In Hindi:
पदपाठ : चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्॥
हिंदी में अर्थ : (चन्द्रे) चन्द्रमा = मन में संयम करने से (ताराव्यूहज्ञानम्) तारा अर्थात् इन्द्रियों की स्थिति का ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : चन्द्रे संयमं कृत्वा ताराणां व्यूहं विजानीयात्॥
हिंदी में अर्थ : (चन्द्रे) चन्द्रमा = मन में (संयमम् कृत्वा) संयम करके (ताराणाम्) तारों = इन्द्रियों के (व्यूहम्) व्यूह = संनिवेश को (विजानीयात्) जानना चाहिए ॥
वैदिक योग मीमांसा : भोज और उसके बाद के भाष्यकारों के अनुसार लौकिक चन्द्रमा अथवा शरीरस्थ चन्द्रनाड़ी में संयम करने से ताराओं के व्यूह = स्थितिक्रम का ज्ञान योगी को हो जाता है। परन्तु इस प्रकार का निष्कर्ष निम्न कारणों से सत्य से परे है —
१. ब्रह्माण्ड में तारे स्वयं प्रकाश का साधन हैं, जबकि लौकिक चन्द्रमा किसी तारे = सूर्य के प्रकाश से ही प्रकाश को प्राप्त कर चमकता है।
२. लौकिक चन्द्रमा अपने मूल ग्रह, यथा पृथिवी आदि की परिक्रमा करता है और अपने मूल ग्रह की स्थिति के अनुसार ही आकाश में स्थित होता है।
३. लौकिक चन्द्रमा का प्रत्यक्षतया सम्बन्ध अपने मूल ग्रह के तारे = सूर्य से तो है; परन्तु आकाश गंगा / मन्दाकिनी में स्थित करोड़ों, अरबों तारों से किसी प्रकार नहीं हो सकता। इसी प्रकार शरीरस्थ चन्द्र नाड़ी का सम्बन्ध भी ब्रह्माण्डस्थ तारों से नहीं जाना जाता और न ही इस पक्ष में कोई प्रमाण ही है।
लौकिक चन्द्रमा अथवा शरीरस्थ चन्द्रनाड़ी से ताराओं के व्यूह का कोई सम्बन्ध वेदादि सत्यशास्त्रों के प्रमाणानुसार सिद्ध नहीं होता। दूसरी ओर महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास इस सम्बन्ध के बारे में, इस सूत्र में, स्पष्ट रूप से कह रहे हैं; अतः इसके रहस्य को समझना होगा।
पूर्व के सूत्र में जैसे सूर्य को शरीरस्थ प्राण के रूप में सिद्ध किया गया है, उसी प्रकार चन्द्र का सम्बन्ध भी शरीरस्थ किसी अङ्ग आदि से होना चाहिए। योगसूत्र ३.१-३ में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बाह्य देश विशेष योगी के संयम का विषय नहीं हो सकते। आइए सूत्र में कथित चन्द्र के रहस्य को समझें —
च॒न्द्रमा॒ मन॑सो जा॒तः। (यजु॰ ३१.१२)
अर्थात् इस ब्रह्म पुरुष के मन अर्थात् मननशील सामर्थ्य से चन्द्रमा ........ उत्पन्न हुआ। (महर्षि दयानन्द वेदभाष्य)
इस सन्दर्भ में ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रमाण देखें —
चन्द्रमा मे मनसि श्रितः। (तैत्तिरीयब्रा॰ ३.१०.८.५)
— अर्थात् चन्द्रमा ही मन में पहुँचा हुआ है = स्थित है।
मनश्चन्द्रमाः। (ऐतरेय उपनिषद् १.१.४)
— अर्थात् मन से चन्द्रमा का प्रादुर्भाव हुआ।
चन्द्रमा वै ब्रह्माऽधिदैवं मनोऽध्यात्म्। (गोपथ ब्रा॰ पूर्वभाग ४.२)
— अध्यात्म अर्थात् शरीरपक्ष में चन्द्रमा मन है।
यत्तन्मन एष स चन्द्रमाः। (शत० १०.३.३.७)
— यह जो मन है, वह यह चन्द्रमा है।
चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदयं प्राविशन्। (ऐतरेय उपनिषद् १.२.४)
— अर्थात् चन्द्रमा मन रूप होकर हृदय में प्रविष्ट हुआ।
यदिदं मनः सोऽसौ चन्द्रः। (बृहदारण्यकोपनिषद् ३.१.६)
— जो यह मन है, वह यह चन्द्रमा है। यहाँ याज्ञवल्क्य यज्ञ के आध्यात्मिक स्वरूप का वर्णन करते हुए मन को ब्रह्मा कहते हैं, उसी सन्दर्भ में मन को चन्द्रमा भी कहा है।
उपरोक्त प्रमाणों से स्पष्ट है कि शरीरस्थ मन ही चन्द्रमा है।
अब चन्द्रमा = मन में संयम से किन तारों के व्यूह का ज्ञान होता है ? यह प्रश्न विचारणीय है। इस प्रश्न का उत्तर भी इन्हीं ब्राह्मणग्रन्थों में उपलव्ध होता है —
मनोऽन्तरिक्षलोकः। (शत० १४.४.३.११)
अर्थात् मन ही अन्तरिक्ष लोक है। अब इस अन्तरिक्ष लोक में क्या प्रतिष्ठित है —
मनसि हि सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिताः। (शत० ७.५.२.६)
अर्थात् मन में सभी प्राण प्रतिष्ठित हैं।
मनो वै प्राणानामधिपतिर्मनसि हि सर्वे प्राणाः प्रतिष्ठिताः। (शत० १४.३.२.३)
अर्थात् मन ही सभी प्राणों का अधिपति है और मन में ही सभी प्राण प्रतिष्ठित हैं।
और ये प्राण क्या हैं ? —
सप्त शिरसि प्राणाः। प्राणा इन्द्रियाणि। (ताण्डयमहाब्राह्मण २.१४.२)
शिर में सात प्राण हैं। प्राण इन्द्रियाँ हैं। अतः मन में प्रतिष्ठित प्राण ही इन्द्रियाँ हैं।
इसी प्रकार उपनिषदों में भी इन्द्रियों को प्राण शब्द से कहा है।
अतः स्पष्ट है कि मन में स्थित इन इन्द्रियों के व्यूह = स्थिति = संनिवेश का ज्ञान मन में संयम करने से होता है।
शंका — महर्षि पतञ्जलि चन्द्रमा में संयम से तारों की स्थिति का ज्ञान कहते हैं। यदि यहाँ उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर चन्द्रमा से मन का ग्रहण कर भी लिया जाए तो भी तारों से इन्द्रियों का ग्रहण करना उचित नहीं है।
समाधान — देखो जो तारा = नक्षत्र है, वह लोक में प्रकाश का साधन है। और अध्यात्म पक्ष में प्रकाश, ज्ञान को कहते हैं। भोज योगसूत्र ३.४७ की व्याख्या में इन्द्रियों के स्वरूप के विषय में कहते हैं — “स्वरूपं सामान्येन प्रकाशकत्वम्” अर्थात् सामान्य रूप से विषयों का प्रकाश करना इन्द्रियों का स्वरूप है। अब इन्द्रियाँ ही शरीर में स्थित हुई मन के आश्रय से बाह्यविषयों का ज्ञान = प्रकाश कराती हैं, तभी आत्मा बाह्यविषयों का प्रत्यक्ष करने में समर्थ होता है। जिस पुरुष की नेत्रेन्द्रिय नहीं होती वह कभी भी बाह्यविषयों के रूप का प्रत्यक्ष नहीं कर पाता। अतः शरीर में इन्द्रियाँ ही तारा = नक्षत्र रूप से प्रकाश = ज्ञान का साधन हैं।
ऐसा प्रतीत होता है कि भोज ने यहाँ तैत्तिरीयब्राह्मण के निम्न वचनों के आधार पर बाह्य चन्द्र और तारा परक अर्थ किया है—
चन्द्रमा अस्यादित्ये श्रितः। नक्षत्राणां प्रतिष्ठा।
नक्षत्राणि स्थ चन्द्रमसि श्रितानि। तै॰ ब्रा॰ ३.११.१.१२-१३॥
भोज ने चन्द्रमा से लौकिक चन्द्रमा का ग्रहण करके नक्षत्राणि से अन्तरिक्ष में स्थित तारों को ही लिया है। परन्तु यह भाष्य महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास की भावना के प्रतिकूल ही जानना चाहिए। भोज के बाद के भाष्यकारों ने तो उसका ही अन्धानुकरण मात्र किया है। जैसा कि ऊपर ब्राह्मणग्रन्थों के प्रमाणों से सिद्ध किया है कि शरीरपक्ष में चन्द्रमा से मन का ही ग्रहण उचित है, तो ऐसे में मन रूपी अन्तरिक्ष में स्थित इन्द्रियाँ को ही तारा कहना उचित होगा। (यह तो हम पूर्व ही कह चुके हैं कि किसी एक चन्द्रमा से अन्तरिक्ष में स्थित असंख्य तारों के व्यूह = स्थिति का कोई सम्बन्ध नहीं है।) अतः चन्द्रमा रूपी मन के अन्तरिक्ष में तारों रूपी इन्द्रियों की स्थिति ही स्पष्ट करती है, कि मन में संयम से योगी को ज्ञान के साधन इन्द्रियों की स्थिति का ज्ञान होता है।