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Samaadhi Paada / Trance / 9
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Samaadhi Paada / Trance / 9

शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः॥९॥

Padas Name : Samaadhi Paada / Trance | Sutra No : 9

In Hindi:

पदपाठ : शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः विकल्पः॥

हिंदी में अर्थ : (शब्दज्ञानानुपाती) शब्द से उत्पन्न ज्ञान का अनुसरण करने वाला = शब्दार्थ के आधार पर समझा जाने वाला, परन्तु (वस्तुशून्यः) वस्तु से रहित व्यवहार (विकल्पः) विकल्प वृत्ति है।

महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : तीसरी विकल्प वृत्ति (शब्दज्ञाना॰) जैसे किसी ने किसी से कहा कि एक देश में हमने आदमी के सिर पर सींग देखे थे। इस बात को सुनके कोई मनुष्य निश्चय करले कि ठीक है — सींग वाले मनुष्य भी होते होंगे। ऐसी वृत्ति को विकल्प कहते हैं। सो झूठी बात है अर्थात् जिसका शब्द तो हो परन्तु किसी प्रकार का अर्थ किसी को न मिल सके, इसी से इसका नाम विकल्प है। (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)

व्यास भाष्य : स न प्रमाणोपारोही, न विपर्ययोपारोही च। वस्तुशून्यत्वेऽपि शब्दज्ञानमाहात्म्यनिबन्धनो व्यवहारो दृश्यते। तद्यथा चैतन्यं पुरुषस्य स्वरूपमिति।

यदा चितिरेव पुरुषस्तदा किमत्र केन व्यपदिश्यते? भवति च व्यपदेशे वृत्तिः। यथा चैत्रस्य गौरिति। तथा प्रतिषिद्धवस्तुधर्मो निष्क्रियः पुरुषः, तिष्ठति बाणः स्थास्यति स्थित इति। गतिनिवृत्तौ धात्वर्थमात्रं गम्यते। तथाऽनुत्पत्तिधर्मा पुरुष इति। उत्पत्तिधर्मस्याभावमात्रमवगम्यते न पुरुषान्वयी धर्मः। तस्माद्विकल्पितः स धर्मस्तेन चास्ति व्यवहार इति॥

हिंदी में अर्थ : (स) वह विकल्प वृत्ति (न) न (प्रमाणः) प्रमाण के (उपारोही) अन्तर्गत है (च) और (न) न ही (विपर्ययः) विपर्यय के (उपारोही) अन्तर्गत है। क्योंकि (वस्तुशून्यत्वे) वास्तविक वस्तु = पदार्थ से रहित होने पर (अपि) भी (शब्दज्ञानमाहात्म्यनिबन्धनः) शब्द ज्ञान की महिमा से युक्त (व्यवहारः) व्यवहार (दृश्यते) देखा जाता है। (तद्यथा) जैसे कि (चैतन्यम्) चैतन्य = चेतनता (पुरुषस्य) पुरुष का (स्वरूपम् इति) स्वरूप है। (यदा) जबकि (चितिः एव) चिति = चेतनता ही (पुरुषः) पुरुष = आत्मा है (तदा) तब (किम् अत्र) यहाँ किस से (केन) किसको (व्यपदिश्यते) बताया जा रहा है अर्थात् किस पदार्थ से किस पदार्थ को बताया जा रहा है ? (च) और इस प्रकार (व्यपदेशे) बताने से “चेतनता पुरुष का स्वरूप है” एक प्रकार की (वृत्तिः) वृत्ति (भवति) उत्पन्न होती है; (यथा) जैसे कि (चैत्रस्य) चैत्र नामक पुरुष की (गौः इति) गाय है, कहने पर वृत्ति बनती है।

(तथा) और उसी प्रकार (प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा) प्रकृति और उसके विकारों = पदार्थों में रहने वाले धर्मों यथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्दादि तथा सत्त्व, रज और तम धर्मों से रहित, और (निष्क्रियः) क्रिया रहित = सब प्रकार के प्राकृतिक द्रव्यों में होने वाली क्रियाओं से रहित यथा परिणाम, विकार, निर्माण और क्षय आदि क्रियाओं से रहित (पुरुषः) पुरुष है। इसी प्रकार (तिष्ठति बाणः) बाण ठहरता है, (स्थास्यति) ठहरेगा, (स्थित इति) ठहर गया है; इस उदाहरण में भी (गतिनिवृत्तौ धात्वर्थमात्रम् गम्यते) गति की निवृत्ति में “स्था” धातु का अर्थ मात्र ही प्रतीत होता है।

(तथा) वैसे ही (अनुत्पत्तिधर्मा) उत्पत्ति धर्म के अभाव वाला (पुरुषः इति) पुरुष है। इस प्रकार से यहाँ (उत्पत्तिधर्मस्य) उत्पत्ति धर्म के (अभावमात्रमवगम्यते) अभाव की प्रतीति हो रही है (न पुरुषान्वयी धर्मः) न कि पुरुष के अन्दर रहने वाला अनुत्पत्ति रूप कोई धर्म जाना जाता है। (तस्मात्) इससे (स धर्मः) वह उत्पत्ति धर्म के अभाव रूप धर्म शाब्दिक ज्ञान मात्र होने से (विकल्पितः) विकल्प वृत्ति है (तेन च) और उससे (अस्ति व्यवहार इति) व्यवहार होता है।

वैदिक योग मीमांसा : लोक में बहुलता से प्रयुक्त विकल्प वृत्ति के बारे में बताते हुए कहा है कि शब्द ज्ञान से उत्पन्न होने वाली पदार्थ विषयक वह वृत्ति, जो पदार्थ से रहित हो, विकल्प है। यहाँ पर वस्तु = पदार्थ के न होने पर उस विषयक शब्द का सुनने पर श्रोता को उस काल्पनिक पदार्थ का ज्ञान उत्पन्न होता है, जैसे किसी ने कहा “वन्ध्या का पुत्र आता है।” जबकि वन्ध्या का पुत्र होता ही नहीं, परन्तु श्रोता के चित्त में किसी वन्ध्या पुत्र रूप पुरुष की वृत्ति बन जाती है, जो कि है ही नहीं। यहाँ वस्तु के न होने पर भी शब्दज्ञान की महिमा से उसका व्यवहार होता है।

यह वृत्ति न तो प्रमाण के अन्तर्गत आती है और न ही विपर्यय के अन्तर्गत आती है। इन दोनों वृत्तियों में पदार्थ का सद्भाव रहता है। प्रमाण वृत्ति में पदार्थ का यथार्थ ज्ञान होता है, और विपर्यय में पदार्थ के यथार्थ ज्ञान से भिन्न ज्ञान होता है; परन्तु पदार्थ की सत्ता रहती है। जबकि विकल्प में पदार्थ के न होने से इसे स्वतन्त्र वृत्ति के रूप में, अलग से कहा है। प्रमाण वृत्ति यथार्थ ज्ञान है; विपर्यय मिथ्याज्ञान है। विपर्यय वृत्ति में जब तक अज्ञान रहता है, तब तक मिथ्याज्ञान होता है; यह विपर्यय ज्ञान इन्द्रिय दोषों और संस्कार दोषों के कारण भी उत्पन्न होता है, और दोष दूर होते ही विपर्यय = मिथ्याज्ञान का नाश हो जाता है। विकल्प वृत्ति में ज्ञान का आरोपण होता है अतः यह वृत्ति वास्तविक ज्ञान न होने से प्रमाण के अन्तर्गत नहीं आती; और बाद में इसका निराकरण न होने से यह विपर्यय के अन्दर भी नहीं आती। विपर्यय ज्ञान सबको नहीं होता, परन्तु विकल्प ज्ञान उनको भी होता है जिनमें उपरोक्त दोष नहीं होते।

यह विकल्प व्यवहार निम्न प्रकार से भी किया जाता है —

१. अभेद में भेद मानकर अर्थात् एक वस्तु को दो भिन्न वस्तु मानकर; तथा

२. भेद में अभेद मानकर अर्थात् दो विभिन्न वस्तुओं को एक मानकर।

महर्षि व्यास ने उन दोनों प्रकारों का उदाहरण दिया है—

१. चैतन्यम् पुरुषस्य स्वरूपम् = चेतनता पुरुष का स्वरूप है। यहाँ पुरुष में षष्ठी विभक्ति का प्रयोग बताता है कि चेतनता पुरुष का स्वरूप है अर्थात् जैसे चैत्र नामक पुरुष की गाय कहने पर, चैत्र और गाय दो भिन्न पदार्थ हैं जिनका आपस में सम्बन्ध है, वैसे ही उपर्युक्त वाक्य से चेतनता और पुरुष रूप दो भिन्न पदार्थों का ज्ञान उत्पन्न होता है, जिनका एक दूसरे से सम्बन्ध है। यह विकल्प वृत्ति है क्योंकि चेतनता ही पुरुष = आत्मा नामक पदार्थ है। यहाँ किस के द्वारा किस को बताया जा रहा है ? न तो पुरुष = आत्मा नामक पदार्थ का चेतनता नामक कोई गुण या धर्म है, और न ही दोनों में कोई अंश अंशी भाव या अङ्ग अङ्गी भाव है; वरन् वास्तव में तो आत्मा से भिन्न चेतनता नामक कोई अलग पदार्थ है ही नहीं। अतः शब्द ज्ञान के द्वारा अभेद में भेद बताया जाना ही विकल्प वृत्ति है।

इसी प्रकार एक अन्य उदाहरण देते हुए कहा है — प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा निष्क्रिय पुरुषः। इस वाक्य में पुरुष के दोनों विशेषणों से एक-एक विकल्प वृत्ति उत्पन्न होती है। प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा पुरुषः = प्रकृति और उसके विकारों अर्थात् वस्तुओं में रहने वाले धर्मों यथा सत्त्व, रज, तम, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्दादि धर्मों का निषेध शास्त्रों द्वारा जिस पदार्थ में किया गया है वह पुरुष है। इस वाक्य को सुनने से शब्दज्ञान के प्रभाव से यह वृत्ति बनती है कि पुरुष वस्तु धर्मों के अभाव वाला है। यहाँ “वस्तुधर्मों का अभाव” पुरुष का विशेषण है अतः यह वृत्ति प्रमाण न होकर विकल्प है क्योंकि “वस्तुधर्म अभाव” पुरुष के विशेषण के रूप में सर्वथा वस्तुशून्य है क्योंकि अभाव नाम का कोई धर्म ऐसा नहीं होता जो किसी का विशेषण हो सके।

इसी प्रकार “निष्क्रिय पुरुषः” जिसमें प्राकृतिक पदार्थों में होने वाली क्रियाएँ यथा परिणाम, विकार, निर्माण, क्षय आदि से रहित पुरुष है। निरुक्तकार महर्षि यास्क ने उत्पन्न पदार्थों की क्रियाओं के सम्बन्ध में कहा है “षड् भावविकारा भवन्तीति वार्ष्यायणि — जायतेऽस्ति विपरिणमते वर्धतेऽपक्षीयते विनश्यतीति॥” निरुक्त १.२॥ अर्थात् उत्पन्न होने वाले पदार्थों में उत्पन्न होना, अस्तित्त्व में आना, परिणाम को प्राप्त होना, वृद्धि को प्राप्त होना, घटना = क्षीणता को प्राप्त करना तथा नष्ट हो जाना, ये छः क्रियाएँ होती हैं॥ पुरुष = आत्मा नित्य होने से उसमें इस प्रकार की किसी क्रिया का होना सम्भव ही नहीं है। अतः इन “क्रियाओं के अभाव” से विशेषित पुरुष का ज्ञान होता है। यह वृत्ति भी वस्तुशून्य होने से विकल्प वृत्ति है। यहाँ बहुधा भाष्यकारों ने “निष्क्रियः पुरुषः” का अर्थ किया है कि “पुरुष सभी प्रकार की क्रियाओं से रहित है।” परन्तु वेद और वेदानुकूल शास्त्रों में पुरुष को कर्त्ता, भोक्ता तथा कर्मफल भोग हेतु विभिन्न देहों को प्राप्त करने वाला कहा होने से, पुरुष को सभी प्रकार की क्रियाओं से रहित कहना सर्वथा अयुक्त है। इस विषय में वेदादि शास्त्रों के निम्न प्रमाण द्रष्टव्य हैं —

यस्मिन्वृ॒क्षे म॒ध्व॑दः सुप॒र्णा नि॑वि॒शन्ते॒ सुव॑ते॒ चाधि॒ विश्वे॑।

तस्येदा॑हुः॒ पिप्प॑लं स्वा॒द्वग्रे॒ तन्नोन्न॑श॒द्यः पि॒तरं॒ न वेद॑॥ ऋ० १.१६४.२२॥

अर्थात् :— अनादि अनन्त काल से यह विश्व उत्पन्न होता और नष्ट होता है, जीव उत्पन्न होते और मरते भी जाते हैं; इस संसार में जीवों ने जैसा कर्म किया वैसा ही अवश्य ईश्वर के न्याय से भोग्य है। कर्म, जीव का नित्य सम्बन्ध है। जो परमात्मा और उसके गुण, कर्म, स्वभावों के अनुकूल आचरण को न जानकर मनमाने काम करते हैं वे निरन्तर पीडि़त होते हैं और जो उससे विपरीत हैं वे सदा आनन्द भोगते हैं। (महर्षि दयानन्द सरस्वती — वेदभाष्य)

वा॒यु पु॑नातु सवि॒ता पु॑नात्व॒ग्नेर्भ्राज॑सा॒ सूर्य॑स्य॒ वर्च॑सा। वि मु॑च्यन्तामु॒स्रियाः॑॥ यजु॰ ३५.३॥

अर्थात् जब जीव शरीरों को त्याग कर विद्युत, सूर्य के प्रकाश और वायु आदि को प्राप्त करके विचरते हैं तथा गर्भ में प्रविष्ट होते हैं तब किरणें उन्हें त्याग देती हैं॥

एष आत्मा निष्क्रामति चक्षुषो वा मूर्ध्नो वान्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रामन्तं प्रार्णोऽनूत्क्रामति........॥ बृहदा॰ ४.४.२॥

यहाँ आत्मा के शरीर से निकलने तथा उसके पीछे प्राण तथा इन्द्रिय के गमन का स्पष्ट वर्णन है॥

न्यायदर्शनकार महर्षि गौतम ने आत्मा के गुणों का वर्णन करते हुए कहा है —

इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्॥ न्याय० १.१.१०॥

अर्थात् जिसमें (इच्छा) राग, (द्वेष) वैर, (प्रयत्न) पुरुषार्थ, सुख, दुःख, (ज्ञान) जानना, गुण हों वह जीवात्मा है। जब इच्छा, द्वेष और प्रयत्न आत्मा के गुण हैं तो इच्छा, द्वेष और प्रयत्न करने वाला आत्मा निष्क्रिय नहीं हो सकता।

उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर जीवात्मा कर्त्ता, भोक्ता, प्रयत्नकर्त्ता तथा एक शरीर से दूसरे शरीर को प्राप्त होने के कारण सभी प्रकार की क्रियाओं से रहित नहीं कहा जा सकता। अतः यहाँ निष्क्रियः का अर्थ “प्रतिषिद्धवस्तुधर्मा” की तरह “प्रतिषिद्धवस्तु-क्रिया” ऐसा करना शास्त्र सम्मत है।

अब यहाँ अभेद में भेद का एक उदाहरण वेद से देते हैं —

“विष्णो॒र्यत् प॑र॒मं प॒दम्” (यजु॰ ३४.४४; ऋ० १.२२.२१)। यजुर्वेद में इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द सरस्वती लिखते हैं — (विष्णोः) सर्वत्राऽभिव्यपाकस्य (परमेश्वरस्य) (यत् परमम्) प्रकृष्टं (पदम्) प्रापणीयं मोक्षप्रदं स्वरूपम् .....। अर्थात् विष्णु = सर्वव्यापक परमेश्वर का जो उत्तम प्राप्त करने योग्य मोक्षदायक स्वरूप है ....॥ यहाँ विष्णोः में षष्ठी विभक्ति है; इसे देखकर कोई विष्णु = परमेश्वर के परम पद में भेद की कल्पना कर सकता है कि विष्णु का वह “परम पद” विष्णु से भिन्न है। वस्तुतः परमेश्वर का पद, परमेश्वर का स्वरूप ही है जैसा कि महर्षि दयानन्द जी लिखते हैं — “मोक्षप्रदं स्वरूपम्”। जिस प्रकार किसी पदार्थ का स्वरूप उससे भिन्न नहीं होता उसी प्रकार परमात्मा का स्वरूप परमात्मा से भिन्न नहीं हो सकता। अतः यहाँ अभेद में भेद की कल्पना से यह भी विकल्प वृत्ति है।

इसी प्रकार व्यवहार में लोहे की अलमारी, लकड़ी की मेज आदि उदाहरण हैं जो कि विकल्प वृत्ति है। यहाँ भी अभेद में भेद की कल्पना की जा रही है। लोहा और अलमारी तथा लकड़ी और मेज कोई दो अलग-अलग पदार्थ नहीं हैं जिनका सम्बन्ध दिखाया जा रहा है। अगर अलमारी में से सारा लोहा तथा मेज में से सारी लकड़ी निकाल जी जाए तो अलमारी अथवा मेज का अस्तित्त्व ही नहीं रहता। वास्तव में यह एक ही पदार्थ का रूप परिवर्तन मात्र है। अतः इस प्रकार का सम्बन्ध दिखाना विकल्प वृत्ति है।

२. अब भेद में अभेद का उदाहरण दिखाया है — “तिष्ठति बाणः स्थास्यति स्थित इति” = बाण ठहरता है, ठहरेगा, ठहर गया। इस उदाहरण में गति की निवृत्ति में “स्था” धातु का अर्थ मात्र है, उसका ही ज्ञान होता है। बाण जड़ होने से उसमें किसी प्रकार की स्वभावतः गति नहीं है। परन्तु इस वाक्य को सुन कर बाण में गति निषेध की प्रतीति होती है। परन्तु क्या वास्तव में बाण में कही गयी गति निवृत्ति होती है ? बाण जड़ होने से उसमें जब प्रयत्न है ही नहीं, तो गति का होना और फिर गति निवृत्ति का होना सम्भव ही नहीं है। अतः बाण में गति निवृत्ति को सम्भावित करने के लिए उसमें भावरूप की कल्पना करनी होगी अर्थात् बाण में गति की कल्पना करनी होगी चेतनवत्। प्रयत्न चेतन का धर्म होने से; और इस उदाहरण में चेतन के न होने से यह विकल्प वृत्ति है जिसमें भेद में अभेद मानकर व्यवहार किया गया है।

इसी प्रकार अगर कोई व्यक्ति गरम लोहे के गोले को स्पर्श कर जल जाने पर कहता है कि “लोहे का गोला जलाता है” इसमें ऐसा लगता है कि लोहे के गोले में जलाने की शक्ति है, परन्तु वास्तव में जलना अग्नि के कारण होता है नाकि लोहे के गोले के कारण। यहाँ लोहे का गोला और अग्नि दो भिन्न पदार्थों को एकाकार रूप से कथन किया जा रहा है, अतः विकल्प वृत्ति है।

इसी प्रकार “अहमस्मि” अर्थात् “मैं हूँ” यह वृत्ति भी विकल्प रूप है। क्योंकि अंहकार और आत्मा एक दूसरे से भिन्न पदार्थ होने पर भी दोनों में अभेद प्रतीत है; अर्थात् अंहकार को आत्मा में आरोपित करके दोनों को एक बताया जा रहा है।

विकल्प वृत्ति का एक अन्य उदाहरण महर्षि व्यास ने दिया है — “अनुत्पत्तिधर्मा पुरुष इति” अर्थात् पुरुष उत्पत्ति धर्म के अभाव वाला है। यहाँ जिस धर्म का निषेध किया गया है वह पुरुष में है ही नहीं। अनुत्पत्ति रूप पुरुष का स्वरूप है, उससे भिन्न कोई अन्य वस्तु नहीं है। अतः वस्तुशून्य होने से, शब्द व्यवहार से उत्पन्न, यह भी विकल्प वृत्ति है।