In Hindi:
पदपाठ : प्रवृत्ति आलोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्॥
हिंदी में अर्थ : योगी को (प्रवृत्ति-आलोक न्यासात्) मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक = प्रकाश के सम्बन्ध से (सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्) चित्तगत वृत्तियों और विषयों का सूक्ष्म, व्यवहित = परोक्ष तथा विप्रकृष्ट = विस्तारित ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : ज्योतिष्मती प्रवृत्तिरुक्ता मनसः। तस्यां य आलोकस्तं योगी सूक्ष्मे वा व्यवहिते वा विप्रकृष्टे वार्थे विन्यस्य तमर्थमधिगच्छति॥
हिंदी में अर्थ : (मनसः ज्योतिष्मती प्रवृत्तिः उक्ता) मन की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति योगसूत्र १.३६ में कही गई है। (तस्याम्) उस प्रवृत्ति का (यः) जो (आलोकः) आलोक = प्रकाश है, (तम्) उसको (योगी) योगी (सूक्ष्मे वा) सूक्ष्म, (व्यवहिते वा) व्यवहित = परोक्ष, (विप्रकृष्टे वा) विप्रकृष्ट = विस्तारित (अर्थे) वृत्ति अथवा विषय में (विन्यस्य) डालकर, उससे सम्बद्ध करके (तम् अर्थम्) उस अर्थ = विषय / वृत्ति को (अधिगच्छति) जान लेता है॥
वैदिक योग मीमांसा : (इस सूत्र के रहस्य को समझने हेतु योगसूत्र १.३६, जहाँ विशोका = ज्योतिष्मती प्रवृत्ति का वर्णन है, की व्याख्या को एक बार पुनः पढ़ लें)
महर्षि पतञ्जलि तथा भाष्यकार महर्षि व्यास के अनुसार, चित्त की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक का न्यास = सम्बन्ध करने से योगी को विषयों का, सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट ज्ञान प्राप्त होता है।
चित्त की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति को योगसूत्र १.३६ में स्पष्ट किया गया है। इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास ने विशोका प्रवृत्ति को दो प्रकार की कहा है — १. विषयवती, और २. अस्मितामात्र, जो कि ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के नाम से कही जाती है। इस अस्मितामात्र प्रवृत्ति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि “तथाऽस्मितायां समापन्नं चित्तं निस्तरङ्गमहोदधिकल्पं शान्तमनन्तमस्मितामात्रं भवति।” अर्थात् “उसी प्रकार अस्मिता = अपने आत्मस्वरूप में समाहित हुआ चित्त निस्तरङ्ग, शान्त, महान् = विशाल, और आत्मस्वरूपाकार = केवल आत्मानुभूति करने वाला होता है।” इस सूत्र की व्याख्या में हमने स्पष्ट किया है कि यह स्थिति अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अथवा उसके समकक्ष है। इस विशोका = ज्योतिष्मती प्रवृत्ति से प्राप्त होने वाली सिद्धि को महर्षि व्यास ने योगसूत्र ३.४९ की व्याख्या में निम्न प्रकार से कहा है —
“सर्वज्ञातृत्वं सर्वात्मनां गुणानां शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मत्वेन व्यवस्थितानामक्रमोपारूढं विवेकजं ज्ञानमित्यर्थ इति। एषा विशोका नाम सिद्धिः”
अर्थात् “ योगी सर्वज्ञातृत्व को प्राप्त करता है अर्थात् शान्त = भूत, उदित = वर्त्तमान, और व्यपदेश्य = भविष्यत् धर्मों के रूप में स्थित सभी रूपों वाले सत्त्वादि गुणों का बिना किसी क्रम के विवेकज ज्ञान हाेता है, यह विशोका नामक सिद्धि है।”
महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास ने ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक के न्यास से सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट अर्थ का ज्ञान होना कहा है। यहाँ व्यासभाष्य में कथित “अर्थ” शब्द का अभिप्राय बहुधा भाष्यकारों ने धन, भौतिक पदार्थ आदि को लिया है। उनके अनुसार इस ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक के सम्बन्ध से योगी सूक्ष्म = परमाणु आदि का, व्यवहित = छिपे हुए, व्यवधान युक्त धनों / पदार्थों यथा भूमि में दबे हुए धन = खनिज आदि का तथा विप्रकृष्ट = दूर स्थित यथा मेरु पर्वत से परे विद्यमान रसायन आदि का भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है। कुछ भाष्यकारों ने पदार्थों के साथ-साथ मनुष्यादि का भी ग्रहण किया है कि योगी दूरस्थ मनुष्यादि की स्थिति को भी जान / देख अथवा सुन लेता है। विभिन्न भाष्यकारों द्वारा व्यासभाष्य का इसप्रकार का अर्थ भोजवृत्ति के आधार पर ही किया गया है।
परन्तु ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के, उपर्युक्त प्रकार से, वास्तविक रहस्य को जानने और समझने के बाद, भाष्यकारों द्वारा किया गया यह अर्थ, महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास की भावना के प्रतिकूल ही समझना चाहिए। इस प्रकार के अर्थ से ऐसा लगता है कि योगपथ पर अग्रसर साधक विशोका-प्रवृत्ति के आधार पर, अमृत को पाकर भी, साधारण रसों की प्राप्ति में ही संलग्न है।
आइए, इस सिद्धि के मूल रहस्य को समझने का प्रयास करें। सूत्र में प्रयुक्त “सूक्ष्म”, “व्यवहित”, “विप्रकृष्ट”, “अर्थ” — इन शब्दों के कोषकारों ने निम्न अर्थ किए हैं —
“अर्थ” — अर्यते प्राप्यतेऽसौ अर्थः शब्दानां वाच्यो धनं कारणं वस्तु प्रयोजनं निवृत्तिर्विषयो वा। (उणादिकोष २.४ — महर्षि दयानन्द सरस्वती।)
यहाँ अर्थ से धन, कारण, वस्तु = पदार्थ, प्रयोजन, निवृत्ति और विषय का ग्रहण होता है।
— “अर्थ” को उणादिकोष के अन्य प्राचीन वृत्तिकारों ने ‘धनं वाङ्मयं वा, वृत्तिर्वा’ अर्थात धन और वृत्ति को कहा है।
व्यवहित — व्यवधान युक्त; दृष्टि से ओझल = गुप्त = परोक्ष;
(संस्कृत-हिन्दी कोष — आप्टे)
विप्रकृष्ट — दूरस्थ; सुदीर्घ, विस्तारित; (संस्कृत-हिन्दी कोष — आप्टे)
अब उपर्युक्त प्रकार की ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के सन्दर्भ में सूक्ष्म, व्यवहित और विप्रकृष्ट अर्थ का ज्ञान निम्न प्रकार से जानना चाहिए। ‘सूक्ष्म’ का अभिप्राय सूक्ष्म विषयों से ही है। ‘व्यवहित’ से परोक्ष अर्थात् किसी भी विषय का “अप्रत्यक्ष ज्ञान” का ग्रहण करना चाहिए। ‘विप्रकृष्ट’ से उस विषय का “विस्तारित एवं सुदीर्घ ज्ञान” ग्रहण करना चाहिए। और ‘अर्थ’ से “विषय या वृत्ति” का ग्रहण करना चाहिए। अर्थ शब्द से कोषकारों द्वारा धन का ग्रहण देखकर ही भाष्यकारों ने धन आदि पदार्थों का ग्रहण किया है। सम्भवतः इसी कारण भोज ने भी अर्थ शब्द से धन का ग्रहण कर, सूत्र की वैसी ही व्याख्या कर दी है; और बाद के भाष्यकारों उसका अन्धानुकरण मात्र ही किया है। परन्तु ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के वास्तविक अभिप्राय को समझने के बाद, ऐसा कोई भी व्याख्यान हेय कोटि में ही जानना चाहिए।
ज्योतिष्मती प्रवृत्ति = अस्मितामात्र प्रवृत्ति की अवस्था में, जब चित्त निस्तरङ्ग, शान्त तथा आत्मस्वरूप को ही जान रहा होता है, तब उस समय योगी को चित्तस्थ वृत्तियों का सूक्ष्म ज्ञान; व्यवहित ज्ञान अर्थात् जो वृत्तियाँ प्रत्यक्ष नहीं हैं, परोक्ष हैं उनका भी ज्ञान; विप्रकृष्ट ज्ञान अर्थात् वृत्तियों का विस्तारित ज्ञान = अर्थात् वृत्तियों का, उनके निमित्त आदि सहित ज्ञान हो जाता है। इसी प्रकार सत्त्वादि गुणों के सम्बन्ध में भी जानना चाहिए। अर्थात् योगी सत्त्वादि गुणों के विभिन्न रूप = विकार जो कि भूत, वर्त्तमान और भविष्यत कालीन अवस्थाओं के रूप में स्थित होते हैं, उन सभी का सूक्ष्म ज्ञान, परोक्ष अवस्थाओं का ज्ञान और विस्तारित = सभी प्रकार का सम्बद्ध ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
शंका — आपके द्वारा किया गया उपरोक्त व्याख्यान प्रचलित भाष्यों से सर्वथा पृथक् है। यह भोजवृत्ति की मूल भावना से भी विपरीत है। इस विषय में महर्षि व्यास ने भी योगसूत्र १.४९ के भाष्य में स्पष्ट रूप से कहा है ‘न चास्य सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टस्य वस्तुनो लोकप्रत्यक्षेण ग्रहणसस्ति’ अर्थात् इस सूक्ष्म, व्यवधान वाली और दूरस्थ-वस्तु का लौकिक बाह्यइन्द्रिय साध्य प्रत्यक्ष प्रमाण से ग्रहण नहीं होता’ कहा है। यहाँ भी सूक्ष्म, व्यवधान युक्त और दूरस्थ वस्तुओं का ग्रहण किया गया है। तथा इसी प्रकार योगसूत्र २.४५ के भाष्य में महर्षि व्यास ने देहान्तर, कालान्तर और देशान्तर में होने वाले सभी अभीष्ट पदार्थों के ज्ञान को कहा है। इन सन्दर्भों में इस सूत्र का उपर्युक्त प्रकार का व्याख्यान उचित प्रतीत नहीं होता ?
समाधान — इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के आलोक के सम्बन्ध से होने वाली सिद्धि को कह रहे हैं। सूत्र की व्याख्या में हमने ज्योतिष्मती प्रवृत्ति का रहस्य, योगसूत्र १.३६ के अनुसार स्पष्ट किया है। इसी प्रकार ज्योतिष्मती प्रवृत्ति जो विशोका भी कही जाती है, और उससे होने वाली उपलब्धि का, योगसूत्र ३.४९ के व्यासभाष्य के आधार पर भी, वर्णन किया है। उपर्युक्त प्रकार से अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात स्थिति की अवस्था में पहुँचे हुए साधक के लिए लौकिक धन आदि के ज्ञान की प्राप्ति कहना योगपथ पर विपरीत चलने के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
योगसूत्र १.४९ में अनुमान और शब्द प्रमाण की अपेक्षा से सम्प्रज्ञात समाधि की वैशारद्यता से उत्पन्न ऋतम्भराप्रज्ञा रूप आन्तरिक प्रत्यक्ष के महत्त्व को दर्शाया गया है। वहाँ सूक्ष्म व्यवहित और विप्रकृष्ट वस्तुओं का बाह्य इन्द्रियों से प्रत्यक्ष न होने के कारण, आन्तरिक प्रत्यक्ष से उपरोक्त वस्तुओं के साक्षात्कार = ज्ञान को कहा है, जोकि ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा होता है। यह ऋतम्भरा प्रज्ञा निर्विचार सम्प्रज्ञात समाधि की वैशारद्यता से उत्पन्न होती है। दूसरी ओर अस्मितामात्र अर्थात् आत्मस्वरूपाकार = आत्मानुभूति करने की स्थिति अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि की अवस्था में ही होती है। इस अस्मितामात्र स्थिति में भी, उस अवस्था से पूर्व ही प्राप्त हो जाने वाली ऋतम्भराप्रज्ञा से होने वाली उपलब्धियों को कहना और मानना, कैसे उचित कहा जा सकता है?
अतः यहाँ इस ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के सम्बन्ध से होने वाला ज्ञान, लौकिक पदार्थगत न होकर, पुरुष की अपनी वृत्तियों तथा सत्त्वादि गुणों के सूक्ष्म, प्रत्यक्ष एवं परोक्ष, तथा विस्तारित = सुदीर्घ ज्ञान का होना ही उचित है, क्योंकि आत्मस्वरूप की अनुभूति के उपरान्त ही योगी, सत्त्वादि गुणों के ज्ञान से, उनसे भी विरक्त होकर परवैराग्य की ओर बढ़ता है; तथा वृत्तियों और उनके संस्कारों को दग्धबीजभाव की अवस्था में लाने हेतु पुरुषार्थरत होता है। और ये कार्य उपर्युक्त प्रकार के ज्ञान के पश्चात् ही सम्भव होते हैं।
इसी प्रकार जो योगसूत्र २.४५ में समाधिसिद्धि से देहान्तर, कालान्तर और देशान्तर में होने वाले ज्ञान को कहा है, उसका इस सूत्र की मूल भावना से कोई विरोध नहीं है, क्योंकि वहाँ किसी संयम विशेष का विधान नहीं किया गया है।
इस सन्दर्भ में हम यहाँ योगसूत्र २.४३ पर भोजवृत्ति का उल्लेख करना चाहेंगे। भोज इस सूत्र की व्याख्या में कहते हैं — “तत् क्षयादिन्द्रियादीनां सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टदर्शनादिसामर्थ्यमाविर्भवति” अर्थात् तप से इन्द्रियों के दोष दूर होने से इन्द्रियों आदि का सूक्ष्म, व्यवधान युक्त और दूरस्थ पदार्थों के दर्शन का सामर्थ्य उत्पन्न होता है। जब भोज के अनुसार यह उपलब्धि तप के सम्यक् अनुष्ठान से ही प्राप्त हो जाती है, तब उस प्रकार की सिद्धि को सम्प्रज्ञात समाधि की अति उच्च अवस्था ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के सम्बन्ध से कहना कितना उचित कहा जाए ? भोज का इस सूत्र पर व्याख्यान, योगसूत्र २.४३ पर अपने व्याख्यान के सन्दर्भ में, अनुचित ही ज्ञात होता है। भोज भी ज्योतिष्मती प्रवृत्ति के वास्तविक रहस्य से दूर रह गये हैं।
अतः इस सूत्र पर भोज की व्याख्या का अन्धानुकरण करने वाले भाष्यकारों के सम्बन्ध में यही कहना उचित होगा कि न तो वे स्वयं योगी थे, और न ही उन्होंने महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास के भाष्य को पठन की सीमा से आगे ले जाकर मनन आदि किया है; अन्यथा इस सूत्र पर ऐसा भाष्य कदापि नहीं करते। अतः इस सूत्र पर भोजवृत्ति हेय कोटि में जाननी चाहिए।