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Samaadhi Paada / Trance / 24
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Samaadhi Paada / Trance / 24

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः॥२४॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 24

In Hindi:

पदपाठ : क्लेशः कर्मः विपाकः आशयैः अपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ प्रधानपुरुषव्यतिरिक्तः कोऽयमीश्वरो नामेति —

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (प्रधानपुरुषव्यतिरिक्तः) प्रधान = प्रकृति और पुरुष = जीवात्मा से भिन्न (कः) कौन (अयम्) यह (ईश्वरः) ईश्वर (नाम) नामक पदार्थ = तत्त्व है ? (इति) इस आशंका के विषय में यह सूत्र है—

हिंदी में अर्थ : (क्लेशः) अविद्यादि पाँच क्लेश, (कर्मः) कुशल, अकुशल = शुभ, अशुभ, मिश्रित कर्म (विपाकः) जाति, आयु, भोग रूपी कर्मफल, और (आशयः) चित्त में क्लेश, कर्म, और उनके फलों के अनुभव से उत्पन्न वासनाओं से (अपरामृष्टः) सर्वथा सम्बन्धरहित = संसर्गरहित (पुरुषविशेषः) जीवों से भिन्न स्वभाव वाला पुरुष = चेतन विशेष (ईश्वरः) ईश्वर है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : १. “अब ईश्वर का लक्षण कहते हैं कि (क्लेशकर्म) अर्थात् इसी प्रकरण में आगे लिखे हैं, जो अविद्यादि पाञ्च क्लेश और अच्छे बुरे कर्मों की जो-जो वासना, इन सबसे जो सदा अलग और बन्धरहित है, उसी पूर्णपुरुष को ईश्वर कहते हैं। फिर वह कैसा है ? जिससे अधिक वा तुल्य पदार्थ कोई नहीं तथा जो सदा आनन्द, ज्ञानस्वरूप, सर्वशक्तिमान् है, उसी को ईश्वर कहते हैं।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

२. “ जो अविद्यादि क्लेश, कुशल, अकुशल, इष्ट, अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है।” (स० प्र० सप्तमसमुल्लास)

३. “अविद्यादि क्लेशों और शुभाशुभ कर्मों के फलों से पृथक् मनुष्यादि की तुलना से रहित पुरुष परमेश्वर कहाता है।” (लघुग्रन्थ० वेदविरुद्धमतखण्डन०)

व्यास भाष्य : अविद्यादयः क्लेशाः। कुशलाकुशलानि कर्माणि। तत्फलं विपाकः। तदनुगुणा वासना आशयाः। ते च मनसि वर्त्तमानाः पुरुषे व्यपदिश्यन्ते। स हि तत्फलस्य भोक्तेति। यथा जयः पराजयो वा योद्धृषु वर्त्तमानः स्वामिनि व्यपदिश्यते। यो ह्यनेन भोगेनापरामृष्टः स पुरुषविशेष ईश्वरः।

कैवल्यं प्राप्तास्तर्हि सन्ति च बहवः केवलिनः। ते हि त्रीणि बन्धनानि छित्त्वा कैवल्यं प्राप्ता। ईश्वरस्य च तत्सम्बन्धो न भूतो न भावी। यथा मुक्तस्य पूर्वा बन्धकोटिः प्रज्ञायते नैवमीश्वरस्य। यथा वा प्रकृतिलीनस्योत्तरा बन्धकोटिः सम्भाव्यते नैवमीश्वरस्य। स तु सदैव मुक्तः सदैवेश्वर इति।

योऽसौ प्रकृष्टसत्त्वोपादानादीश्वरस्य शाश्वतिक उत्कर्षः स किं सनिमित्त आहोस्विन्निर्निमित्त इति। तस्य शास्त्रं निमित्तम्। शास्त्रं पुनः किं निमित्तम्? प्रकृष्टसत्त्वनिमित्तम्।

एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोरीश्वरसत्त्वे वर्त्तमानयोरनादिः सम्बन्धः। एतस्मादेतद्भवति सदैवेश्वरः सदैव मुक्त इति। तच्च तस्यैश्वर्यं साम्यातिशयविनिर्मुक्तम्। न तावदैश्वर्यान्तरेण तदतिशय्यते। यदेवातिशयि स्यात्तदेव तत्स्यात्। तस्माद्यत्र काष्ठाप्राप्तिंरैश्वर्यस्य स ईश्वरः।

न च तत्समानमैश्वर्यमस्ति। कस्मात्? द्वयोस्तुल्ययोरेकस्मिन्युगपत्कामितेऽर्थे नवमिदमस्तु पुराणमिदमस्त्वित्येकस्य सिद्धावितरस्य प्राकाम्यविघातादूनत्वं प्रसक्तम्। द्वयोश्च तुल्ययोर्युगपत्कामितार्थ- प्राप्तिर्नास्ति। अर्थस्य विरुद्धत्वात्। तस्माद्यस्य साम्यातिशयैर्विनिर्मुक्तमैश्वर्यं स एवेश्वरः। स च पुरुषविशेष इति॥

हिंदी में अर्थ : (अविद्यादयः) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश - ये पाँच (क्लेशाः) क्लेश हैं। (कुशलाकुशलानि) कुशल = पुण्य, अकुशल = अपुण्य रूप (कर्माणि) कर्म हैं। (तत्फलम्) उन पुण्य-अपुण्य कर्मों का जाति-आयु-भोग रूपी सुख-दुःख फल ही (विपाकः) विपाक है। (तत् अनुगुणाः) उन कर्मफलों के भोगों के अनुकूल बनने वाली (वासनाः) वासनाएँ ही (आशयाः) आशय हैं।

(च) और (ते) वे अविद्यादि चारों (मनसि) मन = चित्त में (वर्त्तमानाः) वर्त्तमान रहते हुए (पुरुषे) पुरुष = जीवात्मा में (व्यपदिश्यन्ते) व्यवहृत होते हैं। (हि) क्योंकि (सः) वह पुरुष (तत्फलस्य) उन अविद्यादि के फलों का (भोक्ता इति) भोक्ता है। (यथा) जैसे (जयः पराजयो वा) जय अथवा पराजय (योद्धृषु) योद्धाओं में (वर्त्तमानः) वर्त्तमान = रहते हुए भी (स्वामिनि) उनके स्वामी राजा में (व्यपदिश्यते) व्यवहृत होती है। (यः) जो पुरुष (हि) निश्यच से (अनेन भोगेन) इन क्लेश, कर्म आदि तथा इनके भोग से (अपरामृष्टः) सर्वथा सम्बन्ध रहित है (सः) वह (पुरुषविशेषः) पुरुषविशेष (ईश्वरः) ईश्वर है।

(कैवल्यम् प्राप्ताः तर्हि) कैवल्य = मोक्ष को प्राप्त हुए तो (बहवः) बहुत से (केवलिनः) मुक्त पुरुष (सन्ति) हैं, (च) और (ते) वे (हि) निश्चय से (त्रीणि बन्धनानि) सत्त्व, रज और तम गुणों के बन्धनों को (छित्त्वा) दूर करके = काट करके (कैवल्यं प्राप्ताः) कैवल्य = मोक्ष को प्राप्त हुए है। (च) और (ईश्वरस्य) ईश्वर का (तत्सम्बन्धः) उन सत्त्व, रज और तम रूपी गुणों के बन्धनों से सम्बन्ध (न भूतो) न भूतकाल में = पहले कभी हुआ और (न भावी) न कभी भविष्यत् में होने वाला है। (यथा) जैसे (मुक्तस्य) मुक्ति को प्राप्त हुए योगी पुरुष की (पूर्वा) मुक्ति से पूर्वकाल में (बन्धकोटिः) बन्धन की स्थिति (प्रज्ञायते) ज्ञात होती है; (एवम्) इस प्रकार की पूर्वकालिक बन्धन की दशा (ईश्वरस्य न) ईश्वर की नहीं जानी जाती। (वा) अथवा (यथा) जैसे (प्रकृतिलीनस्य) प्रकृतिलीन योगी को (चित्त के साधिकार = अकृतकृत्य होने से) (उत्तरा) बाद में = भविष्यत् में (बन्धकोटिः) बन्धन की स्थिति (सम्भाव्यते) सम्भव होती है; (एवम्) इस प्रकार की उत्तरकालिक बन्धन की दशा (ईश्वरस्य न) ईश्वर में सम्भव नहीं होती। (सः) वह ईश्वर (तु) तो (सदैव) सदा = तीनों कालों में (मुक्तः) मुक्त है; और (सदैव) सदा ही (ईश्वरः इति) ईश्वर है; अर्थात् वह सदा से ज्ञान बल आदि ऐश्वर्य सम्पन्न होने से, सदा से ईश्वर ही है और सदा ही ईश्वर रहेगा; कभी अनिश्वर नहीं होगा।

(यः असौ) जो यह (प्रकृष्टसत्त्वोपादानात्) सर्वोत्कृष्ट, सर्वातिशायी सत्त्व = विशुद्ध = अविनश्वर, अनादि और शुद्ध स्वरूप के ग्रहण करने से (ईश्वरस्य) ईश्वर का (शाश्वतिकः) सर्वकालिक = सदा रहने वाला (उत्कर्षः) नित्यमुक्तत्व और नित्य ऐश्वर्य रूप उत्कर्ष है (किम्) क्या (सः) वह उत्कर्ष (सनिमित्तः) प्रमाण सहित है, (आहोस्वित्) अथवा (निर्निमित्तः इति) प्रमाण रहित है? (तस्य) उस ईश्वर के शाश्वतिक उत्कर्ष में (शास्त्रम्) शास्त्र = वेद का (निमित्तम्) प्रमाण है। (पुनः) फिर (शास्त्रम्) शास्त्र = वेद का (किम्) क्या (निमित्तम्) प्रमाण है? (प्रकृष्टसत्त्वः) सर्वोत्कृष्ट अनादि शुद्धस्वरूप ईश्वर का उत्कृष्ट गुण, बल (निमित्तम्) प्रमाण है। (ईश्वरसत्त्वे) ईश्वर के शुद्धस्वरूप में (वर्त्तमानयोः) विद्यमान = सदा वर्त्तमान होने से (एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोः) इन दोनों — शास्त्र = वेद और उत्कर्ष का (अनादिः सम्बन्धः) अनादि सम्बन्ध है। (एतस्मात्) इससे (एतत् भवति) यह सिद्ध होता है कि वह ईश्वर (सदैवेश्वरः) सदा ही अतिशय ऐश्वर्यशाली और (सदैव) सदा ही (मुक्तः इति) मुक्त है। (च) और (तत्) वह (तस्य) ईश्वर का (ऐश्वर्यम्) ऐश्वर्य, किसी अन्य के ऐश्वर्य की अपेक्षा से (साम्यः) समानता और (अतिशयः) अधिकता से (विनिर्मुक्तम्) रहित है। (तत्) वह ईश्वर का ऐश्वर्य (ऐश्वर्यान्तरेण) किसी अन्य के ऐश्वर्य से (न तावत् अतिशय्यते) अतिक्रान्त = उल्लंघित नहीं किया जा सकता। (यदेव) जो ही ऐश्वर्य (अतिशयि) सर्वातिशायी = सबसे बढ़कर (स्यात्) होता है (तदेव) वही ऐश्वर्य (तत् स्यात्) ईश्वर का ऐश्वर्य है।

(तस्मात्) इसलिए (यत्र) जिसमें (ऐश्वर्यस्य) ऐश्वर्य की (काष्ठाप्राप्तिः) पराकाष्ठा = चरम सीमा है (सः) वह (ईश्वरः) ईश्वर है। (च) और (तत्समानम्) ईश्वर के ऐश्वर्य के समान (ऐश्वर्यम्) अन्य किसी का ऐश्वर्य (न अस्ति) नहीं है। (कस्मात्?) क्यों ईश्वर के ऐश्वर्य के समान अन्य का ऐश्वर्य नहीं है? (द्वयोः तुल्ययोः) दो समान ऐश्वर्य वाले पदार्थों के होने से (एकस्मिन् कामितेऽर्थे) अभीष्ट किसी एक पदार्थ के विषय में (युगपत्) एक ही काल में (नवम् इदम् अस्तु) यह नवीन है (पुराणम् इदम् अस्तु) यह पुरातन = प्राचीन है; इस प्रकार का व्यवहार = सङ्कल्प होता है। (इति) इस स्थिति में (एकस्य सिद्धौ) एक पदार्थ की इष्ट सिद्धि होने पर (इतरस्य) दूसरे पदार्थ की (प्राकाम्यविघातात्) पूर्णकामता में = अभीष्ट सिद्धि में विघात् = विरोध होने से दूसरे के ऐश्वर्य में (ऊनत्वम्) न्यूनता (प्रसक्तम्) हो जाती है। (च) और (अर्थस्य विरुद्धत्वात्) “नवीन और पुरातन रूप” अर्थ के परस्पर विरोधी होने से (द्वयोः तुल्ययोः) दो समान ऐश्वर्य = सङ्कल्प वालों के (युगपत्) एक ही काल में (कामितार्थप्राप्तिः) दोनों के अभीष्ट सङ्कल्प की प्राप्ति (न अस्ति) नहीं होती।

(तस्मात्) इसलिए (यस्य) जिसका (ऐश्वर्यः) ऐश्वर्य (साम्यातिशयैः) समानता और अतिशयता = अधिकता से (विनिर्मुक्तम्) रहित है (सः एव) वह ही (ईश्वरः) ईश्वर है, (च) और (सः) वह ईश्वर (पुरुषविशेषः इति) पुरुषविशेष है॥

वैदिक योग मीमांसा : शीघ्र समाधि सिद्धि और समाधि लाभ हेतु परम उपकारक साधन ईश्वर प्रणिधान का निर्देश कर महर्षि पतञ्जलि ईश्वर के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से रहित पुरुषविशेष ईश्वर है।

शास्त्रों में पुरुष शब्द जीवात्मा और परमात्मा दोनों के लिए प्रयुक्त हुआ है। महर्षि यास्क ने निरुक्त २.१.३ में पुरुष शब्द का निर्वचन करते हुए लिखा है —

पुरुषः पुरिषादः। पुरिशयः। पूरयतेर्वा। पूरयत्यन्तरित्यन्तपुरुषमभिप्रेत्य॥

पुरुषः — पुरुष किस कारण से है ? १. पुरि सीदतीति पुरिषादः। पुरि अर्थात् शरीर में बैठने से जीवात्मा पुरुष कहलाता है; अथवा ब्रह्माण्ड रूपी शरीर में बैठने वाला = विद्यमान होने वाला परमात्मा। २. पुरिशयः — शरीर में लेटने वाला = शयन करने वाला; ३. पूरयति से — पूर्ण है अन्दर; इस प्रकार अन्तरपुरुषम् = अन्तर्यामी पुरुष को अभिप्राय में रखकर यह निर्वचन है। इस हेतु यह प्रमाण दिया है —

यस्मा॒त्परं॒ नाप॑र॒मस्ति॒ किञ्चि॒द्यस्मा॒न्नाणी॑यो॒ न ज्यायो॑ऽस्ति॒ कश्चि॑त्।

वृ॒क्ष इ॑व स्त॒ब्धो दि॒विति॑ष्ठ॒त्येक॒स्तेने॒दं पू॒र्णं पुरु॑षेण॒ सर्व॑म्॥ तैत्ति॰ आ० प्र० १०.१०.३॥

अर्थात् जिस परमेश्वर से परे अन्य कोई भी पदार्थ नहीं है, कहा भी है — वह परमात्मा आकाश से भी परे विद्यमान् है (त्वम॒स्य पा॒रे रज॑सो॒ व्यो॑मनः॒॥ ऋ० १.५२.१२॥), इसी प्रकार यजुर्वेद में कहा है — वह परमात्मा इस सब जगत् और जीवों के भीतर और वह इस प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप जगत् के बाहर भी वर्त्तमान् है। (तद॒न्तर॑स्य॒ सर्व॑स्य॒ तदु॒ सर्व॑स्यास्य बाह्य॒तः॥ यजु॰ ४०.५॥); जिससे अधिक निकट भी कोई भी अन्य पदार्थ नहीं है, वह आत्मा में भी विराजमान है, जिससे सूक्ष्म भी कोई अन्य पदार्थ नहीं है और जिससे बड़ा = ज्येष्ठ भी कोई अन्य पदार्थ नहीं है; वह नित्य मुक्तस्वरूप, स्वप्रकाशमान् वृक्ष के समान निश्चल = ध्रुव, एक = अद्वितीय ही सम्पूर्ण जड़ और चेतन जगत् का आधार रूप होकर रहता है। उसी परमात्मा पुरुष से यह सम्पूर्ण जगत् पूर्ण है = वही सर्वत्र व्यापक है।

महर्षि दयानन्द ने परमात्मा के लिए प्रयुक्त “पुरुष” शब्द का निर्वचन करते हुए लिखा है — “पॄ पालनपूरणयोः” इस धातु से पुरुष शब्द सिद्ध हुआ है “यः स्वव्याप्त्या चराचरं जगत् पृणाति पूरयति वा स पुरुषः” जो जब जगत् में पूर्ण हो रहा है इसलिए परमेश्वर का नाम पुरुष है। (स० प्र० प्रथम समुल्लास)

इसी प्रकार “पुरं॒ यो ब्रह्म॑णो॒ वेद॒ यस्याः॒ पुरु॑ष उ॒च्यते॑” (अथर्व० १०.२.३०) में पुरुष से जीवात्मा का बोध होता है क्योंकि ब्रह्मपुर का ज्ञान करने वाला जीवात्मा ही हो सकता है।

अतः पुरुष शब्द से जीवात्मा और परमात्मा दोनों का बोध होता है। इन दोनों अर्थों में किन-किन आधारों पर अन्तर है, इसको इस सूत्र में स्पष्ट किया है —

१. जीवात्मा रूपी पुरुष अविद्या के कारण प्रकृति के संयोग को प्राप्त हुआ, जन्म-मरण रूपी संसारचक्र में घूमता हुआ दुःखों को प्राप्त हो रहा है; वह अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश रूपी पाँच क्लेशों से ग्रस्त हुआ इन क्लेशों के कारण बहुत प्रकार के दुःखों को पाता है।

परमात्मा अविद्यादि क्लेशों से सम्बद्ध न रहता हुआ कभी भी दुःखरूपी बन्धन में नहीं आता।

२. जीवात्मा शुभ-अशुभ और मिश्रित कर्मों को करता हुआ धर्म-अधर्म रूपी कर्माशय को संचित करता है । वेदादि सत्यशास्त्रों में विहित कर्मों को करता हुआ और निषिद्ध एवं अविहित कर्मों को न करता हुआ धर्म; और विहित कर्मों को न करता हुआ और निषिद्ध एवं अविहित कर्मों को करता हुआ अधर्म रूपी कर्माशय के संचय होने से संसार चक्र में लगा हुआ जन्म-मरण को प्राप्त करता हुआ, विभिन्न योनियों में कर्मानुसार जाता रहता है।

परमात्मा के कर्मों में सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और विनाश करना और जीवों के पुण्यापुण्य कर्मों का यथावत् फल देना है। परन्तु परमात्मा का कोई भी कर्म स्वार्थ न होता हुआ, ये सभी कर्म भी जीवों के कल्याण हेतु पूर्णतया न्यायपूर्वक, निर्लिप्तता और निष्कामता से ही होते हैं। अतः वह धर्म-अधर्म रूपी कर्माशय का संचय नहीं करता।

३. जीवात्मा रूपी पुरुष अपने संचित धर्म-अधर्म रूपी कर्माशय का फल जाति, आयु और भोग के रूप में प्राप्त करता हुआ, सुख और दुःख को प्राप्त करता है।

परमात्मा के सृष्टि उत्पत्ति आदि कार्यों से किसी भी प्रकार के धर्म-अधर्म रूपी कर्माशय का संचय न होने के कारण, उसे किसी भी प्रकार के कर्मफल की प्राप्ति नहीं होती।

४. जीवात्मा रूपी पुरुष अपने कर्माशय के सुख-दुःख रूपी फलों को भोगते हुए वैसे ही संस्कारों = वासनाओं से युक्त होते हैं, और उन्हीं संस्कारों के अनुकूल कर्म भी करते हैं। इस प्रकार वे कर्म-संस्कार-कर्म के चक्र से सम्बद्ध रहते हैं। इसी तथ्य को महर्षि व्यास ने योग० १.५ के भाष्य में “एवं वृत्तिसंस्कारचक्रमनिशमावर्तते” के द्वारा कहा है।

परमात्मा क्लेश, कर्म और विपाक से सर्वथा असम्बद्ध होने से उसमें किसी भी प्रकार के संस्कार = वासना का बनना सम्भव ही नहीं है। अतः वह इससे भी सर्वथा असम्बद्ध रहता है।

इस प्रकार वह पुरुष विशेष जो क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा, सर्वकाल में असम्बद्ध है, वह ईश्वर कहा जाता है। ईश्वर परमात्मा का ही एक नाम है और योगदर्शन में परमात्मा को ईश्वर नाम से कहा गया है। ईश्वर शब्द की निरुक्ति करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं — ईश ऐश्वर्य (धातु २.१०) इस धातु से “ईश्वर” शब्द सिद्ध होता है, “य ईष्टे सर्वैश्वर्यवान् वर्त्तते स ईश्वरः” अर्थात् जिसका सत्य विचारशील ज्ञान और अनन्त ऐश्वर्य है, इससे परमात्मा का नाम ईश्वर है। कोई भी जीवात्मा रूपी पुरुष, किसी भी काल में, किसी भी स्थिति में, कभी भी, ईश्वर या उसके तुल्य नहीं हो सकता। इसे समझने हेतु परमात्मा के नाम “ईश्वर” के बारे संक्षेप में समझना आवश्यक है। उणादिकोश में ईश्वर का निर्वचन इस प्रकार से है “अश्नुते आशु शीघ्रं करोति जगद्रचयति स ईश्वरः” और धातु है “अशूङ् व्याप्तौ ” (उणादि॰ ५.५७) अर्थात् ईश्वर में जगत् रचना, व्यापकत्व और आशु कर्त्तृत्व आता है। इसी प्रकार अथर्ववेद में कहा है — “यो भू॒तः सर्व॑स्येश्वरो यस्मि॒न्त्सर्वं॒ प्रति॑ष्ठितम्” (अथर्व० ११.४.१) अर्थात् जो सबका ईश्वर है और जिसमें सब स्थित हैं; वह ईश्वर कहलाता है। तथा — “य ईशे॑ मह॒तो म॒हान्” (यजु॰ २०.३२) जो महान् से महान् का भी सर्वोपरि स्वामी है वह ईश्वर है। कुछ वैयाकरण ईश्वर का निर्वचन इस प्रकार से करते हैं — “ईशितुं शीलमस्यैतीश्वरः” अर्थात् ईक्षण करना जिसका स्वभाव है वह ईश्वर है। ईश्वर शब्द का एक निर्वचन यह भी सम्भव है — “ईशनात् रमणाच्च ईश्वरः” ईक्षण करने तथा जगत् निर्माण रूपी क्रीड़ा करने से परमात्मा ईश्वर कहाता है। इसी प्रकार ऋक्परिशिष्ट २३.१८ में ईश्वर के बारे में कहा है — योऽसौ सर्वेषु वेदेषु पठ्यतेऽनद ईश्वरः॥ अर्थात् सब लोक लोकान्तरों के ईशनकर्त्ता = अधिष्ठाता होने से तथा निरुपाधिक ऐश्वर्यवान् होने से, सब वेद जिन्हें प्राणदाता तथा सृष्टिकर्त्ता कहते हैं, वह ईश्वर है।

उपरोक्त विवेचन से स्पष्ट है कि ईश्वर शब्द परमात्मा का ही एक नाम है, जो किसी भी प्रकार से किसी जीव रूपी पुरुष के लिए प्रयुक्त नहीं होता। इसी व्याख्या के सन्दर्भ में महर्षि व्यास का सूत्र पर व्याख्यान समझना आवश्यक है।

कैवल्य = मोक्ष को प्राप्त करने वाले पुरुष मुक्ति से पूर्व बन्धन में थे और वे सत्त्व, रज और तम तीनों गुणों के बन्धनों को काट कर मुक्ति को प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार प्रकृतिलीन को निकट भविष्य में बन्धन की सम्भावना रहती है, क्योंकि प्रकृतिलीन चित्त के अकृतकृत्य होने से मुक्त नहीं होते। परन्तु ईश्वर को न तो पहले ही कभी कोई बन्धन था और न ही आगे किसी प्रकार का बन्धन होने की कोई सम्भावना ही है। वह तो सदा से, तीनों कालों में मुक्त है और सदा ही ईश्वर है।

इस सूत्र के भाष्य में प्रयुक्त “त्रीणिबन्धनानि” से बहुधा भाष्यकारों ने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के बन्धनों को माना है तथा कुछ ने आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक बन्धनों को माना है। किसी ने भी सत्त्व, रज और तम गुणों के बन्धनों को नहीं कहा। वस्तुतः अगर सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाये तो सत्त्व, रज और तम गुणों के बन्धनों से छूटना ही मुक्ति प्राप्ति है। असम्प्रज्ञात समाधि की प्राप्ति हेतु योगी को परवैराग्य का सम्पादन करना होता है जो कि पुरुषदर्शन अभ्यास से गुणों के प्रति तृष्णा रहित होना है। महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास दोनों ही अधिमात्र तीव्र संवेग = परवैराग्य को समाधिलाभ = कैवल्य प्राप्ति हेतु आवश्यक मानते है। तीन गुणों के बन्धन से छूटने को महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र ४.३४ में स्पष्ट रूप से कहा है — पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥ अर्थात् जीवात्मा के प्रयोजन से रहित हुए सत्त्वादि गुणों का अपने कारण में लीन हो जाना आत्मा की मुक्ति = स्वरूपस्थिति है। अतः प्रकृति के तीनों गुणों रूपी बन्धनों से छूटना स्पष्ट है। इसीलिए इन्हें ही तीन प्रकार के बन्धनों के रूप में हमने यहाँ कहा है।

ईश्वर का स्वरूप सर्वोत्कृष्ट शुद्धता है। महर्षि व्यास ने भाष्य में “प्रकृष्टसत्त्व” का प्रयोग किया है। “प्रकृष्ट” का अर्थ है सर्वोत्कृष्ट और “सत्त्व” का अर्थ है सबके मध्य में विशुद्ध (सत्त्वं तु मध्ये विशुद्धं तिष्ठति॥ निरुक्त १४.३॥) अर्थात् जो सबके मध्य विशुद्ध रूप से स्थित हो। यहाँ प्रकृति का सत्त्वगुण अभिप्रेत नहीं है। अतः “प्रकृष्टसत्त्व” का अर्थ हुआ सर्वोत्कृष्ट शुद्धता = शुद्धस्वरूपता। ईश्वर का सर्वकालिक नित्यमुक्तत्व और नित्यऐश्वर्य रूप उत्कर्ष है; और इस उत्कर्ष का प्रमाण वेद है। और वेद का प्रमाण “प्रकृष्टसत्त्व” अर्थात् ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट शुद्ध स्वरूप, उत्कृष्ट ज्ञान, गुण आदि हैं। ऐसे में दोनों की प्रामाणिकता में अन्योन्याश्रित होने का दोष न हो इसके लिए महर्षि व्यास कहते हैं कि “एतयोः शास्त्रोत्कर्षयोरीश्वरसत्त्वे वर्तमानयोरनादिः संबन्धः।” अर्थात् ईश्वर के शुद्धस्वरूप में विद्यमान् होने से वेद और उत्कर्ष का अनादि सम्बन्ध है। इसी प्रकार वेदान्तदर्शन में भी महर्षि व्यास कहते है कि “शास्त्रयोनित्वात्” वेदान्त १.१.३॥ अर्थात् शास्त्र = वेद का कारण होने से ब्रह्म के अस्तित्व का बोध होता है अथवा वेद का कारण ब्रह्म है।

इस प्रकार ईश्वर सदा ही अतिशय ऐश्वर्यशाली और सदा ही मुक्त है। किसी अन्य का ऐश्वर्य न तो ईश्वर के ऐश्वर्य के तुल्य और न ही उससे अधिक है। क्योंकि ईश्वर में ऐश्वर्य की पराकाष्ठा = चरम सीमा है। ऐसा क्यों ? अगर एक से अधिक ईश्वर समान ऐश्वर्य वाले हों तो ऐसी स्थिति में समान ऐश्वर्य वाले दो ईश्वरों में किसी एक अभिलषित वस्तु के विषय में, एक ही काल में, “यह नवीन है” और “यह प्राचीन है” इस प्रकार का सङ्कल्प होगा, और इस प्रकार विरुद्ध सङ्कल्प होने से एक ही सङ्कल्प एक ही काल में सिद्ध होगा। इस प्रकार जिस का सङ्कल्प सिद्ध नहीं होगा, उसका ऐश्वर्य न्यून होने से वह ईश्वर सिद्ध नहीं होगा। क्योंकि दो तुल्य सङ्कल्प होने पर, एक ही काल में, दोनों सङ्कल्प एक साथ सिद्ध नहीं हो सकते।

अतः जिसका ऐश्वर्य समानता और अधिकता से रहित है वही ईश्वर है। वही परम पुरुष है।

प्रस्तुत सूत्र में ईश्वर के विधायात्मक स्वरूप का वर्णन नहीं है वरन् क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा असम्बद्ध पुरुषविशेष को ईश्वर कहा है। वेदादि सत्यशास्त्रों में ईश्वर के विधायात्मक स्वरूप का वर्णन है। जिसमें ईश्वर को सच्चिदानन्दस्वरूप आदि कहा है। जीव या प्रकृति के गुणों के निषेध से सिद्ध होने वाला ऐसा कोई सत्तामात्र ईश्वर नहीं है, जिसका अपना कोई गुण न हो। अतः ईश्वर के विधेयात्मक स्वरूप और गुणों को जानने हेतु वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय अनिवार्य है। महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२५ के भाष्य में “तस्य संज्ञादिविशेषप्रतिपत्तिरागमतः पर्यन्वेष्या” कहा है अर्थात् “उस ईश्वर के संज्ञा = नाम आदि विशेष ज्ञान की सिद्धि आगम प्रमाण = वेद से खोज करनी चाहिए।” इसलिए इस सम्बन्ध में वेदादि सत्यशास्त्रों का स्वाध्याय अत्यन्त आवश्यक है। वेदादि शास्त्रों में परमात्मा को निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप से कहा है। इसका विवेचन महर्षि दयानन्द इस प्रकार से करते हैं —

“गण्यन्ते ये ते गुणा वा यैर्गणयन्ति ते गुणाः + यो गुणेभ्यो निर्गतः स निर्गुणः ईश्वरः” जितने सत्त्व, रज, तम, रूप, रस, स्पर्श गन्धादि जड़ के गुण अविद्या, अल्पज्ञता, राग, द्वेष और अविद्यादि क्लेश जीव के गुण हैं उनसे जो पृथक् है इस में “अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययम्” इत्यादि उपनिषदों का प्रमाण है जो शब्द, स्पर्श रूपादि गुण रहित है इस से परमात्मा का नाम “निर्गुण” है। “यो गुणैः सह वर्त्तते स सगुणः” जो सब का ज्ञान सर्वसुख पवित्रता अनन्त बलादि गुणों से युक्त है इस लिये परमेश्वर का नाम “सगुण” है। जैसे पृथिवी गन्धादि गुणों से सगुण और इच्छादिगुणों से रहित होने से निर्गुण है वैसे जगत् और जीव के गुणों से पृथक् होने से परमेश्वर निर्गुण और सर्वज्ञादि गुणों से सहित होने से “सगुण” है। (सत्यार्थप्रकाश प्रथम समुल्लास)

इस प्रकार एक ही परमात्मा सगुण और निर्गुण रूप से प्रसिद्ध है। यथा —

एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।

कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्य॥ श्वेताश्वेतरोपनिषद ६.११॥

अर्थात् — एक ही देव ईश्वर सब प्राणियों में गुप्त सूक्ष्मरूप से छिपा, सब वस्तुओं के सर्वाशों में व्यापक, सब प्राणियों का अन्तर्यामी प्रेरक, प्रयोजक होने से कर्मों का अध्यक्ष, सब प्राणियों को अपनी अनन्त शक्ति से नियम में चलाता हुआ सब में स्वामी होकर वसता, सब के शुभाशुभ कर्मों को सर्वत्र देखता, सब को चितानेवाला, आदि गुणों से युक्त होने से सगुण तथा सदा सब से अलग और सत्त्वादि गुणों से सदा अलग रहने से निर्गुण भी है।

वेद में परमात्मा के सगुण स्वरूप के अन्तर्गत सर्वशक्तिमान्, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वज्ञ, नित्य, पवित्र, साक्षी, अधिष्ठाता इत्यादि गुणों का तथा निर्गुण स्वरूप के अन्तर्गत निराकार, निर्विकार, अनादि, अजन्मा, अनुपम, अजर, अमर, दुःखरहित आदि गुणों का वर्णन है।

वेद में ईश्वर के स्वरूप का वर्णन करने वाले बहुत से मन्त्र है। यथा —

स पर्य्या॑गाच्छु॒क्रम॑का॒यम॑व्र॒णम॑स्नावि॒र शु॒द्धमपा॑पविद्धम्।

क॒विर्म॑नी॒षी प॑रि॒भूः स्व॑य॒म्भूर्या॑थातथ्य॒तोऽर्था॒न् व्य᳖दधाच्छाश्व॒तीभ्यः॒ समा॑भ्यः॥ यजु॰ ४०.८॥

अर्थात् — हे मनुष्यो! जो ब्रह्म शीघ्रकारी, सर्वशक्तिमान्, स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर से रहित है, छिद्र रहित एवं जिसके दो टुकड़े नहीं हो सकते, नाड़ी आदि के बन्धन से रहित है, अविद्या आदि दोषों से रहित होने से सदा पवित्र है, जो कभी भी पाप से युक्त, पाप करने वाला और पाप से प्रेम करने वाला नहीं है, वह सर्वत्र व्यापक है, जो सर्वज्ञ, सब जीवों की मनोवृत्तियों को जानने वाला, दुष्ट पापियों का तिरस्कार करने वाला, अनादिस्वरूप वाला, जिसकी संयोग से उत्पत्ति और वियोग से नाश नहीं होता, जिसके माता-पिता कोई नहीं और जिसका गर्भवास, जन्म, वृद्धि और क्षय नहीं होते हैं, वह परमात्मा सनातन, अनादि स्वरूप वाली, अपने स्वरूप की दृष्टि से उत्पत्ति और विनाश से रहित, प्रजा के लिए यथार्थता से वेद के द्वारा सब पदार्थों का अच्छी प्रकार से उपदेश करता है। वही परमात्मा तुम्हारे लिए उपासना करने के योग्य है।

इसी प्रकार परमात्मा का व्याख्यान महर्षि दयानन्द सरस्वती ने निम्न प्रकार से किया है —

१. ईश्वर :- जिसके गुण, कर्म स्वभाव तथा स्वरूप सत्य ही हैं, जो केवल चेतनमात्र वस्तु है, तथा जो अद्वितीय, सर्वशक्तिमान, निराकार, सर्वत्र व्यापक, अनादि और अनन्त आदि सत्य गुण वाला है, जिसका स्वभाव अविनाशी, ज्ञानी, आनन्दी, शुद्ध, न्यायकारी, दयालु और अजन्मादि है, जिसका कर्म जगत् की उत्पत्ति, पालन और विनाश करना तथा सर्व जीवों के पाप-पुण्य के फल ठीक-ठीक पहुँचाना है, उसको ईश्वर कहते हैं। (आर्योद्देश्यरत्नमाला, १)

२. प्रथम ईश्वर कि जिसके ब्रह्म परमात्मादि नाम हैं, जो सच्चिदानन्दादि लक्षण युक्त है, जिसके गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं, जो सर्वज्ञ, निराकार, सर्वव्यापक, अजन्मा, अनन्त, सर्वशक्तिमान्, दयालु, न्यायकारी, सब सृष्टि का कर्त्ता, धर्त्ता, हर्त्ता, सब जीवों को कर्मानुसार सत्य न्याय से बल दाता आदि लक्षणयुक्त है उसी को परमेश्वर मानता हूँ। (स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश, १)

३. ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है। (आर्यसमाज नियम २)

अतः जीव रूपी पुरुषों से भिन्न एक ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्त्व को दर्शाने हेतु इस सूत्र द्वारा पुरुषविशेष ईश्वर का उपदेश किया है। परन्तु ईश्वर के स्वरूप का वर्णन वेदादि शास्त्रों में बहुलता से उपलब्ध है। आगे के सूत्रों में ईश्वर का प्रमाण, प्रभाव, वाचक और उपासनाक्रम को दिखाया जायेगा।

यहाँ यह प्रश्न होता है कि महर्षि पतञ्जलि ने ईश्वर का वर्णन करते हुए उसके विधेयात्मक स्वरूप का वर्णन क्यों नहीं किया? क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से असम्बद्ध पुरुषविशेष क्यों कहा है? इसका उत्तर यह है — देखो, जीवात्मा रूपी पुरुष इस योग का सम्पादन कैवल्य प्राप्ति हेतु करता है। जिस प्रकार पुरुष विशेष ईश्वर क्लेश, कर्म, विपाक और आशय से सर्वथा असम्बद्ध है उसी प्रकार, कैवल्य प्राप्ति हेतु, जीवात्मा को भी इन सभी का निरोध कर इनसे निवृत्त होना होगा। जीवात्मा रूपी पुरुष, क्लेश, कर्म, विपाक और आशय रूपी बन्धनों से सम्बद्ध होने के कारण ही, संसारचक्र में घूमता हुआ दुःखों को प्राप्त कर रहा है। स्वरूपतः दोनों = परमात्मा और जीवात्मा चेतन पदार्थ ही हैं परन्तु परमात्मा इनसे सर्वथा असम्बद्ध, दुःखादि से सर्वथा रहित, केवली, तथा संसार का स्रष्टा, नियन्ता है। दूसरी ओर जीवात्मा अविद्या के कारण प्रकृति के संयोग को प्राप्त हुआ कर्म, विपाक और आशय रूपी बन्धनों से बँधा हुआ संसारचक्र में दुःखों को प्राप्त करता है। अतः जीवात्मा को भी संसारचक्र से छूटने तथा दुःख रहित कैवल्य की स्थिति को प्राप्त करने हेतु इन क्लेशादि से छूटना होगा, तभी वह परम पुरुष = पुरुष विशेष ईश्वर के आलम्बन को प्राप्त कर, प्रकृति और उसके विकारों से सर्वथा पृथक् होकर, संसारच्रक का उच्छेद करता हुआ दुःखों से छूट पायेगा।

इस सूत्र के भाष्य से एक शंका होती है कि मुक्त पुरुष की मुक्ति से पुनरावृति नहीं होती अर्थात् वह पुनः बन्धन में नहीं आता। क्योंकि जिसप्रकार से प्रकृतिलीन को भविष्य में बन्धन की सम्भावना कही गयी है, उसी प्रकार मुक्ति को प्राप्त हुए पुरुष के लिए पूर्व में तीन बन्धनों का कथन तो है परन्तु भविष्य में होने वाले किसी प्रकार के बन्धन का वर्णन नहीं है। इस सम्बन्ध में वेद में मुक्ति से पुनरावृति का स्पष्ट वर्णन होने से ऐसा मानना उचित नहीं है। इस विषय में महर्षि दयानन्द सरस्वती सत्यार्थप्रकाश के नवमसमुल्लास में वेद का प्रमाण देते हुए लिखते हैं —

कस्य॑ नू॒नं क॑त॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑।

को नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात् पि॒तरं॑ च दृशेयं॑ मा॒तरं॑ च॥१॥

अ॒ग्नेर्व॒यं प्र॑थ॒मस्या॒मृता॑नां॒ मना॑महे॒ चारु॑ दे॒वस्य॒ नाम॑।

स नो॑ म॒ह्या अदि॑तये॒ पुन॑र्दात् पि॒तरं॑ च दृ॒शेयं॑ मा॒तरं॑ च॥२॥ ऋ० १.२४.१-२॥

(प्रश्न) हम लोग किसका नाम पवित्र जानें ? कौन नाशरहित पदार्थों के मध्य में वर्त्तमान देव सदा प्रकाशस्वरूप है। हम को मुक्ति का सुख भुगा कर पुनः इस संसार में जन्म देता और माता तथा पिता का दर्शन कराता है ?

(उत्तर) हम इस स्वप्रकाशस्वरूप अनादि सदा मुक्त परमात्मा का नाम पवित्र जानें जो हमको मुक्ति में आनन्द भुगा कर पृथिवी में पुनः माता पिता के सम्बन्ध में जन्म देकर माता पिता का दर्शन कराता है। वही परमात्मा मुक्ति की व्यवस्था करता सब का स्वामी है।

इसी प्रकार सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल कहते हैं —

इदानीमिव सर्वत्र नात्यन्तोच्छेदः॥ सांख्य० १.१५९॥

अर्थात् जैसे इस समय बन्ध मुक्त जीव है वैसे ही सर्वदा रहते हैं, अत्यन्त विच्छेद बन्ध मुक्ति का कभी नहीं होता किन्तु बन्ध और मुक्ति सदा नहीं रहती।

इसी प्रकार भोज ने भी इस सूत्र के भाष्य में मुक्ति से पुनरावृति मानी है। यथा “मुक्तात्मनान्तु पुनः पुनः क्लेशादियोगस्तैस्तैः शास्त्राक्तैरुपायैर्निर्वर्त्तितः” अर्थात् मुक्तआत्माओं को तो बारम्बार, मुक्ति से पुनरावृति होने पर, क्लेश-कर्म-विपाक-आशय से योग होता है, और उन-उन शास्त्रों = वेद में उपदिष्ट उपायों के द्वारा क्लेशादि को निवृत्त किया जाता है।

अतः मुक्ति की अवधि के पश्चात् जीव के शेष अभुक्त कर्माशय के आधार पर परमात्मा की व्यवस्था में पुनः उसको जन्म प्राप्त होता है। अतः व्यास भाष्य में प्रकृतिलीन को भविष्यत में बन्धन की सम्भावना और मुक्तों के सन्दर्भ में बन्धन का न होना, वर्त्तमान सर्ग के दृष्टिकोण से ही जानना चाहिए।