In Hindi:
पदपाठ : तत् एव अर्थमात्रनिर्भासम् स्वरूपशून्यम् इव समाधिः॥
हिंदी में अर्थ : (तद् एव) वह जब ध्यान ही (अर्थमात्रनिर्भासम्) ध्येय वस्तु के स्वरूप मात्र को प्रकाशित करने वाले और जिसमें योगी (स्वरूपशून्यम् इव) अपने स्वरूप से शून्य = रहित जैसा हो जाता है, तब (समाधिः) समाधि कहा जाता है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : “ध्यानसमाध्योरयं भेदः ध्याने मनसो ध्यातृध्यानध्येयाकारेण विद्यमाना वृत्तिर्भवति, समाधौ तु परमेश्वरस्वरूपे तदानन्दे च मग्नः स्वरूपशून्यः इव भवति।” (ऋ० भू॰ उपासना विषय)
“(तदेवार्थ०) जैसे अग्नि के बीच में लोहा भी अग्निरूप हो जाता है, इसी प्रकार परमेश्वर के ज्ञान में प्रकाशमय होके अपने शरीर को भी भूले हुए के समान जान के आत्मा को परमेश्वर के प्रकाशस्वरूप आनन्द और ज्ञान में परिपूर्ण करने को समाधि कहते हैं। ध्यान और समाधि में इतना भी भेद है कि ध्यान में तो ध्यान करने वाला, जिस मन से, जिस चीज का ध्यान करता है, वे तीनों ही विद्यमान रहते हैं। परन्तु समाधि में केवल परमेश्वर ही के आनन्द स्वरूप ज्ञान में आत्मा मग्न हो जाता है। वहाँ तीनों का भेद भाव नहीं रहता। जैसे जल में डुबकी मार के थोड़ा समय भीतर ही रुका रहता है, वैसे ही जीवात्मा परमेश्वर के बीच में मग्न हो के फिर बाहर को आ जाता है।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)
“जब ध्याता, ध्यान और ध्येय, इन तीनों का पृथक् भाव न रहे, तब जानना कि समाधि सिद्ध हो गई।” (ऋषि दयानन्द का पण्डित ताराचरण तर्करत्न से “प्रतिमापूजन विचार” पर शास्त्रार्थ से — द्र० ऋषि दयानन्द के पत्र और विज्ञापन भाग १, पृष्ठ २९-३०)
“इन सातों अङ्गों का फल समाधि है।” (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)
व्यास भाष्य : ध्यानमेव ध्येयाकारनिर्भासं प्रत्ययात्मकेन स्वरूपेण शून्यमिव यदा भवति ध्येयस्वभावावेशात्तदा समाधिरित्युच्यते॥
हिंदी में अर्थ : (यदा) जब = जिस काल में (ध्यानम् एव) ध्यान ही (ध्येयस्वभावावेशात्) ध्येय के स्वभाव को प्राप्त होने के कारण से (ध्येयाकारनिर्भासम्) ध्येय के आकार का भासित होने वाला (प्रत्ययात्मकेन स्वरूपेण) अपने ज्ञानात्मक रूप से (शून्यम् इव) शून्य = भूला हुआ जैसा (भवति) हो जाता है; (तदा) उस समय, वह ध्यान ही (समाधिः इति उच्यते) समाधि कहा जाता है॥
वैदिक योग मीमांसा : जब किसी ध्येय पदार्थ = विषय के आलम्बन का सदृश प्रवाह बना रहता है, तो ध्यान कहलाता है। जब ध्यान करते हुए, ध्येय पदार्थ = विषय का स्वरूपमात्र ही ज्ञात रहे और योगी का अपना स्वरूप भी शून्य जैसा हो जाये, तो ध्यान की इसी अवस्था को समाधि कहा जाता है।
यजुर्वेद ९.३ में “समाहितम्” पद आया है जिसका अर्थ महर्षि दयानन्द ने “सम्यक् सर्वतो धृतम्” किया है अर्थात् अच्छी प्रकार से सभी ओर से धारण करना। वस्तुतः जब ध्येय विषय मात्र को ही सम्यक् रूप से धारण किया जाए, उसे जाना जाए, उस स्थिति को समाधि कहते हैं। भोज के अनुसार भी चित्त के सभी विक्षेपों को दूर करके मन को जहाँ = जिस विषय या पदार्थ में एकाग्र किया जाए उसे समाधि कहते हैं।
स्वामी विज्ञानाश्रम जी ने अपने भाष्य में, वर्त्तमान में प्रचलित योगवार्त्तिक के कुछ अंशों को व्यास भाष्य के रूप में लिखा है जो कि इस प्रकार है — “इदमत्रबोध्यम् — ध्यातृध्येयध्यानकलनावत् ध्यानं तद्रहितं समाधिरिति ध्यानसमाध्योर्विभागः। अस्य च समाधिरूपस्याङ्गस्याङ्गिसंप्रज्ञातयोगादयं भेदो यदत्र चिन्तारूपतया निःशेषतो ध्येयस्य स्वरूपं न भासते। अङ्गिनि तु संप्रज्ञाते ज्ञातव्यसाक्षात्कारोदये समाध्यविषया अपि विषया भासन्त इति। तथा च साक्षात्कारयुक्तैकाग्र्याकाले संप्रज्ञातयोगः। अन्यदा ते समाधिमात्रमिति विभागः।” अर्थात् इस विषय में यह जानने योग्य है — ध्याता-ध्येय-ध्यान इन तीनों के भेदपूर्वक ध्यान होता है, उस भेद से रहित समाधि होती है। यह ध्यान और समाधि में अन्तर है। इस समाधि के अङ्ग ध्यान के अङ्गि सम्प्रज्ञात योगादि में भेद है, जब इस ध्यान में चिन्तारूप होने के कारण सम्पूर्णता से ध्येय का स्वरूप भासित नहीं होता। उस ध्यान के अङ्गि सम्प्रज्ञात योग में जानने योग्य विषय = पदार्थ के साक्षात्कार होने पर समाधि के अविषय = अन्य विषय भी इसी प्रकार से जाने जाते हैं। और इस प्रकार साक्षात्कार से युक्त एकाग्रकाल में सम्प्रज्ञात योग कहलाता है। सर्ववृत्ति निरोध काल में तो समाधि मात्र है ऐसा कहा जाता है।”
वस्तुतः समाधि काल में ध्याता, ध्यान और ध्येय में से मात्र ध्येय का ही स्वरूप ज्ञात रहता, और शेष दो अर्थात् ध्याता और ध्यान का स्वरूप होते हुए भी शून्य जैसा हो जाता है, और भासित नहीं होता। महर्षि दयानन्द ने परमात्मा का आलम्बन लेकर अर्थ करते हुए कहा है “जैसे अग्नि के बीच में लोहा भी अग्निरूप हो जाता है, इसी प्रकार परमेश्वर के ज्ञान में प्रकाशमय होके अपने शरीर को भी भूले हुए के समान जानके, आत्मा को परमेश्वर के प्रकाशस्वरूप आनन्द और ज्ञान में परिपूर्ण करने को समाधि कहते हैं।” यहाँ आत्मा का परमात्मा में लय नहीं होता, और न ही आत्मा परमात्मा के समान बन जाता; किन्तु परमात्मा के ज्ञान और आनन्द से परिपूर्ण होकर, अपने आपको भूला हुआ, केवल और केवल मात्र परमात्मा को ही जान रहा होता है। इसी कारण महर्षि पतञ्जलि ने “स्वरूपशून्यमिव” कहा है ना कि “स्वरूपशून्यम्”।
महर्षि पतञ्जलि ने समाधि के होने वाले विभिन्न विषयों और उनसे होने वाली विभूतियों का वर्णन यहाँ विभूतिपाद में किया है। अतः समाधि का विषय केवल परमात्मा नहीं होता। योगी विभिन्न विषयों में आलम्बन करता हुआ, जब जिस काल में उस विषय मात्र को ही जानता, उस विषय का ही साक्षात्कार करता, तब उस काल में, उस की, उस विषय में समाधि होती, और उस समाधि में वह उस विषय को ही जानता है।
धारणा, ध्यान और समाधि को महर्षि पतञ्जलि ने सम्प्रज्ञात योग का अन्तरङ्ग साधन कहा है परन्तु ये तीनों भी निर्बीज समाधि हेतु बहिरङ्ग साधन ही हैं। इससे यह जानना चाहिए कि इन सूत्रों में व्याख्यात धारणा, ध्यान और समाधि में आलम्बन होने वाले पदार्थ एवं विषय, प्रकृति और जीवात्मा सम्बन्धी ही होते हैं और इस प्रकार इन विषयों का आलम्बन करता हुआ साधक सम्प्रज्ञात समाधि को प्राप्त करता है, जो कि क्रमशः वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मितानुगत है। विभूति पाद में व्याख्यात विषयों में संयम से होने वाली समाधि इन चारों में से किसी न किसी श्रेणी में आती है। इन समाधियों से होने वाले लाभों यथा आलम्बन किए गए विषय / पदार्थ का साक्षात्कार, ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि की प्राप्ति का वर्णन समाधि पाद में किया गया है। इसी प्रकार विभिन्न विषयों में धारणा-ध्यान-समाधि रूपी संयम से प्राप्त होने वाली विभूतियों का वर्णन यहाँ विभूति पाद में किया गया है।
एक प्रयोग
वेदादि सत्यशास्त्रों में जीवात्मा के लिए परमात्मा ही एक मात्र परम लक्ष्य कहा गया है। उपनिषदों में भी पुरुष के लिए ब्रह्मज्ञान को ही मुख्य रूप से कहा गया है। महर्षि दयानन्द ने समाधि हेतु मुख्य ध्येय परमात्मा को ही कहा है। हम यहाँ महर्षि दयानन्द द्वारा कथित स्थिति तक पहुँचने हेतु अर्थात् जीवात्मा के लिए समाधि में परमात्मा की अनुभूति / ज्ञान होने की स्थिति तक पहुँचने हेतु, वेद मंत्र के आधार पर एक प्रयोग का वर्णन कर रहे हैं। इस प्रयोग का सम्पादन आरम्भिक साधक के लिए सरल नहीं होगा, परन्तु लगातार अभ्यास से इस स्थिति की प्राप्ति कालान्तर में सम्भव होगी। इस प्रयोग से सिद्ध होने वाली समाधि, सम्प्रज्ञात समाधि नहीं है, किन्तु यह असम्प्रज्ञात समाधि का पूर्वाभास ही है। इसके लिए कुछ मूलभूत तथ्यों को बुद्धि में स्थिर कर लेना आवश्यक है, क्योंकि इनके सम्यक् ज्ञान के बिना प्रयोग सम्भव नहीं हो पायेगा —
१. एतावा॑नस्य महि॒मातो॒ ज्यायाँ॑श्च पूरु॑षः।
पादो॑ऽस्य॒ विश्वा॑ भू॒तानि॑ त्रि॒पाद॑स्या॒मृतं॑ दि॒वि॥ यजु॰ ३१.३॥
हे मनुष्यों ! इस जगदीश्वर का यह दृश्य-अदृश्य ब्रह्माण्ड महत्त्वसूचक है। इस ब्रह्माण्ड से यह परिपूर्ण परमात्मा अति प्रशंसित और बड़ा है और इस ईश्वर के सब पृथिव्यादि चराचर जगत् एक अंश में हैं और इस जगत्सृष्टा का तीन अंश नाशरहित महिमा द्योतनात्मक अपने स्वरूप में है।
भावार्थ — यह सब सूर्य चन्द्रादिक लोकलोकान्तर चराचर जितना जगत् है वह सब चित्र-विचित्र रचना के अनुमान से परमेश्वर के महत्त्व को सिद्ध कर उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय रूप से तीनों कालों में घटने-बढ़ने से भी परमेश्वर के चतुर्थांश में ही रहता, किन्तु ईश्वर के चौथे अंश की भी अवधि को नहीं पाता। और इस ईश्वर के सामर्थ्य के तीन अंश अपने अविनाशी मोक्षस्वरूप में सदैव रहते हैं। इस कथन से उस ईश्वर का अनन्तपन नहीं बिगड़ता किन्तु जगत् की अपेक्षा उसका महत्त्व और जगत् का न्यूनत्व जाना जाता है। (महर्षि दयानन्द सरस्वती — वेदभाष्य)
अर्थात् यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड — प्रकृति और उसके सभी विकार तथा समस्त जैवी सृष्टि परमात्मा के एक अंश में ही विद्यमान है, वस्तुतः तो यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड परमात्मा के उस एक अंश की अवधि को भी प्राप्त नहीं करता, बल्कि यह ब्रह्माण्ड गति करता हुआ भी परमात्मा के अंश तक ही सीमित रहता है; और ईश्वर के अन्य तीन अंशों में प्रकृति अथवा उसके विकारों का कोई भी रूप, किसी भी प्रकार से, उपस्थित नहीं रहता। वहाँ केवल और केवल मात्र परमात्मा ही है।
२. जीवात्मा का स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों से सम्बन्ध, बन्धन और सृष्टि काल में ही रहता, ये सभी शरीर प्रकृति और उसके विकारों से बनते और सम्यक् पुरुषार्थ से छूट भी जाते हैं।
३. इस दृश्य जगत् की विशालता का अनुमान कर लेना चाहिए। यह भी जानना चाहिए कि अनन्त प्रतीत होने वाला यह ब्रह्माण्ड अन्त वाला ही है; और उसके आगे प्रकृति तथा उसके विकार उपलब्ध नहीं होते।
यह दृश्य ब्रह्माण्ड असंख्य आकाशगंगाओं का समुदाय है। प्रत्येक आकाशगंगा में असंख्य तारे = सूर्य और उन सूर्यों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में सौरमण्डल हैं, जोकि कई ग्रहों का समुदाय होता है; जैसा कि हमारा सौरमण्डल हैं और उसमें पृथिवी, बुध, मंगल, शुक्र, बृहस्पति, शनि आदि ग्रह हैं। इसी सौर मण्डल के एक ग्रह = पृथिवी पर हमारा = जीवात्मा का निवास इस स्थूल शरीर के साथ है। प्रकाश की गति के अनुसार इन आकाशगंगाओं के विस्तार का अनुमान चित्तगत कर लेना चाहिए। इस विषय में हमारी website www.vedyog.net पर ब्रह्माण्ड के विस्तार को दर्शाने वाले कुछ vedio दिये गये हैं। उनको देखने से ऐसा ज्ञान शीघ्रता से चित्तगत हो जाता है।
४. साधक को चाहिए कि वेदादि सत्यशास्त्रों के आधार पर “परमात्मा का साक्षात्कार कैसा होता है?” इस विषय को सम्यक् रूप से जान ले। अन्यथा उस स्थिति में पहुँच कर भी कोई लाभ नहीं ले पायेगा। (इस विषय में हमारी पुस्तक “परमात्म-साक्षात्कार कैसा ?” (हमारी website www.vedyog.net पर निःशुल्क उपलब्ध) सहायक सिद्ध होगी)
५. “मोक्ष में भौतिक शरीर वा इन्द्रियों के गोलक जीवात्मा के साथ नहीं रहते किन्तु अपने स्वाभाविक शुद्ध गुण रहते हैं। ........ और संकल्पमात्र शरीर होता है, जैसे शरीर के आधार रह कर इन्द्रियों के गोलक के द्वारा जीव स्वकार्य करता है, वैसे अपनी शक्ति से मुक्ति में सब आनन्द भोग लेता है। (प्रश्न) उसकी शक्ति कै प्रकार की और कितनी है ? (उत्तर) मुख्य एक शक्ति है परन्तु बल, पराक्रम, आकर्षण, प्रेरणा, गति, भीषण, विवेचन, क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा, प्रेम, द्वेष, संयोग, विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, स्वादन और गन्धग्रहण तथा ज्ञान इन २४ चौबीस प्रकार के सामर्थ्ययुक्त जीव है। इससे मुक्ति में भी आनन्द की प्राप्ति भोग करता है।” (स० प्र० नवम समु॰)
इस प्रयोग में भी जीवात्मा स्थूल शरीर को छोड़ने के बाद अपने संकल्पमात्र शरीर के साथ अपनी स्वाभाविक शक्ति — गति के सामर्थ्य से गति करेगा। चाहे बन्धन काल में इस प्रकार का सामर्थ्य जीवात्मा को प्राप्त नहीं हो सकता परन्तु इस प्रयोग हेतु इस सामर्थ्य का उपयोग विशिष्ट समाधिगत स्थिति में करने में कोई हानि नहीं है। तथा सूक्ष्म और कारण शरीरों की उपस्थिति भी इस प्रयोग में विशेष बाधक नहीं है। अथवा जीवात्मा स्थूल शरीर के समान सूक्ष्म और कारण शरीरों को नष्ट कर प्रयोग को आगे बढ़ा सकता है।
प्रयोग — (कोष्ठक में दिए गए वाक्यों को वस्तुस्थिति की जानकारी एवं दिशानिर्देश जानना चाहिए)
साधक किसी एकान्त स्थान पर (ऐसे स्थान को प्राथमिकता देनी चाहिए जहाँ प्रकाश, तेज वायु, शब्द तथा गन्ध आदि की अनुभूति / उपस्थिति न हो, क्योंकि ये सभी प्रयोग में आगे चलकर प्रबल बाधक बनते हैं) अपने सुविधाजनक आसन पर बैठ जाए। सर्वप्रथम चित्त की वृत्तियों को बाह्य विषयों से हटाकर अपने में अर्थात् आत्मा में स्थित करे। यह विचार करे कि आगे होने वाली क्रियाओं को करने वाला मैं अर्थात् आत्मा हूँ और उन क्रियाओं को मैं स्वयं ज्ञानपूर्वक और अधिकारपूर्वक कर रहा हूँ तथा आगे भी करूँगा। साधक यह कल्पना करे कि मेरा इस स्थूल शरीर से सम्बन्ध विच्छेद हो गया है अर्थात् सांसारिक दृष्टि से मृत्यु हो गई है। वह यह भी देखें कि इस शव को श्मशान में ले जाकर सम्बन्धियों ने, इसका अग्नि संस्कार भी कर दिया है। स्थूल शरीर के समाप्त होने के पश्चात् इस शरीर के कारण बने सम्बन्धी, स्वजन, मित्र, धन, सम्पत्ति आदि से कोई सम्बन्ध शेष नहीं रहा। इस समय सूक्ष्म और कारण शरीर तो साथ हैं, परन्तु आगे की क्रियाओं में ये दोनों शरीर बाधक नहीं बनते। (आरम्भ में साधक के लिए स्थूल शरीर के समान सूक्ष्म और कारण शरीरों को नष्ट करना सम्भव नहीं होता। मगर दीर्घकालीन अभ्यास के बाद यह क्रिया भी धीरे-धीरे सम्भव होने लगती है। इस समय आत्मा अपने को संकल्पमात्र शरीर से युक्त जाने।)
मैं अर्थात् आत्मा, अपने स्वाभाविक सामर्थ्य रूप गति के आश्रय से, अब अति तीव्र गति (मन की गति) से ब्रह्माण्ड में गति कर रहा हूँ। मैं अब उस स्थान की ओर जा रहा हूँ जहाँ इस ब्रह्माण्ड का अन्त है। इस सौरमण्डल से निकलता हुआ, अन्य तारों को पीछे छोड़ता हुआ, द्यौलोक को पार करता हुआ इस आकाशगंगा से भी बाहर निकल गया हूँ। इस मार्ग में एक-एक कर के कई आकाशगंगाएँ आ रही हैं और मैं उन सभी को पार करता जा रहा हूँ। (साधक को आकाशगंगाओं की संख्या में भटकना नहीं चाहिए बल्कि यह जानना चाहिए कि बहुत सी आकाशगंगाओं को पार कर रहा हूँ। चिन्तन करते हुए इन आकाशगंगाओं को पार करने में अधिक समय नहीं लगाना चाहिए। इन आकाशगंगाओं के मध्य से निकलता हुआ आत्मा, रूप = प्रकाश, तेजोमय लोकों, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को जान रहा होता है। परन्तु इस मार्ग में उपस्थित होने वाले किसी मनोरम दृश्य से आकृष्ट होकर वहाँ रुकना नहीं चाहिए, क्योंकि यह इस प्रयोग का लक्ष्य नहीं है। इस मार्ग में कहीं भी भटकने या रुकने वाला साधक ईश्वर प्राप्ति को नहीं कर पायेगा।)
अब ब्रह्माण्ड का अन्त आ गया है। आत्मा उसी तीव्र गति से ब्रह्माण्ड के अन्त को भी पार कर गया है; और जैसे गोताखोर ऊपर से कूद कर सागर की गहराई में डूब जाता है, उसी प्रकार मैं भी प्रकृति जन्य इस ब्रह्माण्ड से निकल कर, इस ब्रह्माण्ड से आगे उपस्थित केवल और केवल मात्र परमात्मा में डूब गया हूँ। (यहाँ न रूप है; न प्रकाश है; न शब्द है; न गन्ध है; न रस है; न स्पर्श है। न यहाँ प्रकृति = सत्त्व, रज और तम गुण अथवा इनका कोई भी विकार है।) यहाँ केवल और केवल मात्र परमात्मा है, अनन्त तक उपस्थित परमात्मा। जो कुछ है वह परमात्मा और केवल परमात्मा, और परमात्मा के मध्य मैं हूँ। इससे अन्य कोई अनुभूति नहीं। मैं इस समय परमात्मा में ही हूँ; परमात्मा से ही सर्वतः सर्वथा व्याप्त = आच्छादित हूँ। परमात्मा ही मेरे भीतर तथा बाहर सभी ओर है। (यहाँ अब कोई गति नहीं है, किन्तु परमात्मा के स्वरूप में डूबना मात्र है। जैसे अन्तरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण के अभाव में कोई गिरता नहीं है, किन्तु अनन्त आकाश में विचरण करता है; अथवा जैसे कोई पक्षी अनन्त आकाश में स्वच्छन्दता से आरामपूर्वक विचरण करता है, वैसे ही मात्र परमात्मा में आत्मा स्वच्छन्द होकर उसी में विचरण करता हुआ उसी की अनुभूति को करता है।) मैं परमात्मा के ज्ञान और आनन्द से परिपूर्ण हो रहा हूँ। ज्ञान स्वरूप, आनन्दस्वरूप परमात्मा में मग्न मैं तृप्त हो रहा हूँ। (यहाँ इस अवस्था में साधक जब प्राप्त हो रहे आनन्द या ज्ञान की कोई तुलना; अथवा प्रकृति के गुणों का चिन्तन; अथवा आत्मा के साथ सूक्ष्म शरीर के अङ्गों चित्त, इन्द्रिय आदि की उपस्थिति का बोध; अथवा अन्य किसी प्रकार से संसार सम्बन्धी चिन्तन को किसी भी प्रकार से करता है; अथवा जिस स्थान में वह बैठा है वहाँ की तीव्र वायु, बाहरी शब्द, स्पर्श अथवा किसी सुगन्ध या दुर्गन्ध आदि के कारण व्यवधान होता है; तो यह स्थिति समाप्त हो जाती है तथा साधक फिर से लौकिक स्थिति में आ जाता है। आरम्भ में इस स्थिति को बनाना बहुत ही परिश्रम साध्य है। परन्तु सम्यक् अभ्यास से यह स्थिति कुछ छणों के लिए बनती है, और दीर्घकालीन अनवरत अभ्यास से इस स्थिति के काल को थोड़ा-थोड़ा बढ़ाया जा सकता है। इस अवस्था में आत्मा को परमात्मा के बोध के साथ अपनी उपस्थिति का ज्ञान भी बना रहना, ध्यान कहलाता है और जब आत्मा स्वयं को भी भूलकर परमात्मा के स्वरूप को ही बोध कर रहा होता है, तो यह समाधि कहलाती है।)
महर्षि दयानन्द लिखते हैं कि —“जैसे जल में डुबकी मार के थोड़ा समय भीतर ही रुका रहता है, वैसे ही जीवात्मा परमेश्वर के बीच में मग्न हो के फिर बाहर को आ जाता है।” यही स्थिति उक्त प्रयोग में समझनी चाहिए। आत्मा जितने काल = छणों तक प्रकृति और उसके विकारों का चिन्तन न करके मात्र परमात्मा के स्वरूप का ही बोध करता है, उतने काल तक वह परमात्मा के ज्ञान और आनन्द में मग्न रहता है। इस स्थिति में बार-बार जाने हेतु अनवरत अभ्यास की आवश्यकता होती है।