In Hindi:
पदपाठ : परिणामत्रय संयमात् अतीतानागतज्ञानम्॥
संस्कृत में सूत्र की भूमिका : अतो योगिन उपात्तसर्वसाधनस्य बुभुत्सितार्थप्रतिपत्तये संयमस्य विषय उपक्षिप्यते—
हिंदी में अर्थ : (अतः) इसके पश्चात् (उपात्तसर्वसाधनस्य) योग के सभी साधनों = अङ्गों का अनुष्ठान कर लेने वाले (योगिनः) योगी के (बुभुत्सितार्थप्रतिपत्तये) जिज्ञासित पदार्थों के ज्ञान के लिए (संयमस्य) संयम का (विषयः) विषय = आलम्बन (उपक्षिप्यते) उपस्थित किया जाता है —
हिंदी में अर्थ : (परिणामत्रय) धर्मी = पदार्थ के परिणामत्रय = धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों में (संयमात्) संयम = धारणा, ध्यान, समाधि करने से, योगी को (अतीतानागतज्ञानम्) उस धर्मी के अतीत और अनागत का ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : धर्मलक्षणावस्थापरिणामेषु संयमाद्योगिनां भवत्यतीतानागतज्ञानम्। धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयम उक्तः। तेन परिणामत्रयं साक्षात्क्रियमाणमतीतानागतज्ञानं तेषु सम्पादयति॥
हिंदी में अर्थ : किसी धर्मी = पदार्थ के (धर्मलक्षणावस्थापरिणामेषु) धर्म, लक्षण, अवस्था परिणामों में (संयमात्) संयम करने से (योगिनाम्) योगियों को (अतीतानागतज्ञानम्) उस पदार्थ के अतीत = भूत और अनागत = भविष्यत का ज्ञान (भवति) होता है। (एकत्र) एक विषय = आलम्बन में (धारणाध्यानसमाधित्रयम्) धारणा, ध्यान और समाधि तीनों को करना (संयमः) संयम (उक्तः) कहा है। (तेन) उस संयम से (परिणामत्रयम्) धर्मादि तीनों परिणामों का (साक्षात्क्रियमाणम्) साक्षात्कार करते हुए (तेषु) उन योगियों को (अतीतानागतज्ञानम्) ध्येय पदार्थ = धर्मी के अतीत और अनागत का ज्ञान (सम्पादयति) सम्पन्न = प्राप्त होता है॥
वैदिक योग मीमांसा : योगदर्शन के इस पाद में व्याख्यात यह प्रथम विभूति है। योगी द्वारा किसी भी धर्मी के जब धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम में संयम किया जाता है, तो वह उस पदार्थ = धर्मी के अतीत और अनागत का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भूत और इन्द्रिय रूपी कार्य पदार्थों के ही होते हैं। अतः योगी इन्हीं भूत और इन्द्रियों का जो धर्म परिणाम होता है, उस धर्म के अतीत और अनागत का ज्ञान प्राप्त कर लेता है। योगी यह जान लेता है कि इस धर्मपरिणाम रूपी कार्य पदार्थ का उपादान कारण क्या है? तथा वर्त्तमान पदार्थ के रूप में आने से पूर्व, वह उपादान कारण किन-किन धर्मो = रूपान्तरों को प्राप्त हुआ, आदि-आदि रूप से उसका अतीत ज्ञान; और यह कार्य पदार्थ भविष्यत में नष्ट होकर किसी रूप में परिवर्तित हो जायेगा, इस रूप में उस धर्मी का अनागत ज्ञान को प्राप्त करता है। योगी इस संयम के आधार से ही इस मनुष्यादि प्राणियों के शरीरों के अतीत और भविष्यत का ज्ञान भी प्राप्त कर लेता है; अर्थात् वह जानता है कि ये सभी शरीर किन प्रकार के उपादान कारणों से बने हैं और भविष्यत में नष्ट होने पर इन शरीरों का क्या होगा ?
न तो सूत्र और न ही व्यासभाष्य में इस विषय में काल सम्बन्धी ज्ञान होने का कोई भी संकेत मात्र ही है। अतः यहाँ यह समझना चाहिए कि योगी को इस प्रकार से किसी भी धर्मी का जो अतीत और अनागत रूपी ज्ञान होता है, वह काल की अपेक्षा से नहीं होता। अर्थात् योगी इस संयम मात्र के आधार पर, जब तक कोई अन्य कारण या ज्ञान का अन्य स्रोत उपस्थित न हो तो, यह नहीं जानता कि यह कार्य पदार्थ अपने उपादान कारण से अमुक काल में बना; और न ही यह जानता है कि यह कार्य पदार्थ अमुक काल में नष्ट हो जायेगा। अर्थात् इस प्रकार योगी इस संयम के आधार पर यह नहीं जानता कि इस प्राणधारी का शरीर अमुक तिथि को उत्पन्न हुआ और भविष्यत में इस तिथि को इस प्राणधारी का शरीर नष्ट हो जायेगा अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो जायेगा। इस प्रकार अन्य धर्मियों = पदार्थों के बारे में भी जानना चाहिए।
महर्षि पतञ्जलि ने धर्म, लक्षण और अवस्था परिणामों को भूत और इन्द्रियों में कहा है। अतः इन परिणामों में संयम से अतीत और अनागत का ज्ञान इनसे ही सम्बन्धित होता है। जिन पदार्थों, यथा नित्य आत्मा तथा मूल प्रकति, में यह धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम नहीं घटते, उन पदार्थों का अतीत और अनागत ज्ञान, भूत और इन्द्रियों के धर्म परिणाम से बने पदार्थों के अतीत और अनागत ज्ञान के समान, नहीं होता; और न ही इस परिणामत्रय संयम से उस का ज्ञान होने का कोई प्रश्न ही उत्पन्न होता है। अतः कोई व्यक्ति इससे आत्मा आदि नित्य पदार्थों के अतीत और अनागत का ज्ञान होने की बात कहे, तो यह मिथ्या ही समझना चाहिए।