Vibhuti Paada / Attainments / 31
कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्॥३१॥
Padas Name : Vibhuti Paada / Attainments | Sutra No : 31
In Hindi:
पदपाठ : कूर्मनाड्याम् स्थैर्यम्॥
हिंदी में अर्थ : (कूर्मनाड्याम्) कूर्म नाड़ी = कछुवे के आकार की नाड़ी में संयम करने से (स्थैर्यम्) स्थिरता की प्राप्ति होती है॥
व्यास भाष्य : कूपादध उरसि कूर्माकारा नाडी, तस्यां कृतसंयमः स्थिरपदं लभते, यथा सर्पो गोधा वेति॥
हिंदी में अर्थ : (कूपात्) उस कण्ठकूप से (अधः) नीचे (उरसि) वक्षःस्थल में स्थित (कूर्माकारा नाडी) कूर्म = कछुवे के आकार की नाड़ी है। (तस्याम्) उस नाड़ी में (कृतसंयमः) संयम करने वाला योगी (स्थिरपदम्) स्थिर स्थिति को (लभते) प्राप्त करता है। (यथा) जैसे (सर्पः गोधा वा इति) साँप और गोधा = गोह स्थिर हो जाते हैं॥
वैदिक योग मीमांसा : इस सूत्र में कूर्माकार = कछुवे के आकार की नाड़ी में संयम से होने वाली सिद्धि को कहा है। उपर्युक्त कण्ठकूप से नीचे वक्षस्थल में एक कछुवे के आकार की नाड़ी होती है, उसे कूर्मनाड़ी कहा जाता है। साधक जब उस कूर्मनाड़ी में संयम करता है, तो वह स्थिरपद = स्थिरता को प्राप्त करता है; और यह स्थिरता शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार की होती है। संयम रूपी मानसिक कर्म से होने वाली मानसिक स्थिरता तो अपेक्षित है ही, जिसे भोज ने भी स्पष्ट रूप से अपने भाष्य में कहा है। परन्तु महर्षि व्यास ने शारीरिक स्थिरता की प्राप्ति को दो उदाहरणों से कहा है — यथा सर्पो गोधा वेति — अर्थात् जैसे सर्प और गोधा स्वेच्छा से स्थिरता को प्राप्त करते हैं।
साँप की स्थिरता बिल में प्रवेश करते हुए देखी जाती है, उस समय उसे कितना ही बलशाली व्यक्ति वापिस खीचने का प्रयास करे, परन्तु वह खीचा नहीं जाता। इसी प्रकार गोधा का प्रयोग युद्ध के समय किले आदि की तथा ऊँची दीवारों पर चढ़ने हेतु किया जाता है। गोधा = गोह के पैर में रस्सी बाँध कर उस किले की चाहरदीवारी के ऊपर फैंक दिया जाता है और उसी रस्सी के सहारे योद्धा ऊपर चढ़ जाते हैं। ये दोनों प्रकार की स्थिरता के उदाहरण शारीरिक स्थिरता के हैं। अतः मानसिक के साथ शारीरिक स्थिरता की प्राप्ति भी कूर्मनाड़ी के संयम से योगी को होती है, ऐसा जानना चाहिए।