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Samaadhi Paada / Trance / 30
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Samaadhi Paada / Trance / 30

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥३०॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 30

In Hindi:

पदपाठ : व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपाः ते अन्तरायाः॥

संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ केऽन्तरायाः ये चित्तस्य विक्षेपाः के पुनस्ते कियन्तो वेति —

हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (के अन्तरायाः) अन्तराय = विघ्न कौन सै हैं ? (ये) जो (चित्तस्य) चित्त को (विक्षेपाः) विक्षिप्त करने वाले होते हैं; (के पुनः ते) फिर वे अन्तराय कौन-कौन हैं (वा) और (कियन्तः) कितने प्रकार के हैं (इति) इस बारे में बताया जाता है —

हिंदी में अर्थ : (व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि) व्याधि, स्त्यान, संशय, प्रमाद, आलस्य, अविरति, भ्रान्तिदर्शन, अलब्धभूमिकत्व तथा अनवस्थितत्व (चित्तविक्षेपाः) चित्त के विक्षेप अर्थात् चित्त को विक्षिप्त करने वाले (ते) वे ये (अन्तरायाः) योग = समाधि के विघ्न हैं

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : वे विघ्न नव प्रकार के हैं। (व्याधि) एक व्याधि अर्थात् धातुओं की विषमता से ज्वर आदि से पीड़ा होना, दूसरा (स्त्यान) अर्थात् सत्यकर्मों में अप्रीति, तीसरा (संशय) अर्थात् जिस पदार्थ का निश्चय किया चाहे उसका यथावत् ज्ञान न होना, चौथा (प्रमाद) अर्थात् समाधि साधनों के ग्रहण में प्रीति और उनका विचार यथावत् न होना, पांचवाँ (आलस्य) अर्थात् शरीर और मन में आराम की इच्छा से पुरुषार्थ छोड़ बैठना, छठा (अविरति) अर्थात् विषय सेवा में तृष्णा का होना, सातवाँ (भ्रान्तिदर्शन) अर्थात् उलटे ज्ञान का होना जैसे — जड़ में चेतन और चेतन में जड़ बुद्धि करना तथा ईश्वर में अनीश्वर और अनीश्वर में ईश्वरभाव करके पूजा करना, आठवाँ (अलब्धभूमिकत्व) अर्थात् समाधि की प्राप्ति न होना और नववाँ (अनवस्थित्व) अर्थात् समाधि की प्राप्ति होने पर भी उसमें चित्त स्थिर न होना, ये सब चित्त की समाधि होने में विक्षेप अर्थात् उपासना योग के शत्रु हैं”॥ (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : नवान्तरायाश्चित्तस्य विक्षेपाः। सहैते चित्तवृत्तिभिर्भवन्ति। एतेषामभावे न भवन्ति पूर्वोक्ताश्चित्तवृत्तयः। तत्र व्याधिर्धातुरसकरणवैषम्यम्। स्त्यानमकर्मण्यता चित्तस्य। संशय उभयकोटिस्पृग्विज्ञानं स्यादिदमेवं नैवं स्यादिति। प्रमादः समाधिसाधनानामभावनम्। आलस्यं कायस्य चित्तस्य च गुरुत्वादप्रवृत्तिः। अविरतिश्चित्तस्य विषयसम्प्रयोगात्मा गर्धः। भ्रान्तिदर्शनं विपर्ययज्ञानम्। अलब्धभूमिकत्वं समाधिभूमेरलाभः। अनवस्थितत्वं लब्धायां भूमौ चित्तस्याप्रतिष्ठा। समाधिप्रतिलम्भे हि सति तदवस्थितं स्यादिति। एते चित्तविक्षेपा नव योगमला योगप्रतिपक्षा योगान्तराया इत्यभिधीयन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (चित्तस्य विक्षेपाः) चित्त को विक्षिप्त करने वाले (नव) ये नौ (अन्तरायाः) अन्तराय = विघ्न हैं। (एते) ये नौ विघ्न (चित्तवृत्तिभिः) चित्त की वृत्तियों के (सह) साथ ही (भवन्ति) होते हैं। (एतेषाम्) इन विघ्नों के (अभावे) अभाव होने पर = नष्ट होने पर (पूर्वोक्ताः) पहले कही गई (चित्तवृत्तयः) प्रमाणादि चित्त की वृत्तियाँ (न) नहीं (भवन्ति) होती।

(तत्र) इन नौ विघ्नों में से (धातुरसकरणवैषम्यम्) वात-पित्त-कफ धातुओं की विषमता, भोजनादि से बने रस की विषमता और करण = इन्द्रियों की शक्ति में मन्दता तथा दोषों आदि के कारण से विषमता का होना (व्याधिः) व्याधि = रोग कहा जाता है। (चित्तस्य) चित्त की (अकर्मण्यता) योगसाधनों के अनुष्ठान में अप्रीति का होना (स्त्यानम्) स्त्यान है। (इदम् एवम् स्यात्) यह ऐसा होगा (न एवम् स्यात्) अथवा ऐसा नहीं होगा (इति) इस प्रकार का (उभयकोटिस्पृक्) दोनों कोटियों को स्पर्श करने वाला (विज्ञानम्) ज्ञान (संशयः) संशय कहलाता है। (समाधिसाधनानाम्) समाधि के साधनों का (अभावनम्) अनुष्ठान न करना (प्रमादः) प्रमाद है। (कायस्य) शरीर का (चित्तस्य च) और चित्त का (गुरुत्वात्) भारी होने के कारण (अप्रवृत्तिः) योगसाधना में प्रवृत्ति न होना (आलस्यम्) आलस्य है। (चित्तस्य) चित्त की (विषयसम्प्रयोगात्मा) विषयों के साथ सम्प्रयोग रूप = सम्पर्क रूप (गर्धः) इच्छा = लोलुपता (अविरतिः) अविरति है। (विपर्ययज्ञानम्) विपर्ययज्ञान = विपरीतज्ञान = मिथ्याज्ञान (भ्रान्तिदर्शनम्) भ्रान्तिदर्शन है। (समाधिभूमेः) चित्त को समाधि की भूमि की (अलाभः) प्राप्ति का न होना (अलब्धभूमिकत्वम्) अलब्धभूमिकत्व है। (लब्धायाम् भूमौ) प्राप्त हुई समाधि की किसी भूमि में (चित्तस्य) चित्त की (अप्रतिष्ठा) प्रतिष्ठा न होना = निरन्तर स्थिति का अभाव ही (अनवस्थितत्वम्) अनवस्थितत्व है; (हि) क्योंकि (समाधिप्रतिलम्भे सति) समाधि भूमि का लाभ होने पर = समाधि की सिद्धि होने पर (तदवस्थितम् स्यात् इति) चित्त को उसमें स्थित होना चाहिए।

(एते) पूवोक्त (चित्तविक्षेपा नव) चित्त के नौ विक्षेप (योगमलाः) योग के मल = दोष, (योगप्रतिपक्षाः) योग के शत्रु तथा (योगान्तरायाः) योग के अन्तराय = विघ्न (इति) इन नामों से (अभिधीयन्ते) कहे जाते हैं॥

वैदिक योग मीमांसा : पिछले सूत्र में ईश्वर प्रणिधान का एक लाभ योग के अन्तरायों = विघ्नों का नाश होना कहा गया है। इन अन्तरायों का विस्तार से उल्लेख इस सूत्र में किया गया है। ये अन्तराय = विघ्न योग के विरोधी अर्थात् चित्त को विक्षिप्त करने वाले = चित्त की एकाग्रता को नष्ट करने वाले, योग के शत्रु, योग के दोष कहे गए हैं। ये अन्तराय संख्या की दृष्टि से नौ — व्याधि आदि नाम वाले हैं। ये सभी विक्षेप चित्त की वृत्तियों के साथ ही होते हैं और इन विघ्नों के अभाव होने पर चित्त की वृत्तियाँ भी उत्पन्न नहीं होती और चित्त स्थिर रहता है। यहाँ यह समझना चाहिए कि इनमें से किसी भी विघ्न के उपस्थित होने से चित्त की एकाग्रता नष्ट हो जाती है और विक्षिप्त चित्त में प्रमाणादि वृत्तियाँ उपस्थित रहती है। इनमें से कुछ विघ्न तो वृत्तिरूप ही हैं यथा “संशय” और “भ्रान्तिदर्शन” दोनों ही विपर्ययवृत्ति ही हैं। इसी प्रकार अन्य विघ्नों के उपस्थित होने पर भी “वृत्तिसारूप्यमितरत्र” (योग० १.४) की स्थिति बन जाती है। अतः अन्तरायों और वृत्तियों का घनिष्ट सम्बन्ध है। ये नौ विघ्न इस प्रकार हैं —

१. व्याधि — शरीर में व्याधि के तीन कारण कहे गए हैं; (१) वात, पित्त और कफ धातुओं की विषमता से उत्पन्न होने वाले ज्वरादि; (२) खाए और पिए हुए अन्न-जलादि का सम्यक् परिपाक न होना अथवा अभक्ष्य पदार्थ, ऋतु आदि से विपरीत आहार, अथवा अत्यधिक आहार आदि के कारण रसों में विषमता होने से उत्पन्न होने वाले रोग; और (३) करण = इन्द्रियों मे दोष, उनकी शक्ति की मन्दता = विकार आदि के कारण उत्पन्न होने वाले रोग। इन तीनों कारणों में से किसी भी एक या अधिक कारणों से उत्पन्न हुई व्याधि योग मार्ग में सबसे प्रबल विघ्न = बाधक है, और साधकों में सामान्यतः हो जाने से इसे सबसे प्रथम कहा गया है। धातु, रस और करण की विषमता भी दो प्रकार के कारणों से होती है — १. स्वयं के नियन्त्रण वाले कारणों से; और २. स्वयं के नियन्त्रण से बाहर वाले कारणों से। साधक को स्वयं के नियन्त्रण वाले कारणों को प्रयत्नपूर्वक और पुरुषार्थपूर्वक दूर करना चाहिए। विभिन्न कारणों से हुए रोग से ग्रस्त व्यक्ति को संसार में दुःख ही दिखाई देता है। अस्वस्थ शरीर तथा अस्वस्थ मन के होने से, चित्त की निर्मलता के अभाव में, साधक न तो शरीर और न ही मन से योगसाधना में प्रगति कर पाता है। साधक के लिए इस स्थिति में योगसाधना करना तो दूर, वह अपना सामान्य जीवन भी आरामपूर्वक व्यतीत नहीं कर पाता।

साधक को अपने शरीर की प्रकृति के अनुसार भोजनादि लेने से, शरीर में उत्पन्न होने वाले बहुत से रोगों से मुक्ति मिल जाती है। इसी प्रकार ईश्वर की भावना से योगी व्यवहार काल में यमनियमों का पालन करते हुए काम-क्रोधादि दोषों से बचता हुआ शरीर और मन को स्वस्थ रखने में सफल रहता है।

२. स्त्यान — का अर्थ है चित्त की अकर्मण्यता। योग के साधनों का अनुष्ठान करने में प्रीति = रुचि न होने से समाधि का अभ्यास नहीं हो सकता। परन्तु जब साधक ईश्वर के स्वरूप को जानकर उसमें भावना करता है तो, ईश्वर की सत्ता की अनुभूति से होने वाले लाभों को जानने से, स्त्यान रूपी विघ्न का नाश होता है।

३. संशय — किसी भी विषय या पदार्थ में दो प्रकार का ज्ञान संशय कहाता है। यथा मैं योग साधना कर सकूँगा अथवा नहीं कर सकूँगा ?; ईश्वर आकाशवत् व्यापक है अथवा किसी एक स्थान विशेष में रहने वाला है?; योग साधना से ईश्वर और मुक्ति की प्राप्ति होगी अथवा नहीं? आदि, इस प्रकार का ज्ञान संशय कहलाता है। ऋग्वेद में संशय करने वाले व्यक्तियों से रक्षा की प्रार्थना की गई है —

मा नो॒ रक्षो॑ अ॒भि ....... कि॑मी॒दिना॑॥ ऋ० ७.१०४.२३॥

अर्थात् — जो “किमीदिना” परमात्मा के ज्ञान में संशय करने वाले अर्थात् इसमें क्या है ? “किम् इदम् इति” ऐसा कहने वाले = संशय करने वाले पुरुष योगसाधना में अप्रवृत्त ही रहते हैं। ऐसे पुरुषों से, ऐसे भावों से रक्षा की प्रार्थना की गई है।

संशय करने वाला व्यक्ति परमात्मा की सत्ता में ही शंका करके उससे दूर हो जाता है। अतः इस प्रबल दुर्गुण को वेदादि सत्यशास्त्रों के ज्ञान से दूर करना चाहिए। अनुमान और आगम प्रमाण द्वारा ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हुए, सृष्टि कर्त्तृत्व एवं कर्मफल व्यवस्था रूपी ईश्वर के कार्यों के साक्षात् होने से प्रत्यक्षादि प्रमाणों से उसे स्वीकार करते हुए, ईश्वर की भावना करने से तथा वेदादि सत्यशास्त्रों के सम्यक् ज्ञान से, योगी के सभी संशयों का नाश हो जाता है। यथा वेद में कहा है —

यस्तु सर्वा॑णि भू॒तान्या॒त्मन्ने॒वानु॒पश्य॑ति। स॒र्व॒ भूतेषु॑ चा॒त्मानं॒ ततो॒ न वि चि॑कित्सति॥ यजु॰ ४०.६॥

अर्थात् — हे मनुष्यों! जो विद्वान् जन परमात्मा मे ही सब जड़ चेतनों को विद्या, धर्माचरण और योगाभ्यास के पश्चात् देखता है, और जो विद्वान् सब प्रकृत्यादि पदार्थों में सर्वत्र व्यापक परमात्मा को देखता है, वह ऐसे सम्यग्दर्शन के पीछे संदेह = संशय को प्राप्त नहीं होता। (यजुर्वेदभाष्य महर्षि दयानन्द)

४. प्रमाद — योग = समाधि के साधनों के अनुष्ठान में उपेक्षा रखना और उनका पालन न करना प्रमाद है। परन्तु ईश्वर की भावना होने के पश्चात्, उससे होने वाले लाभों को जानने से, प्रमाद रूपी विघ्न भी दूर हो जाता है।

५. आलस्य — तमोगुण के प्रभाव के कारण शरीर और चित्त में भारीपन के कारण योग साधनों में अप्रवृत्ति रहती है। वेद में आलस्य को परम घातक कहा है; यथा —

उ॒त घा॒ नेमो॒ अस्तु॑तः पुमाँ॒ इति॑ ब्रु॒वे प॒णिः। स वैर॑देये॒ इत्स॒मः॥ ऋ० ५.६१.८॥

अर्थात् — जो आलस्य युक्त जन श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त नहीं होता है और दूसरा विद्वान् पुरुष सत्य और असत्य को जानकर सत्य का आचरण नहीं करता, वे दोनों तुल्य अधर्मात्मा हैं। (ऋग्वेदभाष्य महर्षि दयानन्द सरस्वती)। अतः प्रमाद और आलस्य योगसाधना में साधक के महान शत्रु हैं।

परन्तु ईश्वर की भावना से तमोगुण का अभिभव होने, और सत्त्वगुण की प्रधानता होने से साधक फिर से योगानुष्ठान में प्रवृत्त हो जाता है।

६. अविरति — चित्त की विषयों के भोग की लालसा = कामना अविरति है। यह विघ्न सम्यक् वैराग्य के अभाव के कारण ही होता है। परन्तु ईश्वर की भावना करने से, प्रकृति और उसके विकारों रूपी विषयों से प्राप्त होने वाले दुःखमिश्रित सुख की हेयता = त्याज्यता ज्ञात होने पर, इस विघ्न का भी नाश हो जाता है।

७. भ्रान्तिदर्शन — यह मिथ्याज्ञान रूपी क्लिष्ट वृत्ति है। इसका मुख्य कारण वेदादि सत्यशास्त्रों में उपदिष्ट सत्य सिद्धान्तों का सम्यक् ज्ञान न होना है। परन्तु ईश्वर की भावना और उसके ज्ञान वेद के सम्यक् अभ्यास से यह विघ्न भी नष्ट हो जाता है।

८. अलब्धभूमिकत्व — योग के साधनों का निरन्तर, दीर्घकाल तक अनुष्ठान करने पर भी योग की भूमि का लाभ = प्राप्ति न होना भी एक महान् विघ्न है। अतः महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.२३ में ईश्वरप्रणिधान को समाधि प्राप्ति का महत्त्वपूर्ण साधन बताया है। इस प्रकार ईश्वर की भावना और प्रणिधान से योग का यह विघ्न भी दूर हो जाता है।

९. अनवस्थितत्व — अर्थात् समाधि की प्राप्ति होने पर भी चित्त का उसमें स्थिर न होना; अथवा कुछ उपलब्धि होते ही, अभ्यास का छोड़ देना ही, इस विघ्न का एक कारण है। परन्तु ईश्वर की सम्यक् भावना बनाए रखने से यह विघ्न भी दूर हो जाता है, और साधक = योगी दीर्घकाल तक निरन्तर अभ्यास करता हुआ अपने अन्तिम लक्ष्य को भी प्राप्त कर लेता है।

इन विघ्नों के नाश के लिए ईश्वर प्रणिधान के साथ-साथ अभ्यास और वैराग्य का सम्पादन भी आवश्यक है। यथा महर्षि व्यास ने योगसूत्र १.३२ की अनुभूमिका में कहा है — अथैते विक्षेपाः समाधिप्रतिपक्षा- स्ताभ्यामेवाभ्यासवैराग्याभ्यां निरोद्धव्याः। अतः साधक को ईश्वर प्रणिधान के साथ-साथ अष्टाङ्गयोग का अनुष्ठान रूपी अभ्यास अनवरत करना चाहिए तथा वैराग्य को दृढ बनाए रखना चाहिए, तभी समाधि के सभी विघ्नों का नाश सम्भव हो सकेगा।