In Hindi:
पदपाठ : क्रमान्यत्वम् परिणामान्यत्वे हेतुः॥
हिंदी में अर्थ : (क्रमान्यत्वम्) क्रम की अन्यता = भिन्नता = विविधता (परिणामान्यत्वे) परिणामों की भिन्नता = विविधता = भेद होने में (हेतुः) कारण है॥
व्यास भाष्य : एकस्य धर्मिण एक एव परिणाम इति प्रसक्ते क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुर्भवतीति। तद्यथा चूर्णमृत्पिण्डमृद्घटमृत्कपालमृत्कणमृदिति च क्रमः। यो यस्य धर्मस्य समनन्तरो धर्मः स तस्य क्रमः। पिण्डः प्रच्यवते घट उपजायत इति धर्मपरिणामक्रमः। लक्षणपरिणामक्रमो घटस्यानागतभावाद्वर्त्तमानभावः क्रमः। तथा पिण्डस्य वर्त्तमानभावादतीतभावः क्रमः। नातीतस्यास्ति क्रमः। कस्मात्? पूर्वपरतायां सत्यां समनन्तरत्वम्। सा तु नास्त्यतीतस्य तस्माद्द्वयोरेव लक्षणयोः क्रमः। तथावस्थापरिणामक्रमोऽपि घटस्याभिनवस्य प्रान्ते पुराणता दृश्यते। सा च क्षणपरम्परानुपातिना क्रमेणाभिव्यज्यमाना परां व्यक्तिमापद्यत इति। धर्मलक्षणाभ्यां च विशिष्टोऽयं तृतीयः परिणाम इति।
त एते क्रमा धर्मधर्मिभेदे सति प्रतिलब्धस्वरूपाः। धर्मोऽपि धर्मी भवत्यन्यधर्मस्वरूपापेक्षयेति। यदा तु परमार्थतो धर्मिण्यऽभेदोपचारद्वारेण स एवाभिधीयते धर्मस्तदायमेकत्वेनैव क्रमः प्रत्यवभासते।
चित्तस्य द्वये धर्माः परिदृष्टाश्चापरिदृष्टाश्च। तत्र प्रत्ययात्मकाः परिदृष्टाः। वस्तुमात्रात्मका अपरिदृष्टाः। ते च सप्तैव भवन्त्यनुमानेन प्रापितवस्तुमात्रसद्भावाः।
निरोधधर्मसंस्काराः परिणामोऽथ जीवनम्। चेष्टा शक्तिश्च चित्तस्य धर्मा दर्शनवर्जिताः इति॥
हिंदी में अर्थ : (एकस्य धर्मिणः) एक धर्मी का (एक एव परिणामः) एक ही परिणाम होना चाहिए (इति प्रसक्ते) इस प्रसङ्ग = शंका के उपस्थित होने पर (क्रमान्यत्वम्) क्रम का अन्य = भिन्न होना ही (परिणामान्यत्वे) धर्मी के परिणाम की अन्यता = भिन्नता का (हेतुः) कारण (भवति इति) होता है। (तत् यथा) वह जैसे (चूर्णमृत्) चूर्ण = पिसी हुई मिट्टी, (पिण्डमृत्) पिण्डाकार मिट्टी, (घटमृत्) घट रूप में परिवर्तित मिट्टी, (कपालमृत्) कपाल = ठीकरों के रूप में मिट्टी, (च) और (कणमृत्) कण रूप में मिट्टी (इति क्रमः) इस प्रकार से मिट्टी सम्बन्धी क्रम है। (यः धर्मः) जो धर्म (यस्य धर्मस्य) जिस धर्म का (समनन्तरः) समीपी = परवर्त्ती = पश्चात् होने वाला है, (सः) वह परवर्त्ती धर्म (तस्य) उस पूर्ववर्त्ती धर्म का (क्रमः) क्रम है। (पिण्डः प्रच्यवते) मिट्टी का पिण्ड प्रच्युत = अपने स्वरूप से नष्ट होता है, और (घटः उपजायते) घट उत्पन्न हो जाता है; (इति) इस प्रकार का क्रम (धर्मपरिणामक्रमः) धर्म परिणाम क्रम है। (लक्षणपरिणामक्रमः) लक्षण परिणाम क्रम यह है — (घटस्य) घट का (अनागतभावात्) अनागत लक्षण वाली स्थिति से (वर्त्तमानभावः क्रमः) वर्त्तमान लक्षण वाली स्थिति में आना ही क्रम है। (तथा) वैसे ही (पिण्डस्य) मिट्टी के पिण्ड का (वर्त्तमानभावात्) वर्त्तमान लक्षण वाली स्थिति से (अतीतभावः क्रमः) अतीत लक्षण वाली स्थिति को प्राप्त होना क्रम है। (अतीतस्य) अतीत लक्षण वाली स्थिति का (क्रमः) क्रम (न अस्ति) नहीं होता। (कस्मात्) क्यों ? क्योंकि (पूर्वपरतायाम् सत्याम्) पूर्वता और परता के होने पर ही (समनन्तरत्वम्) अव्यवहित = अनन्तर क्रम होता है। (सा तु) वह पूर्व से परता का होना (अतीतस्य) अतीत लक्षण वाली स्थिति का (न अस्ति) नहीं होता है। (तस्मात्) इसलिए (द्वयोः एव लक्षणयोः) दो लक्षणों = अनागत और वर्त्तमान का ही (क्रमः) क्रम होता है।
(तथा) वैसे ही (अवस्थापरिणामक्रमः अपि) अवस्था परिणाम में भी क्रम को जानना चाहिए। जैसे (अभिनवस्य घटस्य) नए घट के (प्रान्ते) बनने के कुछ काल उपरान्त, उसमें (पुराणता) पुराणता = पुरानापन (दृश्यते) दिखाई पड़ता है। (सा च) और वह पुराणता (क्षणपरम्परानुपातिना) क्षणों की परम्परा का अनुसरण करने वाले (क्रमेण) क्रम के द्वारा (अभिव्यज्यमाना) अभिव्यक्त होती हुई (पराम् व्यक्तिम्) अन्तिम अवस्था को (आपद्यते) प्राप्त होती है। (इति) इस प्रकार (धर्मलक्षणाभ्याम् च) धर्म परिणाम और लक्षण परिणाम से (विशिष्टः) विशिष्ट = भिन्न (अयम्) यह (तृतीयः परिणामः इति) तृतीय अवस्था परिणाम है।
(ते एते) वे ये (क्रमाः) तीन प्रकार के क्रम (धर्मधर्मिभेदे सति) धर्म और धर्मी भेद रहने पर ही (प्रतिलब्धस्वरूपाः) अपने स्वरूप को प्राप्त होने वाले होते हैं। (धर्मः अपि) धर्म भी (अन्यधर्मस्वरूपापेक्षया) अपने से अन्य धर्मों के स्वरूप की अपेक्षा से (धर्मी भवति इति) धर्मी हो जाता है। (यदा तु) किन्तु जब (परमार्थतः) वास्तविक रूप से (धर्मिणः) धर्मी में (अभेदोपचारद्वारेण) अभेद की दृष्टि से (स एव) वह धर्मी ही (धर्मः) धर्म (अभिधीयते) कहा जाता है (तदा) उस समय (अयम् क्रमः) यह क्रम (एकत्वेन् एव) एक ही रूप में (प्रत्यवभासते) प्रतिभासित होता है।
अन्य धर्मियों के समान चित्त के धर्म दिखाए जाते हैं — (चित्तस्य) चित्त के (द्वये धर्माः) दो प्रकार के धर्म हैं — (परिदृष्टाश्च अपरिदृष्टाश्च) परिदृष्ट = प्रत्यक्ष और अपरिदृष्ट = अप्रत्यक्ष = परोक्ष। (तत्र) उनमें से (प्रत्ययात्मकाः) ज्ञान कराने वाले प्रमाणादि वृत्ति रूप (परिदृष्टाः) परिदृष्ट धर्म हैं। (वस्तुमात्रात्मकाः) वस्तु मात्र स्वरूप वाले = चित्त स्वरूप से स्थित (अपरिदृष्टाः) अपरिदृष्ट धर्म हैं। (ते च) और वे, (अनुमानेन) अनुमान प्रमाण द्वारा (प्रापितवस्तुमात्रसद्भावाः) साधित वस्तु मात्र सद्भाव वाले, (सप्त एव भवन्ति) सात प्रकार के ही हैं — (निरोधधर्मसंस्काराः) निरोध, धर्म, संस्कार, (परिणामः) परिणाम, (अथ) एतदनन्तर (जीवनम्) जीवन, (चेष्टा) चेष्टा, (च) और (शक्तिः) शक्ति, ये (चित्तस्य) चित्त के (दर्शनवर्जिताः) न दिखाई देने वाले = अपरिदृष्ट (धर्माः इति) धर्म हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : किसी भी धर्मी का एक ही परिणाम होना चाहिए, क्योंकि किसी भी धर्मी का उदित धर्म निश्चित रूपेण एक ही होता है; ऐसे में सभी धर्मी अपने एक ही निश्चित परिणाम को प्राप्त होने चाहिए जो कि धर्म परिणाम के रूप में जाना जाता है। परन्तु लोक में धर्मी के अनेक परिणाम देखने में आते हैं, और इसमें क्रम की विविधता = भिन्नता कारण होता है। महर्षि पतञ्जलि कहते है कि क्रम की भिन्नता के कारण एक ही धर्मी के विविध परिणाम होते हैं। पूर्व सूत्र की व्याख्या में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी भी धर्मी के उदित धर्मों के समान अनागत धर्म निश्चित रूपेण नहीं कहे गए; अतः धर्मी के विविध अनागत धर्मों के होने से, उसके विभिन्न धर्म-परिणाम होना सम्भव होता है। किसी भी अनागत धर्म के उदित धर्म के रूप में परिवर्तित होने के लिए क्रम का भिन्न-भिन्न होना ही, कारण होता है। जैसे, मिट्टी रूपी धर्मी पहले चूर्ण रूप में होती है; फिर उसमें पानी मिलाकर पिण्डाकार बनाया जाता है; उस पिण्डाकार मिट्टी से कुम्हार घट बनाता है; उस घट के टूटने पर उसके ठीकरे = कपाल होते हैं; और अन्त में उन कपालों का फिर से चूर्ण बन जाता है; यह मिट्टी के विविध परिणामों का क्रम है।
क्रम क्या है ? जो धर्म जिस धर्म के पश्चात् होने वाला होता है, वह बाद में होने वाला = परवर्त्ती धर्म, पूर्व वाले धर्म का क्रम कहलाता है। जैसे मिट्टी के पिण्ड का क्रम घट है, क्योंकि उस पिण्ड से ही घट उत्पन्न होता है। इसी क्रम को धर्म-परिणाम क्रम कहा जाता है।
घट की उत्पत्ति होने पर, घट का अनागत लक्षण वाली स्थिति को त्याग कर वर्त्तमान लक्षण वाली स्थिति को प्राप्त होना और वर्त्तमान लक्षण वाली स्थिति में टूटने पर अतीत लक्षण को प्राप्त हो जाना, लक्षण परिणाम क्रम कहलाता है। इस अतीत स्थिति के पश्चात् कोई क्रम नहीं होता, क्योंकि इस अतीत स्थिति के पश्चात् होने वाली कोई स्थिति नहीं होती। अतः दो = अनागत और वर्त्तमान लक्षणों का ही क्रम होता है।
घट की उत्पत्ति होने पर घट नवीन होता और क्षण परम्परा से घट प्रतिक्षण नवीनता से पुराणता को प्राप्त होता हुआ, कालान्तर में यही घट पुरातन कहा जाता और अन्तिम स्थिति में टूट कर कपाल = ठीकरा रूप में उपलब्ध होता। इस प्रकार नवीनता से पुराणता की प्राप्ति घट का अवस्था परिणाम क्रम है।
ये तीनों ही क्रम धर्म-धर्मी के भेद रहने पर ही होते हैं। यहाँ यह भी समझना चाहिए कि किसी धर्म की अपेक्षा से जो धर्मी है, वह अपने पूर्ववर्त्ती का धर्म होता है। वास्तव में तो एक ही धर्मी है, जिसे मूल प्रकृति कहा जाता है। जैसे मिट्टी, घट रूपी धर्म की अपेक्षा से, धर्मी है; यह मिट्टी, गन्ध तन्मात्रा रूपी धर्मी का, धर्म है; गन्ध तन्मात्रा भी, अंहकार रूपी धर्मी का, धर्म है; इसी क्रम में अंहकार भी, महत्तत्त्व रूपी धर्मी का, धर्म है; और अन्तिम रूप से महत्तत्त्व भी, मूल प्रकृति रूपी धर्मी का, धर्म है। मूल प्रकृति ही आदि मूलकारण रूप धर्मी है, जो किसी अन्य धर्मी का धर्म नहीं है। इसी प्रकार अन्य धर्म-धर्मी के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए। इस प्रकार धर्म-धर्मी में भेद मानकर ही क्रम को कहा गया है। परन्तु यदि अन्य की अपेक्षा से धर्म-धर्मी में भेद न कहा जाए, तो क्रम भी नहीं होगा।
महर्षि व्यास ने अन्य धर्मियों के समान चित्त के परिदृष्ट = प्रत्यक्ष और अपरिदृष्ट = परोक्ष, दो प्रकार के धर्म कहे हैं। चित्त में ज्ञान कराने वाली प्रमाणादि वृत्ति रूप प्रत्यक्ष धर्म हैं, दूसरी ओर परोक्ष = न दिखने वाले सात धर्म है, जो कि अनुमान से जाने जाते हैं —
१. निरोध — असम्प्रज्ञात समाधि में व्युत्थान संस्कारों का क्षय और निरोध संस्कारों का उदय, चित्त का निरोध परिणाम कहा जाता है। इस काल में संस्कारमात्र शेष रहते हैं। यह चित्त का निरोध परिणाम धर्म है।
२. धर्म — मन, वाणी और शरीर से किए जाने वाले शुभाशुभ कर्म धर्म-अधर्म रूप से चित्त में संचित रहते हैं। यहाँ धर्म के साथ अधर्म का भी ग्रहण जानना चाहिए।
३. संस्कार — वासना रूप संस्कार; चित्त में क्लेश, कर्म और उनके विपाक = फल के अनुभव से उत्पन्न वासनाएँ, संस्कार कहलाती है। ये संस्कार चित्त में प्रसुप्त, तनु, विच्छिन्न और उदार अवस्था वाले होते हैं।
४. परिणाम — सत्त्वादि गुणों के कारण चित्त में निरन्तर परिणाम होता रहता है। जिस काल में जो एक गुण प्रधान होता, उस काल में अन्य दोनों गुण गौण रूप से रहते हैं। जो गुण चित्त में प्रधान रूप से कार्यरत होता है, पुरुष वैसी ही वृत्तियों का अपनाता है।
५. जीवन — शरीर को धारण करने हेतु, चित्त द्वारा होने वाला प्रयत्न जीवन कहलाता है।
६. चेष्टा — इन्द्रियों को अपने-अपने विषयों की ओर प्रवृत्त करने के लिए, चित्त द्वारा की गई क्रिया चेष्टा कहलाती है। यदि चित्त चेष्टा न करे, तो कोई भी इन्द्रिय अपने विषय को प्राप्त नहीं कर सकती।
७. शक्ति — अपने कार्यों को सम्पादित करने का सूक्ष्म सामर्थ्य, चित्त में रहता है। इसी सामर्थ्य को शक्ति रूपी धर्म कहा जाता है।