In Hindi:
पदपाठ : त्रयम् एकत्र संयमः॥
हिंदी में अर्थ : (त्रयम्) धारणा, ध्यान और समाधि का (एकत्र) एक विषयक होना (संयमः) संयम है॥
महर्षि दयानन्द कृत अर्थ : (त्रयमेकत्र०) जिस देश में धारणा की जाय, उसी में ध्यान और उसी में समाधि अर्थात् ध्यान करने योग्य परमेश्वर में मग्न हो जाने को संयम कहते हैं, जो एक ही काल में तीनों का मेल होना है, अर्थात् धारणा से संयुक्त ध्यान और ध्यान से संयुक्त समाधि होती है। उनमें बहुत सूक्ष्म काल का भेद रहता है, परन्तु जब समाधि होती है तब आनन्द के बीच में तीनों का फल एक ही हो जाता है। (ऋ० भू॰ उपासनाविषय)
व्यास भाष्य : तदेतद्धारणाध्यानसमाधित्रयमेकत्र संयमः। एकविषयाणि त्रीणि साधनानि संयम इत्युच्यते। तदस्य त्रयस्य तान्त्रिकी परिभाषा संयम इति॥
हिंदी में अर्थ : (तत् एतत्) वह यह (धारणाध्यानसमाधित्रयम्) धारणा, ध्यान और समाधि — तीनों का (एकत्र) एक विषयक होना (संयमः) संयम है। अर्थात् (एकविषयाणि) एक विषय में किए गए (त्रीणि साधनानि) धारणा, ध्यान और समाधि रूपी साधन (संयमः) संयम (इति उच्यते) कहे जाते हैं। (तत् अस्य त्रयस्य) वह यह तीनों के समुदाय की (तान्त्रिकी परिभाषा) योगशास्त्र में परिभाषा (संयमः इति) संयम है॥
वैदिक योग मीमांसा : महर्षि पतञ्जलि ने विभूति पाद में विभिन्न विषयों में संयम से होने वाली सिद्धियों को कहा है। यह संयम क्या है ? इसको स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब धारणा, ध्यान और समाधि एक विषय में होते हैं तो इन तीनों का नाम “संयम” होता है। संयम की यह परिभाषा योगशास्त्र के लिए ही मान्य है। अन्यथा तो लोक व्यवहार में मन पर नियन्त्रण को संयम कहते हैं। परन्तु योग शास्त्र में जिस-जिस विषय में संयम कहा जायेगा, वहाँ उस-उस विषय में ही धारणा, ध्यान और समाधि का होना आवश्यक होगा। इसका अभिप्राय यह है कि उसी विषय में धारणा की जाए, उसी विषय में ध्यान = सदृश प्रवाह का होना और उसी विषय में समाधि अर्थात् उसी विषय की अर्थमात्र प्रतीति होनी चाहिए। यदि यह तीनों एक से अधिक विषयों में होगें, तो योगशास्त्र की परिभाषा में वह संयम नहीं कहलायेगा तथा जो विभूतियाँ महर्षि पतञ्जलि ने उस-उस विषय में संयम को करने से प्रतिपादित की हैं, साधक उन्हें प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगा। अतः किसी भी विभूति अथवा सिद्धि की प्राप्ति हेतु संयम वाले विषय में ही धारणा, ध्यान और समाधि का होना प्राथमिक आवश्यकता है।
जिस प्रकार विभिन्न विभूतियों हेतु, विभिन्न विषयों में संयम आवश्यक है; उसी प्रकार जीवात्मा के परम लक्ष्य परमात्मा, जिसको कि शास्त्रकारों ने ध्यान करने योग्य कहा है, की प्राप्ति हेतु भी धारणा, ध्यान और समाधि का विषय परमात्मा ही होना चाहिए अन्यथा परमात्मा की प्राप्ति सम्भव नहीं होगी। परमात्मा के वाचक ओ३म् की धारणा और उसका जप, परमात्मा के ज्ञान का सदृश प्रवाह रूपी ध्यान, तदनन्तर परमात्मा का ही ज्ञान मात्र रहने (समाधि) से ही परमात्मा की प्राप्ति सम्भव होती है। और परमात्मा में संयम करने का फल है — परमात्मा के स्वरूप में जीवात्मा का मग्न हो जाना।
जो लोग धारणा हेतु बाह्य देश आदि को स्वीकार करते हैं, उनकी मान्यता यहाँ खण्डित हो जाती है। क्योंकि ध्यान और समाधि, दोनों ही, धारणागत तथाकथित बाह्यदेशों में हो ही नहीं सकते। ध्यान और समाधि चित्तगत ही होते हैं। न तो महर्षि पतञ्जलि और न ही महर्षि व्यास, ध्यान और समाधि को चित्त से अन्यत्र कहीं और मानते हैं। महर्षि पतञ्जलि द्वारा प्रतिपादित संयम के विषयों में, सूर्य चन्द्र और ध्रुव को छोड़कर (वर्त्तमान के बहुसंख्यक भाष्यकारों की मान्यता के अनुसार), कोई भी बाह्य देश नहीं है। वस्तुतः सूर्य, चन्द्र और ध्रुव भी संयम हेतु बाह्य देश नहीं है, इनका वास्तविक स्पष्टीकरण योगसूत्र ३.२६ से ३.२८ में किया गया है।
महर्षि दयानन्द कहते है कि — जिस देश में धारणा की जाय, उसी में ध्यान और उसी में समाधि .......। जब महर्षि पतञ्जलि और महर्षि व्यास के अनुसार ध्यान और समाधि का बाह्यदेशों से सम्बन्ध ही नहीं है तो धारणा हेतु कथित ‘‘देश’’ को चित्त से भिन्न शरीर का अन्तः देश ही मानना होगा यथा नाभि, हृदय, मूर्धाज्योति, नेत्र, नासिकाग्र, जिह्वाग्र आदि। इन्हीं देशों में वृत्तिमात्र से चित्त को स्थिर कर, आलम्बन के विषय में मन को लगाना धारणा कहलाती है। उसी आलम्बित विषय में ही ध्यान और समाधि होने से किसी भी विषय का संयम होता है। योग सूत्र ३.१ की व्याख्या में भी यह स्पष्ट कर दिया है कि महर्षि व्यास ने अपने भाष्य में “बाह्य वा विषये” कहा है न कि “बाह्य वा देशे”। अतः संयम हेतु, धारणा का विषय, किसी बाह्यदेश को मानना योगदर्शन में प्रतिपादित सिद्धान्तों के प्रतिकूल है। हमने योगसूत्र ३.१ की व्याख्या में यह भी स्पष्ट किया है कि धारणा हेतु देश गौण और आलम्बित विषय ही प्रधान होता है, जिसमें ध्यान और समाधि को प्राप्त करना होता है।