In Hindi:
पदपाठ : मैत्र्यादिषु बलानि॥
हिंदी में अर्थ : (मैत्र्यादिषु) मैत्री आदि चित्त की वृत्तियों में संयम करने से (बलानि) मैत्री आदि बलों की प्राप्ति होती है॥
व्यास भाष्य : मैत्रीकरुणामुदितेति तिस्रो भावनाः। तत्र भूतेषु सुखितेषु मैत्रीं भावयित्वा मैत्रीबलं लभते। दुःखितेषु करुणां भावयित्वा करुणाबलं लभते। पुण्यशीलेषु मुदितां भावयित्वा मुदिताबलं लभते। भावनातः समाधिर्यः स संयमः। ततो बलान्यवन्ध्यवीर्याणि जायन्ते। पापशीलेषूपेक्षा न तु भावना। ततश्च तस्यां नास्ति समाधिरित्यतो न बलमुपेक्षातः तत्र संयमाभावादिति॥
हिंदी में अर्थ : (मैत्रीकरुणामुदिता इति) मैत्री, करुणा और मुदिता ये (तिस्रः भावनाः) तीन भावनाएँ हैं। (तत्र) उनमें से (सुखितेषु भूतेषु) सुखी प्राणियों में (मैत्रीम्) मैत्री की (भावयित्वा) भावना करके योगी (मैत्रीबलम् लभते) मैत्री बल को प्राप्त करता है। (दुःखितेषु) दुःखी प्राणियों के प्रति (करुणाम्) करुणा की (भावयित्वा) भावना करके (करुणाबलम् लभते) करुणा बल को प्राप्त करता है। और (पुण्यशीलेषु) पुण्य करने वाले प्राणियों में (मुदिताम्) मुदिता की (भावयित्वा) भावना करके (मुदिताबलम् लभते) मुदिता बल को प्राप्त करता है। (भावनातः) भावना करने से (यः) जो (समाधिः) समाधि होती है, (सः) वह (संयमः) संयम है। (ततः) उस समाधिजन्य संयम से (अवन्ध्यवीर्याणि) अमोघ शक्ति वाले (बलानि) मैत्री आदि बल (जायन्ते) उत्पन्न होते हैं।
(पापशीलेषु) पाप = अपुण्य करने वाले प्राणियों में जो (उपेक्षा) उपेक्षा की जाती है, वह (तु) तो (न भावना) भावना नहीं है। (ततः च) और इस कारण से (तस्याम्) उस उपेक्षा में (समाधिः) समाधि (न अस्ति इति) नही होती; (अतः) इसलिए, (तत्र) उस उपेक्षा में (संयमाभावात्) संयम का अभाव होने से, (उपेक्षातः) उपेक्षा से (बलम् न इति) सिद्धि रूप बल की प्राप्ति नहीं होती॥
वैदिक योग मीमांसा : योगसूत्र १.३३ में चित्त के परिकर्मों = मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा का परिपालन करने से चित्त की निमर्लता = एकाग्रता, प्रसादता प्राप्ति का कथन है। सुखी प्राणियों में मैत्री की भावना, दुःखी प्राणियों में करुणा की भावना तथा पुण्यशील प्राणियों के प्रति मुदिता की भावना में संयम अर्थात् धारणा-ध्यान-समाधि करने से, योगी उस-उस भावना से वह-वह बल प्राप्त करता है।
महर्षि व्यास कहते हैं कि भावना करने से जो समाधि होती है वह मैत्री आदि का संयम है। इनमें समाधि की स्थिति अर्थात् मैत्री-करुणा-मुदिता भावनाओं का सम्यक् विचार करता हुआ, उस मैत्री-करुणा-मुदिता के सभी प्रकार के विरोधी विचारों = भावनाओं, यथा राग-द्वेष-ईर्ष्या-असूया-अमर्ष आदि का सर्वथा परित्याग करता हुआ, उन-उन प्राणियों के प्रति मैत्री आदि का व्यवहार करता हुआ, योगी मैत्री-करुणा-मुदिता के यथेष्ठ और अमोघ बलों को प्राप्त करता है।
इन परिकर्मों के परिपालन का सम्बन्ध, योगी के स्वयं के साथ ही मुख्य रूप से है। अर्थात् वह स्वयं मैत्री, करुणा और मुदिता का सर्वभावेन, सर्वरूपेण पालन करता है। यह परिपालन भी दूसरे मनुष्यों से अपने प्रति वैसी भावनाओं की अपेक्षा के बिना ही होता है। अर्थात् वह मैत्री, करुणा और मुदिता का परिपालन करते हुए यह नहीं सोचता कि मैं जो दूसरों के प्रति मैत्री आदि की भावना रखता हुआ और वैसा ही व्यवहार करता हूँ, वैसे ही दूसरे मनुष्य भी मेरे प्रति मैत्री आदि का व्यवहार करेंगे; अथवा जो-जो मेरे प्रति वैसी भावना रखेगा, उस-उस के प्रति मैं मैत्री आदि का व्यवहार करूँगा, अन्यों के साथ नहीं।
महर्षि व्यास ने उपेक्षा रूप वृत्ति को भावना रूप में स्वीकार न करते हुए, न तो उसमें संयम और न ही उपेक्षा बल की प्राप्ति को कहा है। अतः भोज द्वारा उपेक्षा भावना और संयम से उपेक्षा बल का कथन आर्ष मान्यताओं के प्रतिकूल होने से त्याज्य ही जानना चाहिए। इस प्रकार उपेक्षा बल का कथन न होने से जो-जो अपुण्य कर्म करने वाले मनुष्य, किसी भी निमित्त से अपने कर्मों के पाप रूप को जानकर उनसे निवृत्त हो जाते हैं अथवा उन पाप कर्मों से दूर होने में प्रयत्न शील हो जाते हैं, तो ऐसे प्राणियों के प्रति करुणा, मुदिता रूपी भावना करके उनके सुधार का सम्यक् प्रयत्न करना चाहिए।
इस प्रकार उपरोक्त मैत्री, करुणा, मुदिता रूप बलों को प्राप्त करके, योगी न केवल दूसरे प्राणियों का कल्याण करने वाला होता है, बल्कि स्वयं के चित्त की एकाग्रता = निर्मलता को भी उत्कृष्ट बनाने में समर्थ होता है॥