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Vibhuti Paada / Attainments / 29
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Vibhuti Paada / Attainments / 29

नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्॥२९॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 29

In Hindi:

पदपाठ : नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्॥

हिंदी में अर्थ : (नाभिचक्रे) नाभिचक्र में संयम करने से (कायव्यूहज्ञानम्) शरीर के व्यूह = स्थितिक्रम का ज्ञान होता है॥

व्यास भाष्य : नाभिचक्रे संयमं कृत्वा कायव्यूहं विजानीयात्। वातपित्तश्लेष्माणस्त्रयो दोषाः। धातवः सप्त त्वग्लोहितमांसस्नाय्वस्थिमज्जाशुक्राणि। पूर्वं पूर्वमेषां बाह्यमित्येष विन्यासः॥

हिंदी में अर्थ : योगी (नाभिचक्रे) नाभिचक्र में (संयमम् कृत्वा) संयम करके (कायव्यूहम्) काया = शरीर के स्थितिक्रम को (विजानीयात्) जाने। (वातपित्तश्लेष्माणः) वात, पित्त और कफ, ये (त्रयः दोषाः) तीन दोष हैं। (त्वग्लोहितमांसस्नाय्वस्थिमज्जाशुक्राणि) त्वचा, रक्त, मांस, स्नायु = नाडी, अस्थि, मज्जा = अस्थि में रहने वाला रस = धातु, और शुक्र = वीर्य, ये (सप्त धातवः) सात धातुएँ हैं। (एषाम्) इन सात धातुओं में (पूर्वम् पूर्वम्) पूर्व-पूर्व के धातु (बाह्यम्) अपने बाद की धातु की अपेक्षा से बाह्य हैं। (इति एष विन्यासः) इस प्रकार से इनका सन्निवेश है॥

वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में नाभिचक्र में संयम का फल कहा है। नाभिचक्र शरीर के मध्य में स्थित है। इसमें संयम करने वाले योगी को शरीर के व्यूह = सन्निवेश = स्थितिक्रम का ज्ञान हो जाता है। इसको स्पष्ट करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं — वात, पित्त और कफ तीन दोष हैं। आयुर्वेद के अनुसार शरीर में इन तीन दोषों की समता से शरीर का स्वास्थ्य रहता है, और इनकी विषमता से शरीर में भिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं, जिसके कारण शरीर के सन्निवेश में विषमता आ जाती है।

शरीर की बाह्य त्वचा से लेकर शुक्र = वीर्य पर्यन्त सात धातुएँ हैं। इसमें त्वचा सबसे बाह्य धातु है, और शुक्र सबसे अन्दर की धातु है। शुक्र से बाह्य अस्थियों में रहने वाली मज्जा है; मज्जा से बाह्य अस्थि नाम की धातु है; अस्थियों से बाह्य शरीर की स्नायु अर्थात् नाडि़याँ है; नाडी से बाह्य मांस नामक धातु है; मांस से बाह्य रक्त नामक धातु है; और रक्त से भी बाह्य त्वचा नामक धातु है। शरीर में इनका सन्निवेश इसी क्रम से जानना चाहिए। इन्हीं के आधार पर ही शरीर में स्थिरता है।