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Samaadhi Paada / Trance / 8
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Samaadhi Paada / Trance / 8

विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् ॥८॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 8

In Hindi:

पदपाठ : विपर्ययः मिथ्याज्ञानम् अतद् रूपप्रतिष्ठम्॥

हिंदी में अर्थ : (अतद् रूपप्रतिष्ठम्) जो पदार्थ के यथार्थ स्वरूप में अप्रतिष्ठित = स्थित न हो ऐसा (मिथ्याज्ञानम्) मिथ्याज्ञान (विपर्ययः) विपर्यय वृत्ति है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (विपर्ययो) दूसरी विपर्यय कि जिस से मिथ्याज्ञान हो अर्थात् जैसे को तैसा न जानना अथवा अन्य में अन्य भावना कर लेना इसको विपर्यय कहते हैं।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : स कस्मान्न प्रमाणम्? यतः प्रमाणेन बाध्यते भूतार्थविषयत्वात् प्रमाणस्य। तत्र प्रमाणेन बाधनमप्रमाणस्य दृष्टम्। तद्यथा द्विचन्द्रदर्शनं सद्विषयेणैकचन्द्रदर्शनेन बाध्यत इति। सेयं पञ्चपर्वा भवत्यविद्या, अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशा इति। एत एव स्वसंज्ञाभिस्तमो मोहो महामोहस्तामिस्रोऽन्धतामिस्र इति। एते चित्तमलप्रसङ्गेनाभिधास्यन्ते॥

हिंदी में अर्थ : (सः) वह विपर्यय वृत्ति (कस्मात्) क्यों (प्रमाणम्) प्रमाण (न) नहीं है? (यतः) इसलिए कि वह विपर्यय ज्ञान (प्रमाणेन) प्रमाण के द्वारा (बाध्यते) बाधित = निराकृत हो जाता है। क्यों ? (प्रमाणस्य) प्रमाण का विषय (भूतार्थविषयत्वात्) सत्तात्मक = यथार्थ पदार्थ होने से; (तत्र) वहाँ (प्रमाणेन) प्रमाण के द्वारा (अप्रमाणस्य) अप्रमाण का = विपर्यय ज्ञान का (बाधनम्) निराकारण हो जाना (दृष्टम्) देखा जाता है। (तद्यथा) जैसा कि (द्विचन्द्रदर्शनम्) किसी दोष के कारण दो चन्द्रों का दीखना रूप मिथ्या ज्ञान (सद्विषयेण) सत्तात्मक = यथार्थ विषयक (एकचन्द्रदर्शनेन) एक चन्द्र दर्शन रूप प्रत्यक्ष प्रमाण से (बाध्यत इति) निराकृत हो जाता है।

(सा इयं) वह यह विपर्यय वृत्ति (अविद्या) अविद्या कही जाती है, वह (पञ्चपर्वा भवति) पाँच प्रकार की होती है। जिनको (अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः) अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक (क्लेशा इति) क्लेश कहते हैं। (एत एव) ये पाँच क्लेश (स्वसंज्ञाभिः) अपने अनुरूप (तमोमोहोमहामोहस्तामिस्रोऽन्धतामिस्र इति) तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र नामों से भी कहे जाते हैं। (एते) ये क्लेश (चित्तमलप्रसङ्गेन) चित्त मल के प्रसङ्ग में (योग० २.३-९) (अभिधास्यन्ते) कहे जायेंगे॥

वैदिक योग मीमांसा : क्रम प्राप्त विपर्यय वृत्ति को स्पष्ट करते हुए महर्षि पतञ्जलि कहते है कि जो ज्ञान पदार्थ के यथार्थ स्वरूप के अनुसार न हो, वह मिथ्याज्ञान कहाता है और इसे विपर्यय कहते हैं। ऐसा ज्ञान बाद में प्रमाणों के आधार पर खण्डित हो जाता है। जैसे किसी को चक्षु इन्द्रिय के दोष के कारण दो चन्द्र दिखाई दे रहे हो; बाद में इन्द्रिय दोष दूर होने पर, तब यथार्थ में एक चन्द्र के दर्शन से, दो चन्द्रमाओं रूपी मिथ्याज्ञान का निराकरण हो जाता है। वैशेषिक दर्शनकार महर्षि कणाद ने विपर्यय = अविद्या के लिए दो कारण कहे हैं —

इन्द्रियदोषात् संस्कारदोषाच्चाविद्या॥ वैशेषिक ९.२.१०॥

इन्द्रियों के दोषों से और संस्कारों के दोषों से अविद्या उत्पन्न होती है। इन्द्रिय दोष वात, पित्त, कफ रूप शरीर धातुओं के विकृत होने के कारण होता है। इससे इन्द्रियों में विषयों की ग्रहण क्षमता में दुर्बलता आ जाने से विषय का विपरीत अथवा अन्यथा ज्ञान होता है। इसी प्रकार अशुद्ध ज्ञान एवं अनुभव से अशुद्ध संस्कार बनते हैं, जैसे क्लिष्ट वृत्ति से क्लिष्ट संस्कार बनते हैं; इन्हें संस्कार दोष कहा जाता है। अतः इन्द्रिय दोष तथा संस्कार दोष विपर्यय = अविद्या को उत्पन्न करने में कारण हैं।

प्रमाण में सत्तात्मक अर्थात् पदार्थ के वास्तविक = यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होता है; जबकि विपर्यय में पदार्थ के वास्तविक = यथार्थ ज्ञान से भिन्न ज्ञान होता है। दोनों वृत्तियों में यह मूलभूत भेद होने से इन्हें पृथक्-पृथक् कहा गया है।

इस विपर्यय वृत्ति को अविद्या कहा गया है जो कि पाँच प्रकार की है — अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश। इन्हें ही क्लेश भी कहा गया हैं, जिनकी विस्तार से व्याख्या योगसूत्र २.५ से २.९ में की गई है। इन्हीं अविद्यादि क्लेशों के दूसरे नाम तम, मोह, महामोह, तामिस्र और अन्धतामिस्र कहे गए है अर्थात् अविद्या = तम; अस्मिता = मोह; राग = महामोह; द्वेष = तामिस्र; और अभिनिवेश = अन्धतामिस्र कहलाते हैं। सांख्यकारिका में इनके भी ६२ भेद किये हैं, जो इनके स्वरूप को अधिक स्पष्ट करने में सहायक हैं।

विपर्यय वृत्ति क्लेश होने से यह सर्वथा क्लिष्ट ही होती है। दूसरी वृत्तियाँ (= विकल्प, निद्रा, स्मृति) भी जब विपर्यय से प्रभावित होती है अर्थात् क्लेश सहित होती हैं, तब वे वृत्तियाँ भी क्लिष्ट ही कहलाती हैं। यहाँ यह जानना चाहिए कि विपर्यय = मिथ्याज्ञान ही सभी दुःखों का मूल कारण है। महर्षि गौतम कहते हैं —

दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः (न्याय १.१.२)

अर्थात् दुःख का कारण जन्म; जन्म का कारण प्रवृत्ति; प्रवृत्ति का कारण दोष; और दोष का कारण मिथ्याज्ञान है। मिथ्याज्ञान के नाश होने पर दोषों का नाश होता है; दोषों के नाश होने पर प्रवृत्ति का नाश होता है; प्रवृत्ति के नाश होने पर जीव के जन्म (शरीरधारण) का नाश होता है; और जन्म का नाश होने से दुःखों का नाश हो जाता है। यही अवस्था अपवर्ग की है। अतः मिथ्याज्ञान = विपर्यय से बने क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र के कारण ही जीवात्मा दोष — प्रवृत्ति — जन्म — दुःखों के अनवरत चक्र में अनन्त काल से भटक रहा है। इसी को महर्षि व्यास ने योग० १.५ में वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र का निरन्तर घूमना कहा है। इस प्रकार यह विपर्यय वृत्ति कर्म एवं संस्कारों = कर्म वासनाओं को सुदृढ़ करती हुई आत्मा को जन्म-मरण के चक्र में घुमाते हुए दुःखों के अथाह सागर में डुबाए रखने से क्लिष्ट कहलाती है।

वैसे तो योग = समाधि हेतु सभी वृत्तियों का निरोध करना पड़ता है, परन्तु इस विपर्यय वृत्ति का निरोध किये बिना योग मार्ग पर किसी भी प्रकार की गति सम्भव ही नहीं होती। पुरुष जबतक मिथ्याज्ञान में ग्रस्त होगा, तो ऐसी स्थिति में आत्मा, परमात्मा का ज्ञान होना तो दूर का विषय है, बल्कि वह सामाजिक और व्यवहारिक जीवन में भी दोषों से ग्रस्त रहता हुआ दुःखों को ही प्राप्त करेगा। योग का फल अपवर्ग कहा है और वह विवेकख्याति की प्राप्ति हुए बिना तथा सत्त्वादि गुणों के अधिकार को समाप्त किये बिना सम्भव ही नहीं है। अतः इस वृत्ति के स्वरूप, व्याख्यान तथा निरोध के लिए महर्षि पतञ्जलि तथा महर्षि व्यास ने योगदर्शन में स्थान-स्थान पर विशेष बल दिया है।