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Vibhuti Paada / Attainments / 24
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Vibhuti Paada / Attainments / 24

बलेषु हस्तिबलादीनि॥२४॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 24

In Hindi:

पदपाठ : बलेषु हस्तिबलादीनि॥

हिंदी में अर्थ : (बलेषु) हस्ति = हाथी आदि के बलों में संयम करने से योगी (हस्तिबलादीनि) हाथी आदि के बल को प्राप्त कर लेता है॥

व्यास भाष्य : हस्तिबले संयमाद्धस्तिबलो भवति। वैनतेयबले संयमाद्वैनतेयबलो भवति। वायुबले संयमाद्वायुबलो भवतीत्येवमादिः॥

हिंदी में अर्थ : (हस्तिबले) हाथी के बल विषयक (संयमात्) संयम करने से योगी (हस्तिबलः) हाथी के समान बल वाला (भवति) हो जाता है। (वैनतेयबले) गरुड़ के बल विषयक (संयमात्) संयम करने से (वैनतेयबलः) गरुड़ के समान बल वाला (भवति) हो जाता है। (वायुबले) वायु के बल विषयक (संयमात्) संयम करने से (वायुबलः) वायु के बल वाला (भवति) हो जाता है। (इति एवम् आदिः) इस प्रकार अन्य बलों के विषय में भी जानना चाहिए॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी पुरुष हाथी आदि के बल विषय में संयम करता हुआ, उन बलों के स्वरूप को साक्षात् करता हुआ, उन बलों की प्राप्ति के साधनों को जानकर तथा उन्हें जीवन में अपनाकर हाथी आदि के बलों को प्राप्त कर सकता है। महर्षि व्यास ने सूत्र के भाष्य में हाथी, गरुड़ और वायु के बलों में संयम से उन-उन बलों की प्राप्ति को कहा है। परन्तु मात्र बौद्धिक स्तर पर बल के स्वरूप को साक्षात् करने से योगी के शरीर में बल की प्राप्ति को नहीं कहा जा सकता। इसके लिए ब्रह्मचर्य रूपी अमोघ साधन का परिपालन, अन्य बल प्राप्ति के अन्य साधनों के साथ सतत पालन करना पड़ता है, तभी ऐसा सम्भव हो सकता है।

शंका — हस्ति, गरुड़ आदि के समान बलों की प्राप्ति मनुष्य शरीर में सम्भव प्रतीत नहीं होती। बलशाली हाथी आदि के शरीरों का जो सामर्थ्य है, वह मनुष्य के छोटे से शरीर में कैसे सम्भव मान जाए? इसी प्रकार वायु का वेग अपरिमित है, उस जैसे वेग का सामर्थ्य मनुष्य के छोटे से शरीर में नहीं माना जा सकता।

समाधान — देखो, मनुष्य के शरीर में जो बल प्राप्ति होती है, वह मनुष्य के शरीर की सीमाओं के भीतर ही होती है। मनुष्यों में यथेष्ठ बल प्राप्ति को करने का उपदेश परमात्मा ने वेद में दिया है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ऋग्वेद ५.५२.५ के भावार्थ में लिखते हैं — “मनुष्या यावद् बलं वर्द्धितुमिच्छेयुस्तावदेव वर्द्धितुं शक्यम्” अर्थात् मनुष्य जितना बल बढ़ाने की इच्छा करे उतना ही बढ़ सकता है। इसी प्रकार ऋग्वेद ५.५३.११ के भावार्थ में लिखते हैं — “यदि मनुष्याः पूर्णं बलं कुर्युस्तर्हि बहून्बलिष्ठानप्युत्क्रामयेयुः।” अर्थात् जो मनुष्य पूर्ण बल को करे तो बहुत बलिष्ठों का भी उत्क्रमण करे।

इसी प्रकार अथर्ववेद के ३.२२ सूक्त में विभिन्न प्रकार के बलों की प्राप्ति को कहा है। इस सूक्त के दूसरे मंत्र को छोड़कर सभी पाँचों मंत्रों में हस्तिबल का वर्णन आया है। इस सूक्त का अर्थ करते हुए स्वामी ब्रह्ममुनि जी लिखते हैं —

— हाथी का तेजोबल मेरे शरीर में फैले - प्रवेश करे, ............॥१॥

— सूर्य, जल, वायु और अग्नि मेरे अन्दर वर्च-तेजोबल को बढ़ावे, विश्व को धारण करने वाले देव भी, मुझे तेजबल से चमकावें॥२॥

— हाथी जिस तेजोबल से सम्पन्न होता है ......... उस तेजोबल से, हे परमात्मन् ! मुझे आज वर्चस्वी, तेजस्वी कर॥३॥

— सूर्य का जितना तेजोबल है, और आसुर हाथी का प्राणों में उन्मत्त प्राण शक्ति सम्पन्न रमण करने वाले में, प्रबल हाथी का तेजोबल मेरे में, आकाश को मेघ से सर्जन करने वाले विद्युत और वायु, उतना तेजोबल धारण करावें॥४॥

— जितना चारों प्रमुख दिशाएँ तेजोबल रखती है, जितना तेजोबल आँख सम्यक् प्राप्त प्रभावकारी दूरतक लिए हुए है, उतना हाथी का तेजोबल उतना मेरे में इन्द्रिय अर्थात् आत्मा लिङ्ग अङ्ग बन प्राप्त हो॥५॥

— सुख से बैठने-रहने वाले वन्य पशुओं में, हाथी अत्यन्त स्थित बलवान् हुआ है। उसके भजनीय तेजोबल से, अपने को मैं अभिषिक्त करता हूँ॥६॥

उपरोक्त सूक्त के छओं मंत्रों के अर्थों से स्पष्ट है कि मनुष्य ऐसे बलों को प्राप्त कर सकता है। और उसकी प्राप्ति के साधन को महर्षि पतञ्जलि ने इस सूत्र में स्पष्ट करते हुए कहा है कि इन बलों में संयम करने से इन बलों की प्राप्ति होती है।

भोज ने इस सूत्र के भाष्य में “यस्मिन् हस्तिबले वायुवेगे सिंहवीर्य्ये वा तन्मयीभावेन अयं संयमं करोति तत्तत्सामर्थ्ययुक्तं सत्त्वमस्य प्रादुर्भवति” कहा है। यहाँ सत्त्व का तात्पर्य शारीरिक बल लेना सम्भव न होने से चित्त बल लेना ही अधिक युक्त है, क्योंकि योगदर्शन में सत्त्व का अर्थ चित्त ही लिया जाता है, शरीर नहीं। इससे यह धारणा अधिक युक्तियुक्त प्रतीत होती है कि हस्ति, वायु आदि के बलों में संयम, जो कि चित्त के माध्यम से ही होता है, से प्राप्त होने वाले उपरोक्त बल चित्तगत भी माने जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक भाष्यकारों ने हाथी, गरुड़ आदि बल की प्राप्ति के कथनों को देखकर, बलों में चित्तगत संयम से ही, उन बलों को स्वाभाविक रूप से शरीरगत ही मान कर वैसा ही व्याख्यान कर दिया है।

हाँ! यह मानना उचित है कि शरीर की सीमाओं के अन्दर विभिन्न प्रकार के बलों की प्राप्ति, उन बल प्राप्ति के उपायों को शरीर द्वारा अपनाने से, सम्भव है; और लोक में, ऐसा ही देखा भी जाता है। इसी प्रकार वायु बल से शरीर में प्राणबल की वृद्धि को जानना चाहिए, क्योंकि इस शरीर में प्राप्त वायुबल से पृथिवी पर वायु के प्रभाव से होने वाले कार्यों का सम्पादन सम्भव ही नहीं है। इसी प्रकार मात्र चित्तगत संयम से प्राप्त होने वाले बलों को चित्तगत ही माना जाना चाहिए। देखों महर्षि दयानन्द की जीवनी में ऐसे प्रमाण मिलते हैं, जिसमें उन्होंने ब्रह्मचर्य के अखण्ड पालन से तथा योग की शक्ति से शारीरिक और चित्त बल प्राप्त किए। उन्होंने अपने अतुल्य शरीर बल से ऐसे-ऐसे कार्य किए जो अच्छे-अच्छे बलवानों के लिए भी सम्भव न थे, कई स्थलों पर तो उन्होंने मात्र अपने चित्त बल से ही अपने बलवान् घातकों तक को बल-तेज हीन कर दिया और कई स्थलों पर शारीरिक बल को भी दिखाया।