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Vibhuti Paada / Attainments / 30
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Vibhuti Paada / Attainments / 30

कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः॥३०॥

Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 30

In Hindi:

पदपाठ : कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः॥

हिंदी में अर्थ : (कण्ठकूपे) कण्ठकूप में संयम करने से (क्षुत्पिपासानिवृत्तिः) क्षुत्-पिपासा = भूख-प्यास की निवृत्ति हो जाती है॥

व्यास भाष्य : जिह्वाया अधस्तात्तन्तुः। ततोऽधस्तात्कण्ठः। ततोऽधस्तात्कूपः। तत्र संयमात्क्षुत्पिपासे न बाधेते॥

हिंदी में अर्थ : (जिह्वायाः) जिह्वा के (अधस्तात्) अधोभाग = नीचे (तन्तुः) तन्तु = जिह्वासूत्र है। (ततः) उस तन्तु के (अधस्तात्) नीचे (कण्ठः) कण्ठ है; (ततः) उस कण्ठ के (अधस्तात्) नीचे (कूपः) कूप = गर्तविशेष है। (तत्र) उस कण्ठकूप में (संयमात्) संयम करने से योगी को (क्षुत्पिपासे) भूख और प्यास (न बाधेते) बाधित नहीं करती॥

वैदिक योग मीमांसा : योगी पुरुष द्वारा कण्ठकूप में संयम करने से भूख और प्यास की निवृत्ति होती है। जिह्वा के अधोभाग में तन्तु है, उस तन्तु के नीचे कण्ठ है, और वहाँ कण्ठ से नीचे जो गर्ताकार स्थान है वह कण्ठकूप कहलाता है। इस कण्ठकूप में संयम करने से भूख और प्यास की निवृत्ति होना कहा गया है। क्योंकि इस कण्ठकूप में प्राण वायु के स्पर्श से प्राणी में भूख और प्यास की उत्पत्ति = अनुभूति होती है। अतः संयम द्वारा उस स्थान में प्राण निरोध पर्वूक योगी क्षुत्पिपासा निवृत्ति को प्राप्त करता है।

इस विषय में आधुनिक पौराणिक भाष्यकारों का मानना है कि यह भूख-प्यास की निवृत्ति बहुत लम्बे काल के लिए और आजीवन भी होती है। परन्तु इस प्रकार का कोई भी निष्कर्ष व्यासभाष्य के आधार पर निकालना सम्भव नहीं है, और न ही भोजवृत्ति में भी ऐसा कोई संकेत है। इन दोनों ही भाष्यों में कालवाचक कोई शब्द नहीं है। साधारण रूप से व्यक्ति शरीर की क्षमता के अनुसार, एक काल तक ही, भूख-प्यास को रोकने में समर्थ होता है। इस विषय में छान्दोग्योपनिषद् ६.७.१-६ तक का प्रकरण द्रष्टव्य है। यहाँ ऋषि आरुणि अपने पुत्र श्वेतकेतु को तत्त्वोपासना का उपदेश कर रहे हैं —

षोडशकलः सोम्य! पुरुषः पञ्चदशाहानि माशीः काममपः पिबाऽऽपोमयः प्राणो न पिबतो विच्छेत्स्यत इति॥ १॥ स ह पञ्चदशाहानि नाऽऽशाथ हैनमुपससाद। किं ब्रवीमि भो इत्यृचः सोम्य! यजूᳬषि सामानीति। स होवाच न वै मा प्रतिभान्ति भो इति॥२॥ तᳬ होवाच यथा सोम्य! महतोऽभ्याहितस्येकोऽङ्गारः खद्योतमात्रः परिशिष्टः स्यात्तेन ततोऽपि न बहु दहेदेवᳬ सोम्य! ते षोडशानां कलानामेका कलाऽतिशिष्टा स्यात्तयैतर्हि वेदान्नानुभ्वस्यशान॥३॥ अथ मे विज्ञास्यसीति। स हाशाथ हैनमुपससाद। तᳬ ह यत्किञ्च पप्रच्छ सर्वᳬह प्रतिपेदे। तᳬहोवाच॥४॥

अर्थात् हे सौम्य! पुरुष षोडशकाल है। पन्द्रह दिन भोजन मत करो, परन्तु यथेच्छ जल पियो। जल को पीते हुए तेरा प्राण शरीर से वियुक्त नहीं होगा, क्योंकि जलमय प्राण है॥१॥ उस श्वेतकेतु ने पन्द्रह दिन भोजन नहीं किया। तत्पश्चात् (अर्थात् सोलहवें दिन) अपने पिता के निकट आया और बोला कि हे भगवन्! मैं क्या कहूँ। पिता — हे सौम्य! ऋग्, यजु और सामवेद को कहो। वह बोला — हे भगवन्! मुझे कुछ नहीं प्रतिभात होता है। अर्थात् इस समय मुझे ऋग्वेदादि कुछ भी मन में नहीं आता है॥२॥ उससे (उसका पिता) बोले कि हे सौम्य! जैसे महान् और वृद्धि को प्राप्त अग्नि का खद्योतमात्र एक ही अङ्गार अवशिष्ट रह जाय तो उस अङ्गार से उससे भी लघुतर (वस्तु) को अग्नि नहीं जला सकता। हे सौम्य! वैसे ही तेरी षोडश कलाओं के बीच एक ही कला अवशिष्ट रह गई है इस हेतु अभी उस (अवशिष्ट कला) से वेदों का अनुभव नहीं कर रहे हो, जाओ भोजन करो॥३॥ तब तुम मेरे कथन को जानोगे। उसने भोजन किया। अनन्तर वह अपने पिता के निकट आया। तब उससे पिता ने जो कुछ पूछा उसने उस सब का उत्तर दिया॥४॥

इस प्रकरण में ऋषिपुत्र श्वेतकेतु पन्द्रह दिन के भोजन त्याग और मात्र जल ग्रहण से किसी प्रकार के वेदादि के ज्ञान से को कहने में असमर्थ हो गए। इसी प्रकार छान्दोग्योपनिषद् ७.९.१ में कहा है —

अन्नं वाव बलाद्भूयस्तस्माद्यद्यपि दशरात्रीर्नाश्नीयाद्यद्यु ह जीवेदवथाऽद्रष्टाऽश्रोताऽमन्ता-ऽबोद्धाऽकर्त्ताऽविज्ञाता भवत्यथाऽन्नस्याऽऽये द्रष्टा भवति। श्रोता भवति। मन्ता भवति। बोद्धा भवति। कर्त्ता भवति। विज्ञाता भवत्यन्नमुपास्वेति॥

अर्थात् अन्न ही बल से अधिक है। उस हेतु यद्यपि कोई दशरात्रि भोजन न करे तो वह जीवित न रहे, अथवा कदाचित् जीवित रहे तो कष्ट से जीवित रहे, तथापि जीवित रहने पर भी वह अद्रष्टा, अश्रोता, अमन्ता, अबोद्धा, अकर्त्ता, अविज्ञाता होता है। फिर यदि अन्न की प्राप्ति हो तो द्रष्टा, श्रोता, मन्ता, बोद्धा, कर्त्ता, विज्ञाता होता है। इस कारण अन्न की उपासना करो।

शुष्यति वै प्राण ऋतेऽन्नात्॥ बृहदा॰ ५.१२.१॥

अर्थात् अन्न के बिना प्राण शुष्क हो जाता है। अतः इन प्रमाणों के सन्दर्भ में बहुकाल पर्यन्त अथवा आजीवन भूख-प्यास की निवृत्ति मानना प्रमाणानुकूल नहीं हो सकता।

यह सत्य है कि योगी योगाभ्यास काल में अन्न ग्रहण को सूक्ष्म कर लेता है, इस प्रकार वह इतना ही अन्न लेता है जो कि शरीर की पुष्टि के लिए आवश्यक होता है। इस प्रकार से शरीर की पौष्टिकता हेतु सूक्ष्म अन्न आदि द्वारा वह क्षुधा-पिपासा पर नियन्त्रण करता है।

यहाँ यह जानना चाहिए कि यह सिद्धि ज्ञानात्मक न होकर अनुभवात्मक है। इसमें किसी काल विशेष में कण्ठकूप में संयम से उसके उपरान्त अर्थात् संयम के काल के उपरान्त भी सिद्धि का लगातार बना रहना उचित नहीं जानना चाहिए, जैसे एक काल में भोजन करने के पश्चात् सामान्य पुरुष को दूसरे दिन भी भूख-प्यास की निवृत्ति हेतु भोजन करना होता है। दूसरी ओर ज्ञानात्मक सिद्धियों में अपने संयम के विषय से होने वाली सिद्धि का ज्ञान, उस विषय में संयम समाप्त होने के उपरान्त भी बना रहता है। यही, इस क्षुधा-पिपासा रूप अनुभवात्मक सिद्धि और अन्य ज्ञानात्मक सिद्धियों में अन्तर है। इसलिये यह कदापि नहीं माना जा सकता कि कण्ठकूप में संयम के बल से क्षुधा-पिपासा की निवृत्ति का एक काल में अनुभव हो जाने पर उसके पश्चात् के काल में भी क्षुधा-पिपासा, अन्य ज्ञानात्मक सिद्धियों के अनुसार, की निवृत्ति बनी रहेगी। अतः योगी को, कण्ठकूप में संयम द्वारा कुछ काल विशेष तक, अपने शरीर की क्षमतानुसार, भूख-प्यास की निवृत्ति हो जाती है। जो साधक लम्बे काल तक क्षुधा-पिपासा की निवृत्ति का अनुभव करना चाहता हो, उसे समय-समय पर कण्ठकूप में संयम का सम्पादन करना होगा। ऐसी स्थिति में ऐसा साधक द्वारा इसी संयम में अधिक समय लगाने से, इससे उच्च भूमियों में संयम का सम्पादन करने में असमर्थ रहेगा। अतः सर्ववृत्तिनिरोध का लक्ष्य करने वाले साधक को, यह सिद्धि भी, महर्षि पतञ्जलि द्वारा योगसूत्र ३.३७ के निर्देशानुसार, उपसर्ग ही जाननी चाहिए।