In Hindi:
पदपाठ : व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोः अभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयः निरोधपरिणामः॥
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अथ निरोधचित्तक्षणेषु चलं गुणवृत्तमिति कीदृशस्तदा चित्तपरिणाम: —
हिंदी में अर्थ : (अथ) अब (गुणवृत्तम्) गुणों का स्वभाव = व्यवहार (चलम्) चञ्चल = निरन्तर परिवर्तनशील है (इति) इसलिए (निरोधचित्तक्षणेषु) जब चित्तवृत्ति का निरोध होने से योगी का चित्त “निरोधचित्त = निरोधकालिक चित्त कहा जाता है, (तदा) उस चित्त के निरोधकाल में (चित्तपरिणामः) चित्त का परिणाम (कीदृशः) किस प्रकार का होता है ? —
हिंदी में अर्थ : (व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोः) व्युत्थान और निरोध संस्कारों का क्रमशः (अभिभवप्रादुर्भावौ) अभिभव = दबना और प्रादुर्भाव = प्रकट होना, इन संस्कारों के साथ (निरोधक्षणचित्तान्वयः) निरोधकालिक चित्त का सम्बन्ध होना (निरोधपरिणामः) निरोध परिणाम है॥
व्यास भाष्य : व्युत्थानसंस्काराश्चित्तधर्मा न ते प्रत्ययात्मका इति प्रत्ययनिरोधे न निरुद्धाः। निरोधसंस्कारा अपि चित्तधर्माः। तयोरभिभवप्रादुर्भावौ। व्युत्थानसंस्कारा हीयन्ते, निरोधसंस्कारा आधीयन्ते। निरोधक्षणं चित्तमन्वेति। तदेकस्य चित्तस्य प्रतिक्षणमिदं संस्कारान्यथात्वं निरोधपरिणामः। तदा संस्कारशेषं चित्तमिति निरोधसमाधौ व्याख्यातम्॥
हिंदी में अर्थ : (व्युत्थानसंस्काराः) व्युत्थान = चित्त की क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त और एकाग्र दशा में बने संस्कार (चित्तधर्माः) चित्त के धर्म हैं; (ते प्रत्ययात्मकाः) वे संस्कार वृत्तिरूप अथवा ज्ञानात्मक (न) नहीं होते (इति) इसलिए (प्रत्ययनिरोधे) वृत्तियों अथवा ज्ञान का निरोध होने पर भी, इन संस्कारों का (न निरुद्धाः) निरोध नहीं होता। (निरोधसंस्काराः अपि) चित्त की निरुद्धावस्था में बनने वाले संस्कार भी (चित्तधर्माः) चित्त के धर्म हैं। (तयोः) उन दोनों = व्युत्थान और निरोध संस्कारों का सम्यक् अभ्यास से (अभिभवप्रादुर्भावौ) दबना और प्रकट होना अर्थात् (व्युत्थानसंस्काराः) व्युत्थान दशा के संस्कार (हीयन्ते) दबते हैं, और (निरोधसंस्काराः) निरोध दशा के संस्कार (आधीयन्ते) प्रादुर्भूत = प्रकट होते हैं, और (निरोधक्षणम् चित्तम्) निरोधकालिक चित्त उन दोनों प्रकार के संस्कारों के साथ (अन्वेति) अन्वित = युक्त होता है। (तत्) इसलिए (एकस्य चित्तस्य) एक चित्त का (प्रतिक्षणम्) प्रत्येक क्षण में (इदम्) यह (संस्कारान्यथात्वम्) संस्कारों का अन्यथा भाव = परिवर्तन होना ही (निरोधपरिणामः) निरोधपरिणाम कहा जाता है। (तदा) उस निरोध परिणाम के काल में (चित्तम्) चित्त (संस्कारशेषम्) संस्कारमात्र शेष वाला होता है, (इति) यह (निरोधसमाधौ) निरोध समाधि के प्रसंग (योग० १.१८) में (व्याख्यातम्) कहा गया है॥
वैदिक योग मीमांसा : चित्त त्रिगुणात्मक है; सत्त्व, रज और तम गुणों का विकार है। गुणों का स्वभाव चञ्चल होने से चित्त में चञ्चलता स्वभाविक रूप से होती है। चित्त में सात्त्विक, राजसिक और तामसिक वृत्तियों के अनवरत रूप से विद्यमान रहने से, चित्त की एकाग्रता का सम्पादन करने हेतु पुरुषार्थ करना होता है। चित्त की पाँच भूमियों का वर्णन योगसूत्र १.१ में महर्षि व्यास ने किया है; इनमें से निरुद्धावस्था चित्त की अन्तिम भूमि है। जब चित्त की सभी वृत्तियों का निरोध हो जाता है, उस काल में चित्त के परिणाम का वर्णन यहाँ किया जा रहा है।
व्युत्थान संस्कार चित्त के धर्म हैं। चित्त की एकाग्रावस्था की अपेक्षा से चित्त की क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त अवस्थाओं की वृत्तियों से बने संस्कार व्युत्थान संस्कार कहलाते हैं। सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में समाधिप्रज्ञा के संस्कारों से व्युत्थान = क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त अवस्थाओं में बने संस्कार बाधित हो जाते हैं। जबकि निरुद्धावस्था की अपेक्षा से, चित्त की एकाग्रावस्था में बने संस्कार भी व्युत्थान-संस्कार ही कहे जाते हैं। इस प्रकार से बने सभी संस्कार चित्त रूपी धर्मी में रहते हैं। ये संस्कार वृत्तिरूप या ज्ञानरूप नहीं होते; अतः निरुद्धावस्था में सभी प्रकार की वृत्तियों का तथा सम्प्रज्ञात समाधि के आलम्बन बने सभी पदार्थों और विषयों के ज्ञानों का निरोध हो जाने पर भी इन संस्कारों का स्वतः निरोध नहीं होता। वृत्तियों और विभिन्न ज्ञानों की अनुभूतियों से बने व्युत्थान संस्कारों की निवृत्ति के भी वही उपाय हैं, जो अविद्यादि क्लेशों के नाश के उपाय कहे गए हैं। व्युत्थान संस्कारों के समान ही, चित्त की निरुद्धावस्था में बने निरोध संस्कार भी चित्त के धर्म हैं।
योगी को व्युत्थान संस्कारों का अभिभव और निरोध संस्कारों का प्रादुर्भाव करना होता है। व्युत्थान संस्कारों के अभिभव का अभिप्राय है कि इन संस्कारों को निर्बल = शक्तिहीन बनाना जिससे ये अपने कार्य करने के सामर्थ्य से रहित होकर चित्त में उपस्थित मात्र रहें; अर्थात् ये संस्कार अपने अनुरूप वृत्तियों और ज्ञानों को पुनः उभारने में समर्थ न रहें। निरोध संस्कारों के प्रादुर्भाव का अभिप्राय है कि निरोधकाल में बने संस्कारों का प्रकट रूप से बने रहना। इस प्रकार से व्युत्थान संस्कारों को अभिभूत = तिरोहित किया जाता है, और निरोध संस्कारों को प्रादुर्भूत किया जाता है। निरोधकालिक चित्त इन दोनों प्रकार के संस्कारों से सम्बद्ध रहता है। ऐसे चित्त में व्युत्थान संस्कारों के अभिभूत होने, निरोध संस्कारों के प्रकट होने रूप परिणाम की प्राप्ति ही, चित्त का निरोध परिणाम कहलाता है। अर्थात् निरोध क्षणयुक्त चित्त रूपी धर्मी में व्युत्थान = सम्प्रज्ञात समाधि के संस्कार रूपी चित्त के धर्मों का क्षय होकर, निरोध संस्कार रूप चित्त के धर्मों का प्रादुर्भाव होता रहता है। यह परिणाम ही इस निरोधक्षण युक्त चित्त का निरोध परिणाम है।
परन्तु गुणों की वृत्तियों का स्वभाव चञ्चल होने से चित्त लगातार निरुद्धावस्था में नहीं रह पाता। इस स्थिति के हटते ही व्युत्थान संस्कार पुनः सक्रिय हो जाते हैं। अतः योगी को निरोध संस्कारों को प्रबल करने हेतु निरुद्धावस्था का सतत् अभ्यास करना होता है। इस प्रकार के अनवरत अभ्यास से ही निरोध संस्कार धीरे-धीरे प्रबल होते हैं, और दीर्घकालीन अभ्यास से योगी व्युत्थान संस्कारों को, निरोध संस्कारों के प्राबल्य से, निर्बल करने में समर्थ हो पाता है। क्योंकि अगले ही सूत्र के भाष्य में महर्षि व्यास स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि निरोध संस्कारों की निर्बलता होने पर व्युत्थान संस्कार इनको दबाने में समर्थ हो जाते है। इसका विपरीत भी इसी प्रकार से सत्य है।
इस काल में चित्त की संस्कारमात्र शेष अवस्था होती है, जिसका वर्णन योगसूत्र १.१८ में किया गया है। यहाँ यह जानना चाहिए कि चित्त की निरुद्धावस्था में एकाग्रावस्था तक के संस्कारों का ही निरोध होता है। परन्तु परमात्मा की अनुभूति और तद्विषयक संस्कारों का निरोध अपेक्षित नहीं होता। योगी परमश्रेष्ठ लक्ष्य परमात्मा को जानकर ही, विकारी एवं परिणामी प्रकृति के आलम्बन को, हेय जानकर, त्यागता हुआ प्रकृति संयोग से हुए क्लेश, कर्म, विपाक और तदनुकूल वासनाओं = संस्कारों का भी निरोध करने में समर्थ होता है।
अन्त में चित्त, इन निरोध संस्कारों के साथ ही, प्रकृति में लय हो जाता है। इनके निरोध हेतु किसी अन्य उपाय की अपेक्षा नहीं रहती।