

३. असम्प्रज्ञात समाधि में संस्कारशेष अवस्था होती है। महर्षि व्यास ने इस सूत्र के भाष्य में विदेह विद्वानों के लिए “स्वसंस्कारमात्रोपयोगेन चित्तेन” के द्वारा अपने संस्कारों के फलभोग को कहा है और प्रकृतिलय साधकों के लिए “साधिकार चित्त” के कारण चित्त के लौकिक स्थिति में लौट के न आने तक मोक्षपद जैसा अनुभव होना कहा है। संस्कारशेष अवस्था का वर्णन योगसूत्र १.१८ में महर्षि व्यास ने इस प्रकार से किया है “सर्ववृत्तिप्रत्यस्तमये संस्कारशेषो निरोधश्चित्तस्य समाधिरसंप्रज्ञातः” अर्थात् चित्त की सभी वृत्तियों के निरोध हो जाने पर संस्कार शेष वाली चित्त की निरुद्ध स्थिति = निरोध रूप समाधि असम्प्रज्ञात है। विदेह और प्रकृतिलय अवस्था में संसार का ज्ञान होने से चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध नहीं होता; अतः ये दोनों ही संस्कारशेष अवस्थाएँ नहीं हैं।

४. विदेह और प्रकृतिलय अवस्था में भव = संसार का ज्ञान चित्त में होने से यह अभ्यास निरालम्बन नहीं होता।

भोज ने भी अपने भाष्य में विदेह और प्रकृतिलय विद्वानों के द्वारा सम्पादित योग को, परमपुरुष परमात्मा के दर्शन न होने से, योग का आभास ही कहा है, वास्तविक योग नहीं (तेषां परतत्त्वादर्शनात् योगाभासोऽयम्॥)। अतः उपरोक्त हेतुओं से भवप्रत्यय से होने वाली समाधि असम्प्रज्ञात नहीं होती।

कुछ व्याख्याकारों ने भव का अर्थ अविद्या लिया है, जोकि प्रकरण के विरुद्ध है। अविद्या = विपर्यय की स्थिति में होने वाली समाधि = एक वृत्तिता = एकाग्रता को योग पक्ष में माना ही नहीं जा सकता। (देखें सूत्र १.१ पर वैदिकयोगमीमांसा)। अविद्या का, अभ्यास और वैराग्य द्वारा, निरोध करने के पश्चात् ही योग की आरम्भिक अवस्था को सम्पादित किया जा सकता है। वृत्तियों के निरोध की स्थिति सम्पादन के पश्चात्, सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात समाधियों की प्राप्ति के लिए, अविद्या को समाधि प्राप्ति का कारण कहना न तो महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास को अभीष्ट है, और न ही ऐसा कोई व्याख्यान इनकी भावना के अनुकूल ही है।

इसी प्रकार कुछ व्याख्याकारों ने महर्षि व्यास द्वारा कथित इस सूत्र की अवतरिणका के आधार पर विदेह और प्रकृतिलयों को अयोगी माना है। महर्षि व्यास ने कहा है “तत्रोपायप्रत्ययो योगिनां भवति” अर्थात् उन दोनों में से उपायप्रत्यय योगियों की होती है। इसके आधार पर विदेह और प्रकृतिलय साधकों को अयोगी मानना उचित नहीं है। महर्षि व्यास ने प्रथम सूत्र के भाष्य में विक्षिप्त अवस्था वाले चित्त में होने वाली समाधि को योगपक्ष में नहीं माना है। उसके बाद एकाग्र और निरुद्ध अवस्था का वर्णन किया है। इसी क्रम में वृत्ति निरोध के उपायों को बता कर और सम्प्रज्ञात एवं असम्प्रज्ञात समाधि का वर्णन करने के पश्चात्, इन समाधियों की प्राप्ति के अन्य उपायों को बताया जा रहा है। विदेह और प्रकृतिलय दोनों ही अवस्थाएँ क्रमशः सम्प्रज्ञात योग की उच्चतर (आनन्दानुगत) और उच्चतम (अस्मितानुगत) अवस्थाएँ हैं। महर्षि व्यास ने इस सूत्र के भाष्य में “विदेहानां देवानां भवप्रत्ययः” कहा है अर्थात् विदेह को देव = विद्वान् माना है। इसी प्रकार इन दोनों के लिए मोक्षपद जैसा अनुभव करना कहा है। ऐसे में विदेह और प्रकृतिलय साधकों को अविद्वान्, अयोगी मानना सर्वथा युक्तिविरुद्ध तथा महर्षि व्यास तथा महर्षि पतञ्जलि के मन्तव्य से विपरीत है। यहाँ पर यह समझना अति आवश्यक है कि यह दोनों स्थितियाँ चित्त की एकाग्रावस्था में ही होती है। अर्थात् साधक रजोगुण और तमोगुण से सर्वथा रहित होता तथा उसकी वृत्तियाँ मात्र सात्त्विक = सत्त्वगुण के अनुरूप ही होती है। सत्त्वगुण रहित, अथवा रजोगुण और तमोगुण के लेशमात्र से भी युक्त व्यक्ति, प्रकृति और उसके विकारों तथा आत्मतत्त्व के अन्वेषण में सलंग्न रहता हुआ भी, उपरोक्त विदेह आदि अवस्थाओं को प्राप्त नहीं कर सकता।

यहाँ प्रश्न यह है कि महर्षि व्यास ने उपायप्रत्यय के लिए “योगिनाम्” पद का प्रयोग विशेषतया क्यों किया है ? यहाँ योगिनाम् से तात्पर्य उन योगियों से है जो श्रद्धा आदि पूर्वक अष्टाङ्गयोग — यमनियम आदि का पालन करते हुए ईश्वरसाक्षात्कार, = कैवल्य प्राप्ति, हेतु प्रयत्न करते हैं। महर्षि पतञ्जलि के अनुसार योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः (योग० १.२) अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है; तथा तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् (योग० १.३) अर्थात् तब निरुद्धावस्था में चितिशक्ति = जीवात्मा की द्रष्टा = सर्वसाक्षी, सर्वान्तर्यामी परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित = विराजमानता हो जाती है। अतः जो चित्त की वृत्तियों का पूर्णतया निरोध कर परमात्मस्वरूप में स्थिति का लक्ष्य रखते हैं वे ही योगी कहलाते है। सर्ववृत्ति निरोध के बिना स्वरूपस्थिति की प्राप्ति महर्षि व्यास ने भी नहीं मानी है। अतः जिनका लक्ष्य कैवल्य नहीं है, और न ही जो ईश्वर के यथार्थ स्वरूप को जानते और न उसका साक्षात्कार करना चाहते परन्तु फिर भी सत्त्वगुण प्रधान हो समाधि की सिद्धि हेतु एकाग्रता का सम्पादन करते हुए, प्रकृति और उसके विकार संसार की वास्तविकता = नश्वरता को जानने हेतु प्रयत्नरत रहते, उनको ही विदेह; और जो उस स्थिति से भी आगे जाकर अपने स्वरूप को जानते है, उन्हें प्रकृतिलय की श्रेणी में रखा गया है। इनका लक्ष्य योग की अन्तिम उच्चतम अवस्था तक पहुँचने का न होने से इन्हें “योगिनाम् = योगी” पद से नहीं कहा गया।