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Vibhuti Paada / Attainments / 26
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Vibhuti Paada / Attainments / 26

भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्॥२६॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 26

In Hindi:

पदपाठ : भुवनज्ञानम् सूर्ये संयमात्॥

हिंदी में अर्थ : (सूर्ये संयमात्) सूर्य = शरीरस्थ प्राण में संयम करने से (भुवनज्ञानम्) शरीर रूपी भुवन का ज्ञान हो जाता है॥

व्यास भाष्य : तत्प्रस्तारः सप्तलोकाः। तत्रावीचेः प्रभृति मेरुपृष्ठं यावदित्येष भूर्लोकः। मेरुपृष्ठादारभ्याऽऽध्रुवाद् ग्रहनक्षत्रताराविचित्रोऽन्तरिक्षलोकः। ततः परः स्वर्लोकः पञ्चविधो माहेन्द्रस्तृतीयो लोकः। चतुर्थः प्राजापत्यो महर्लोकः। त्रिविधो ब्राह्मः तद्यथा जनलोकस्तपोलोकः सत्यलोक इति।

ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान्।

माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः॥ इति संग्रहश्लोकः।

तत्रावीचेरुपर्युपरि निविष्टाः षण्महानरकभूमयो घनसलिलानलानिलाकाशतमःप्रतिष्ठा महा- कालाम्बरीषरौरवमहारौरवकालसूत्रान्धतामिस्राः। यत्र स्वकर्मोपार्जितदुःखवेदनाः प्राणिनः कष्टमायुर्दीर्घकालमाक्षिप्य जायन्ते। ततो महातलरसातलातलसुतलवितलतलातलपातालाख्यानि सप्त पातालानि। भूमिरियमष्टमी सप्तद्वीपा वसुमती यस्याः सुमेरुर्मध्ये पर्वतराजः काञ्चनः। तस्य राजतवैदूर्यस्फटिकहेममणिमयानि शृङ्गाणि। तत्र वैदूर्यप्रभानुरागान्नीलोत्पलपत्रश्यामो नभसो दक्षिणो भागः। श्वेतः पूर्वः। स्वच्छः पश्चिमः। कुरण्टकाभ उत्तरः। दक्षिणपार्श्वे चास्य जम्बूः। यतोऽयं जम्बूद्वीपः। तस्य सूर्यप्रचाराद्रात्रिन्दिवं लंग्नमिव वर्त्तते। तस्य नीलश्वेतशृङ्गवन्त उदीचीनास्त्रयः पर्वता द्विसहस्रायामाः। तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसहस्राणि रमणकं हिरण्मयमुत्तराः कुरव इति। निषधहेमकूटहिमशैला दक्षिणतो द्विसहस्रायामाः। तदन्तरेषु त्रीणि वर्षाणि नवनवयोजनसहस्राणि हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतमिति। सुमेरोः प्राचीना भद्राश्वः माल्यवत्सीमानः प्रतीचीनाः केतुमालाः गन्धमादनसीमानः। मध्ये वर्षमिलावृतम्। तदेतद्योजनशतसहस्रं सुमेरोर्दिशि दिशि तदर्धेन व्यूढम्।

स खल्वयं शतसाहस्रायामो जम्बूद्वीपस्ततो द्विगुणेन लवणोदधिना वलयाकृतिना वेष्टितः। ततश्च द्विगुणाः द्विगुणाः शाककुशक्रौञ्चशाल्मलगोमेधपुष्करद्वीपाः। समुद्राश्च सर्षपराशिकल्पाः सविचित्रशैलावतंसा इक्षुरससुरासर्पिर्दधिमण्डक्षीरस्वादूदकाः सप्तसमुद्रपरिवेष्टिताः वलयाकृतयो लोकालोकपर्वतपरिवाराः पञ्चाशद्योजनकोटिपरिसंख्याताः। तदेतत्सर्वं सुप्रतिष्ठतसंस्थानमण्डमध्ये व्यूढम्। अण्डं च प्रधानस्याणुरवयवो यथाकाशे खद्योत इति।

तत्र पाताले जलधौ पर्वतेष्वेतेषु देवनिकाया असुरगन्धर्वकिनरकिम्पुरुषयक्षराक्षसभूतप्रेतपिशाचा- पस्मारकाप्सरोब्रह्मराक्षसकूष्माण्डविनायकाः प्रतिवसन्ति। सर्वेषु द्वीपेषु पुण्यात्मानो देवमनुष्याः। सुमेरुस्त्रिदशानामुद्यानभूमिः। तत्र मिश्रवनं नन्दनं चैत्ररथं सुमानसमित्युद्यानानि। सुधर्मा देवसभा। सुदर्शनं पुरम्। वैजयन्तः प्रासादः। ग्रहनक्षत्रतारकास्तु ध्रुवे निबद्धा वायुविक्षेपनियमेनोपलक्षितप्रचाराः सुमेरोरुपर्युपरि सन्निाविष्टा दिवि विपरिवर्त्तन्ते।

माहेन्द्रनिवासिनः षड्देवनिकायाः त्रिदशा अग्निष्वात्ता याम्यास्तुषिता अपरिनिर्मितवशवर्त्तिनः परिनिर्मितवशवर्त्तिनश्चेति। ते सर्वे संकल्पसिद्धा अणिमाद्यैश्वर्योपपन्नाः कल्पायुषो वृन्दारकाः कामभोगिन औपपादिकदेहा उत्तमानुकूलाभिरप्सरोभिः कृतपरिचाराः। महति लोके प्राजापत्ये पञ्चविधो देवनिकायः कुमुदा ऋभवः प्रतर्दना अञ्जनाभाः प्रचिताभा इति। एते महाभूतवशिनो ध्यानाहाराः कल्पसहस्रायुषः।

प्रथमे ब्रह्मणो जनलोके चतुर्विधो देवनिकायो ब्रह्मपुरोहिता ब्रह्मकायिका ब्रह्ममहाकायिका अजरामरा इति। ते भूतेन्द्रियवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः। द्वितीये तपसि लोके त्रिविधो देवनिकायः आभास्वरा महाभास्वराः सत्यमहाभास्वरा इति। ते भूतेन्द्रियप्रकृतिवशिनो द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः सर्वे ध्यानाहाराः ऊर्ध्वरेतस ऊर्ध्वमप्रतिहतज्ञाना अधरभूमिष्वनावृतज्ञानविषयाः। तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके चत्वारो देवनिकायाः अच्युताः शुद्धनिवासाः सत्याभाः संज्ञासंज्ञिनश्चेति। ते चाकृतभवनन्यासाः स्वप्रतिष्ठा उपर्युपरिस्थिताः प्रधानवशिनो यावत्सर्गायुषः।

तत्राच्युताः सवितर्कध्यानसुखाः, शुद्धनिवासाः सविचारध्यानसुखाः, सत्याभा आनन्दमात्रध्यानसुखाः संज्ञासंज्ञिनश्चास्मितामात्रध्यानसुखाः। तेऽपि त्रैलोक्यमध्ये प्रतिष्ठन्ति। त एते सप्त लोकाः सर्वे एव ब्रह्मलोकाः। विदेहप्रकृतिलयास्तु मोक्षपदे वर्त्तन्ते इति न लोकमध्ये न्यस्ता इति। एतद्योगिना साक्षात्करणीयं सूर्यद्वारे संयमं कृत्वा ततोऽन्यत्रापि। एवं तावदभ्यसेद्यावदिदं सर्वं दृष्टमिति॥

हिंदी में अर्थ : (तत् प्रस्तारः) इस भुवन का विस्तार (सप्तलोकाः) शरीरस्थ सात प्रकार के लोक = प्राण अर्थात् इन्द्रियाँ हैं। (तत्र) उनमें (अवीचेः प्रभृति) अवीचि से लेकर (मेरुपृष्ठम् यावत्) मेरु पृष्ठ पर्यन्त (इति एवम्) इस प्रकार यह (भूर्लोकः) भूःलोक है। (मेरुपृष्ठात् आरभ्य) मेरुपृष्ठ से लेकर (आध्रुवात्) ध्रुव तक (ग्रहनक्षत्रताराविचित्रः) ग्रह, नक्षत्र और तारों से विचित्र (अन्तरिक्षलोकः) अन्तरिक्ष लोक है। (ततः परः) उस से परे (स्वर्लोकः पञ्चविधः) पाँच प्रकार का स्वःलोक है; उसमें भूःलोक की अपेक्षा से (तृतीयः लोकः) तीसरा लोक (माहेन्द्रः) माहेन्द्र लोक है। (चतुर्थः) चौथा (प्राजापत्यः) प्रजापति का (महर्लोकः) महःलोक है। (त्रिविधः ब्राह्मः) तीन प्रकार का ब्रह्मलोक (तद्यथा) जो कि (जनलोकः तपोलोकः सत्यलोकः इति) जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक हैं। (यहाँ भूःलोक और भुवःलोक = अन्तरिक्ष लोक तो शरीर की स्थितियाँ विशेष हैं और स्वःलोक से सत्यलोक पर्यन्त मन = चित्त की स्थितियाँ हैं।) (इति संग्रहश्लोकः) इसमें श्लोकसंग्रह का प्रमाण है —

ब्राह्मस्त्रिभूमिको लोकः प्राजापत्यस्ततो महान्।

माहेन्द्रश्च स्वरित्युक्तो दिवि तारा भुवि प्रजाः॥

ब्रह्मलोक तीन भूमियों वाला = जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक रूपी भूमि = स्थिति वाला; प्रजापति का महःलोक, माहेन्द्र का स्वःलोक, द्युलोक में तारे अर्थात् इन्द्रियाँ और भूमि पर प्रजा है।

(तत्र) उन लोकों में (अवीचेः) अवीचि से = नीचे से (उपरि उपरि निविष्टाः) ऊपर-ऊपर स्थित (घनसलिलानलानिलाकाशतमःप्रतिष्ठा) घन = ठोस, सलिल = जल, अनल = तेज = अग्नि प्रधान, अनिल = वायु प्रधान, आकाश, तम = अन्धकार में स्थित क्रमशः (महाकालाम्बरीषरौरवमहारौरव-कालसूत्रान्धतामिस्राः) महाकाल, अम्बरीष, रौरव, महारौरव, कालसूत्र और अन्धतामिस्र नामक (षण्महानरकभूमयः) छः महानरक भूमियाँ (= अर्थात् विभिन्न प्रकार के वृक्षादि से लेकर पशु-पक्षी पर्यन्त शरीर) हैं। (यत्र) जहाँ (स्वकर्मोपार्जितदुःखवेदनाः) अपने कर्मों से उपार्जित दुःख का भोग करने वाले = हेतु (प्राणिनः) प्राणी (कष्टम्) कष्टरूप = दुःखप्रद (दीर्घकालम् आयुः) दीर्घ काल की आयु को (आक्षिप्य) लेकर = ग्रहण कर (जायन्ते) उत्पन्न होते हैं। (ततः) फिर (महातलरसातलातलसुतलवितल-तलातलपातालाख्यानि) महातल, रसातल, अतल, सुतल, वितल, तलातल और पाताल नामक (सप्त पातालानि) सात पाताल (= शरीर के निम्न (=नीचे के) सात अङ्ग) हैं। (इयम् वसुमती) यह वसुमती नामक (सप्तद्वीपा भूमिः) सात द्वीपों वाली भूमि (अष्टमी) आठवीं है। (यस्याः) जिसके (मध्ये) मध्य में (काञ्चनः) स्वर्णिम (सुमेरुः पर्वतराजः) पर्वतराज सुमेरु है। (तस्य) उसके (राजतवैदूर्यस्फटिकहेम- मणिमयानि) राजत, वैदूर्य, स्फटिक, हेममणि मय (शृङ्गाणि) शिखर हैं। (तत्र) वहाँ (नभसः दक्षिणः भागः) आकाश का दक्षिण भाग (वैदूर्यप्रभानुरागात्) वैदूर्य की कान्ति के सम्पर्क से (नीलोत्पलपत्रश्यामः) नीलकमल की पँखुड़ी के समान श्याम वर्ण का है; (पूर्वः) पूर्व का आकाश (श्वेतः) श्वेत है; (पश्चिमः) पश्चिम का आकाश (स्वच्छः) स्वच्छ है; (उत्तरः) उत्तर का आकाश (कुरण्टकाभः) कुरण्ट पुष्प के समान आभा वाला है।

(च) और (अस्य) इसके (दक्षिणपार्श्वे) दक्षिण भाग में (जम्बूः) जम्बू है। (यतः) जिसके कारण (अयम्) यह (जम्बूद्वीपः) जम्बूद्वीप है। (तस्य) उस मेरु के (सूर्यप्रचारात्) सूर्य के प्रचार से (रात्रिन्दिवम्) रात और दिन (लंग्नम् इव) इसमें लगे हुए से (वर्त्तते) वर्तते हैं। (तस्य) उस मेरु के (उदीचीनाः) उत्तरदिशा में (नीलश्वेतशृङ्गवन्त) नील और श्वेत चोटियों वाले (त्रयः पर्वताः) तीन पर्वत (द्विसहस्रायामाः) दो-दो हजार योजन = जोड़ वाले हैं। (तदन्तरेषु) उन पर्वतों के बीच में (नवनवयोजनसहस्राणि) नौ-नौ हजार योजन = जोड़ = संयोग वाले (रमणकम् हिरण्मयम् उत्तराः कुरवः इति) रमणक, हिरण्मय, उत्तरकुरु नामक (त्रीणि वर्षाणि) तीन स्थान हैं। (दक्षिणतः) दक्षिण दिशा में (निषधहेमकूटहिमशैलाः) निषध, हेमकूट और हिमशैल नामक तीन (द्विसहस्रायामाः) दो-दो हजार योजन = जोड़ विस्तार वाले हैं। (तदन्तरेषु) उसके बीच में (नवनवयोजनसहस्राणि) नौ-नौ हजार योजन = जोड़ वाले (हरिवर्षं किम्पुरुषं भारतम् इति) हरिवर्ष, किम्पुरुष, भारत नाम वाले (त्रीणि वर्षाणि) तीन स्थान हैं। (सुमेरोः) सुमेरु के (प्राचीनाः) पूर्व में (माल्यवत्सीमानः) माल्यवान सीमा वाला (भद्राश्वः) भद्राश्व नामक स्थान है; (प्रतीचीनाः) इसके पश्चिम में (गन्धमादनसीमानः) गन्धमादन सीमा वाला (केतुमालाः) केतुमाल नामक स्थान है। (मध्ये) इसके मध्य में (इलावृतम् वर्षम्) इलावृत नामक स्थान है।

(तत् एतत्) वह यह (योजनशतसहस्रम्) सौ हजार योजन = जोड़ वाला जम्बूद्वीप (सुमेरोः) सुमेरु के (दिशि दिशि) चारों दिशाओं में (तदर्धेन) अपने आधे विस्तार से (व्यूढम्) स्थित है। (स खलु अयम्) वह यह (शतसाहस्रायामः) सौ हजार योजन = जोड़ के विस्तार वाला (जम्बूद्वीपः) जम्बूद्वीप (ततो द्विगुणेन) अपने से दुगने विस्तार वाले (वलयाकृतिना) वलयाकार (लवणोदधिना) लवण जल (समुद्र) से (वेष्टितः) घिरा हुआ है। (ततः च) और उससे क्रमशः (द्विगुणाः द्विगुणाः) दुगने-दुगने (शाककुशक्रौञ्चशाल्मलगोमेधपुष्करद्वीपाः) शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मल, गोमेध तथा पुष्कर द्वीप (च) और (समुद्राः) समुद्र भी (सर्षपराशिकल्पाः) सरसों के ढेर के समान (सविचित्रशैलावतंसाः) विचित्र पर्वतों से युक्त (इक्षुरससुरासर्पिर्दधिमण्डक्षीरस्वादूदकाः) इक्षुरस, सुरा, घृत, दधि, माण्ड और दूध के समान जल वाले (सप्तसमुद्रपरिवेष्टिताः) सात समुद्रों से घिरे हुए हैं। ये सभी (वलयाकृतयः) वलयाकार = गोलाकार (लोकालोकपर्वतपरिवाराः) लोकालोक पर्वत समूह (पञ्चाशद्योजनकोटिपरिसंख्याताः) पचास कोटि योजन = जोड़ विस्तार वाले हैं। (तत् एतत् सर्वम्) वह यह सब (सुप्रतिष्ठतसंस्थानम्) सुप्रतिष्ठित संस्थान (अण्डमध्ये) (वीर्य से उत्पन्न) शरीर के मध्य (व्यूढम्) स्थित है। (च) और (अण्डम्) यह शरीर (प्रधानस्य) प्रकृति का = प्रकृति के सभी विकारों से युक्त (अणुः अवयवः) छोटा सा भाग है, (यथा) जैसे (आकाशे) आकाश में (खद्योतः इति) जुगनू होता है।

अब आगे शरीर के विभिन्न अंगों सम्बन्धी, वृत्तियों, गुणों से युक्त पुरुषों की स्थितियों का वर्णन करते हैं। (तत्र) वहाँ (पाताले जलधौ एतेषु पर्वतेषु) शरीर के नीचे के अङ्गों = कर्मेन्द्रियों, उदर पोषण तथा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श आदि वृत्तियों में आसक्त पुरुष (देवनिकाया असुरगन्धर्वकिनरकिम्पुरुषयक्ष-राक्षसभूतप्रेतपिशाचापस्मारकाप्सरोब्रह्मराक्षस-कूष्माण्डविनायकाः) देवसमूह, असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अपस्मारक, अप्सरा, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड और विनायक रूप (प्रतिवसन्ति) इस संसार में वसते हैं। (सर्वेषु द्वीपेषु) सभी द्वीपों में ही (पुण्यात्मानः देवमनुष्याः) पुण्य करने वाले = पुण्यात्मा, देव और मनुष्य रहते हैं।

(सुमेरुः) सुमेरु (त्रिदशानाम्) त्रिदश संज्ञक पुरुषों की (उद्यानभूमिः) उद्यानभूमि है। (तत्र) वहाँ (मिश्रवनम् नन्दनम् चैत्ररथम् सुमानसम् इति) मिश्रवन, नन्दन, चैत्ररथ, सुमानस नामक (उद्यानानि) उद्यान, (सुधर्मा देवसभा) सुधर्म करने वालों की देवसभा, (सुदर्शनम् पुरम्) सुदर्शन = सम्यक् रूप से दर्शन करने योग्य = साक्षात्कार करने योग्य अथवा सुन्दर = प्रिय = मनोहर यह पुर = शरीर है, जो (वैजयन्तः प्रासादः) वैजयन्त = इन्द्र रूप आत्मा का निवास यह प्रासाद = महल है।

(ग्रहनक्षत्रतारकाः तु) ग्रह = वृत्तियाँ, नक्षत्र = प्रकाश = ज्ञान के प्रति गमन करने वाली अर्थात् तारा = इन्द्रियाँ (ध्रुवे निबद्धाः) स्थिर मन = चित्त से बँधे हुए (वायुविक्षेपनियमेन उपलक्षित प्रचाराः) विविध प्राण व्यापार से नियत संचार वाले (सुमेरोः उपरि उपरि सन्निविष्टाः) मेरु दण्ड से ऊपर-ऊपर अर्थात् ज्ञानेन्दियों के भौतिक शरीर के गोलकों में स्थित हुए (दिवि) भुवःलोक में (विपरिवर्त्तन्ते) गति करते हैं।

(षड्देवनिकायाः) छः प्रकार के देव गण, जो कि (त्रिदशा अग्निष्वात्ता याम्यास्तुषिता अपरि- निर्मितवशवर्त्तिनः च परिनिर्मितवशवर्त्तिनः इति) त्रिदश, अग्निष्वात्त, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मितवशवर्ती, परिनिर्मितवशवर्ती संज्ञा वाले हैं, (माहेन्द्रनिवासिनः) माहेन्द्रलोक की स्थिति वाले हैं। (ते सर्वे) वे सभी (संकल्पसिद्धाः) पूर्ण मनोरथ वाले, (अणिमाद्यैश्वर्योपपन्नाः) अणिमादि सिद्धियों से युक्त (कल्पायुषः) कल्प = नियमानुकूल आयु व्यतीत करने वाले (वृन्दारकाः) लोक = सामान्य जनों में पूज्य (कामभोगिनः) कर्मानूकल कामनाओं का भोग करने वाले (औपपादिकदेहाः) औषधि, तप आदि से दिव्य देह का निर्माण करने वाले (उत्तमानुकूलाभिः अप्सरोभिः कृतपरिचाराः) उत्तम, अनुकूल अप्सराओं = इन्द्रियों से घिरे हुए होते हैं।

(पञ्चविधः देवनिकायः) पाँच प्रकार के देव गण, जो कि (कुमुदा ऋभवः प्रतर्दना अञ्जनाभाः प्रचिताभा इति) कुमुद, ऋभव, प्रतर्दन, अञ्जनाभ और प्रचिताभ संज्ञा वाले हैं, (महति लोके प्राजापत्ये) प्रजापति = प्रजा के पालन करने वाले महःलोक की स्थिति वाले होते हैं। (एते) ये (महाभूतवशिनः) महाभूतों पर जय प्राप्त किए हुए, (ध्यानाहाराः) ध्यानसुख के आश्रित, (कल्पसहस्रायुषः) कल्पसहस्र = बहुनियमों (वेदादिसत्यशास्त्रों में कथित) के अनुकूल आयु व्यतीत करने वाले होते हैं।

(चतुर्विधो देवनिकायाः) चार प्रकार के देव गण, जो कि (ब्रह्मपुरोहिता ब्रह्मकायिका ब्रह्ममहाकायिका अजरामरा इति) ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक, और अजरामर संज्ञा वाले हैं, (ब्रह्मणः प्रथमे जनलोके) ब्राह्मण = वेदों के विद्वान् ब्रह्मा के प्रथम जनःलोक की स्थिति वाले होते हैं। (ते) वे (भूतेन्द्रियवशिनः) महाभूतों और इन्द्रियों पर विजय प्राप्त किए हुए, क्रमशः (द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः) पूर्व-पूर्व की अपेक्षा दुगने-दुगने नियमपूर्वक आयु जीने वाले होते हैं।

(त्रिविधः देवनिकायः) तीन प्रकार के देव गण, जो कि (आभास्वरा महाभास्वराः सत्यमहाभास्वरा इति) आभास्वर, महाभास्वर, सत्यमहाभास्वर संज्ञा वाले हैं, (द्वितीये तपसि लोके) ब्रह्मा के द्वितीय तपलोक की स्थिति वाले होते हैं। (ते) वे (भूतेन्द्रियप्रकृतिवशिनः) महाभूतों, इन्द्रियों और प्रकृति पर जय प्राप्त किए हुए, (द्विगुणद्विगुणोत्तरायुषः) क्रमशः दुगने-दुगने नियमपूर्वक आयु जीने वाले, (सर्वे) सभी (ध्यानाहाराः) ध्यानसुख के आश्रित, (ऊर्ध्वरेतसः) ऊर्ध्वरेता, (ऊर्ध्वम् अप्रतिहतज्ञानाः) उच्चस्तर के अप्रतिहतज्ञान = अखण्डित ज्ञान वाले (अधरभूमिष्वनावृतज्ञानविषयाः) योग की अधर = निम्न भूमियों = स्तरों के भी ज्ञान से युक्त होते हैं।

(चत्वारः देवनिकायाः) चार प्रकार के देव गण, जो कि (अच्युताः शुद्धनिवासाः सत्याभाः च संज्ञासंज्ञिनः इति) अच्युत, शुद्धनिवास, सत्याभ और संज्ञासंज्ञी संज्ञा वाले हैं, (तृतीये ब्रह्मणः सत्यलोके) ब्रह्मा के तीसरे सत्यलोक की स्थिति वाले होते हैं। (च) और (ते) वे (अकृतभवनन्यासाः) भवनादि की स्थापना न करने वाले (स्वप्रतिष्ठाः) अपने-आप में प्रतिष्ठित, (उपरि उपरि स्थिताः) वैचारिक = मानसिक स्तर पर ऊपर-ऊपर स्थित (प्रधानवशिनः) प्रकृति पर जय प्राप्त किए हुए (यावत्सर्गायुषः) वर्त्तमान सर्ग के अन्त तक की आयु वाले होते हैं। (तत्र) उन चार प्रकार के देव गणों में (अच्युताः) अच्युत संज्ञा वाले देवगण (सवितर्कध्यानसुखाः) सवितर्क समाधि सुख को प्राप्त किए होते हैं; (शुद्धनिवासाः) शुद्धनिवास संज्ञा वाले देवगण (सविचारध्यानसुखाः) सविचार समाधि सुख को प्राप्त किए होते हैं; (सत्याभाः) सत्याभ संज्ञा वाले देवगण (आनन्दमात्रध्यानसुखाः) आनन्दानुगत समाधि सुख को प्राप्त किए होते हैं; (च) और (संज्ञासंज्ञिनः) संज्ञासंज्ञी संज्ञा वाले देवगण (अस्मितामात्रध्यानसुखाः) अस्मितामात्र समाधि सुख को प्राप्त किए होते हैं। (ते) वे चार प्रकार की संज्ञा वाले देवगण (अपि) भी (त्रैलोक्यमध्ये) तीनों लोकों = तीनों शरीरों के बन्धन में (प्रतिष्ठन्ति) स्थित रहते हैं। (ते एते सप्त लोकाः) ये सातों प्रकार की स्थितियाँ (सर्वे एव) सभी ही (ब्रह्मलोकाः) परमात्मा की कर्मफल रूपी जन्म-मरण की न्याय व्यवस्था के अन्तर्गत ही हैं। (विदेहप्रकृतिलयाः तु) विदेह और प्रकृतिलय नामक योगी तो (मोक्षपदे) इस जन्म-मरण की व्यवस्था से पृथक् व्यवस्था में (वर्त्तन्ते इति) कुछ काल पर्यन्त रहते हैं, (न लोकमध्ये न्यस्ताः इति) इसलिए इनको लोकमध्ये अर्थात् जन्म-मरण की अनवरत व्यवस्था में नहीं कहा गया।

(एतत्) यह सब (योगिना) योगी के द्वारा (सूर्यद्वारे) प्राणद्वार में (संयमम् कृत्वा) संयम करके (साक्षात्करणीयम्) साक्षात् करने योग्य है, (ततः) इस प्रकार योगी को (अन्यत्र अपि) अन्य विषयों में भी संयम का अभ्यास करना चाहिए। (एवम्) इस प्रकार (तावत्) तब तक (अभ्यसेत्) अभ्यास करता रहे (यावत्) जब तक (इदम् सर्वम् दृष्टम् इति) यह सब साक्षात् न हो जाये॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में महर्षि पतञ्जलि सूर्य में संयम से भुवनज्ञान का होना कहते हैं। इस सूत्र की सिद्धि का वास्तविक अभिप्राय शरीरज्ञान के होने से हमने यहाँ सूर्य का अर्थ “प्राण” लेते हुए भुवनज्ञान से शरीर रूपी भुवन ज्ञान को कहा है। वेदादि सत्यशास्त्रों में “सूर्य” ईश्वर और प्राण अर्थ में भी आता है। हम यहाँ सर्वप्रथम सूर्य के अर्थ का ही विवेचन करते हैं —

सूर्य — सर्वप्रथम हम वेद के प्रमाणों से सूर्य का प्राण परक अर्थ दिखाते हैं। वेद में आये सूर्य शब्द से निम्न स्थलों पर महर्षि दयानन्द ने सूर्य, परमात्मा अथवा प्राण परक अर्थ किया है —

१. — ब्रह्माण्डस्थो मार्त्तण्डः शरीरस्थ प्राणो वा॥ ऋ० १.९०.८॥

अर्थात् ब्रह्माण्डों में स्थित होने वाला सूर्य तथा शरीर में ठहरने वाला प्राण ॥

२. — सविस्तारं प्राणं वा॥ ऋ० १.१००.१८॥ अर्थात् सूर्यलोक तथा प्राण ॥

३. — यः सुवति ऐश्वर्यं ददाति, ऐश्वर्यहेतुन् प्रेरयति स परमेश्वरः प्राणो वा तस्य॥ ॥ यजु॰ १.३१॥

अर्थात् ऐश्वर्य के दाता, ऐश्वर्य के कारणों के प्रेरक परमेश्वर वा प्राण की ॥

४. — सकलविद्यादि व्यवहारप्रापकत्वेन वर्त्तमानः प्राणादिसमूहो वायुगणः॥ ॥ यजु॰ ३.९॥

सकल विद्यादि व्यवहारों का प्रापक प्राणादि समूह॥ इसी मन्त्र में अन्य दो स्थलों पर सूर्य का अर्थ स्पष्ट रूप से ईश्वर ही किया है।

५. — सर्वान्तर्गतस्य प्राणस्य सूर्यलोकस्य वा॥ यजु॰ ३.१९॥

अर्थात् सब के अन्तर्गत प्राण वा सूर्यलोक ॥

६. — परमेश्वरं सवितृमण्डलं प्राणम् वा ॥ यजु॰ ३.५४॥

अर्थात् परमेश्वर, सूर्यलोक वा प्राण को ॥

इसी प्रकार ब्राह्मणग्रन्थों के निम्न वचनों में सूर्य का प्राण-परक अर्थ कहा है —

१. आदित्यः सर्वाणि भूतानि प्रणयति तस्मादेनं प्राणः इत्याचाक्षते॥ ॥ऐ०ब्रा॰५.३१ (पञ्चिका ५, अध्याय ५, खण्ड ६)॥

आदित्य ही सभी भूतों / प्राणियों को प्राण देता है, इसलिये यह “प्राण” ही कहा जाता है।

२. प्राणा वा आदित्याः॥ जै॰ उ० ४.२.९॥; प्राण आदित्यः॥ ताण्ड्य० १६.१३.२॥

प्राण ही आदित्य है।

३. आदित्यौ वै प्राणः॥ जै॰ उ० ४.२२.१॥

अर्थात् आदित्य ही निश्चय रूप प्राण है।

इस वाक्य को उद्धृत कर महर्षि दयानन्द कहते हैं — “जो आदित्य में अर्थात् प्राण में पुरुष है, .....” (वेदान्तिध्वान्त निवारण०)। इसी प्रकरण में स्वामी जी लिखते हैं — “यद्वा परमेश्वरोऽभिवदति — हे जीवाः! यः असौ आदित्ये बाह्ये सूर्ये कि वा अन्तर्गते प्राणे स असौ अहमेवास्मीति मां वित्तं ....” यहाँ स्पष्ट है कि बाह्य जगत् के सूर्य से अन्तर्जगत में प्राण का ही ग्रहण होता है।

इसी प्रकार उपनिषदों में आदित्य को प्राण कहा है —

१. प्राणा वावाऽऽदित्या॥ छान्दोग्य० ३.१६.५॥ अर्थात् प्राण ही आदित्य है।

२. प्रश्नोपनिषद् में तीसरे प्रश्न का उत्तर देते हुए महर्षि पिप्पलाद प्राण की शरीर में स्थिति का वर्णन करते हुए कहते हैं — आदित्यो वा बाह्य प्राणः॥ प्रश्नोपनिषद् ३.८॥ अर्थात् सूर्य ही शरीर से बाहर रहने वाला प्राण है। इसी प्रकार प्रथम प्रश्न के उत्तर में महर्षि पिप्पलाद कहते हैं — आदित्यो ह वै प्राणो ....... ॥प्रश्नोपनिषद् १.५॥ अर्थात् निश्चय पूर्वक आदित्य = सूर्य ही प्राण है ......।

३. महर्षि दयानन्द ने मुण्डकोपनिषद् के १.२.११ में आये “सूर्यद्वारेण” पद का अर्थ प्राण द्वार ही किया है (सत्यार्थप्रकाश पञ्चम समुल्लास वानप्रस्थप्रकरण।)। अतः सूत्र के भाष्य के अन्त में महर्षि व्यास ने जो सूर्यद्वार में संयम कहा है वह प्राणद्वार अर्थात् प्राणों में संयम को ही जानना चाहिए।

इन सभी प्रमाणों से स्पष्ट है कि सूर्य का एक अर्थ प्राण भी है। इस सूत्र का शरीरपरक अर्थ करने में जीवात्मा के साथ सम्बद्ध स्थूल और सूक्ष्म शरीरों में प्राण ही ऐसा तत्त्व है जो सम्पूर्ण शरीर से सम्बद्ध है। अतः यहाँ प्राण में संयम से भुवन रूपी शरीर का सम्पूर्ण ज्ञान योगी को होता है।

इस सूत्र के अर्थ को समझने में निम्न तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि “यहाँ भूःलोक और भुवःलोक = अन्तरिक्ष लोक तो शरीर में स्थितियाँ विशेष हैं; और स्वःलोक से सत्यलोक पर्यन्त मन = चित्त की स्थितियाँ हैं।”

जिस प्रकार बाह्यलोक में सूर्य, अपनी आकर्षण शक्ति से, ग्रहों आदि को धारण करने वाला है, उसी प्रकार इस शरीर में प्राण ही मन, इन्द्रियों सहित इस शरीर को धारण करता है।

अब आगे इस सूत्र में प्रतिपादित विभिन्न संज्ञाओं के रहस्य को समझते हैं। इस सूत्र की व्याख्या में महर्षि व्यास ने सात लोकों और सात पतालों का वर्णन किया है। जिसका अभिप्राय व्याख्याकारों ने पृथिवी आदि लोकों से लिया है। सातलोक, सात पाताल, सात समुद्र निम्न हैं—

लोक — भूः लोक, अन्तरिक्ष लोक, स्वः लोक, महः लोक, जन लोक, तपोलोक, सत्य लोक॥ इनमें स्वःलोक को माहेन्द्र लोक; महः लोक को प्राजापत्य लोक; और जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक को ब्रह्मलोक कहा गया है।

पाताल — महातल, रसातल, अतल, सुतल, वितल, तलातल और पाताल॥

यहाँ यह विचार करना चाहिए कि क्या सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में सात लोक और सात ही पाताल हैं ? क्या किसी स्थान विशेष को ब्रह्मलोक कहा जा सकता है ? वस्तुतः तो इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में असंख्य लोक हैं जिनकी गणना संभव नहीं है। वास्तव में यह शरीर में स्थित प्राणों का ही वर्णन है।

ऋग्वेद १.२२.१६ में “पृथिव्याः सप्तधामभिः” पद आया है। इसका अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द लिखते हैं —

अन्वय — पृथिवीमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तैः सप्तभिधामभिः सह वर्त्तमानाँल्लोकान् ........

(पृथिव्याः) पृथिवीमारभ्य प्रकृतिपर्यन्तैः (सप्त) पृथिवीजलाग्निवायुविराट्परमाणुप्रकृत्याऽऽख्यैः सप्तभिः पदार्थैः (धामभिः) दधति सर्वाणि वस्तूनि येषु तैः सह।

अर्थात् पृथिवी से लेकर प्रकृति पर्यन्त सात अर्थात् पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, विराट्, परमाणु, प्रकृति नामक सात सब वस्तुओं का धारण करने वाले पदार्थों सहित वर्त्तमान लोकों को ....... ॥ यहाँ स्पष्ट रूप से किसी सात विशिष्ट लोकों का वर्णन नहीं है, क्योंकि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को मात्र सात लोकों में विभक्त करके कहना सम्भव नहीं है।

इस विषय में पं॰ शिवशंकर शर्मा जी वैदिक इतिहास विमर्श के पृष्ठ ११२ पर लिखते हैं — “१४ चतुर्दश लोकों का जो वर्णन है, वह प्राणों का ही वर्णन है। ये ही सात प्राण - दो चक्षु, दो कर्ण, दो नासिकाएँ और एक वाक् ऊपर के लोक हैं, और दो हाथ, दो पैर, एक मूत्रेन्द्रिय, एक मलेन्द्रिय और एक उदर ये सात नीचे के सात लोक, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल नाम से पुकारे जाते हैं।”

वेद, ब्राह्मण ग्रन्थों आदि में सप्तसिन्धु, सप्तलोक, सप्तराशि, सप्तार्चि, सप्ताग्नि आदि पदों से भी शरीर की सप्तेन्द्रियों का ही ग्रहण किया गया है। इसमें निम्न प्रमाण देखें —

सप्त शिरसि प्राणाः। प्राणा इन्द्रियाणि। इन्द्रियाण्येवैतयाऽऽप्नोति॥ ताण्ड्यमहाब्राह्मण २.१४.२॥

सप्त वै शीर्षन् प्राणाः। शीर्षन्नेव तत्प्राणान् दधाति॥ ऐ० ब्रा॰ १.३.६॥

सप्त वै शीर्षण्याः प्राणाः शिरः ........ ॥ तै॰ सं॰ ५.१.७.१॥

इन प्रमाणों में शिर में स्थित सात प्राणों का वर्णन है। शिर में सात प्राण स्थित हैं, जो कि इन्द्रियाँ हैं — दो श्रोत्र, दो नयन, दो घ्राण और एक जिह्वा। इन्हीं सात का ही निरुपण है। उपनिषद् में अन्यत्र इन्हीं को सात लोक कहा है —

सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तस्मात् सप्तार्चिषः समिधः सप्त होमाः। सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त॥ मुण्डक० २.१.८॥

यहाँ भी इन सात प्राणों का ही वर्णन है। ये शिर स्थित सात प्राण — दो नेत्र, दो कर्ण, दो घ्राण तथा एक जिह्वा, ही उस परमात्मा से उत्पन्न होते हैं। ये ही सात अपने अपने विषय को प्रकाशित करने वाली किरणें हैं; इन सातों के विषय ही सात समिधाएँ हैं; इनका विज्ञान ही सात होम है; ये ही सात लोक हैं, जिनमें प्राण विचरते हैं। ये ही सात गुहाशय = ध्यानादि वा निद्रा के समय में अन्तःकरण में सोने वाले प्राण जाग्रत आदि दशा में विचरते हैं। ऐसे प्राण परमात्मा ने प्रत्येक शरीर में सात-सात स्थापित किए हैं। मुण्डकोपनिषद् के प्रमाण से शरीरस्थ इन्द्रियों / प्राणों की लोक संज्ञा स्पष्ट प्रमाणित है।

सात लोकों का वर्णन संस्कृत साहित्य में बहुत स्थलों पर आया है, जोकि भूः आदि लोकों के नाम से जाने जाते हैं और एक से दूसरा ऊपर-ऊपर माने जाते हैं, तथा दूसरी ओर सात पाताल पृथिवी से एक-दूसरे के नीचे माने जाते हैं। महर्षि व्यास द्वारा इस सूत्र के भाष्य के आधार पर विष्णु पुराण तथा भागवत पुराण में इनका विस्तृत एवं काल्पनिक इतिहास रचा गया है। परन्तु ये चतुर्दश लोक कौन से हैं? पुराणों में कथित कल्पित मान्यताओं के आधार पर लोग इन्हें बाह्य जगत् में मानते हैं। वस्तुतः उपनिषद् और ब्राह्मण ग्रन्थों आदि के प्रमाणानुसार ये १४ लोक अन्यत्र न होकर इस शरीर में ही स्थित हैं — यथा दो कर्ण, दो चक्षु, दो घ्राण तथा एक रसना, ये शरीर में ऊपर शिर में स्थित, ही सात भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः और सत्य लोक हैं। और दो हस्त, दो चरण, एक मूत्रेन्द्रिय, एक मलेन्द्रिय और एक शरीर का मध्य भाग (कण्ठ से कटि पर्यन्त) ही सात अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल है, क्योंकि ये शरीर में नियत तथा निम्न स्थान पर हैं और इन्हीं का ग्रहण करना उचित है। दूसरी ओर बाह्य जगत में असंख्य सूर्य और असंख्य लोक-लोकान्तर है, तो ऐसे में मात्र १४ चतुर्दश की गणना करना सर्वथा अनुचित ही जानना चाहिए।

अतः इस विवरण से स्पष्ट है कि सात लोक और सात पाताल बाह्य जगत का वर्णन न होकर इस शरीर का ही वर्णन है। इसी प्रकार सूत्र के भाष्य में सात समुद्र, द्वीप और नरकों का भी वर्णन आया है —

समुद्र — क्षार, इक्षुरस, सुरा, घी, दही, माण्ड तथा दुग्ध के;

द्वीप — जम्बू, शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मल, मगध, पुष्कर ॥

देखो, इस पृथिवी पर न तो सात समुद्र हैं और न ही ऐसे समुद्र हैं जिनमें इक्षुरस, सुरा, घी, दही, माण्ड अथवा दुग्ध होता हो। यह बाह्यजगत् अर्थात् पृथिवी गत समुद्रों का वर्णन नहीं है। ऋग्वेद १.३२.१२, २.१२.३ तथा २.१२.१२ में “सप्तसिन्धु” पद आया है। इन मंत्रों का देवता इन्द्र है। इन्द्र नाम जीवात्मा और सूर्य दोनों का ही है। महर्षि दयानन्द ने इन मन्त्रों का सूर्य परक अर्थ किया है। अतः सप्तसिन्धु का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द ने भूमि पर महाजलाशय, समुद्र, नदी, कूप, तडाग चार और अन्तरिक्ष में निकट और दूर देश में स्थित तीन, इस प्रकार से सात जलाशयों को कहा है। दूसरी ओर यदि अध्यात्म पक्ष में इन्द्र का जीवात्मा अर्थ लिया जाए तो शरीर प्रकरण में सप्त सिन्धु से सात प्राणों का ही ग्रहण करना होगा। ये सात प्राण = इन्द्रियाँ, मन के आश्रय से कार्योन्मुख होती हैं। शतपथ ब्राह्मण में मन को समुद्र कहा गया है —

मनो वै समुद्रः॥ शतपथ ७.५.२.५२॥

यजु॰ १३.५३ की व्याख्या करते हुए शतपथ ब्राह्मण में उपरोक्त वचन है। अर्थात् मन ही समुद्र है। देखो! मन से अधिक वृत्तियों / विचारों की लहरें और कहीं नहीं उठती। मन में ही सभी इन्द्रियाँ अर्थात् प्राण प्रतिष्ठित हैं (मनसि वै सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिताः॥ शतपथ० ७.५.२.६॥)। शरीर में ये मन और इन्द्रियाँ नियत स्थान हैं, और इन्हीं इन्द्रियों में, मन के आश्रय से समुद्र से भी बढ़कर तरङ्गें उठती है, अतः ये ही सागर नाम से पुकारे गए हैं। दूसरी ओर पृथिवी पर कोई नियत सात ही सागर अथवा नदियाँ नहीं हैं और न ही सात द्वीप नियत हैं। इन प्राणों की मन के आश्रय से होने वाली वृत्तियाँ ही क्षार, इक्षुरस, सुरा, घी, दही, माण्ड, दुग्ध के गुणानुकूल होना सम्भव होने से, ये ही सात समुद्र जानने चाहिए।

द्वीप और समुद्र के वर्णन में जो योजन शब्द दिया गया है, वह दूरी के अभिप्राय से ४ कोस = ८ मील की दूरी को बताता है। परन्तु जब समुद्र आदि शरीरपक्ष में कहे गये हैं, तो सूत्र में वर्णित दूरी शरीर पक्ष में सम्भव नहीं है। योजन का एक अर्थ जोड़ भी है। अतः यहाँ शरीर के उस भाग, अङ्ग आदि में नस / नाडि़यों / मांसपेशियों आदि के जोड़ों को जानना चाहिए। अर्थात् वहाँ नस / नाडि़यों / मांसपेशियों के इतने जोड़ हैं, ऐसा कहा जा सकता है। इसका विशेष अन्वेषण संयम द्वारा किया जाना चाहिए।

नरक — महाकाल, अम्बरीष, रौरव, महारौरव, कालसूत्र, अन्धतामिस्र जो कि क्रमशः घन, सलिल, अनल, अनिल, आकाश और अन्धकार युक्त हैं।

इस सम्बन्ध में यह जानना चाहिए कि पुरुष अपने सञ्चित शुभाशुभ कर्माशय के आधार पर विभिन्न अन्धकारमय योनियों = वृक्षादि से लेकर पशु-पक्षी पर्यन्त के शरीरों में जाकर, जहाँ ज्ञान प्राप्ति और उन्नति की कोई सम्भावना नहीं होती, जो दुःख भोगता है, वह ही नरक है। ये सभी प्रकार के नरक भी इस पुरुष को इस शरीर के ही माध्यम से प्राप्त होते हैं। अतः ये सभी नरक भी कोई पृथक् लोकविशेष न होने से इनको भी शरीर का वर्णन जानना चाहिए।

इस विषय में वेदान्तदर्शन का निम्न सूत्र भी द्रष्टव्य है —

“अपि च सप्त” (वेदान्त ३.१.१५)॥ इस की व्याख्या करते हुए आर्य विद्वानों यथा आर्यमुनि जी तथा रघुनन्दन सिंह निर्मल जी ने इस सूत्र में सात प्रकार के नरकों का वर्णन स्वीकार किया है, जो कि महर्षि व्यास की मान्यता के अनुकूल ही ज्ञात होता है।

पर्वत — इस सूत्र के भाष्य में कुछ पर्वत संज्ञाओं को भी कहा गया है जिनके राजत, वैदूर्य, स्फटिक, हेममणिमय शिखर हैं; इसी प्रकार नील और श्वेत चोटियों वाले पर्वतों का वर्णन है। बृहदारण्यक उपनिषद् में शरीरस्थ यकृत और क्लोमा को पर्वत कहा है (यकृच्च क्लोमानश्च पर्वता .... । बृहदा॰ १.१.१)। यहाँ इस विषय को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

पर्वत वह स्थान होता है जो समतल भूमि से उभार वाला, कठोर क्षेत्र हो, यथा — पृथिवी पर हिमालय आदि। शरीर में मेरुदण्ड की अस्थियों तथा अन्य अस्थियों रूप उभार वाले कठोर अवयवों को ही पर्वत रूप से जानना चाहिए। अथवा बृहदारण्यकोपनिषद् के अनुसार यकृत और क्लोमा को भी पर्वत समझा जा सकता है। इनकी चोटियों को नील और श्वेत वर्ण का कहा है, वह भी दो प्रकार से समझना चाहिए —

१. शरीरस्थ वात आदि धातुओं के प्रभाव से वर्ण विशेष की प्रतीति है; यथा —

पित्तं तीक्ष्णं द्रवं पूति नीलं पीतं तथैव च॥ सुश्रुत सू॰ २१.११॥

अर्थात् पित्त नील, पीत (स्वर्ण) वर्ण वाला .........

श्लेष्मा श्वेतो .......... ॥ सुश्रुत सू॰ २१.१५॥

अर्थात् कफ श्वेत वर्ण वाला ...........

२. छान्दोग्योपनिषद् में हृदयस्थ नाडि़यों को विभिन्न वर्णों के रसों से युक्त कहा है —

अथ या एता हृदयस्य नाड्यास्ताः पिङ्गलस्याणिम्नस्तिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पीतस्य लोहितस्य .........॥ छान्दो॰ ८.६.१॥

अर्थात् हृदय की जो ये नाडि़याँ हैं, पिङ्गल, शुक्ल, नील, पीत, लोहित वर्ण विशिष्ट सूक्ष्म रस से परिपूर्ण हैं॥ इसी प्रकार बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा है —

ता वा अस्यैता हिता नाम नाड्यो यथा केशः सहस्रधा भिन्नस्तावताऽणिम्नातिष्ठन्ति शुक्लस्य नीलस्य पिङ्गलस्य हरितस्य लोहितस्य पूर्णा .......... ॥ बृहदा॰ ४.३.२०॥

अर्थात् इस शरीर में हिता = हित करने वाली नाडि़याँ हैं, वे केश के सहस्रवें भाग के समान सूक्ष्म हैं। वे शुक्ल, नील, पिङ्गल, हरित और लोहित रस से पूर्ण हैं॥

इस शरीर के सभी अवयव इन नाडि़यों से आच्छादित हैं। इन नाडि़यों में पूरित विभिन्न वर्णों से आच्छादित होने से, पूर्वोक्त अस्थि रूप पर्वत शिखर विभिन्न वर्णों वाले कहे गये हैं।

ग्रह, नक्षत्र, तारा का अभिप्राय —

ग्रहः = वृत्तियों का ग्रहण = प्रत्यक्षीकरण;

ग्रहाधीशः — सूर्य अर्थात् प्राण और इसमें साधन चित्त / बुद्धि।

नक्षत्र - नक्षति गच्छतीति नक्षत्रम्, तारका वा ॥ उणादिकोष ३.१०५॥

- कारणरूपेणऽविनश्रवरैः (पदार्थैः) ऋ० ३.५४.१९ - महर्षि दयानन्द॥

— अर्थात् कारण रूप से नाश न होने वाले;

- यो न क्षीयते स (आप्तो जनः) ऋ० ६.६७.६ - महर्षि दयानन्द॥

— जो नष्ट नहीं होता वह (आप्त विद्वान्)

- नक्षत्राणि वै जनयो ये हि जनाः पुण्यकृतः स्वर्गं लोकम् यन्ति तेषामेतानि ज्योतीᳬषि

(शत० ६.५.४.८)

- देवगृहा वै नक्षत्राणि (तैत्तिरीय ब्रा॰ १.५.२.६)

देवगृहा = इन्द्रियगृह = इन्द्रियगोलक ही नक्षत्र हैं। अगले प्रमाण से इन्द्रियों की ग्रह संज्ञा प्रतिपादित होती है। इसी प्रकार से बृहदारण्यकोपनिषद् में इन्द्रियों को ग्रह कहा है —

प्राणो वै ग्रहः .......... ; वाग्वै ग्रहः .......... ; जिह्वा वै ग्रहः .......... ; चक्षुर्वै ग्रहः ........... ; श्रोत्रं वै ग्रहः........... ; मनो वै ग्रहः .............. ; हस्तौ वै ग्रहः ............. ; त्वग्वै ग्रहः ............. (बृह० ३.२.२-९)

यहाँ घ्राणेन्द्रिय, वागिन्द्रिय, जिह्वा, चक्षु, श्रोत्र, मन, हाथ और त्वचा को ग्रह कहा है; और इन ग्रहों के विषय हैं — गन्ध, नाम, रस, रूप, शब्द, काम, कर्म, स्पर्श। ये ग्रह इन्हीं विषयों को ग्रहण करते हुए आत्मा को शरीर में बांधते हैं। लोक में ग्रह का अर्थ पृथिवी आदि लोक लिया जाता है। दूसरी ओर शरीर पक्ष में ग्रह का अर्थ है — जो ग्रहण करे वह ग्रह है; इस आत्मा को भी इस संसार बन्धन में इन्द्रियों ने पकड़ा हुआ है, इस हेतु ये भी ग्रह हैं।

इन प्रमाणों से स्पष्ट है कि ग्रह, नक्षत्र से मात्र अन्तरिक्ष में प्रकाश करने वाले तारा विशेषों और उन तारों के आश्रित ग्रहों का ही ग्रहण नहीं होता। शरीर पक्ष में (प्रवाह से) अनादि काल से आत्मा के साथ सम्बद्ध इन्द्रियाँ और मन का ग्रहण और आत्मा के चित्तस्थ संस्कारों का ग्रहण भी सम्भव है। इसी प्रकार अगले सूत्र में तारों से इन्द्रियों का ग्रहण किया है, उसका विवरण अगले सूत्र की व्याख्या में देखें।

इस भाष्य में सुमेरु सम्बन्धित कुछ संज्ञाओं को कहा गया है यथा सुधर्मा देवसभा, सुदर्शन पुर, वैजयन्त प्रासाद, मिश्रवन, नन्दनवन आदि उद्यान .... । पौराणिक भाष्यकारों ने इन संज्ञाओं का सम्बन्ध पुराणों में वर्णित इन्द्रलोक = स्वर्गलोक से कहा है, जो कि काल्पनिक है। ये भी इस शरीर से सम्बन्धित वर्णन है, जो इस प्रकार से समझना चाहिए —

ऐतरेयोपनिषद् में “इन्द्र” को स्पष्ट करते हुए कहा है —

तस्मादिदन्द्रो नाम इदन्द्रो ह वै नाम तामिदन्द्रं सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण॥ ऐतरेय० १.३.१४॥

अर्थात् उस ब्रह्म को देखने के कारण ही यह जीवात्मा इदन्द्र नाम वाला है, इदन्द्र यह नाम है। उस इदन्द्र के होते हुए को परोक्ष से इन्द्र कहते हैं॥ अतः इस जीवात्मा का नाम ही इन्द्र है। इस प्रकार इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मा को इन्द्र कहते हैं। इस इन्द्र के लोक अर्थात् इस शरीर से सम्बन्धित संज्ञाएं इस प्रकार से हैं —

१. सुधर्मा देवसभा — यह शरीर सुधर्म = सम्यक् रूप से धर्म का अनुष्ठान करने वाली इन्द्रियों की देवसभा = इन्द्रियादि देवों की सभा है, क्योंकि धर्म के बाह्य साधन नेत्रादि इन्द्रियाँ हैं।

२. सुदर्शनं पुरम् — सुदर्शन अर्थात् सम्यक् रूप से दर्शन करने योग्य अथवा सुन्दर = प्रिय यह इन्द्रियादि देवों का शरीर है।

३. वैजयन्त प्रासाद — वैजयन्त का अर्थ इन्द्र है। जो इन्द्रियों का स्वामी हो वह इन्द्र अर्थात् जीवात्मा। इस इन्द्र रूपी जीवात्मा का निवास यह शरीर रूपी प्रासाद = महल है।

४. उद्यानों में मिश्रवन, नन्दन, चैत्ररथ, सुनामस आदि कहा है। उद्यान का अर्थ है प्रमोदवन = आनन्द का स्थान। नन्दनवन का अर्थ करते हुए कोशकारों ने कहा है — “इन्द्र का उद्यान, प्रसन्नता देने वाला”। नन्दन के विषय में ऐतरेयोपनिषद् में कहा है —

स एतयेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत। सैषा विदृतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्॥ ऐतरेय० १.३.१२॥

अर्थात् वह इन्द्र रूपी जीवात्मा मूर्द्धा रूप ऊपर की सीमा को = ब्रह्मरन्ध्र को छेदकर के इसी द्वार से शरीर में प्रविष्ठ होता है। वह यह द्वार विदृति नाम वाला है। वह यह द्वार ही नान्दन अर्थात् आनन्द का स्थान है॥ अतः इस शरीर के सम्बन्ध में यही नन्दनवन है। उद्यान सम्बन्धित अन्य संज्ञाओं की मीमांसा इसी प्रकार से कर लेनी चाहिए।

इन द्वीपों, लोकों, भूमि, पाताल, समुद्र और पर्वत के निवासियों का वर्णन —

१. भूमि, पाताल, समुद्र और पर्वत के निवासी — असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अपस्मारक, अप्सरा, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, विनायक, देव-समूह॥

२. स्वः (माहेन्द्र) लोक निवासी — त्रिदश, अग्निष्वात, याम्य, तुषित, अपरिनिर्मितवशवर्त्ती, परिनिर्मित- वशवर्त्ती॥ (ये अणिमादि विभूति सम्पन्न होते हैं।)

३. महः (प्राजापत्य) लोक निवासी — कुमुद, ऋभव, प्रतर्दन, अञ्जनाभ, प्राचिताभ॥ (ये महाभूतों पर वशित्व वाले होते हैं।)

४. जनलोक निवासी — ब्रह्मपुरोहित, ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक, अजरामर॥ (ये भूत और इन्द्रियों पर अधिकार वाले होते हैं।)

५. तपोलोक निवासी — आभास्वर, महाभास्वर, सत्यमहाभास्वर॥ (ये भूत और इन्द्रिय और प्रकृति पर अधिकार वाले होते हैं।)

६. सत्यलोक निवासी — अच्युत, शुद्धनिवास, सत्याभ, संज्ञासंज्ञी॥ (ये प्रकृति पर अधिकार वाले होते हैं। इनमें से अच्युत सवितर्कसमाधि सुखसम्पन्न; शुद्धनिवास निर्वितर्कसमाधि सुखसम्पन्न; सत्याभ आनन्दसमाधि सुखसम्पन्न; तथा संज्ञासंज्ञी अस्मितासमाधि सुखसम्पन्न होते हैं।)

इस विषय को निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

१. लोक में विभिन्न वृत्तियों वाले लोग होते हैं। सात पाताल जो कि पांच प्रकार की कर्मेन्द्रियाँ रूप दो हाथ, दो पैर, मूत्रेन्द्रिय, मलेन्द्रिय हैं और सातवाँ कटि से मुख पर्यन्त रूप एक लोक है; जो पुरुष इन कर्मेन्द्रियों से प्राप्त होने वाले भोगों, उदर पालन तथा भू लोक यथा पृथिवी के गुणों गन्ध, रूप, रस, स्पर्श के सम्पादन में लगा हुआ होता है वे ही इस प्रथम श्रेणी में आते हैं। इसमें यह जानना चाहिए ये सभी प्रकार की वृत्तियाँ जब अविद्या, अधर्म, अज्ञान से युक्त होती हैं तो दुःखों को प्राप्त कराने वाली तथा निकृष्ट होती हैं, यथा राक्षस, पिशाच अर्थ में; जब ये वृत्तियाँ धर्मानुकूल और दूसरों के कल्याणार्थ होती हैं तो ऐसे पुरुष को देव रूप में ही जाना और कहा जाता है। अर्थात् ऐसी-ऐसी वृत्तियों, गुणों वाले पुरुष ही असुर, गन्धर्व, किन्नर, किम्पुरुष, यक्ष, राक्षस, भूत, प्रेत, पिशाच, अपस्मारक, अप्सरा, ब्रह्मराक्षस, कूष्माण्ड, विनायक, देव-समूह कहाते हैं। ये पुरुष चित्त की प्रथम तीन भूमियों अर्थात् क्षिप्त, मूढ और विक्षिप्त भूमि वाले होते हैं। इनके जीवन में योग अर्थात् चित्तवृत्ति निरोध से सामान्यतः कोई सम्बन्ध नहीं होता।

सूत्र में कथित पुण्यात्मा, देव, मनुष्य आदि संज्ञाओं को गुणवाचक जानना चाहिए। शतपथ १.१.१.३-४ में यजुर्वेद १.५ की व्याख्या करते हुए कहा है — “सत्यं चैवानृतं च सत्यमेव देवाऽ अनृतं मनुष्याः” अर्थात् सत्य ही देव हैं, अनृत मनुष्य हैं। इसी मंत्र की व्याख्या में महर्षि दयानन्द लिखते हैं —

‘मनुष्याणां द्विविधमेवाचरणं सत्यमनृतं च, तत्र ये वाङ्मनःशरीरैः सत्यमेवाचरन्ति ते देवाः। ये चैवानृतमाचरन्ति ते मनुष्या अर्थादसुरराक्षसाः सन्तीति वेद्यम्।’ ॥ यजु॰ १.५॥

अर्थात् मनुष्यों का दो प्रकार का आचरण है, एक सत्य दूसरा अनृत। जो वाणी, मन और शरीर से सत्य का आचरण करते हैं, वे देव कहलाते हैं, जो मिथ्या आचरण करते हैं वे मनुष्य अर्थात् असुर एवं राक्षस हैं॥

इसी प्रकार महर्षि दयानन्द ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका के ग्रन्थप्रामाण्याप्रामाण्यविषय के अन्तर्गत लिखते हैं — “ये सत्यवादिनः सत्यमानिनः सत्यकारिणश्च ते देवाः। ये चानृतवादिनोऽनृतकारिणोऽनृतमानिनश्च ते मनुष्या असुरा एव।” अर्थात् जो मनुष्य सत्यवादी, सत्यमानी और सत्य कर्म करने वाले हैं, वे तो “देव” और जो झूंठ बोलने, झूंठ मानने और मिथ्याचार करने वाले हैं, वे “असुर” कहाते हैं। इसी प्रकार

“ये प्राणपोषकाः स्वार्थसाधनतत्परा मायविनः कपटिनो मनुष्यास्ते ह्यसुराः। ये च परोपकारकाः परदुःखभञ्जना निष्कपटिनो धार्मिका मनुष्यास्ते देवाश्च विज्ञेयाः॥” अर्थात् जो-जो मनुष्य स्वार्थी और अपने प्राण को पुष्ट करने वाले तथा कपट छल आदि दोषों से युक्त हैं, वे “असुर” और जो लोग परोपकारी, परदुःखभंजन तथा धर्मात्मा हैं, वे “देव” कहाते हैं। अतः यहाँ गुणानुसार ही मनुष्यों की देव, असुर, राक्षस आदि संज्ञा होती है, नाकि जाति विशेषानुसार।

उपरोक्त गुणानुसार मनुष्य श्रेणियों की निम्न प्रकार से व्याख्या शास्त्रों में उपलब्ध होती है —

देव — मन, वाणी और शरीर से सत्याचरण करने वाले;

असुर — असुषु प्राणेषु रमते इत्यसुरः। अर्थात् असु = प्राण; जो अपने देह और प्राणों के ही पोषण में, अपने ही स्वार्थ, सुख-सुविधा, धन और हितसाधन में तत्पर रहते हैं, उसकी पूर्त्ति के लिए छल-प्रपंच माया-जाल आदि रचने वाले हो, उन्हें असुर कहते हैं;

गन्धर्व — स्त्रीकामा वै गन्धर्वाः (ऐतरेयब्राह्मण १.५.१); योषित्कामा वै गन्धर्वाः (शतपथ० ३.९.३.२०) अर्थात् स्त्री की कामना करने वाले गन्धर्व कहाते हैं। रूपमिति गन्धर्वाः (उपासते) (शतपथ० १०.५.२.२०) अर्थात् रूप की उपासना करने वाले गन्धर्व कहाते हैं। अतः गन्धर्व शब्द से स्त्रियों की कामना करने वाले, विलासी, श्रृंगार प्रिय और कामुक प्रवृत्ति प्रधान पुरुष, एवं संगीत अर्थात् गाने, बजाने, नाचने की कला में प्रवीण लोगों का ग्रहण होता है।

किन्नर — शरीर की दृष्टि से पुरुष अथवा स्त्री में से किसी एक के धर्मों से रहित;

किम्पुरुष — किम्पुरुषो वै मयुः (यजु॰ १३.४७ के सन्दर्भ में शतपथ० ७.५.२.३२), यजुर्वेद भाष्य में मयुः का अर्थ स्वामी दयानन्द जी ने जगंली पुरुष किया है। अतः जगंली, शिक्षाविहीन, नीच पुरुष किम्पुरुष हैं। (यहाँ किम् अव्यय कु अर्थ में प्रयुक्त हुआ है यथा कुपुरुष, कुपुत्र आदि)

यक्ष — लौकिक धन, सम्पत्ति की रक्षा करने वाले तथा उस की रक्षा हेतु ही सभी प्रकार का पुरुषार्थ करने वाले पुरुष;

राक्षस — रक्षः रक्षितव्यमस्माद्, रहसि क्षणोतीति वा, रात्रौ नक्षते इति वा॥ निरुक्त ४.१८॥ अर्थात् जिससे धन-सम्पत्ति, प्राण आदि की रक्षा करनी पड़े, जो एकान्त अवसर पाकर हानि पहुँचाते और रात्रि में लूट-पाट, चोरी व्यभिचार आदि दुष्ट कर्म करने वाले पुरुष;

भूत — भूतेभ्यः नक्तञ्चरेभ्यः अर्थात् जो रात्रि में विचरण एवं कार्य करता हो;

प्रेत — प्रेत कर्म कराने वाला;

पिशाच — ये पिशितम् = अवयवीभूतं, पेशितं वा मांसं रुधिरादिकम्, आचमन्ति भक्षयन्ति ते पिशाचाः। अर्थात् प्राणियों का कच्चा मांस, रक्त तक खाने-पीने वाले, हिंसक, दुराचारी, अनाचारी, अत्यन्त तमोगुणी, निम्न एवं घृणित स्वभाव वाले पुरुष;

अपस्मारक — अपस्मार का अर्थ है स्मरण शक्ति का अभाव, अतः अपस्मारक वह पुरुष होता है जिसमें स्मरणशक्ति का अभाव हो;

अप्सरा — गन्ध इत्यप्सरसः (उपासते) (शतपथ० १०.५.२.२०) शरीर की ज्ञानेन्द्रियों के विषयों = शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध में तथा कर्मेन्द्रियों के विषयों = भोगों में रक्त पुरुष; (देखें इसी सूत्र पर व्यासभाष्य में अप्सरा की टिप्पणी)

ब्रह्मराक्षस — भ्रूणहत्या अर्थात् ब्रह्महत्या करने वाला पुरुष;

कूष्माण्ड — ऊष्मा अण्डेषु यस्य अर्थात् कामी पुरुष।

विनायक — शिक्षक, बाधाओं को दूर करने वाला पुरुष।

२-६. स्वः लोक से सत्यलोक तक के निवासियों के नामों पर विचार करने से यह ज्ञात होता है कि ये कोई देवों का जातियाँ नहीं हैं। यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो इन सभी देवों का नामकरण भी विशिष्ट वृत्तियों / गुणों के अनुसार ही ज्ञात होता है। इस सम्बन्ध में — स्वःलोक निवासी अपरिनिर्मितवशवर्त्ती, परिनिर्मितवशवर्त्ती; जनलोक निवासी ब्रह्मकायिक, ब्रह्ममहाकायिक; तपोलोक निवासी आभास्वर, महाभास्वर, सत्यमहाभास्वर तथा सत्यलोक निवासी संज्ञासंज्ञी विशेष रूप से द्रष्टव्य हैं। ये सभी नाम स्पष्ट रूप से गुणविशिष्ट ही ज्ञात होते हैं।

ये सभी प्रकार के लोग सम्प्रज्ञातसमाधि की योग्यता वाले तथा विभिूतयों के विशिष्ट स्तरों को प्राप्त किए हुए हैं यथा —

अणिमादि विभूतियों से सम्पन्न पुरुष स्वः लोक निवासी कहाते हैं;

महाभूतों पर वशीत्व प्राप्त किए हुए पुरुष महः लोक निवासी कहाते हैं;

भूत और इन्द्रियों पर अधिकार को प्राप्त किए हुए पुरुष जनलोक निवासी कहाते हैं;

इससे भी आगे बढ़कर भूत, इन्द्रियों और प्रकृति पर अधिकार को प्राप्त किए हुए पुरुष तपोलोक के निवासी कहाते हैं; तथा

वितर्कानुगत से लेकर अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधियों को प्राप्त किए हुए और प्रकृति पर अधिकार सम्पन्न पुरुष सत्यलोक निवासी कहाते हैं।

इस सन्दर्भ में यह जानना चाहिए कि पौराणिक भाष्यकारों द्वारा इन लोकों के नाम से ब्रह्माण्ड में विभिन्न स्थान विशेषों की कल्पना, पुराणों में कथित मिथ्या इतिहास के कारण ही है। किन्तु ”लोक्यत इति लोकः” अर्थात् जो अनुभव से प्राप्त हो वह लोक है; इस व्युत्पति से लोक शब्द अवस्था विशेष ही कहलाता है। इस विषय में कठोपनिषद् का निम्न प्रमाण है—

यथादर्शे तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके।

यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके॥ कठो॰ ६.५॥

अर्थात् जिस प्रकार दर्पण में पदार्थ की स्पष्ट प्रतीति होती है, इसी प्रकार शुद्धान्तःकरण वाले पुरुषों को परमात्मा की निर्भ्रान्त प्रतीति होती है, और जैसे स्वप्नावस्था में जाग्रत संस्कारों के बल से पदार्थ अन्यथा प्रतीत होते हैं वैसे ही केवल कर्मी लोगों की दशा में परमात्मा का यथार्थ अनुभव नहीं होता, और जिसप्रकार जलों में चारों ओर अवयव दीखते हुए भी दर्पणवत् स्पष्ट उपलब्ध नहीं होते; इसी प्रकार गन्धर्व = रसिक लोगों को परमात्मा का ज्ञान आभासमात्र होता है, परन्तु ब्रह्मज्ञानियों को ज्ञान की अवस्था में छाया तथा धूप के समान परमात्मा का ज्ञान यथावस्थित बना रहता है।

यहाँ लोक शब्द से स्पष्ट रूप से अनुभव से प्राप्त होने वाली स्थितियों को ही कहा है। यथा पितृलोक से कर्मी लोगों की कर्मानुष्ठान अवस्था, गन्धर्वलोके से गानविद्या में निपुण रसिक लोगों की अवस्था का वर्णन होता है। इस प्रकार के अन्य प्रमाण भी उपलब्ध होते हैं। विभिन्न आचार्यों ने इस अर्थ को ही माना है।

यहाँ इस सूत्र में जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक को ब्रह्मलोक कहा गया है। कुछ भाष्यकार यहाँ शंका करते हैं कि सभी लोक ब्रह्म से व्याप्त होने से सभी लोक ब्रह्मलोक ही हैं, इसलिये यहाँ इन तीनों को ही ब्रह्मलोक कहना सिद्धान्तहीनता है। इस विषय में हमारा यह कहना है कि मुण्डकोपनिषद् ३.२.६ में “ब्रह्मलोकेषु” तथा बृहदारण्यकोपनिषद् ६.२.१५ में “ब्रह्मलोकान्” पद आया है, जहाँ जीवों की ब्रह्मलोकों में प्राप्ति दर्शायी गयी है। ऐसे में उपर्युक्त शंका के आधार पर सभी लोक ब्रह्मलोक होने से, सभी जीव ब्रह्मलोकों में स्वतः ही निवास कर रहे हैं, तो इन प्रमाणों के आधार पर ब्रह्मलोकों की प्राप्ति का क्या अर्थ होगा ? जबकि इन्हीं प्रमाणों के आधार पर महर्षि व्यास ने यहाँ जनलोक, तपोलोक और सत्यलोक इन तीनों को ब्रह्मलोक कहा है और इसकी संगति वेदान्तसूत्र ४.३.७ से ४.३.११ तक भी प्राप्त होती है, जिसे महर्षि व्यास ने अपने मत के रूप में वहाँ प्रस्तुत किया है। अतः यह स्पष्ट है कि इन ब्रह्मलोकों का वर्णन जीवात्मा की चित्तस्थ स्थितियों से ही सम्बन्धित है। इस प्रकार यहाँ भी विशेष गुणों, ज्ञान आदि के आधार से विभिन्न लोकों की प्राप्ति को, विभिन्न अवस्था विशेषों की प्राप्ति ही जानना चाहिए।

इन देवों की आयु — इस विषय में यह जानना चाहिए कि आयु जीवनकाल का नाम है। इस सूत्र में आधुनिक भाष्यकारों के अनुसार माहेन्द्रलोक निवासियों की कल्प आयु से आरम्भ कर महःलोक निवासियों की सहस्र कल्प आयु से लेकर तपलोक निवासियों तक की दुगनी-दुगनी करते हुए १२८००० कल्प आयु का कथन किया गया है। और अन्तिम सत्यलोक निवासियों की वर्त्तमान सर्ग पर्यन्त आयु का कथन है। वस्तुतः इस प्रकार से आयुविषयक व्याख्या में विरोधाभास स्पष्ट रूप से प्रतीत हो रहा है। जो अन्तिम सबसे उच्च अवस्था वाले अर्थात् सत्यलोक निवासी देवगण हैं, उनकी आयु इस सर्ग पर्यन्त और उनसे नीचे वाले लोकों के निवासियों की आयु १२८००० कल्प पर्यन्त कैसे सम्भव मानी जाए ?

इसका रहस्य भी ऊपर स्पष्ट है। जब ये सभी लोक और देवगण, शरीर और चित्त की गुणानुकूल स्थितियाँ ही हैं। तो ऐसी अवस्था में इस शरीर की इतनी आयु सम्भव नहीं हो सकती। वस्तुतः कल्प का एक अर्थ “नियम” भी है। इसका अभिप्राय है कि उपरोक्त स्थितियों वाले पुरुष वेदादि सत्यशास्त्रों और योग नियमानुकूल आयु को जीने वाले होते हैं। चित्त की ऊँची अवस्था वाले पुरुषों के लिए नियमों की संख्या का बढ़ता जाना स्वाभाविक है। अतः माहेन्द्र लोक की स्थिति वाले देवगणों की अपेक्षा से महःलोक की स्थिति वाले देवगणों हेतु नियमों की संख्या अधिक है। इसी प्रकार आगे की स्थितियों में भी जानना चाहिए। यहाँ सहस्र का अर्थ १००० न लेकर “बहु = अधिक” लेना चाहिए। और जो अन्तिम सत्यलोक की अवस्था वाले देवगण हैं, उनकी वर्त्तमान सर्ग पर्यन्त आयु कही गयी है, उसको निम्न प्रकार से समझना चाहिए —

योगसूत्र १.१९ में महर्षि व्यास ने विदेह और प्रकृतिलय योगियों के लिए चित्त के निवृत्त न होने से इनको कैवल्यपद जैसा अनुभव होना कहा है और जब तक इनके भोग समाप्त नहीं होते तब तक ये लौकिक स्थिति में नहीं लौटते। (विशेष व्याख्यान हेतु १.१९ सूत्र की व्याख्या देखें)। इसी प्रकार इन देवों की सर्गपर्यन्त आयु के विषय में भी जानना चाहिए।

कल्प आयु के विषय को दूसरे पक्ष में इस प्रकार से समझा जा सकता है —

वह आयु शरीर से सम्बन्धित न जानकर वृत्तियों से सम्बन्धित जाननी चाहिए। योगसूत्र १.५ के भाष्य में महर्षि व्यास ने “एवं वृत्तिसंस्कारचक्रमनिशमावर्त्तते” कहा है। अर्थात् इस प्रकार वृत्ति-संस्कार रूप चक्र निरन्तर चलता रहता है। इससे यह जानना चाहिए कि सम्प्रज्ञात समाधि के सम्पादन तथा भूत-इन्द्रियों और प्रकृति वशित्व रूप उपरोक्त वृत्तियों से वैसे ही संस्कार और उस प्रकार के संस्कारों से वैसी वृत्तियाँ। इस प्रकार से जो विशिष्ट गुणों द्वारा उपर्युक्त प्रकार की चित्तस्थ स्थिति = लोक प्राप्ति कही गई है, वह दीर्घ काल पर्यन्त बनी रहने वाली है। परन्तु इन सभी स्थितियों में भी अविद्या का नाश और पुरुष के कर्माशय का दग्धबीजभाव वाली अवस्था न होने से, उपर्युक्त प्रकार से देवगुणों से युक्त पुरुषों के लिए मोक्षप्राप्ति नहीं मानी गई है। ऐसी स्थिति में उपर्युक्त प्रकार की सुखसम्पन्न अवस्थाओं को प्राप्त पुरुष के लिए, अविद्यादि क्लेशों और कर्माशय की निवृत्ति न होने से, दुःख का सर्वथा नाश नहीं होता। वस्तुतः तो जीव = पुरुष अनन्त काल से ही जन्म-मरण के चक्र में घूमता हुआ, अपने कर्माशय और अविद्यादि क्लेशों से सम्बन्ध बने रहने से, अतिदीर्घ अनन्त कल्पों का जीवन काल ही तो भोग रहा है, जिसमें सूक्ष्म और कारण शरीरों का नाश नहीं होता, केवल और केवल मात्र स्थूल शरीर ही बदलता रहता है। और जब तक वह मुक्ति को प्राप्त नहीं होता, तब तक दुःख की अवस्था का सर्वथा नाश न होने से, उस दीर्घ काल की तुलना मुक्ति काल, जो कि ३६००० कल्प का है, से नहीं की जा सकती; और न ही इस दीर्घ काल को किसी भी प्रकार से मुक्ति के समतुल्य या उससे श्रेष्ठ कहा जा सकता है। अतः इस सन्दर्भ में दीर्घ काल होना, सिद्धान्तविरुद्ध नहीं कहा और माना जा सकता।

कुछ विद्वान् यह शंका कर सकते हैं कि आयु के सम्बन्ध में उपर्युक्त व्याख्या युक्तियुक्त नहीं है। परन्तु इस विषय में महर्षि पतञ्जलि का भी यही मत ज्ञात होता है। देखो, महर्षि पतञ्जलि योगसूत्र २.३४ में कहते हैं कि हिंसा आदि वितर्क जो कि ८१ प्रकार से है वे दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फलों को देने वाले हैं। इस में यह विचार करना चाहिए कि जीवन में कुछ काल पर्यन्त किए गए हिंसा आदि कर्म, पुरुष को दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फल कैसे दे सकते हैं ? इस का भी यही उत्तर है कि वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र। इसी तथ्य को महर्षि पतञ्जलि ने योगसूत्र २.१५ में संस्कारदुःख के रूप में कहा है। जब इसी जीवन में किये जाने वाले हिंसा आदि सान्त कर्मों के दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फल हो सकते है, तो इसी प्रकार से सभी वृत्तियों के विषय में समझा जा सकता है।

दीर्घ आयु के विषय में एक अन्य पक्ष इस प्रकार से हो सकता है — शास्त्रों में एक विश्वसृज याग का वर्णन है जो कि एक सहस्र संवत्सर = १००० एक हजार संवत्सर आयु वाले मनुष्य का अधिकार है। इस प्रकारण में महर्षि जैमिनि मीमांसा दर्शन में निर्णय करते हुए कहते हैं —

अहानि वाऽभिसंख्यत्वात्॥ मीमांसा॰ ६.७.४०॥

अन्य पक्षों की निवृत्ति करते हुए कहा है कि “संवत्सर से दिन अभिप्रेत है, त्रिवृत अह के गणनीय होने से।” इस पक्ष में मनुष्य की सौ वर्ष की आयु का अभिप्राय हुआ ३६००० संवत्सर की आयु और ४०० वर्ष की आयु का अभिप्राय हुआ १४४००० संवत्सर। यह ध्यान रखना चाहिए कि इस पृथिवी लोक में दिन का २४ घंटे का मान लोक सापेक्ष है। क्योंकि दूसरे ग्रहों पर दिन का मान उस ग्रह और सूर्य की दूरी पर निर्भर करेगा। और वेद में कहीं भी संवत्सर का मान व्याख्यात नहीं किया गया क्योंकि यह विषय लोकनिरपेक्ष नहीं है।

इस प्रकार से उपर्युक्त व्याख्यान के बाद भी कुछ स्थल अभी भी विवादित प्रतीत होते हैं। परन्तु इस अज्ञान में भी दोष हमारा है। महर्षि व्यास के पश्चात् किसी भी योगी ने इस विषय में संयम नहीं किया; और अन्य विद्याहीन लोगों ने महर्षि व्यास के नाम से मिथ्या पुराणों की रचना करके न केवल इस विषय में, बल्कि वेद की संज्ञाओं के आधार पर भी, मिथ्या इतिहास रच दिया, जिसके कारण सत्य छिप सा गया हैं। परन्तु वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणों के आधार पर संयम द्वारा इस विषय को जानने का, एक मार्गदर्शन इस व्याख्या में किया है, जिससे इस सूत्र में प्रतिपादित सिद्धि का साक्षात्कार सम्भव है।

हिंदी में टिप्पणी : सूर्य का प्राण अर्थ करने हेतु, प्रमाणों को व्याख्या में देखें।