In Hindi:
पदपाठ : ध्रुवे तद् गतिज्ञानम्॥
हिंदी में अर्थ : (ध्रुवे) ध्रुव = निश्चल, निष्कम्पित मन में संयम करने से (तद्गतिज्ञानम्) उन तारों = इन्द्रियों की (विषयों के प्रति) गति का ज्ञान होता है॥
व्यास भाष्य : ततो ध्रुवे संयमं कृत्वा ताराणां गतिं विजानीयात्। ऊर्ध्वविमानेषु कृतसंयमस्तानि विजानीयात्॥
हिंदी में अर्थ : (ततः) उन इन्द्रियों के व्यूह = स्थिति का ज्ञान होने के पश्चात् (ध्रुवे) निश्चल = निष्कम्पित मन में (संयमम् कृत्वा) संयम करके (ताराणाम्) तारों = इन्द्रियों की (गतिम् विजानीयात्) गति जाने। (ऊर्ध्वविमानेषु) मन = चित्त की ऊर्ध्व = उच्चस्थितियों में (कृतसंयमः) संयम करके (तानि) उन स्थितियों, उनकी गति को (विजानीयात्) जाने॥
वैदिक योग मीमांसा : पिछले सूत्र में योगी को मन में संयम करने से इन्द्रियों की स्थिति का ज्ञान होना कहा गया है। जब योगी, मन और इन्द्रियों के स्थितिक्रम का प्रत्यक्ष = सम्यग्ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह इन्द्रियों की विषयों के प्रति होने वाली गति को जानना चाहता है। अतः महर्षि पतञ्जलि उपदेश करते हैं “ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्” अर्थात् ध्रुव = निश्चल मन में संयम करके योगी तत् = उन इन्द्रियों की गति को जाने।
अनन्त काल से वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र में लगे हुए चित्त की, बाह्यविषयों के प्रति स्वाभाविक गति को पुरुष सामान्यतः नहीं जान पाता, और अपने क्लिष्ट वृत्ति-क्लिष्ट संस्कार-क्लिष्ट वृत्ति चक्र को सुदृढ़ करता जाता है। परन्तु योगमार्ग पर अग्रसर योगी के लिए इस क्लिष्ट वृत्ति-संस्कार-वृत्ति चक्र को तोड़ना, नितान्त आवश्यक रहता है। इसके लिए इन्द्रियों की बाह्यविषयों के प्रति होने वाली स्वाभाविक गति को जानकर ही इस क्लिष्ट चक्र को अविरुद्ध किया जा सकता है। अतः पहले महर्षि पतञ्जलि ने चन्द्रमा रूपी मन में संयम कर, तारा अर्थात् विषयों के ज्ञान को प्रकाशित करने वाली इन्द्रियों की स्थिति के ज्ञान हेतु उपदेश करके, इस सूत्र में मन को ध्रुव = निष्कम्पित करके इन्द्रियों की गति के विज्ञान को साक्षात् करने का उपदेश दिया है।
योगसूत्र २.५४ की व्याख्या में महर्षि दयानन्द कहते हैं कि “ जब पुरुष अपने मन को जीत लेता है, तब इन्द्रियों की जीतना अपने आप हो जाता है। ” अर्थात् अस्थिर मन के होने पर इन्द्रियों की बाह्य विषयों के प्रति गति, पुरुष की प्रेरणा से ही, स्वाभाविक रूप से होती है; जबकि पुरुष व्यवहार काल में यह जान ही नहीं पाता। जब मन को निश्चल कर लिया जाता है, तो मन अपने अनुरूप प्रत्येक इन्द्रिय को इच्छित विषय में लगा सकता है; इस प्रकार योगी प्रत्येक इन्द्रिय की गति का ज्ञान प्राप्त करने में सफल हो जाता है। अर्थात् वह यह जान सकता है कि कौन सी इन्द्रिय, किन कारणों (अविद्या, राग-द्वेष-मोह आदि) से अथवा चित्तगत संस्कारों से प्रभावित होकर, अपने विषयों की ओर गति करती है।
यजुर्वेद ७.२५ में “ध्रुवेण मनसा वाचा” आया है। इस का अर्थ करते हुए महर्षि दयानन्द ने “(ध्रुवेण) निष्कम्पेण (मनसा) अन्तःकरणेन ध्रुवया (वाचा) वाण्या..... अर्थात् स्थिर अन्तःकरण (मन) से तथा स्थिर वाणी से ...... ध्रुव = निश्चल परमात्मा को स्वीकार करे।” अतः वाणी आदि की स्थिरता से पूर्व मन की स्थिरता = निश्चलता होनी आवश्यक है, तभी अन्य इन्द्रियों की गति का ज्ञान कर उनकी स्थिरता का सम्पादन कर साधक उन्हें इच्छित विषय में लगा सकता है। अतः यहाँ साधक के लिए स्थिर मन से इन्द्रियों की गति के ज्ञान का उपदेश है। भाष्य में ऊर्ध्वविमानेषु पद से मन की ऊर्ध्व = उच्च ज्ञानरूप स्थितियों में संयम से उनके ज्ञान को प्राप्त करने का निर्देश भी भाष्यकार ने दिया है।
यहाँ पूर्व के दो सूत्रों के समान ही ध्रुव तारे रूप बाह्यविषय में संयम से बाह्य नक्षत्र = तारों की गति का ज्ञान सिद्धान्तविरुद्ध ही जानना चाहिए। इस सूत्र पर भोजवृत्ति को, पूर्व के दो सूत्रों पर भोजवृत्ति के समान ही, हेय कोटि में जानना चाहिए।
शंका — आधुनिक भाष्यकारों ने “ध्रुवे” से “ध्रुव तारा” का ग्रहण किया है और उस ध्रुव में संयम से अन्य तारों की गति का ज्ञान होना कहा है।
समाधान — यह कल्पना भी भोज और उसके काल के बाद की ही देन है। वस्तुतः ब्रह्माण्ड में कोई भी तारा, ग्रह या नक्षत्र स्थिर नहीं है। किसी भी तारे या ग्रह में स्थिरता का कथन, किसी दूसरे तारे या ग्रह की अपेक्षा से ही किया जा सकता है। यथा पृथिवी की अपेक्षा से सूर्य, क्योंकि पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती है, इसी प्रकार चन्द्र की अपेक्षा से पृथिवी भी स्थिर कही जाती है। वास्तव में न तो सूर्य स्थिर है और न ही पृथिवी। ये दोनों ही अपनी कक्षा में गति करने वाले है। अन्तरिक्ष में कोई भी तारा या ग्रह बिना गति किए स्थिर नहीं रह सकता। यह पदार्थ विज्ञान है, और इस विषय में वेद का प्रमाण है —
जिस परमेश्वर ने जिस महान् सूर्य लोक के भ्रमण के लिए विशाल कक्षा का निर्माण किया है, जो कि वायु रूप इन्धन से प्रदीप्त रहता है। जो ये समस्त लोक हैं, वे अन्तरिक्ष रूपी परिधि वाले हैं। किसी लोक का किसी अन्य लोक के साथ कोई संग नहीं है, किन्तु आकाश में स्थित रहते हुए अपनी-अपनी परिधि में घूमते हैं। ........ (ऋ० १.२४.८ पर महर्षि दयानन्द भाष्य का भावार्थ)
अतः किसी स्थिर ध्रुव तारे की कल्पना ही मिथ्या है। यदि मूल सूत्र पर विचार करें तो सूत्र में “तारा” शब्द ही नहीं है। ऐसे में भाष्यकारों ने ध्रुव तारे से तारों की गति का ज्ञान किस प्रकार से कहा। इसका उत्तर यह दिया जाता है कि व्यासभाष्य में तारों की गति को जानने का उपदेश है। जबकि भाष्यकारों ने “तारा” शब्द की पूर्व सूत्र से अनुवृत्ति मान कर ऐसा अर्थ किया है, और व्यासभाष्य का भी वैसा ही अर्थ कर दिया है। वस्तुतः यहाँ पूर्व सूत्र का वास्तविक अभिप्राय न समझने के कारण इस सूत्र के अर्थ का अनर्थ किया गया है।
वास्तव में इस सूत्र में ध्रुव शब्द विशेषण है और विशेष्य पद है “चन्द्र” अर्थात् मन जिसकी पिछले सूत्र से अनुवृत्ति हुई है। इस सन्दर्भ में इस उपर्युक्त अर्थ को समझने से सूत्र का रहस्य स्पष्ट हो जाता है। अतः उपर्युक्त अर्थ ही उचित है।
शंका — यदि इन तीनों सूत्रों पर आप द्वारा किया गया उपर्युक्त अर्थ सही मान लिया जाए, तो यह प्रश्न होता है कि महर्षि पतञ्जलि ने इन विभूतियों को आलंकारिक रूप से क्यों कहा, तथा अन्य विभूतियों के समान इनको भी स्पष्ट रूप से प्रतिपादित क्यों नहीं किया ?
समाधान — सूर्य, चन्द्र और ध्रुव के लिए केवल मात्र “सूर्य, चन्द्र और ध्रुव तारा” रूप लौकिक अर्थ तो महाभारत काल के बाद में ही रूढ हुए हैं। जैसा कि योगसूत्र ३.१ से ३.३ तक की व्याख्या से यह सिद्ध है कि योग में संयम हेतु बाह्य विषयों का कोई सम्बन्ध नहीं है; इसीलिए हमने ऊपर वेद, उपनिषद् और ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रमाणों से इनके उन अर्थों को स्पष्ट किया है, जिससे ये संयम के आभ्यान्तर विषय सिद्ध हो सकें। महाभारत काल पर्यन्त वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन रहने से किसी प्रकार की भ्रान्ति नहीं थी। अतः महर्षि व्यास ने भी जब सूत्रों पर विस्तृत भाष्य लिखा तो उन्होंने भी महर्षि पतञ्जलि की उसी शैली का अनुसरण करते हुए ही भाष्य किया। देखो, इस विषय में हमने ऊपर प्रमाणों से सिद्ध किया है कि किसी भी ग्रह विशेष के उपग्रह रूप में उपस्थित लौकिक चन्द्र का सम्बन्ध, ब्रह्माण्ड के सभी तारों से नहीं हो सकता; और न ही कोई तारा ध्रुव = स्थिर ही है।
जिस प्रकार शास्त्रों में प्राण शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण किया गया है; तथा महर्षि व्यास ने भी वेदान्त दर्शन में “तथा प्राणाः” (२.४.१) सूत्र में इन्द्रियों को प्राण शब्द से कहा है। (इस तथ्य को वेदान्तदर्शन के सभी भाष्यकारों ने स्वीकार किया है, तथा उक्त शास्त्रों में प्राण शब्द से इन्द्रियों का ग्रहण वर्त्तमान के भाष्यकार भी करते हैं। ) इसी प्रकार यह सम्भव है कि उस काल में अध्यात्मपक्ष में सूर्य से “प्राण”, चन्द्र से “मन” का ग्रहण ही परम्परा से होता हो, क्योंकि सूर्य के प्राण-परक और चन्द्र के मन-परक अर्थ वेदादि सत्यशास्त्रों में उपलब्ध होते हैं, जिनका प्रमाण हमने पिछले दो सूत्रों की व्याख्या में दिया है।
अतः ऐसा ज्ञात होता है कि उस काल में वेद, उपनिषद् और ब्राह्मण ग्रन्थों के प्रमाणानुकूल सूर्य, चन्द्र और ध्रुव के उपर्युक्त अर्थ प्रचलन में थे, और उस काल में योगियों / ऋषियों को इस विषय में कोई संशय था ही नहीं। यह तो महाभारत काल के पश्चात् वेदादि सत्यशास्त्रों का पठन-पाठन न रहने से, मनुष्यों की योग में गति न रहने से, व्यास के नाम पर विभिन्न पुराणों की रचना हो जाने पर तथा उनमें व्यासभाष्य की संज्ञाओं के आधार पर मिथ्या इतिहास रच दिए जाना, आदि-आदि, कारणों से ही इन सूत्रों का वास्तविक अभिप्राय लुप्त हो गया और अधिदैवत रूप से सर्वथा असम्बद्ध अर्थ प्रचलन में आ गया। हम तो यह कहते हैं कि इस शैली को आलंकारिक नहीं मानना चाहिए, और यह समझना चाहिए कि “अगर (१) पुराणों के मिथ्या इतिहास सन्दर्भों को हटा दिया जाये, (२) महर्षि पतञ्जलि की यह मान्यता, कि समाधि योग में संयम हेतु बाह्यविषय आलम्बन नहीं होते, सिद्धान्तरूप से सामने रखी जाये, तथा (३) वेद, उपनिषद् आदि के उपर्युक्त प्रमाणों के सन्दर्भ में तथा सृष्टि विद्या के वास्तविक रहस्य को चित्तगत करके, इन तीनों सूत्रों का अर्थ किया जाए तो आधुनिक काल वाला अर्थ तो सम्भव ही नहीं हो सकता।” परन्तु पौराणिक जगत् के विद्वान् तो पुराणों को वेद से अधिक महत्त्व देते हैं, अतः उनसे ऐसी आशा करना व्यर्थ था; दूसरी ओर आर्य जगत् के विद्वानों ने पुराणों के सन्दर्भों में योगसूत्र ३.२६ के भाष्य को ही प्रक्षिप्त कह दिया। महर्षि व्यास के बाद तो किसी भी योगी अथवा योग की विभूतियों को प्राप्त करने वाले ने योगदर्शन पर व्याख्या नहीं की। अतः इन्हीं कारणों से ही इन सूत्रों पर ऐसी विसंगति प्रतीत होती है। अन्यथा वैदिक काल के सन्दर्भ में तो ये सूत्र अन्य सूत्रों के समान ही स्पष्ट और प्रामाणिक ही हैं।
हिंदी में टिप्पणी : यहाँ पिछले सूत्र से चन्द्र = मन की आवृत्ति है, और ध्रुव संज्ञा शब्द न होकर मन का विशेषण है।